संपादकीय लेख


Volume-43, 13-19 January, 2017

 
भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग क्षेत्र में रोजग़ार सृजन की व्यापक संभावनाएं

डा. रंजीत मेहता

ऐतिहासिक रूप से समाज हमेशा जल स्रोतों के आसपास स्थित रहा है क्योंकि मुख्यत: जल के जरिए परिवहन का आवागमन आसान रहता है. आर्थिक विकास के इतिहास के विभिन्न चरणों में जलमार्गों ने आर्थिक संपदा के निर्माण में सहायता की है. औपनिवेशिक काल के दौरान, 1877 में जब वह अपने चरम पर था, देशी कार्गो नौकाएं 180,000 कोलकाता में, 124,000 हुगली में और 62,000 पटना में पंजीकृत की गईं. आज बेड़े की संख्या उल्लेख के लायक भी नहीं है, जो कि सूचनात्मक दृष्टि से संभवत: कऱीब 500 है.  
पुराने समय से ही नदियों ने लोगों और वस्तुओं को लंबी दूरियों तक ले जाने के लिये प्रभावी जलमार्गों के तौर पर सेवा की है. आज के दिन भी बहुत से देश अंतर्देशीय जल परिवहन पर, विशेषकर बड़े और भारी कार्गो के लिये अंतर्देशीय जल परिवहन पर निर्भर करते हैं, क्योंकि सडक़ या रेल से वस्तुओं की ढुलाई की अपेक्षा यह एक सस्ता, अधिक भरोसेमंद और कम से कम प्रदूषणकारक होता है.
सरकार इस सस्ते और हरित परिवहन स्रोत के विकास के लिये प्रतिबद्ध है. यद्यपि ज्यादातर वस्तुओं की ढुलाई भीड़भाड़ वाली सडक़ों और रेल नेटवर्कों के जरिए होती है, जिससे कार्गो की धीमी पहुंच और अनिश्चितता तथा व्यापार लागत में वृद्धि होती है. भारत में संभारतंत्र की लागत देश के सकल घरेलू उत्पाद की कम से कम 18 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है.
भारत के पास नदियों, नहरों, अप्रवाही जल और खाडिय़ों के रूप में अंतर्देशीय जलमार्गों का सघन नेटवर्क है. कुल जहाजरानी योग्य लंबाई 14,500 कि.मी. है, जिसमें से कऱीब 5200 कि.मी. नदियों और 4000 कि.मी. नहरों का यंत्रीकृत क्राफ्टस के जरिये इस्तेमाल किया जा सकता है. दूसरे बड़े देशों और अमरीका, चीन और यूरोपीय संघ जैसे व्यापक भौगोलिक क्षेत्र रखने वाले देशों की तुलना में भारत में माल ढुलाई के लिये जलमार्गों का बेहद कम उपयोग होता है. अमरीका के 21 प्रतिशत के आंकड़े की तुलना में भारत में कुल सामान ढुलाई (टन किलोमीटर में) के दृष्टिगत अंतर्देशीय यातायात का मात्र 0.1 प्रतिशत अंतर्देशीय जलमार्ग से होता है. संगठित रूप में कार्गो परिवहन गोवा, पश्चिम बंगाल, असम और केरल में कुछेक जलमार्गों तक ही सीमित है.
भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (‘‘भा.अं.ज.प्रा.’’), भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985 के अधीन गठित एक सांविधिक प्राधिकरण, जिस पर अन्य बातों के साथ-साथ राष्ट्रीय जलमार्गों पर अवसंरचना विकास और अनुरक्षण कार्यों की जिम्मेदारी है, ने भारत में नौ-परिवहन में सुधार के दृष्टिगत राष्ट्रीय जलमार्गों के तौर पर कुल मिलाकर 4382 किलोमीटर के 5 जलमार्गों को निर्धारित किया है. भा.अं.ज.प्रा. संयुक्त उद्यम मार्ग के जरिए अंतर्देशीय जल परिवहन में कुछ निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने में सफल रहा है, जिनमें से एक विवादा अंतर्देशीय जलमार्ग लिमिटेड है जो कि मुख्यत: कोलकाता से नियंत्रित होता है.
भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1985 को संशोधित करने के वास्ते हाल में राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016 अधिनियमित किया गया. संशोधनों के जरिए 106 अतिरिक्त अंतर्देशीय जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्गोंके तौर पर शामिल किया गया, जिससे राष्ट्रीय जलमार्गों की कुल संख्या मौजूदा पांच राष्ट्रीय जलमार्गों से बढक़र 111 हो गई. इसके अलावा, 2016 के अधिनियम में पांच कानूनों (पांच अधिसूचित राष्ट्रीय जलमार्गों से संबंधित) को भी निरस्त कर दिया गया जिनसे अलग से 5 राष्ट्रीय जलमार्गों संबंधी संव्यवहार होता था और इन्हें नये अधिनियम में शामिल कर लिया गया है. अतिरिक्त राष्ट्रीय जलमार्गों की घोषणा से देश भर में नदियों के मार्ग से वस्तुओं और यात्रियों के लाने-ले जाने में महत्वपूर्ण बदलाव लाने में सहायता मिलेगी.
अंतर्देशीय जलमार्गों को प्रोत्साहन के लिये कदम
चूंकि अनेक भारतीय शहर नदियों से जुड़े हैं, समूचे देश के भीतर बहने वाली नदियों की क्षमता में वृद्धि करने के लिये धरोहर स्थलों को जोडऩे का एक मार्ग नदी क्रूजों का विकास और संवद्र्धन है. दरअसल, इस संबंध में स्वागत योग्य विकास हुआ है. एम.वी. महाबाहुनामक एक नदी क्रूज नौका ब्रह्मपुत्र नदी में संचालित की जाती है. इसके अलावा, चैपियन्स याचट क्लब ने हाल में क्रूज पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के वास्ते कृष्णा नदी में तनवीनामक नदी क्रूज की शुरूआत की है.
111 राष्ट्रीय जलमार्गों की घोषणा के बाद, पूर्व में घोषित 5 राष्ट्रीय जलमार्गों सहित, 12 अप्रैल, 2016 से ये अस्तित्व में आ गये. नये राष्ट्रीय जलमार्गों की तकनीकी- आर्थिक संभाव्यता अध्ययन/ विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया आरंभ कर दी गई. अब तक प्राप्त संभाव्यता रिपोर्टों के अनुसार, अगले तीन सालों में 32 नये राष्ट्रीय जलमार्गों और पूर्व में घोषित पांच राष्ट्रीय जलमार्गों का विकास किया जाना है. इन 32 नये राष्ट्रीय जलमार्गों में से 8 जलमार्गों के लिये विस्तृत परियोजना रिपोर्टें उपलब्ध हैं. शेष 24 जलमार्गों की डीपीआर तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.
उपलब्ध डीपीआर के आधार पर चरण-1 के तहत प्रस्तावित सिल्चर-बंगा (70 कि.मी.) खण्ड के लिये उचित मार्ग विकास और नौवहन सहायता के लिये बराक नदी (एनडब्ल्यू-16) का विकास कार्य शुरू कर दिया गया है. जलमार्ग विकास परियोजना-1500-2000टी जहाजों के नौवहन की सुविधा से हल्दिया से वाराणसी तक (चरण-1) राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (गंगा नदी) के क्षमता विस्तार के लिये परियोजना. परियोजना में विभिन्न उप-परियोजनाएं, जैसे कि उचित मार्ग विकास, जहाजरानी सहायता, वाराणसी, साहिबगंज और हल्दिया में मल्टी-मॉडल टर्मिनलों का निर्माण, फरक्का में नये जहाजरानी लॉक का  निर्माण, तट संरक्षण कार्य, एलएनजी  नौकाएं आदि शामिल हैं. परियोजना विश्व बैंक की रु. 5639 करोड़ की अनुमानित           लागत की तकनीकी सहायता के साथ शुरू की गई है.
