संपादकीय लेख


Volume-51, 17-29 March, 2018

 

 नये भारत की दिशा में भारत और ईरान
के भविष्य के दृष्टिकोण

 

डॉ. शशिकलापुष्पा और
डॉ. बी. रामास्वामी

ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी के नई दिल्ली आगमन ने पश्चिम एशिया में भारत की व्यापक संबंधों की निरंतरता का प्रतिनिधित्व किया. साथ ही, यह बात और भी रोचक है कि मोदी सरकार द्वारा पूरे उत्साह से आयोजित कार्यक्रम में इजरायल भी शामिल हुआ था, जो उस क्षेत्र में ईरान के बड़े शत्रुओं में शुमार है.

वस्तुत: रुहानी की यात्रा एक ऐसे समय में हुई है, जब इजरायल ने सीरिया से लगी सीमा पर तेहरान-समर्थित शिया मिलिशिया की उपस्थिति पर सवाल उठाये हैं तथा उनके विरुद्ध सैन्य अभियान शुरू किया है. पिछले सप्ताह, सीरिया की एसएएम प्रणालियों ने एक इजरायली एफ-१६ को मार गिराया, जो इन शिया मिलिशिया के विरुद्ध हमले में जुटा था. विश्लेषकों के अनुसार यह मोर्चा इस क्षेत्र में काफी खतरनाक है. इसके बावजूद, हाल के वर्षों में ईरान के साथ भारत का संबंध स्थिर बना रहा है, जो बराक ओबामा के अमेरिकी प्रशासन द्वारा तेहरान के विरुद्ध लगाए गए प्रतिबंधों की अवधि के साथ-साथ राष्ट्रपति डॉनाल्ड ट्रम्प की तदर्थ विदेश नीति द्वारा सृजित मौजूदा वृतांत से उत्पन्न उतार-चढ़ाव से अप्रभावित है.

परिचय :

रुहानी के दौरे के समय एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में विविध तथा द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मुद्दे पर विचार विमर्श किया गया. २३ जनवरी, २००३ के ‘‘नई दिल्ली घोषणापत्र’’ में शामिल द्विपक्षीय संबंधों को विकसित करने के सिद्धांतों को याद करते हुए, दोनों पक्षों ने मई २०१६ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ईरान की यात्रा से लेकर द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति पर संतोष व्यक्त किया तथा बहुविध द्विपक्षीय सहयोग को और भी अधिक मजबूत करने की दिशा में अपना साझा संकल्प दोहराया.

दोनों नेताओं ने बताया कि दोनों देशों के बीच परस्पर लाभदायक संबंध इन दोनों की सदियों पुरानी संस्कृति तथा सभ्यता के मजबूत धरातल पर आधारित हैं. इन दोनों देशों के साझा दृष्टिकोण से जहां एक ओर द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती मिली, वहीं दूसरी ओर क्षेत्रीय सहयोग, शांति, समृद्धि और स्थिरता में भी योगदान मिला.

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति रुहानी निम्नलिखित दस्तावेजों के आदान-प्रदान के समय उपस्थित थे तथा दोनों ने संयुक्त रूप से मीडिया को संबोधित किया.
१.दोहरी कर वंचना तथा आयकर के संदर्भ में वित्तीय वंचना की रोकथाम के लिए समझौता.
२.राजनयिक पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा की जरूरत से छूट दिए जाने पर समझौता ज्ञापन.
३.प्रत्यर्पण संधि के सुधार का मसौदा.
४.पारम्परिक औषधी प्रणाली के क्षेत्र में सहयोग पर समझौता.
५.परस्पर हित वाले क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से व्यापार सुधार के उपायों पर एक विशेषज्ञ समूह की स्थापना पर समझौता ज्ञापन.
६.कृषि तथा संबंधित क्षेत्र में सहयोग पर आधारित समझौता ज्ञापन.
७.स्वास्थ्य तथा औषधि के क्षेत्र में सहयोग पर आधारित समझौता ज्ञापन.
८.डाक सहयोग पर समझौता ज्ञापन.
९.चाबहार के शहीद बेहेस्टी पोर्ट के पहले चरण के लिए अंतरिम अवधि के दौरान पोर्ट और मैरीटाइम संगठन (पीएमओ), ईरान तथा इंडिया पोट्र्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) के बीच लीज अनुबंध.

