संपादकीय लेख


Volume-52, 24-30 March, 2018

 

गहराता जल संकट: क्या इसकी अनदेखी संभव है?

एस.पी. शर्मा

 एक प्रसिद्ध किस्सा है. एक समय की बात है कि एक राजा के पास बहुत बड़ा साम्राज्य था. राजा को शिकार खेलने का बड़ा शौक था. एक निर्धारित दिन पर राजा अपने घुड़सवार दल और नौकर-चाकरों तथा दरबारियों के साथ घने जंगल में शिकार के लिए जाया करता था. राजा शिकार करने में व्यस्त था और दिन गुजरता जा रहा था. दोपहर के समय धूप तेज हो गई थी. राजा को बहुत जोर से प्यास लगी और वह पीने के पानी के लिए किसी प्राकृतिक नदी की तलाश करने लगा. लेकिन प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश के राजा के सभी प्रयास व्यर्थ गए.

राजा जब बहुत हताश हो गया, तो उसे धुएं के कुछ बादल दिखाई दिए, जो कुछ दूरी पर एक झोंपड़ी से निकल रहा था. राजा की आंखों में उम्मीद की चमक दिखाई दी. वह बड़ी तेजी से झोंपड़ी की तरफ चलने लगा और उसे वहां एक साधु दिखाई दिया, जो गहरे ध्यान में लगा हुआ था. राजा ने हिम्मत जुटाई और साधु से विनम्र प्रार्थना की, ‘‘हे महान संत कृपया मुझे क्षमा करें कि मैं आपके गहरे ध्यान में व्यवधान डाल रहा हूं. मैं उस राज्य का सम्राट हूं, जिसमें आप रहते हैं, लेकिन इस समय मेरी स्थिति दयनीय है. मुझे बहुत जोर की प्यास लगी है और मैं प्यासा मर रहा हूं. कृपया मुझे थोड़ा पानी दें, ताकि मैं अपनी प्यास बुझा सकूं.’’

साधु ने बिना किसी खेद के राजा का अनुरोध ठुकराते हुए कहा, ‘‘घड़े को पानी से भरने के लिए मुझे संघर्ष करना पड़ता है. यह पानी केवल मेरे इस्तेमाल के लिए है. मैं एक बूंद भी इसमें से किसी को नहीं दे सकता, चाहे वह कितना ही बड़ा या छोटा व्यक्ति क्यों न हो. जाओ और कहीं और पानी की तलाश करो.’’

राजा ने फिर से अनुरोध किया कि ‘‘मैं पानी की और तलाश नहीं कर सकता. मेरी ऊर्जा खत्म हो गई है. कृपया मुझे थोड़ा पानी दे दो, ताकि मैं अपनी जिंदगी बचा सकूं.’’

राजा बेहद निराश हो गया. उसने एक अंतिम प्रयास के रूप में फिर से विनती की: ‘‘हे दयालु साधु, मुझे कुछ पानी दे दो और उसके बदले जो भी दाम तुम चाहोगे, मैं चुका दूंगा. यहां तक कि मैं अपना पूरा साम्राज्य तुम्हें दे सकता हूं, जिसे मैंने अनेक निर्दोष लोगों की हत्या और दुर्भाग्य से अपने अपरिमेय व्यक्तिगत बलिदान से जीता है.’’ अगर मैं प्यास से मर जाता हूं, तो मेरे लिए इस साम्राज्य का कोई मूल्य नहीं है.

साधु ने दार्शनिक अंदाज में उत्तर दिया, ‘‘क्या तुम्हारे समूचे साम्राज्य का मूल्य केवल कुछ गिलास पानी है? तो तुम्हें लानत है, तुम्हारी बादशाहत और तुम्हारे समूचे साम्राज्य को लानत है,’’ और यह कह कर तनिक जल राजा को दे दिया. जीवन की यह घटना राजा के लिए आंख खोल देने वाली थी और उसे यह एहसास हुआ कि मानव मात्र के अस्तित्व के लिए जल कितना महत्वपूर्ण है, जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी.

वास्तव में उपरोक्त कथा किसी राजा और प्यास बुझाने के लिए पानी की उसकी तलाश की सामान्य कहानी नहीं है. इसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए और इसका संदेश साफ  है कि जल इस धरती पर सभी जीवों के अस्तित्व का आधार है. यह कहानी हमें जीवन के इस कटु सत्य का भी अहसास कराती है कि जीवन के अस्तित्व के आधार यानी जल को धन देकर नहीं खरीदा जा सकता.

