संपादकीय लेख


Volume-48, 24 February- 2 March, 2018

 

विभिन्न क्षेत्रों में रोज़गार क्षमता का उपयोग करने की सरकार की योजनाएं

अरुण खुराना

किसी कार्य में संलग्न व्यक्ति को रोज़गारशुदा व्यक्ति कहा जाता है. वह कृषि या व्यापार या कारोबार अथवा सेवा में लगा हो सकता है. भारत में साल में 273 दिन रोजाना 8 घंटे काम करने वाले व्यक्ति को मानक व्यक्ति वर्ष आधार पर रोज़गारशुदा व्यक्ति माना जाता है. इस तरह किसी व्यक्ति को रोज़गारशुदा कहलाने के लिए साल में कम से कम 2,184 घंटे उद्देश्यपूर्ण रोज़गार मिलना जरूरी है. जिस व्यक्ति को इतनी अवधि के लिए रोज़गार नहीं मिल पाता उसे बेरोज़गार व्यक्ति कहा जाता है.

रोज़गार का क्षेत्रीय वितरण

मोटे तौर पर किसी अर्थव्यवस्था को प्राथमिक क्षेत्र, द्वितीयक क्षेत्र और तृतीयक क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया जाता है. कृषि और इससे संबद्ध गतिविधियों जैसे वानिकी, मछली पकडऩे, डेरी उद्योग, खनन आदि को प्राथमिक क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां कहा हाता है. विनिर्माण, विद्युत, गैस, जल आपूर्ति और निर्माण को द्वितीयक क्षेत्र की गतिविधियां माना जाता है. सेवा क्षेत्र कहलाने वाले तृतीयक क्षेत्र के अंतर्गत व्यापार, परिवहन, भंडारण, संचार, वित्तीय सेवाएं, सामाजिक व व्यक्तिगत सेवाएं आती हैं.         

संगठित और असंगठित क्षेत्रों में रोज़गार 

भारतीय अर्थव्यवस्था को संगठित और असंगठित क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है. देश का असंगठित क्षेत्र काफी विस्तृत है. कृषि असंगठित क्षेत्र की गतिविधि है और खनन, निर्माण, व्यापार, परिवहन और संचार, सामाजिक व कार्मिक सेवाएं भी संगठित क्षेत्र के अतर्गत आती हैं. कुल मिलाकर संगठित क्षेत्र विनिर्माण, विद्युत और वित्तीय सेवाओं तक सीमित है.

ग्रामीण क्षेत्र में ग्रामीण और शहरी रोज़गार  

ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादातर रोज़गार कृषि और उससे संबद्ध गतिविधियों से प्राप्त होता है. कृषि और अन्य प्राथमिक गतिविधियों से इतर रोज़गार द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में रोज़गार बहुत कम है. जबकि शहरी क्षेत्र में ज्यादातर रोज़गार द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में मिलता है. इसका मतलब यह हुआ कि शहरी इलाकों में अधिकतर लोग व्यापार, विनिर्माण, विपणन, व्यवसाय व सेवा संबंधी गतिविधियों में लगे हैं. 1980 के दशक और उसके बाद ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी इलाकों की ओर रोज़गार का अंतरण हुआ है यानी लोग प्राथमिक क्षेत्र से द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रों में आये हैं.    