द्विपक्षीय आदान-प्रदान :

राष्ट्रपति रुहानी और प्रधानमंत्री मोदी ने सभी स्तरों पर बार-बार और व्यापक द्विपक्षीय आदान-प्रदान के माध्यम से मौजूदा उच्चस्तरीय कार्यक्रम को और भी आगे बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की. इस संदर्भ में यह निर्णय लिया गया कि इस वर्ष के भीतर भारत-ईरान संयुक्त आयोग तथा इसके सभी कार्यसमूहों, विदेश कार्यालय परामर्शों की बैठकें, दोनों देशों के रक्षा व राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद संगठनों, नीति आयोजना वार्ता की बैठकें आयोजित हों, ताकि संसदीय आदान-प्रदान को बढ़ावा मिले.

संपर्कता :

दोनों पक्षों ने भारत तथा ईरान में तथा पूरे क्षेत्र में बहु-प्रारूपीय संपर्कता को बढ़ावा देने में दोनों देशों की अद्वितीय भूमिका को महत्व दिया. दिसंबर, २०१७ की शुरूआत में चाबहार पोर्ट के पहले चरण की शुरूआत, भारत, ईरान  और अफगानिस्तान के बीच सभी पक्षों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय परिवहन तथा ट्रांजिट कॉरिडोर की स्थापना पर आधारित त्रिपक्षीय समझौता, तथा चाबहार पोर्ट के माध्यम से भारत से अफगानिस्तान के लिए गेहूं की खेप को सफलतापूर्वक भेजे जाने से अफगानिस्तान, मध्य एशिया तथा इसके बाद दोनों तरफ से एक नया मार्ग खुला है.

दोनों पक्षों ने चाबहार स्थित शहीद बेहेस्ती पोर्ट के शीघ्र तथा पूर्णत: संचालन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहरायी. ईरान ने चाबहार में संबंधित पक्षों के लिए परस्पर लाभ के आधार पर उर्वरकों, पेट्रो-रसायनों तथा धातुकर्म जैसे क्षेत्रों में संयंत्र स्थापित करने में भारत के निवेश का स्वागत किया.

इस संदर्भ में दोनों नेताओं ने पोर्ट और मैरीटाइम संगठन (पीएमओ), ईरान तथा इंडिया पोट्र्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) के बीच अंतरिम अवधि के दौरान चाबहार स्थित शहीद बेहेस्टी पोर्ट के लिए लीज अनुबंध का स्वागत किया. इसके अलावा उन्होंने निर्देश दिया कि समन्वय परिषद (कोऑर्डिनेशन काउंसिल) की बैठक त्रिपक्षीय सहमति में निर्धारित समय के भीतर होनी चाहिए. दोनों नेताओं ने दीनदयाल पोर्ट, कांडला और शहीद बेहेस्टी टर्मिनल, चाबहार को दर्शाते हुए एक संयुक्त डाक टिकट जारी किया जो बेहतर संपर्कता के माध्यम से समृद्धि बढऩे का संकेत है.

चाबहार-जाहदान रेल लाइन :

चाबहार पोर्ट और अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया से इसकी संपर्कता की संभावना का पूरा इस्तेमाल करने की दृष्टि से, भारत ने चाबहार-जाहदान रेललाइन के विकास में समर्थन देने की अपनी तैयारी से अवगत कराया. इस विचार-विमर्श में शामिल इरकॉन इंडिया और सीडीटीआईसी, ईरान को एक समय-बद्ध तरीके से परियोजना के लिए तकनीकी मानदंडों तथा वित्तपोषण के विकल्पों को अंतिम रूप देने का काम सौंपा गया. दोनों नेताओं ने इस्पात की पटरियों, पूर्जों तथा इंजनों की आपूर्ति सहित रेलवे के क्षेत्र में सहयोग के प्रयासों को बढ़ावा दिया.

आईएनएसटीसी और चाबहार :

दोनों पक्षों ने अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) के प्रति अपना संकल्प दोहराया और चाबहार को अपने कार्यक्रम में शामिल करने पर जोर दिया. इस  बात की चर्चा की गई कि ईरान, तेहरान में आईएनएसटीसी समन्वय बैठक की शुरूआती बैठक आयोजित करेगा. टीआईआर संधि में भारत के प्रवेश तथा अशगाबाट समझौते का स्वागत करते हुए उन्हें क्षेत्रीय संपर्कता बढ़ाने तथा आर्थिक वृद्धि के क्षेत्रीय केंद्रों को आपस में जोडऩे का अतिरिक्त कदम बताया.