उप-परियोजनाओं के विकास की स्थिति निम्नानुसार है: क) वाराणसी में मल्टी मॉडल टर्मिनल , चरण-1 के निर्माण के लिये कार्य आदेश (क), मुख्यत: अपतटीय कार्य 13.05.2016 को रु. 169.70 करोड़ की लागत पर प्रदान कर दिया गया था और कार्य आरंभ हो चुका है. यह कार्य 26 महीनों में पूरा करना निश्चित किया गया है. ख) साहिबगंज में मल्टीमॉडल टर्मिनल, टर्मिनल के चरण-1 के निर्माण का कार्य रु. 280.90 की लागत पर 27.10.2016 को प्रदान किया गया। कार्य 30 माह में पूरा किया जाना निर्धारित है. ग) फरक्का में नये जहाजरानी लॉक का निर्माण, निविदा प्रक्रिया पूरी हो गई है और कार्य रु. 359.19 करोड़ की लागत पर 15.11.2016 को प्रदान कर दिया गया. कार्य 30 महीनों में पूरा किया जाना निर्धारित है. घ) हल्दिया में मल्टीमॉडल टर्मिनल. हल्दिया डॉक काम्पलेक्स में 61 एकड़ भूमि कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट से 30 वर्षों की लीज पर ले ली गई है. टर्मिनल के चरण1 के लिये निविदा प्रक्रिया अग्रिम चरण में है. कार्य सौंपे जाने की तिथि से 30 माह के भीतर कार्य को पूरा किया जाना निर्धारित है.
पर्यावरणीय चिंताओं का निदान
कऱीब सौ वर्ष पहले तक गंगा नदी भी एक व्यस्त जलमार्ग था. परंतु रेलवे के आने के साथ ही इस जल मार्ग का प्रयोग बंद हो गया। भारत सरकार अब पूर्वी समुद्री बंदरगाह हल्दिया से वाराणसी तक फैरी कार्गो के लिये राष्ट्रीय जलमार्ग 1 अथवा एनडब्ल्यू-1 के तौर पर जाने जाने वाले करीब 1360 कि.मी. अंतर्देशीय गंगा जल मार्ग को बहाल कर रही है. जलमार्ग उत्तरी भारत के लिये प्रमुख रसद धमनी के तौर पर उभरने की क्षमता रखता है.
कोलकाता और दिल्ली के बीच जलमार्ग का खण्ड भारत के सबसे सघन जनसांख्यिकी क्षेत्रों से होकर गुजरता है. भारत के कुल व्यापार वस्तुओं का कऱीब चालीस प्रतिशत या तो इस संसाधन बहुल क्षेत्र से शुरू होता है अथवा इसके महत्वूर्ण बाज़ारों के लिये गंतव्य स्थल होता है. यद्यपि यह क्षेत्र अनुमानित कऱीब 370 मिलियन टन वार्षिक माल ढुलाई का शुरूआती स्थल होता है, वर्तमान में इसका मामूली-सा हिस्सा-कऱीब 5 मिलियन टन का परिवहन जल मार्ग से होता है.
वर्तमान में गांगेय प्रदेशों बिहार और उत्तर प्रदेश से कार्गो सर्वाधिक नजदीक कोलकाता बंदरगाह पहुंचने की बजाए महाराष्ट्र में मुंबई और गुजरात में कांडला समुद्री बंदरगाहों तक सडक़ मार्गों से पहुंचता है. एनडब्ल्यू 1 के विकास से इन राज्यों को कोलकाता-हल्दिया परिसर में सीधे अपना कुल माल भेजने में सहायता मिलेगी जिससे माल ढुलाई विश्वसनीय होगी और काफी हद तक संभारतंत्र की लागत में कमी आयेगी.
विश्व बैंक 375 मिलियन अमरीकी डॉलर के ऋण के साथ गंगा जलमार्ग के विकास का वित्तपोषण कर रहा है. राष्ट्रीय जलमार्ग 1 परियोजना के क्षमता विस्तार से यह सुनिश्चित करने लिये अपेक्षित अवसंरचना और सेवाओं को जुटाने में सहायता मिलेगी कि एनडब्ल्यू1 इस महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्र में एक कुशल परिवहन जरिये के तौर पर उभरे.