आर्थिक विकास और रोज़गार के बीच संबंध

किसी देश में रोज़गार का परिमाण काफी हद तक के स्तर पर निर्भर रहता है. इसलिए जब देश प्रगति करता है और उसके उत्पादन का विस्तार होता है तो रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी होती है. भारत में पिछले करीब तीन दशकों में अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र में उत्पादन का विस्तार हुआ है. लेकिन आयोजना अवधि में बेरोज़गारी कुल मिलाकर बढ़ी ही है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि आर्थिक नियोजन के पहले तीन दशकों में विकास दर का रुझान लक्षित दर से काफी कम रहा. इसलिए पर्याप्त संख्या में रोज़गार के अवसर उत्पन्न नहीं हुए. इतना ही नहीं, केवल आर्थिक विकास होने से बेरोज़गारी की समस्या का समाधान नहीं होता. प्रभात पटनायक ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि विकास दर का ऊंचा आंकड़ा बेरोज़गारी कम करने की आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है. विकास और रोज़गार का यह द्वंद्व महलनबीस की रणनीति में स्वाभाविक रूप से परिलक्षित होता है जिसने करीब दो दशकों तक भारत के विकास के प्रयासों का मार्गदर्शन किया है. भारत में आर्थिक नियोजन की बुनियादी परिकल्पना यह रही है कि विकास से बेरोज़गारी की समस्या का अपने आप समाधान हो जाएगा. लेकिन वास्तव में ऐसा हुआ नहीं. भारत में पिछले डेढ़ दशक में नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों को अपनाये जाने के बाद सरकार द्वारा उच्च विकास दर पर जिस तरह से जोर दिया जाता रहा है उससे ऐसा लगता है कि आर्थिक विकास और रोज़गार के बीच द्वंद को पूरी तरह से भुला दिया गया है. इसलिए हाल के वर्षों में भारत में लगभग ‘‘रोज़गार विहीन’’ विकास हुआ है और कभी-कभी तो रोज़गार के अवसर घटे भी हैं. इसकी पुष्टि इस तथ्य से हो जाती है कि 1990 के दशक में और चालू दशक के शुरू के सालों में बेरोज़गारी में बढ़ोतरी हुई है.    

कृषि और रोज़गार  

राष्ट्र की खुशहाली के लिए ‘‘किसान समृद्धि’’ बहुत जरूरी है. किसान हमारी खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है. हमारे सभ्यतागत जीवन मूल्यों में से एक है: अन्नदाता सुखी भव’. आज वक्त आ गया है जब सरकार समूचे देश में दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए कई कदम उठा रही है. भारत गांवों में बसता है. कृषि क्षेत्र हमारी अर्थव्यवस्था और भारत के लोगों की आत्मा के समान है. रोज़गार में कृषि का योगदान कुल जनशक्ति का 48.9 प्रतिशत है. इसका मतलब यह हुआ कि

देश की 58 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या के लिए आजीविका का मुख्य स्रोत खेती-बाड़ी ही है. आर्थिक समीक्षा के अनुसार 2015-16 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का हिस्सा 17.4 प्रतिशत के बराबर था.   

जैसा कि सभी जानते ही हैं कि कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी की तरह बेहद जरूरी और महत्वपूर्ण है जिससे जनता की तमाम बुनियादी जरूरतें पूरी होती हैं और औद्योगिक क्षेत्र के तीव्र विकास के लिए कच्चा माल भी प्राप्त होता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि विनिर्माण क्षेत्र के अलावा कृषि क्षेत्र भी ग्रामीण लोगों/युवाओं को बड़े पैमाने पर आजीविका के साधन उपलब्ध कराने के साथ ही उद्यमिता के अवसर भी प्रदान करता है. भारत में कृषि क्षेत्र लोगों के लिए रोज़गार के अवसरों और आमदनी का बुनियादी स्रोत बना हुआ है.  2.5 प्रतिशत की अनुमानित विकास दर से देश में हर साल 40 लाख नये ग्रामीण कामगार हमारी श्रम शक्ति में शामिल होते हैं जिनकी रोज़गार संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करना बहुत बड़ी चुनौती है.  

कृषि उत्पादकता में सुधार लाकर ग्रामीण श्रम शक्ति को काफी हद तक खेती-बाड़ी में खपाया जा सकता है. लेकिन सिर्फ इससे बेरोज़गारी के वर्तमान कमरतोड़ बोझ से निजात दिलाना मुमकिन नहीं है. इस समस्या के समाधान के लिए कृषि में विविधता लाकर उसे उच्च लागत वाली कृषि गतिविधियों जैसे बागवानी और पशुपालन से जोडऩा बेहद जरूरी है. कृषि में विविधता लाकर उसे उच्च मूल्य वाले कृषि व्यापार से जोडऩे से कृषि क्षेत्र में आर्थिक विकास का दूसरा दौर शुरू किया जा सकता है और खेती-बाड़ी में रोज़गार के अवसर पैदा किये जा सकते हैं.

इस समय कृषि में विविधता बढ़ाने की दिशा में चार स्पष्ट रुझान स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं:

(1)घरेलू खाद्य अर्थव्यवस्था में उच्च लागत कृषि उत्पादों का आर्थिक महत्व बढ़ रहा है;     

(2)प्रसंस्कृत और मूल्य सवंर्धित खाद्य उत्पादों की घरेलू मांग बढ़ रही है.