चाबहार और भारतीय निवेश :

भारतीय पक्ष ने चाबहार एफटीजेड़ में भारतीय निजी/सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करने हेतु बेहतर वातावरण तैयार करने के प्रति अपनी तैयारी से अवगत कराया. इस संदर्भ में, इस क्षेत्र तथा इससे परे देशों की भागीदारी के साथ, ईरान एक कारोबार संवद्र्धन कार्यक्रम आयोजित करेगा, जिसका उद्देश्य चाबहार पोर्ट द्वारा उपलब्ध आर्थिक अवसरों को दर्शाना है.

ऊर्जा के क्षेत्र में हिस्सेदारी :

ऊर्जा के क्षेत्र में हितसाधन और स्वभाविक साझेदारी पर ध्यान केंद्रित करते हुए, इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि पारम्परिक क्रेता-विक्रेता संबंध से आगे बढ़ते हुए इसे एक दीर्घकालिक साझेदारी के रूप में विकसित किया जाए. दोनों पक्ष इस बात पर भी सहमत हुए कि फरजाद बी गैस फील्ड सहित ऊर्जा क्षेत्र पर समुचित नतीजे पर पहुंचने के उद्देश्य से प्रयास तेज किए जाएं.

व्यापार और निवेश के क्षेत्र में सहयोग :

दोनों नेताओं ने दोनों देशों के बीच व्यापार तथा निवेश के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की. इस संदर्भ में, दोनों नेताओं ने कारोबारी लेन-देन के लिए प्रभावकारी बैंकिंग चैनल स्थापित करने पर जोर दिया. यह बताया गया कि भारत में ईरानी पासरगड बैंक की एक शाखा खोलने हेतु स्वीकृति पर विचार किया जा रहा है. इस बात पर भी सहमति व्यक्त की गई कि कार्यशील भुगतान चैनल स्थापित करने हेतु रुपया-रियाल प्रबंध, एशियन क्लीयरिंग यूनियन प्रणाली सहित व्यवहार्य विकल्पों के परीक्षण हेतु अधिकारियों की एक संयुक्त समिति गठित की जाए.

दोहरी कर वंचना समझौता को अंतिम रूप मिलने का स्वागत एक ऐसे कदम के रूप में किया गया, जिससे कारोबार के अनुकूल वातावरण को बढ़ावा मिलेगा. दोनों पक्षों ने वार्ता के मार्गनिर्देश के  अनुरूप प्रमुखता-आधारित व्यापार समझौते के साथ-साथ निर्धारित समय के भीतर द्विपक्षीय निवेश संधि को शामिल करने पर भी सहमति व्यक्त की.

आर्थिक और वाणिज्यिक सहयोग को बढ़ावा देने में कारोबारियों तथा उद्योगजगत की भूमिका के महत्व के बारे में चर्चा करते हुए, दोनों नेताओं ने पिछले वर्ष तेहरान में भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) का क्षेत्रीय कार्यालय खोले जाने और विभिन्न व्यापारिक संस्थाओं के बीच परस्पर सहयोग के समझौते पर हस्ताक्षर का स्वागत किया. भारतीय पक्ष ने इस बात से अवगत कराया  कि वह भारत में ईरान चेम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री का कार्यालय खोले जाने की प्रतीक्षा कर रहा है.

विश्व व्यापार संगठन :

ईरान इस्लामिक गणराज्य के विश्व व्यापार संगठन में सम्मिलन का भारत पूरा समर्थन करता है. साथ ही, यह संगठन को व्यापक तथा समावेशी बनाने के उद्देश्य को लेकर विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों से अपेक्षा करता है कि सम्मिलन की जारी प्रक्रिया तेज की जाए.

मैत्रीपूर्ण आदान-प्रदान तथा जन-जन के बीच संपर्क को बढ़ावा :

दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण आदान-प्रदान को आसान बनाने के क्रम में इस बात पर सहमति कायम की गयी कि भारत ईरान के नागरिकों के लिए ई-वीजा मंजूर करेगा तथा ईरान भी भारतीय नागरिकों के लिए  ई-वीजा मंजूर करेगा. राजनयिक पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा में छूट के समझौते पर हस्ताक्षर किया जाना भी इस दिशा में एक कदम था. दोनों पक्षों ने दोनों देशों के नागरिकों से जुड़े मानवीयता के मुद्दे के समाधान के महत्व को दोहराया. ईरान का पक्ष अपने देश में दूतावास को अद्यतन बनाने से जुड़े भारत के आग्रह पर सकारात्मक तरीके से विचार करेगा.