प्रचालन में आ जाने पर जल मार्ग नदी के साथ-साथ नियोजित व्यापक मल्टी-मॉडल परिवहन नेटवर्क का हिस्सा बन जायेगा. यह पूर्वी डेडीकेटेड रेल फ्रेट कोरीडोर के साथ जुडऩे के साथ-साथ क्षेत्र के मौजूदा राजमार्गों के नेटवर्क के साथ जुड़ जायेगा. जल, सडक़ और रेल मार्ग का यह हब क्षेत्र के उद्योगों और विनिर्माण इकाइयों में परिवहन के विभिन्न माध्यमों को आसानी से अपनाने में सहायक होगा क्योंकि वे अपने सामानों को भारत और विश्व के बाज़ारों में भेजते हैं. कृषि कार्यों के धनी गांगेय मैदानी क्षेत्र में किसानों को फायदा होगा क्योंकि जलमार्ग से उनके लिये नये बाज़ारों का रास्ता खुलेगा.
चूंकि गंगा का देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय परिदृश्य में विशेष स्थान है, भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण ने नदी को नौवहन योग्य बनाने के कम से कम दखलंदाज़ी के तरीके अपनाये हैं. अत: इसने गंगा जलमार्ग की योजना बनाते समय प्रकृति के अनुकूल कार्य के सिद्धांत को अपनाया है. 
दुनिया की प्रमुख नदी जल धाराओं से भिन्न गंगा एक मौसमी नदी है जो कि मानसून की वर्षा के साथ चढ़ती है और सर्दियों के खुष्क मौसम में इसका जल भराव क्षेत्र कम हो जाता है. जबकि छोटी नौकाएं इस मौसमी नदी में चलाई जा सकती हैं, बड़े कार्गो जहाजों के लिये नौकायन के लिये न्यूनतम गहराई की आवश्यकता होती है. अत: नदी में पानी की अलग-अलग गहराइयों के कारण गंगा में नौवहन सीमित हो जाता है. वर्तमान में यातायात मुख्यत: फरक्का और हल्दिया के बीच नदी के निचले खण्ड तक सीमित रहता है जहां वर्ष भर नौकाओं के परिचालन के लिये पर्याप्त 2.5 मी. से 3.0 मी. तक की पानी की  गहराई होती है.
मोटे तौर पर, ऐसी नदी को नौवहन योग्य बनाने के लिये बड़ी नौकाओं, विशेषकर 2000 टन कार्गो ले जाने वाले बड़े जहाजों के लिये अपेक्षित गहराई पाने के लिये बड़े पैमाने पर नदी के किनारे की खुदाई करनी पड़ेगी. गंगा के मामले में न्यूनतम खुदाई की आवश्यकता के साथ ऐसी नौकाओं को समायोजित करने के लिये विशेष ध्यान दिया गया है.
नदी के सर्वाधिक गहरे हिस्से में 45 मीटर चौड़े चैनल को चिन्हित किया गया है और खुदाई कम करने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नौवहन के लिये कम से कम उपलब्ध गइराई का निर्धारण किया गया है. अत: विभिन्न खण्डों में नदी की प्राकृतिक गहराई के अनुरूप चैनल की गहराई रखी गई है और बड़े जहाजों के दोनों तरफ से आने जाने के लिये पर्याप्त रहती है.
इन उपायों से नदी के 10-11 मिलियन क्यूबिक मीटर के वार्षिक गाद लोड के मात्र 1.5 प्रतिशत तक की खुदाई की आवश्यकता कम होगी. यहां तक कि यह सीमित खुदाई केवल तभी की जायेगी जब बहुत ही आवश्यक होगा और वह भी आधुनिक, कम घुसपैठ वाली प्रौद्योगिकियों के जरिए किया जायेगा. इन प्रौद्योगिकियों में जल इंजेक्शन पद्धति का प्रस्ताव किया गया है जिसमें जमा हुई गाद को तरल बनाने के लिये पानी के दबाव का इस्तेमाल किया जायेगा और उसे बाहर खींच लिया जायेगा. इसके परिणामस्वरूप प्राप्त सघन गाद को  यह सुनिश्चित करते हुए कि तलछट नदी की पारिस्थितिकी में बना रहे, उसे नदी के किनारे प्राकृतिक रूप से जमा कर दिया जायेगा.