(3)वैश्विक खाद्य अर्थव्यवस्था और अधिक खुले बाजार में बदलती जा रही है जिससे भारतीय खाद्य उत्पादों के लिए नये अवसर उत्पन्न हुए हैं.

(4)दुनिया भर में आज कृषि से उत्पन्न कच्चे माल की बजाय मूल्य वर्धित खाद्य उत्पादों का व्यापार महत्वपूर्ण होता जा रहा है. इसके अधिकांश उत्पाद या तो जल्दी खराब हो जाने वाले होते हैं या फिर मूल्यवर्धित होते हैं.

इन रुझानों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कृषि उत्पादों (जैसे अनाज और दालों) का आर्थिक महत्व दो दिशाओं की ओर अग्रसर होगा:

कृषि क्षेत्र के भीतर ही क्षैतिज दिशा में बुनियादी खाद्य उत्पादों (जैसे अनाज और दलहनों) की खेती से लेकर उच्च मूल्य कृषि गतिविधियों (जैसे बागवानी और पशुपालन) का संचालन.

स्पष्ट है कि ग्रामीण आमदनी और रोज़गार में व्यापक बढ़ोतरी का संकेत देने वाले अवसर सामने आ रहे हैं जिनके अंतर्गत (1) उच्च-लागत वाले कृषि उत्पादों जैसे सब्जियों और फलों के

उत्पादन और पशु उत्पादों और पशुपालन पर जोर दिया जाएगा. और (2) ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि गतिविधि के रूप में खाद्य प्रसंस्करण को प्रोत्साहित किया जाएगा. 

रोज़गार सृजन में विनिर्माण का योगदान

विनिर्माण क्षेत्र को कृषि मजदूरों के लिए परिवर्तनकारी क्षेत्र माना जाता है क्योंकि वे कम कौशल वाले रोज़गार से मूल्य सवंर्धित रोज़गार के क्षेत्र में जा सकते हैं. इसका कारण यह है कि ऐतिहासिक रूप से आर्थिक विकास ने लोगों को कृषि क्षेत्र से बाहर निकाल कर गैर-कृषि गतिविधियों जैसे विनिर्माण और सेवा में रोज़गार उपलब्ध कराया है. कृषि से फालतू हुए श्रमिकों को खपाने में विनिर्माण (औद्योगिक क्षेत्र) की भूमिका का महत्व स्थापित हो चुका है और कई विकासशील देशों के साथ-साथ हाल में दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के अनुभवों से इसकी पुष्टि हो जाती है.

इससे विनिर्माण भारत जैसे देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है जहां सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा भले ही मामूली है मगर रोज़गार में इसकी भूमिका आपेक्षिक रूप से बहुत ज्यादा है.  

कामकाजी उम्र के लोगों के पर्याप्त संख्या में उपलब्ध रहने से विनिर्माण को काफी बढ़ाया जा सकता है. लेकिन श्रम शक्ति के अधिकतर हिस्से को खपाने के लिए सुदृढ़ मानव पूंजी के निर्माण पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है. परिवहन उपकरण, पेट्रोलियम और विद्युत मशीनरी जैसे कुछ विनिर्माण उद्योगों में विशेषज्ञता वाले प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है और इस कार्य को केवल कुशल मजदूर ही कर सकते हैं. 

एक वैश्विक प्रबंधन परामर्श फर्म मैककिंसे एंड कंपनी द्वारा हाल में कराए गये एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय विनिर्माण उद्योग का कारोबार 2025 तक 1 ट्रिलियन डालर के स्तर पर पहुंच जाएगा. औद्योगिक विशेषज्ञ विनिर्माण इकाइयों की बढ़ती मांग को अच्छा संकेत मानते हैं और इसी सिलसिले में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत में कम लागत के संयंत्र स्थापित करने की मांग करते हैं. 

देश में करीब 9 करोड़ घरेलू रोज़गार उत्पन्न होने का इंतजार किया जा रहा है जिससे विनिर्माण क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 25-30 प्रतिशत तक हो जाएगा. भारत की तेजी से फलती अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू दोनों ही तरह के विनिर्माताओं को आगे आकर विकास करने के अवसर उपलब्ध करा रही है.