प्रसिद्ध अमरीकी भू वैज्ञानिक लूना बेर्गेरे लियोपोल्ड ने इसीलिए यह कहा कि ‘‘जल जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन मुद्दा है और हमारी आने वाली पीढिय़ों के लिए अत्यंत आवश्यक है. हमारे जल का स्वास्थ्य इस बात का प्रमुख मूल्यांकन है कि धरती पर हम कैसे रहते हैं.’’ इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि जल उन सभी तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण है, जो पृथ्वी ग्रह पर मानव प्रजाति और वन्य जीवों एवं वनस्पतियों को अस्तित्व बनाए रखने में मदद पहुंचाते हैं. यह सभी नैतिक, नीतिपरक, सौंदर्यपरक और आध्यात्मिक मूल्यों के अस्तित्व का सार है और विश्व संस्कृति एवं सभ्यता के स्थायित्व का इंजन है.

परंतु, दुर्भाग्य से विश्व की तेजी से बढ़ती आबादी, जो पिछले सात दशकों में बढक़र दोगुनी से अधिक हो गई है, के कारण जल की उपलब्धता, विशेष रूप से पेयजल प्रयोजनों के लिए सामान्य जनों को जल की उपलब्धता 21वीं सदी की आधुनिक मानव प्रजातियों के लिए सबसे गंभीर संकटों में से एक बन गई है. इतना ही नहीं, वैश्विक आबादी की जल तक पहुंच हर गुजरते वर्ष के साथ घटती जा रही है. जब हम यह देखते हैं कि भूमिगत जल का स्तर हर वर्ष घटता जा रहा है, तो इससे खराब और चिंताजनक बात और कोई नहीं है.

मानव के लिए पानी का संकट कितना चिंताजनक और निराश कर देने वाला माहौल पैदा कर सकता है, इसका अहसास हाल ही में मीडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट और उसके साथ दिए गए साओ पाउलो के लोगों के भयानक तथा संत्रास पैदा करने वाले चित्रों से होता है. साओ पाउलो ब्राजील का सर्वाधिक औद्योगिक शहर है, जिसे कभी सिटी आफ ड्रिजल यानी फुहारों का शहर कहा जाता था, जिसकी आबादी 1.3 करोड़ से अधिक नहीं है. शहर के लोगों को हाल ही में एक गंभीर सूखे का सामना करना पड़ा और उन्हें भूमिगत जल की तलाश में अपने घरों के बेसमेंट, फर्श और यहां तक कि वाहन पार्किंग स्थलों की खुदाई और ड्रिलिंग करनी पड़ी.

दहशत पैदा करने वाली इस खबर और इसके साथ प्रकाशित दिल दहला देने वाले चित्रों के पाठकों और दर्शकों को ब्राजील के इस शहर के निवासियों के अप्रत्याशित संकट और दु:स्वप्न का अनुभव भले ही न हो, परंतु इसके स्पष्ट सबक समझने के लिए किसी रॉकेट विज्ञान की आवश्यकता नहीं है कि जल ही जीवन है, जल के अभाव का अर्थ है, जीवन का नामोनिशान न होना. आने वाले वर्षों में धरती पर मानव मात्र के अस्तित्व के लिए आवश्यक मूल तत्व और वन्यजीव एवं वनस्पतियों के अस्तित्व के आधार, जल  का सबसे बड़ा हिस्सा हड़पने को लेकर दुनिया आज अब तक के सबसे विद्रूप और गंभीर युद्ध के कगार पर पहुंच गई है. इससे धरती पर जीवन के अस्तित्व के प्रति उत्पन्न संकट भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है.

पृथ्वी ग्रह की सतह पर दो तिहाई हिस्सा यानी करीब 70 प्रतिशत हिस्सा जल का है. इसका यह अर्थ नहीं है कि हमारे पास जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध है. इसकी वजह यह है कि समूची पृथ्वी पर उपलब्ध जल में से केवल 3 प्रतिशत ताजा पेयजल है. संकट और विडम्बना की कहानी यहीं पर समाप्त नहीं हो जाती है. कुल 3 प्रतिशत ताजा पेयजल में से दो तिहाई हिस्सा सुदूर ग्लेशियरों (हिमनदों) में अटका हुआ है और इस तरह मात्र एक प्रतिशत जल रोजमर्रा की बुनियादी मानव गतिविधियों के लिए उपलब्ध है, जिसका इस्तेमाल अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रों, वस्तुओं के उत्पादन एवं सेवाओं के सृजन के लिए किया जा रहा है.