जहां कहीं बड़े झुंड और द्वीप मौजूद हैं, प्राकृतिक सामग्रियों जैसे कि बांस आदि से बने अस्थाई ढांचे पानी के प्रवाह को चैनलबद्ध करने के लिये खड़े कर दिये जायेंगे. ये अस्थाई ढांचे
-अथवा बंडल‘, जिस भी नाम से हैं,
-गंगा की विविध जीव जंतुओं की संरक्षा के लिये जलजीव विहारों के आसपास बनाये जायेंगे.  खुदाई की आवश्यकता को कम करने के लिये भी अनुबंध तैयार किये जायेंगे.
भा.अं.ज.प्रा. यह भी सुनिश्चित कर रहा है कि जल यातायात दो जीव विहारों को प्रभावित न करे जो कि नदी के इस खण्ड के मध्य में आते हैं-वाराणसी में काशी    कछुआ विहार और भागलपुर में विक्रमशीला डोल्फिन विहार.
पहले कदम के तौर पर इन संरक्षित जलजीव क्षेत्रों और वैटलैंड्स जैसे अन्य संवेदनशील क्षेत्रों के बारे में सूचना को विश्व बैंक समर्थित परियोजना के अधीन विकसित की जा रही नई नदी सूचना प्रणाली में शामिल किया जायेगा. इससे यह सुनिश्चित होगा कि इन क्षेत्रों में चलने वाली नौकाएं प्रचालन ढांचे का अनुपालन करें          जो कि संवेदनशील क्षेत्रों में न्यूनतम प्रभाव के लिये लागू किया गया है. इस ढांचे में शामिल हैं:
*संरक्षित हैबिटैट क्षेत्रों में खुदाई पर प्रतिबंध
द्यअन्य क्षेत्रों में जिन्हें मूल्यवान जलजीव प्रजातियों के आवास के तौर पर जाना जाता है, प्रजनन और स्पॉन सीजन में खुदाई की अनुमति नहीं दी जायेगी.
*विहारों के संरक्षित क्षेत्रों के आसपास नौका परिवहन 5 कि.मी. प्रति घण्टा तक सीमित रहेगा.
*गंगा में संचालित सभी नौकाओं में शोर नियंत्रण और पशु अपवर्जन उपकरण लगाये जायेंगे ताकि जलजीवों का जीवन अनावश्यक प्रभावित न हो.
*सभी नौकाओं को नदी में न्यूनतम ठोस और तरल कचड़ा प्रवाह और न्यूनतम जैव विविधता दुष्प्रभाव का अनुपालन सुनिश्चित करना होगा.
अंतर्देशीय जलमार्ग नौकाएं वर्तमान में डीजल से चलती हैं. पर्यावरण अनुकूल और लागत प्रभावी ईंधन का इस्तेमाल सुनिश्चित करने के प्रयास के तहत, अंतर्देशीय जलमार्ग नौकाओं के लिये ईंधन के तौर पर कम्प्रेश्ड प्राकृतिक गैस (सीएनजी) को अपनाये जाने की व्यापक और तत्काल आवश्यकता है. परंतु ईंधन में किसी बदलाव का सुझाव देने से पहले, उन क्षेत्रों में पर्याप्त सीएनजी पंप स्टेशनों की स्थापना करना आवश्यक है जहां वर्तमान में सीएनजी चालित वाहन नहीं हैं. सीएनजी पंप स्टेशनों की स्थापना करते समय, ऐसे पंप स्टेशनों की वित्तीय व्यवहार्यता पर विचार करना होगा.
नदी किनारों के आसपास पर्यटकों के सुरक्षित और संरक्षित आवागमन, वस्तुओं का ग़ैर-कानूनी परिवहन सुनिश्चित करने के लिये टर्मिनलों और जहाजों के लिये सुरक्षित माहौल उपलब्ध करवाने के प्रयास जारी हैं जो कि संबंधित राज्य सरकारों के लिये चिंता का विषय हैं. उदाहरण के लिये, बिहार सरकार ने गंगा नदी के किनारों पर       कुछेक नदी थाने/पुलिस थानों को अधिसूचित किया है.