भारतीय विनिर्माण उद्योग के महत्वपूर्ण प्रेरक:

1) भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में निवेश में गिरावट की वजह से विकास की रफ्तार धीमी लग

रही है.

2) राष्ट्रीय विनिर्माण नीति में संकेत दिया गया है कि आगामी दशकों में देश में रोज़गार के दस करोड़ अवसर उपलब्ध कराने के लिए सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा 25 प्रतिशत तक बढ़ाना होगा.

3) प्रमुख विनिर्माण इकाइयों में अतिरिक्त क्षमता सृजित करने की योजना बनायी जा रही है.

4) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक खरीद नीति का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है जिसके तहत साझा सुविधा केन्द्रों और नयी टेक्नोलाजी के जरिए खादी को बढ़ावा दिया जाएगा.     

विनिर्माण क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देने और इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार ने 2011  में राष्ट्रीय विनिर्माण नीति की घोषणा की. इसमें देश के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण के क्षेत्र के हिस्से को वर्तमान 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत करने का प्रस्ताव है जिससे 2022 तक रोज़गार के 10 करोड़ अवसर उत्पन्न होंगे. नीति में केन्द्र से सार्वजनिक-निजी भागीदारी के आधार पर आधारभूत क्षेत्र का विकास कर अनुकूल ढांचा और प्रोत्साहन उत्पन्न कराने को कहा गया है. राज्य सरकारों को भी ऐसे प्रोत्साहन देने का आग्रह किया गया है जिससे वे नीति में बतायी बातों जैसे, राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण जोन की स्थापना, व्यापारिक विनियमों को युक्तिसंगत और सरल बनाने, छोटे और मझोले उद्यमों को प्रोत्साहन, औद्योगिक प्रशिक्षण और श्रमिकों के कौशल विकास के उपायों पर अमल करें. लेकिन विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर अब भी चिंता का विषय बनी हुई है. देश की 63 प्रतिशत आबादी कामकाजी आयुवर्ग (15-64 साल) में है और प्रधानमंत्री ने 2014 में स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में विश्व को मेक इन इंडियाऔर मैन्यूफैक्चर इन इंडियाके लिए आमंत्रित किया. उन्होंने संकेत दिया कि युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए विनिर्माण क्षेत्र का विकास अनिवार्य हो गया है.    

मेक इन इंडिया और रोज़गार सृजन

मेक इन इंडिया पहल की घोषणा सितंबर 2014 में आधिकारिक रूप से की गयी थी. इसका उद्देश्य निवेश को आसान बनाना, नवसृजन को बढ़ावा देना, कौशल विकास को प्रोत्साहन, बौद्धिक संपदा का संरक्षण करना और बेहतरीन विनिर्माण अवसंरचना का निर्माण करके भारत को दुनिया में विनिर्माण गतिविधियों के केन्द्र के रूप  में विकसित करना है. इस पर्चे में मेक इन इंडिया पहल की रोज़गार सृजन क्षमता को परखने का प्रयास किया गया है.

मेक इन इंडिया पहल 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर

ध्यान केन्द्रित करता है और चार स्तंभों पर आधारित है जिनकी पहचान भारत में न सिर्फ विनिर्माण के क्षेत्र में बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी उद्यमिता को बढ़ावा देने को ध्यान में रखकर की गयी है. ये चार स्तंभ इस प्रकार हैं: 

नयी प्रक्रियाएं: मेक इन इंडिया में कारोबार करने की सहूलियत को उद्यमिता बढ़ाने के सबसे महत्वपूर्ण तरीका बताया गया है. कारोबारी माहौल को आसान बनाने के लिए कई पहल पहले ही की जा चुकी हैं.

नयी अवसंरचना: सरकार का इरादा औद्योगिक गलियारों और स्मार्ट शहरों का विकास करके ऐसा विश्वस्तरीय आधारभूत ढांचा खड़ा करने का है जिसमें आधुनिकतम टेक्लोलाजी के साथ तेज रफ्तार संचार सुविधाएं भी उपलब्ध हों. नवसृजन और अनुसंधान गतिविधियों में मदद के लिए तेज रफ्तार पंजीयन प्रणाली और बौद्धिक संपदा अधिकार पंजीयन के लिए उन्नत अवसंरचना की आवश्यकता होती है. उद्योग के लिए कौशल की आवश्यकता की पहचान की जाती है और उसी के अनुसार विकास संबंधी कार्यबल बनाया जाता है.