सभ्यता और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने और विभिन्न स्तरों पर एक-दूसरे के बीच बेहतर समझ को बढ़ावा दिए जाने की दृष्टि से कई मुद्दे पर हस्ताक्षर किए गए, जिनमें शामिल हैं -२०१८/१९ में ईरान में भारत महोत्सव का आयोजन करना; तेहरान विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन का एक पीठ (चेयर) स्थापित करना, भारतीय विदेश सेवा संस्थान की ओर से ईरानी राजनयिकों के लिए भारत अध्ययन पाठ्यक्रम आयोजित करना, भारत में फारसी भाषा पाठ्यक्रमों में सहायता देना, पुरातत्व विज्ञान, संग्रहालयों, अभिलेखागारों और पुस्तकालयों के क्षेत्रों में और भी सहयोग करना.

सुरक्षा और रक्षा सहयोग :

दोनों नेताओं ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषदों के बीच संपर्क बढ़ाने का स्वागत किया और उनके तथा अन्य के बीच आतंकवाद, सुरक्षा तथा संगठित अपराध, मनी लांडरिंग, ड्रग तस्करी और साइबर अपराध जैसे संबंधित मुद्दे पर नियमित तथा संस्थागत विचार-विमर्श को बढ़ावा देने पर सहमति कायम  की. दोनों पक्षों ने समुद्री क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं में रूचि दर्शायी. नौसेना जहाजों द्वारा पोर्ट की जरूरतों, रक्षा प्रतिनिधियों का प्रशिक्षण तथा नियमित आदान-प्रदान समेत रक्षा क्षेत्र में सहयोग के लिए उपाय ढ़ूंढऩे के लिए वार्ता आयोजित करने के बारे में दोनों पक्षों के बीच सहमति कायम हुई.

प्रत्यर्पण :

दोनों पक्षों ने सजायाफ्ता लोगों के स्थानांतरण के मामले में द्विपक्षीय समझौते के कार्यान्वयन में प्रगति, दोनों पक्षों द्वारा प्रत्यर्पण संधि तथा असैनिक और वाणिज्यिक मामले पर पारस्परिक वैधानिक सहायता संधि पर एक समझ कायम होने के बारे में सकारात्मक विचार व्यक्त किए.

अन्य क्षेत्र :

दोनों पक्षों ने उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कृषि, श्रम और उद्यमिता, पर्यटन, नियमित वार्ता और संस्थागत प्रणाली सहित कई अन्य क्षेत्रों में परस्पर हितों तथा समझौते के अनुसार द्विपक्षीय समझौते का स्वागत किया तथा संबंधित अधिकारियों को अतिरिक्त विवरण जुटाने का निर्देश दिया.

क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे :

दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्थिति पर विचारों का आदान-प्रदान किया. बहुपक्षवाद को मजबूत करने की दृष्टि से, राष्ट्रपति रुहानी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर और अधिक बड़ी भूमिका की भारत की आकांक्षा को महत्वपूर्ण मानते हैं. दोनों नेताओं ने मजबूत संयुक्त राष्ट्र के महत्व को दोहराया तथा मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच सुरक्षा परिषद में जल्द सुधार लाने की जरूरत पर बल दिया. उन्होंने सुरक्षा परिषद के व्यापक सुधार के लिए अंतर-सरकारी वार्ताओं (आईजीएन) के समर्थन से जुड़े अपने संकल्प की पुन: पुष्टि की. दोनों नेताओं ने बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं की मजबूती तथा उसमें सुधार की जरूरत और अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक निर्णय प्रक्रिया में विकासशील देशों की आवाज बुलंद करने तथा उनकी भागीदारी बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया.