नदियों के आसपास रेस्तरां, होटल जैसी सुविधाओं का विकास करने के लिये कुछ लघु, मध्यम और दीर्घावधि योजना अपेक्षित है जिससे कि पर्याप्त सीवर, पानी, विद्युत, टर्मिनल, ईंधन भराई, कचड़ा एवं प्रदूषक शोधन और अन्य सेवाएं और सुविधाएं सुनिश्चित की जा सकें और ऐसे विकास पर्यावरण अनुकूल एवं आर्थिक रूप से व्यवहार्य होने चाहिये. योजना में पर्यावरण अनुकूल उपाय जैसे कि सीवर और कचड़ा शोधन संयंत्र, बरसाती नाले, वर्षा जल संरक्षण प्रणाली और अन्य कचड़ा प्रबंधन प्रणालियों को शामिल किया जाना          चाहिये. विकास के लिये ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित करते समय सरकार को निर्माण पहले और अवसंरचना बाद के अपने दृष्टिकोण को अवसंरचना पहले और निर्माण इसके बाद में परिवर्तित करना होगा. कोई भी सुनियोजित विकास न केवल पर्यावरण अनुकूल स्थायित्व वाला होता है बल्कि व्यापक निवेश के साथ-साथ उपयोग अनुकूल होता है.
उपरोक्त सभी चिंताओं पर विचार करते हुए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जहाजरानी योग्य जलमार्गों और तटीय          तथा नदी सेवाओं की संभावनाओं का परिवहन, पर्यटन और मनोरंजन के एक पूरक और पर्यावरण अनुकूल स्थाई संसाधन के तौर पर विस्तार किये जाने की आवश्यकता है. जलमार्गों और नदी सेवाओं के विकास और नियमन की गहराई से पड़ताल की जानी चाहिये और संबंधित प्राधिकरणों को इस क्षेत्र के विस्तार और क्रांति में बाधक सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करना चाहिये.
निष्कर्ष यह है कि चूंकि अर्थव्यवस्था समन्वित और वैश्वीकरण के साथ आगे बढ़ रही है और अवसंरचना विकास एक प्रमुख क्षेत्र है, ऐसे में व्यापार और वृद्धि के लिये जलमार्ग महत्वपूर्ण हो जायेगा. हाल का राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम जिसके तहत छह से बढ़ा कर 111 अंतर्देशीय नदियां और चैनल राष्ट्रीय राजमार्ग के तौर पर तय किये गये हैं, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. 111 राष्ट्रीय राजमार्गों की सूची पर तेज़ी से नजऱ डालने से अंतरसीमा और क्षेत्रीय सहयोग के लिये व्यापक अवसरों का पता चलता है जैसा कि मोटर वाहनों और विद्युत के क्षेत्र के मामले में है. इसके परिणामस्वरूप आयातकों के खर्च में-बंगलादेश और नेपाल जैसे देशों के संबंध में, व्यापक बचत हो सकती है. यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के दावों को वास्तविकता में बदलना है, इससे भारत दक्षिण एशिया में वैश्विक जलवायु परिवर्तन न्यूनीकरण संबंधी चुनौतियों से निपटने में अग्रणी भूमिका हासिल कर सकता है.
आखिऱकार, यूरोपीय संघ अपने जलमार्गों पर लघु समुद्री नौवहन तकनीक का प्रयोग बढ़ाकर परिवहन क्षेत्र में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के अपने लक्ष्य को हासिल करने में समर्थ रहा. भारत में अंतर्देशीय जल परिवहन के काफी प्रारंभिक चरण में होने को देखते हुए (और दक्षिण एशिया में भी), ऊर्जा दक्ष नौवहन विकल्पों के विकास में नवाचार को बढ़ाया जा सकता है जिससे ग्रीनहाउस गैसों का भी उत्सर्जन घट सकेगा (जैसे कि जो प्राकृतिक गैस से प्रचालित होते हैं)
अंतत: भारत सरकार के अनुसार ऐसा अनुमान है कि अगले पांच वर्षों में अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन (आईडब्ल्यूटी) क्षेत्र में 1.8 लाख व्यक्तियों को रोजग़ार उपलब्ध होगा. नये रोजग़ार अवसर फेयरवे, टर्मिनलों, सहायक नौवहन प्रणालियों, प्रशिक्षण और अन्य क्षेत्रों के प्रचालन और प्रबंधन में सृजित होने की आशा है.
लेखक प्रधान निदेशक, पीएचडी चैम्बर ऑफ  कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, नई दिल्ली हैं. ई-मेल: sasikalapushpamprs@gmail.com और सुश्री रीफात रसूल ज्वाइंट