नये क्षेत्र: रक्षा उत्पादन, बीमा, चिकित्सा उपकरणों, निमार्ण और रेलवे अवसंरचना को बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए खोल दिया गया है.

नयी सोच: देश के आर्थिक विकास में उद्योग के साथ साझेदारी के लिए सरकार की भूमिका सुविधा प्रदाता की होगी न कि विनियामक की.

सेवा क्षेत्र और रोज़गार का रुझान भारत का सेवा क्षेत्र सुदृढ़ बन रहा है और लगातार प्रगति कर रहा है. भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) और केपीएमजी की हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ रही सेवा अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है. सेवा क्षेत्र की भारत के सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण भूमिका है और वह बड़े विदेशी निवेश आकृष्ट करने के साथ ही निर्यात में भी महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है. 

भारतीय सेवा क्षेत्र ने सबसे अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेशों को आकृष्ट किया. व्यापार, पर्यटन, स्वास्थ्य देखभाल, परिवहन, संचार, सूचना-टेक्नोलाजी, वित्त, बीमा, रीयल एस्टेट, व्यापारिक सेवा,

सामाजिक और व्यक्तिगत सेवा जैसे क्षेत्रों में क्षेत्रीय गतिविधियों के बढऩे से भारत को राजस्व की अच्छी प्राप्ति हुई है. इस तेज वृद्धि के प्रेरक घटक स्वत: स्पष्ट हैं. बढ़ती हुई क्रय शक्ति, सामाजिक गतिशीलता में बढ़ोतरी और ग्रामीण बाजारों में डिजिटल पैठ से भारत में सेवा क्षेत्र की मांग में जबरदस्त तेजी आयी है.  

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान बड़ी तेजी से बढ़ा है. कई विदेशी उपभोक्ताओं ने देश के सेवा निर्यात में दिलचस्पी दिखाई है. इसका श्रेय हमारे देश में उपलब्ध अत्यंत कुशल कर्मियों के समूह, कम लागत और शिक्षित जनशक्ति को दिया जा सकता है. विदेशी कंपनियां अपना काम भारत से आउटसोर्स करवा रही हैं. खास तौर पर व्यावसायिक सेवाओं, बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग और सूचना टेक्नोलॉजी सेवाओं में ऐसा हो रहा है. इससे भारत में सेवा क्षेत्र को जोरदार बढ़ावा मिला है जिसके परिणामस्वरूप सकल घरेलू उत्पाद में सेवाओं का हिस्सा बढ़ा है. 

भारत सरकार ने इस क्षेत्र में विकास को बढ़ावा देने के महत्व को पहचाना है और ऐसा अनुकूल माहौल बनाने का प्रयास किया जा रहा है जिससे स्वास्थ्य की देखभाल, पर्यटन, संचार, सूचना टेक्नोलाजी जैसे क्षेत्रों को और बढ़ावा मिले. इसके साथ ही प्रोत्साहक विनियामक ढांचे और घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापारिक प्रतिबंधों में ढील के बारे में समझौतों से वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धा क्षमता में बढ़ोतरी होगी. इससे रोज़गारों की संख्या में ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता में भी बढ़ोतरी होगी. इससे देश में उच्च गुणवत्तापूर्ण श्रम शक्ति का निर्माण होगा.  

सेवा क्षेत्र के विकास से अनुषंगी क्षेत्रों में कई गुना बढ़ोतरी होना स्वाभाविक परिणाम है. उदाहरण के लिए भारत आने वाले पर्यटकों की संख्या में वृद्धि का सकारात्मक असर न सिर्फ होटल और एयरलाइन्स उद्योगों पर पड़ेगा बल्कि इससे हस्तकला और शिल्प वस्तुओं की बिक्री भी बढ़ेगी. विनियामक ढांचे के अंतर्गत यह भी ध्यान रखना होगा कि उभर कर सामने आ रहा सेवा क्षेत्र किस तरह अन्य क्षेत्रों के साथ संबद्ध है. 