आतंकवाद :

आतंकवाद तथा हिंसक उग्रवाद की अवधारणाओं से उत्पन्न चुनौतियों की चर्चा करते हुए, दोनों नेताओं ने सभी प्रकार के आतंकवाद से निपटने का अपना मजबूत संकल्प दोहराया तथा इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद के किसी कार्य को सही नहीं माना जा सकता है. उन्होंने शीघ्र ही आतंकवादी समूहों तथा व्यक्तियों के लिए सभी प्रकार की सहायता बंद करने तथा उनके सुरक्षित ठिकानों को समाप्त करने की मांग की तथा उनके विचार से उन देशों की निंदा की जानी चाहिए, जो आतंकवाद की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी रूप में सहायता करते हैं. उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का आह्वान किया कि वे आतंकवाद से निपटने में चयनित अथवा आंशिक पहुंच का अंत करें. साथ ही, उन्होंने एक समझौते तक पहुंचने के सभी प्रयास करने तथा यूएनजीए में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर एक व्यापक संधि पर समापन की जरूरत पर जोर दिया. दोनों पक्षों ने ईरान के राष्ट्रपति से  मिले विचार ‘‘हिंसा व उग्रवाद के विरुद्ध विश्व’’ से प्राप्त वर्ष २०१३ के यूएनजीए  के  सहमत प्रस्ताव पर जोर दिया तथा आतंकवादी  तत्वों से निपटने तथा उनके समर्थन, विशेषकर आतंकवादी समूहों की आर्थिक सहायता को समाप्त करने का आह्वान किया.

संयुक्त व्यापक कार्ययोजना :

भारतीय पक्ष ने संयुक्त व्यापक कार्ययोजना के पूर्णत: तथा प्रभावकारी कार्यान्वयन के लिए अपनी सहायता की फिर से पुष्टि की, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा पेश किया गया है तथा जो अंतर्राष्ट्रीय शांति, स्थिरता तथा सुरक्षा के प्रति महत्वपूर्ण योगदान है.

दोनों पक्षों ने जोर दिया कि एक मजबूत, एकताबद्ध, समृद्ध, बहुलतावादी, लोकतांत्रिक और आत्मनिर्भर अफगानिस्तान द्वारा इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता संबंधी हितों के लिए मददगार होगा, जबकि देश में एक राष्ट्रीय अखंड सरकार को समर्थन मिले. उन्होंने जोर दिया कि चाबहार पर उपयुक्त रूप से अपना सहयोग देने समेत भारत-ईरान-अफगानिस्तान त्रिपक्षीय वार्ताओं तथा समन्वय को मजबूत किया जाए. इस संदर्भ में उन्होंने उस क्षेत्र के देशों का आह्वान किया कि वे क्षेत्रीय संपर्कता बढ़ाने तथा स्थानीय बाधाओं को दूर करने हेतु आगे आएं.

पूर्ववर्ती समझौते :

विमान सेवाएं : भारत तथा ईरान के बीच उड़ानों की संख्या बढ़ाने और एक-दूसरे की एयरलाइनों को अतिरिक्त गंतव्यों तक संचालित करने की अनुमति देकर, भारत ने ईरान  के साथ एक विमान सेवा समझौता पर हस्ताक्षर किया है.

द्विपक्षीय व्यापार : दोनों पक्षों ने एक समझौता ज्ञापन पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जिसका लक्ष्य द्विपक्षीय व्यापार को १५ अरब डॉलर से बढ़ाकर ३० अरब डॉलर तक पहुंचाना है.

समुद्री सहयोग : बेहतर समुद्री सहयोग की योजनाएं भी तैयार की गई हैं तथा ईरान भारतीय नौसेना की वार्षिक पहल, इंडियन ओशियन नेवल सिम्पोजियम में शामिल हो गया है, जो हिंद महासागर के आस-पास वाले देशों की नौसेनाओं के लिए एक मंच उपलब्ध कराता है.

अफगानिस्तान : यह बात और भी अधिक महत्वपूर्ण है कि दोनों देशों ने अफगानिस्तान के मुद्दे पर ‘‘संरचनात्मक तथा नियमित बैठक’’ आयोजित करने का निर्णय लिया है. भारत और ईरान दोनों एक ऐसे अफगानिस्तान को स्वीकार करने में असहज हैं, जो पाकिस्तान के सैन्य हितों के लिए एक पोषक के रूप में काम करे.

अवसर से अधिक चुनौतियां :

कुलभूषण जाधव : जबकि भारत ने  अफगानिस्तान में व्यापार संचालित करके, अफगानिस्तान की आवश्यकता के अनुरूप उसे पाकिस्तान का एक  विकल्प देकर तथा उस युद्ध-पीडि़त देश में भारत की स्थिति मजबूत करके ईरान में अपनी उपस्थिति का बेहतर इस्तेमाल किया है, फिर भी केवल उलझनपूर्ण समझौते की तुलना में भारत और ईरान के बीच समस्याएं अधिक हैं. उदाहरण के लिए, ईरान से अपहरण कर पाकिस्तान लाए गए भारतीय कुलभूषण जाधव पर जासूसी का आरोप लगाकर उसे मौत की सजा सुनायी गयी है, यह महज भारत-पाकिस्तान का मुद्दा नहीं है.