अगर पृथ्वी ग्रह पर उपलब्ध करीब 70 प्रतिशत जल में से केवल 1 प्रतिशत उपयोग के लिए बचता है और वह मानव मात्र एवं अन्य जीवों की पहुंच के भीतर है, तो हम आसानी से विश्व के देशों के बीच जल संकट की गंभीरता का अनुमान लगा सकते हैं. यह अत्यंत चिंताजनक है कि दुनिया में करीब 1.2 अरब, यानी भारत की जनसंख्या से थोड़ा अधिक लोग, पानी तक पहुंच से वंचित हैं. इतना ही नहीं, दुनिया में 3 अरब, यानी भारत और चीन की संयुक्त जनसंख्या से भी अधिक लोग वर्ष में कम से कम एक महीना पानी की गंभीर कमी से जूझते हैं. पानी के संकट से लोगों की तकलीफों की यह कहानी यहीं पर समाप्त नहीं होती है.

पानी की उपलब्धता और पहुंच, दोनों की ही चिंताजनक स्थिति विश्व में स्वच्छता के संकट को भी उजागर करती है. पर्याप्त जल का अभाव लोगों को जल से होने वाली अनेक बीमारियों के जोखिम में डाल देता है. इनमें हैज़ा, पेचिश, टाइफाइड और कई अन्य बीमारियां शामिल हैं. चिकित्सा विज्ञान का कहना है कि आज मनुष्य मात्र को जिन बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है उनमें से 90 प्रतिशत बीमारियां विषाक्त और असुरक्षित पेयजल के कारण होती हैं. यह भी उल्लेखनीय है कि कम से कम 20 लाख व्यक्ति, जिनमें अधिकतर बच्चे होते हैं, हर वर्ष हैजे से मर जाते हैं, जो एक विषाक्त जल जन्य बीमारी है.

इस दौर में सूखा पडऩा सर्वाधिक सामान्य वैश्विक प्राकृतिक घटना है. दुनियाभर में सर्वाधिक असामान्य शहरों और कस्बों में बाढ़ आने लगी है. विषम जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और भी खराब कर दिया है. पिछले सात दशकों में विश्व के कुल आद्र्र भूमि क्षेत्रों में से करीब आधे नष्ट हो गए हैं, जो धरती के लिए अच्छा संकेत नहीं है. विशेष रूप से इस बात को देखते हुए कि ये आद्र्र भूमि क्षेत्र मानव सभ्यता के विकास की सर्वाधिक संभावनाशील नर्सरियों का निर्माण करते हैं और विविध प्रकार के वन्यजीवों और वनस्पतियों का विकास करते हैं तथा तूफानों, सूखों, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं से लोगों को एक कवच प्रदान करते हैं. आद्र्र भूमि क्षेत्रों को नष्ट करना भी चिंता का एक विषय है, क्योंकि वे विश्व में लगभग आधी आबादी के प्रमुख भोजन यानी चावल के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं.

जल संकट एक है और इससे उत्पन्न समस्याएं और दुविधाएं अनेक हैं, जिनके व्यापक प्रभाव अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं. वैश्विक जल संकट से उत्पन्न जीवन और मृत्यु संबंधी प्रश्नों के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर, हमें गंभीर आत्म-अन्वेषण करने की आवश्यकता है और यह विचारोत्तेजक प्रश्न स्वयं से करना है कि हम उस दोष  को कैसे ढूंढें, जिसके कारण यह जल संकट पैदा हुआ है. इसके साथ ही यह और भी अनिवार्य है कि हम स्वयं से एक अन्य समान महत्वपूर्ण प्रश्न यह पूछें कि चिंताजनक बहु-आयामी जल संकटपूर्ण स्थितियों से निजात पाने के लिए हम कब और कैसे उपाय अमल में ला सकेंगे. इस संकट में न केवल वर्तमान पीढ़ी का जीवन संकट में डाल दिया है, बल्कि आने वाली पीढिय़ों का अस्तित्व भी संकट में है.

ज़ाम्बिया की राजधानी लुसाका में एक प्रसिद्ध चिडिय़ाघर है. इस चिडिय़ाघर में एक पिंजरा है, जिसमें कोई जानवर नहीं है, लेकिन एक विचित्र नोटिस चिपकाया गया है, जिस पर लिखा है, ‘‘दुनिया का सबसे खतरनाक जानवर’’. जब आगंतुक इस पिंजरे में प्रवेश करते हैं, तो उन्हें एक मानव आकार का दर्पण दिखाई देता है, जिसमें वे अपनी छवि देखते हैं. संदेश अत्यंत स्पष्ट है: सभी प्राकृतिक महा-विपत्तियों और उन सभी संकटों, जिनका सामना आज दुनिया की आबादी को करना पड़ रहा है, के लिए केवल मानव और उसकी कभी समाप्त न होने वाली लालसाएं जिम्मेदार और दोषी हैं.