हालांकि भारत का सेवा क्षेत्र उच्च आमदनी उत्पन्न करता है मगर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के वैश्विक रोज़गार रुझान 2016 के अनुसार रोज़गार सृजन में सेवा क्षेत्र अब भी बहुत पीछे है. लेकिन भारतीय स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र ने काफी प्रगति की है और राजस्व और रोज़गार सृजन के संदर्भ में यह सेवा उद्योग में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर चुका है. स्वास्थ्य देखभाल के अंतर्गत मूलत: अस्पताल, चिकित्सा प्रणालियां, क्लीनिकल परीक्षण, आउटसोर्सिंग, टेलीमेडिसिन, मेडिकल टूरिज्म, स्वास्थ्य बीमा और चिकित्सा उपकरण आदि शामिल हैं. स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र के बढ़ते दायरे, सेवाओं के विस्तार और निजी व सार्वजनिक निवेशों के निवेश में बढ़ोतरी से भारत में इस

क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा है. विभिन्न प्रकार की स्वास्थ्य कर्मियों जैसे नर्सों, चिकित्सा सहायकों और रेजीडेंशियल एसोसिएटों जैसे व्यावसायिक चिकित्सा कर्मियों को अप्रत्यक्ष रोज़गार मिलने से इसका असर तृतीयक उद्योगों पर भी पड़ रहा है.

सरकार सेवा क्षेत्र को और बढ़ावा देने के लिए अन्य देशों के साथ संपर्क कायम करने के लिए सायास प्रयास कर रही है. इसी सिलसिले में सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जापान और मलाया के साथ विस्तृत द्विपक्षीय समझौतों पर दस्तखत किये गये हैं. दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ आसियान के साथ सेवाओं और निवेश के बारे में एक मुक्त व्यापार समझौता भी किया गया है.

सही विनियामक और नीतिगत ढांचे तथा कारोबार करने के लिए अनुकूल माहौल बनने से यह उद्योग जबरदस्त विकास की दिशा में लंबी छलांग लगाने का इंतजार कर रहा है. इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास पहले ही शुरू हो चुके हैं. सेवाओं के बारे में पहली वैश्विक प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने अप्रैल 2015 में नई दिल्ली में किया. इसमें सभी प्रतिभागियों, शिष्टमंडल सदस्यों, व्यापारियों और सेवा क्षेत्र के अन्य महत्वपूर्ण निर्णयकर्ताओं को एक-दूसरे के साथ विचार-विमर्श करने और कारोबार के मौकों का पता लगाने का अवसर प्राप्त हुआ. इस प्रदर्शनी की सफलता से प्रेरित होकर पिछले साल अप्रैल में इस शृंखला की दूसरी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसमें विश्व अर्थव्यवस्था के सेवा क्षेत्र पर ध्यान केन्द्रित किया गया जिससे भारत के सेवा उद्योग के भविष्य के बारे में विचार-विमर्श व चर्चा करने के लिए एक मंच उपलब्ध हुआ. 

भारत का सेवा क्षेत्र बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है और देश के सकल घरेलू उत्पाद में इसका हिस्सा सबसे अधिक हो सकता है. भारत जैसे कृषि पर मुख्य रूप से निर्भर किसी देश के लिए यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है. देश में नीतिगत बदलाव, नाजुक वैश्विक आर्थिक माहौल और विकास पूंजी की चुनौतियों के मद्दे नजर यह उपलब्धि और भी सराहनीय हो जाती है. 

हमें पर्यटन, परिवहन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, संचार और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति कई गुना बढ़ानी होगी क्योंकि वहां समुद्रपारीय और गैर समुद्रपारीय सेवाओं का सम्यक मूल्यांकन किया जाता है. भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र की विकास दर में पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है. मुझे इस बात का पूरा यकीन है कि सरकार के सहयोग से हम अनगिनत अवसरों का फायदा उठा सकते हैं और भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं.  

गरीबी दूर करने के कुछ महत्वपूर्ण उपाय और रोज़गार सृजन कार्यक्रम:

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) 2005: इसकी शुरुआत 2 फरवरी, 2005 में हुई. अधिनियम में प्रत्येक परिवार को साल में 100 दिहाडिय़ो के बराबर सुनिश्चित रोज़गार उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है. इनमें से एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे. केन्द्र सरकार राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी निधि की भी स्थापना करेगी. इसी तरह राज्य सरकारें इस योजना पर अमल के लिए राज्य रोज़गार गारंटी निधियों की स्थाना करेंगी. इस कार्यक्रम के तहत अगर किसी आवेदक को 15 दिन के भीतर रोज़गार प्राप्त नहीं होता तो वह दैनिक बेरोज़गारी भत्ता प्राप्त करने का अधिकारी होगा.   