आतंकवाद : आतंकवाद पर वैश्विक नजरिये में ईरान के लिए कुछ असहज प्रश्न हैं, जैसे अलकायदा के लिए ईरान में पहुंच संबंधी खुलासे तथा पाकिस्तान के एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद उसके परिवार को  आश्रय देना, आदि. भारत के लिए यह बेहतर होगा  कि यह पाकिस्तान से जुड़े अपने मुद्दे के संदर्भ में निरंतर ईरान के पास पहुंच न करे. जबकि, अफगानिस्तान संबंधी रूख ने  भारत के लिए काम किया है, ईरान पाकिस्तान का भौगोलिक पड़ोसी है तथा पाकिस्तान के साथ इसके संबंधों के प्रति पूरी तरह भिन्न पहुंच होगी.

राजनीतिक : भारत और  ईरान के बीच न केवल आर्थिक चुनौतियां हैं, बल्कि राजनीतिक भी. पिछले वर्ष जून में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने ईद-उल-फितर के अवसर पर अपने संबोधन में सात वर्ष में पहली बार कश्मीर का मुद्दा उठाया. इसके लिए इस समय को चुनने का कारण यह हो सकता है कि भारत की निकटता इजरायल तथा सऊदी अरब, दोनों के साथ बढ़ रही है, ऐसे में अयातुल्ला का घरेलू श्रोताओं के लिए एक ऐसा कथन सामने आया हो.

चीन  और ईरान : चीन इस समय ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है. चीन ने ईरान में काफी निवेश किया है. चीन की १०० से अधिक कंपनियां वहां पश्चिमी देशों की कंपनियों का स्थान लेने की होड़ में शामिल हैं, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण वहां से हटना पड़ा था. चीन के साथ हिस्सेदारी से दोनों पक्षों को लाभ प्राप्त  हुए चीन से जुडक़र ईरान वैश्विक तौर पर अलग-थलग होने से बचा, जो इसके बदले बिना किसी वास्तविक प्रतियोगिता के ही ईरान के ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच कायम कर पाता है.

निष्कर्ष : ईरान के साथ राजनयिक संबंध होना अपने आप में एक कला है. अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की दिशा में ईरान की पहुंच का बड़ा हिस्सा उसके अस्तित्व पर आधारित है. प्रतिबंधों, आर्थिक रुकावटों, युद्धों तथा क्षेत्रीय वर्चस्व की होड़ में शामिल होना ईरान को एक कठिन साझेदार बनाता है, जहां सभ्यतामूलक संबंध हों अथवा नहीं. फिर भी, ईरान में रुहानी के शासन का समर्थन करना भारत के हित में है. ईरानी राजनीतिक प्रणाली में जो संभव है, उस सीमा तक उनकी विनम्रता का रुख तथा लोकतांत्रिक पहुंच, क्षेत्रीय तथा वैश्विक स्थिरता, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है.

इन सभी स्थितियों में, रूहानी भारत का दौरा दोनों देशों के लिए एक अच्छा अवसर है, जिससे इनके बीच मतभेदों को समाप्त करने, लंबे समय से लंबित आर्थिक मुद्दे को आगे बढ़ाने तथा व्यवधानग्रस्त पश्चिम एशिया के क्षेत्रीय गतिविज्ञान पर चर्चा करने का  मौका मिलता है. इस यात्रा के दौरान परिणामों पर जोर दिया जाना चाहिए, जो भारत-ईरान संबंधों का  एक पहलू है तथा यह दोनों देशों में गहरा होते संबंधों के  बीच छोटी वार्ता होने के कारण अपनी गति खो चुकी है.

डॉ. शशिकलापुष्पा एक सांसद (राज्यसभा) हैं और डॉ. रामास्वामी के साथ चार पुस्तकें भी लिखी हैं.

डॉ. बी. रामास्वामी चेन्नै रेल डिवीजन, भारत सरकार के डिवीजनल रेलवे उपभोक्ता परामर्शी समिति (डीआरयूसीसी) में सदस्य हैं. ई-मेल :sasikalapushpamprs@gmail.com