मनरेगा की कुछ खास बातें:

*अधिकारों पर आधारित ढांचा

*रोज़गार की समयबद्ध गारंटी

*श्रम प्रधान गतिविधियां

*महिला सशक्तीकरण

*पारदर्शिता और जवाबदेही

*केन्द्र सरकार द्वारा पर्याप्त धन की व्यवस्था

*काम के बदले अनाज का राष्ट्रीय कार्यक्रम

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन: आजीविका (2011)

यह ग्रामीण विकास मंत्रालय की कौशल और नियुक्ति संबंधी पहल है जो राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन का ही एक अंग है. इसकी शुरुआत 2011 में गरीबी कम करने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर की गयी थी. इसमें ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब लोगों को नियमित मासिक आमदनी वाले रोज़गार उपलब्ध कराने की व्यवस्था है. जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए ग्राम स्तर पर स्व-सहायता समूह कायम किये जाते हैं.

प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना:

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 14 लाख युवाओं को कौशलों का प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए 1120 करोड़ रुपये के खर्च वाली एक परियोजना 21 मार्च, 2015 को शुरू की. इसपर कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के सहयोग से राष्ट्रीय कौशल विकास निगम द्वारा लागू किया जा रहा है. इसमें श्रम बाजार में नये दाखिल होने वालों खास तौर पर दसवीं और बारहवीं की परीक्षा पूरी न कर सके विद्यार्थियों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाता है. 

राष्ट्रीय धरोहर

धरोहर नगरी विकास और संवर्धन योजना

21 जनवरी 2015 को लागू की गयी इस योजना का उद्देश्य देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण करना है. 500 करोड़ रुपये की इस योजना का शुभारंभ नई दिल्ली में शहरी विकास मंत्री ने किया. प्रारंभ में इसे 12 शहरों में लागू किया गया जिनके नाम हैं: अमृतसर, वाराणसी, गया, पुरी, अजमेर, मथुरा, द्वारका, बदामी, वेलांकन्नि, कांचीपुरम, वरंगल और अमरावती. ये कार्यक्रम समाज के सभी वर्गों के लोगों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं ताकि समग्र विकास की परिकल्पना को सही अर्थों में साकार किया जा सके. राष्ट्रीय करिअर सर्विस पोर्टल के माध्यम से सरकार ने राष्ट्रीय व्यावसायिक परामर्श शुरू किया है और सरकार द्वारा संचालित सभी रोज़गार कार्यालयों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय कॅरिअर सेवा पोर्टल के तत्वाधान में केन्द्रीय कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय के इस पोर्टल का शुभारंभ किया. यह रोज़गार देने वालों और रोज़गार खोज रहे लोगों का एक ऐसा साझा मंच है जहां वे ऑनलाइन पंजीयन करा सकते हैं. इसमें नौकरियां ढूंढने और आवेदन करने की सुविधा उपलब्ध है. इसमें व्यवसाय संबंधी परामर्श भी उपलब्ध कराया जाता है जिसके लिए उम्मीदवार या तो हैल्पलाइन की मदद ले सकता है या फिर रोज़गार केन्द्र में जाकर विभिन्न सेवाओं जैसे नियुक्ति स्थान, दक्षता परीक्षा, रोज़गार की तुलना, प्रशिक्षण देने वाले अध्यापकोंकौशल विकास पाठ्यक्रमों, स्वरोज़गार व उद्यमिता के बारे में दिशानिर्देश  का लाभ प्राप्त किया जा सकता है. यहां यह बात ध्यान देने की है कि नेशनल कॅरिअर सर्विस परियोजना का उद्देश्य सरकारी रोज़गार कार्यालयों में आमूल बदलाव लाना है.   

प्रधानमंत्री रोज़गार प्रोत्साहन योजना

यह रोज़गार के अवसरों में बढ़ोतरी के लिए 1000 करोड़ रुपये के आबंटन वाली नयी प्रस्तावित योजना है. इसके अंतर्गत वित्त वर्ष 2016-17 में श्रमिकों को 240 दिन तक कार्य उपलब्ध कराने वाले नियोक्ताओं को  एक नये श्रमिक को अतिरिक्त रोज़गार देकर प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव किया गया है. 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्रमेव जयते कार्यक्रम

यह कार्यक्रम हाल में राष्ट्रीय लोकतांतित्रक गठबंधन (एनडीए) ने शुरू किया. इसके अंतर्गत 5 कार्यक्रम शुरू किये गये हैं जिनका उद्देश्य औद्योगिक विकास और कारोबारी सहूलियत के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने के साथ-साथ श्रमिकों को कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण प्रदान करने में सरकारी मदद हासिल करना है. श्रम सुविधा पोर्टल, यूनीवर्सल खाता संख्या, औचक जांच योजना, एप्रेंटिस प्रोत्साहन योजना और नयी राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के माध्यम से इस तरह की मदद दी जाती है. औद्योगिक मूल्य संवर्धन के लिए कौशल सुदृढ़ीकरण योजना (स्ट्राइव) में औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्रों (आईटीआई) को अपने कार्यनिष्पादन के साथ-साथ एप्रेंटिस प्रशिक्षण में समग्र सुधार के लिए प्रोत्साहन दिया जाता है. इसके लिए छोटे और मझोले उपक्रमों, व्यापारिक संघों और औद्योगिक क्लस्टरों की भी मदद ली जाती है.    

राष्ट्रीय कौशल विकास निगम, राज्य कौशल विकास मिशनों, क्षेत्रीय कौशल परिषदों, आईटीआई और राष्ट्रीय कौशल विकास एजेंसी जैसी संस्थाओं को सुदृढ़ करके गुणवत्तापूर्ण कौशल विकास प्रशिक्षण के लिए मजबूत प्रणाली विकसित की जाएगी. इससे तमाम कौशल विकास कार्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क और राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन फ्रेमवर्क को सर्वजनीय बनाने में मदद मिलेगी. इससे राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन 2015 और इसके विभिन्न उप-मिशनों को वांछित बढ़ावा मिलेगा. सरकार के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों जैसे मेक इन इंडिया और स्वच्छता अभियान से भी इसका तालमेल कायम किया गया है. 

संकल्प योजना

संकल्प योजना के तहत प्रशिक्षकों और मूल्यांककों की ऐसी अकादमियां खोलने का प्रावधान है जो आत्मनिर्भरता के मॉडल पर आधारित होंगी. प्राथमिकता क्षेत्र के अंतर्गत ऐसी अकादमियां खोली जानी हैं. इसमें प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण की संस्थाओं की दीर्घावधि और अल्पावधि मदद के जरिए आपसी तालमेल कायम करने का भी प्रयास किया जाएगा. अतिरिक्त प्रशिक्षक अकादमियां भी खोली जाएंगी. इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि कौशल नियोजन में और अधिक विकेन्द्रीकरण हो. इसके लिए राज्य स्तर पर संस्थाओं को सुद्ढ़ करना होगा और एसएसडीएम खोलने होंगे तथा राज्यों को जिला और राज्य स्तर के कौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाएगा. राज्यों को राज्य और जिला स्तरीय कौशल विकास योजनाएं तैयार करने को भी कहा जाएगा. 

योजना में उपेक्षित और वंचितों जैसे महिलाओं/अनुसूचित जातियों/ जनजातियों और दिव्यांगजनों को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे का लक्ष्य रखा गया है. इससे एक कौशल विकास का ऐसा माहौल तैयार होगा जिससे कारोबार करने की सहूलियत की दृष्टि से भारत की स्थिति में और सुधार हो सकेगा.

आर्थिक समीक्षा के निष्कर्षों के अनुसार 2018 के केन्द्रीय बजट का मुख्य जोर भारत में रोज़गार के और अधिक अवसर उत्पन्न करते हुए किसानों की आमदनी बढ़ाने पर केन्द्रित रखने की संभावना है. समीक्षा में यह पाया गया कि जलवायु परिवर्तन से पहले से समस्याओं का सामना कर रही अर्थव्यस्था पर बोझ और बढ़ सकता है. समीक्षा में सरकार से वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दुगना करने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार से जोरदार अनुवर्ती कार्रवाई करने का आग्रह किया गया है.      

(लेखक सोशल रिस्पोंसिबिलिटी काउंसिल के निदेशक हैं. ई-मेल: khurana@arunkhurana.com इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.)