इस तरह अन्य संकटों की भांति, जल संकट भी मानव निर्मित है. हमने धरती पर जीवन को समर्थन देने में जल की महत्वपूर्ण भूमिका की अनदेखी की है. अत: इस संकट का समाधान भी केवल मानव मात्र के ईमानदार प्रयासों से निकलेगा. सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक कदम यह है कि हम अपनी मानसिकता और अंतर-दृष्टि में समग्र परिवर्तन लाएं. सबसे पहले हमें उन खतरों को समझने की आवश्यकता है, जो पानी की कमी के कारण हमारे अस्तित्व के समक्ष स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं. हमें यह कल्पना करने की आवश्यकता है कि धरती पर जल का कोई स्रोत न बचने पर कितना भयानक परिदृश्य होगा और हम सभी को एक साथ मरने का अभिशाप झेलना होगा. स्लोवाकिया की एक कहावत है कि शुद्ध जल दुनिया की प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण औषधि है. इतना ही नहीं, जल धरती पर समूचे जीव समूह के लिए आजीविका अर्जित करता है. अत: इस तथ्य को समझने में कोई कोताही बरतने की आवश्यकता नहीं है कि हमें जल का तत्काल संरक्षण करने की आवश्यकता है.

जल का संरक्षण पानी की फिजूलखर्ची रोकने से प्रारंभ होता है. कहा जाता है कि किसी प्राकृतिक संसाधन को बचाना उसका उत्पादन करने के समान है. धरती पर जितना जल उपलब्ध है, उसका 70 प्रतिशत इस्तेमाल खेती क्षेत्र के लिए किया जाता है, जो हमारे लिए एक बहुत बड़ा हिस्सा है. इसमें कोई दो राय नहीं कि कृषि अन्नागार का एक मात्र स्रोत है, जो मानवमात्र के अस्तित्व का मूलाधार है, परंतु इसी के साथ हमें यह सावधानी बरतनी है कि खेती के लिए प्रयुक्त 60 प्रतिशत जल रिसाव के कारण बर्बाद होता है. इससे भूमिगत जल पर भारी दबाव पड़ता है. इसलिए जरूरी है कि सिंचाई प्रणाली के लिए अद्यतन वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियां और रिसाव निरोधक ढांचागत सुविधाएं प्रदान की जाएं. कृषि वैज्ञानिकों को गहन अनुसंधान करने की भी आवश्यकता है, ताकि आनुवंशिक दृष्टि से परिष्कृत ऐसे बीज तलाश किए जा सकें, जो शुष्क खेती प्रणाली को बढ़ावा देने वाले हों. इससे हम मूल्यवान और दुर्लभ जल को बचा सकेंगे. उद्योगों को भी पानी की बरबादी रोकने पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है. विभिन्न औद्योगिक इस्तेमालों जैसे कूलेंट या क्लिनिंग एजेंट के रूप में प्रयुक्त जल को युक्तिसंगत ढंग से काम में लाया जाए. इसके लिए अद्यतन संस्थापनाओं का प्रयोग किया जाए, परिष्कृत प्रचालन विधियां अपनाई जाएं और अनेक प्रकार की अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियां काम में लाई जाएं. उत्सर्जित और उद्योगों से निष्कासित जल तथा मल-जल को रीसाइकिल करने की आवश्यकता है ताकि वह नदियों और झीलों में न जाए. वर्षा जल संरक्षण पानी के विकास की एक महत्वपूर्ण तकनीक हो सकती है, जिससे पानी के एक गंभीर अभाव का सामना करने वाले लोगों को राहत मिल सकती है.

सरकार को वनों की कटाई और फर्नीचर उद्योग के विकास के नाम पर प्राइवेट ठेकेदारों द्वारा पेड़ों की कटाई पर सख्त रोक तत्काल  लगानी चाहिए. बड़े पैमाने पर वन रोपण में तेजी लाना आज समय की आवश्यकता है ताकि असामान्य और अनियमित किस्म की बारिश की स्थिति में सुधार लाया जा सके और विश्व की समूची 7.5 अरब की आबादी के लिए डब्ल्यूएएसएच (वाटर फार ड्रिंकिंग, सेनिटेशन एंड हाईजीन) यानी पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त मात्रा में जल सुनिश्चित किया जा सके.

सामान्य जन को भी गहरी नींद से जागना चाहिए और जल की प्रत्येक बूंद के महत्व को समझना चाहिए. बिना किसी प्रयोजन के घंटों तक पानी के नल को खुला बहने देना धरती पर मानवता के खिलाफ अपराध से कम नहीं है. जब तक लोगों को पानी की बरबादी के दुष्परिणामों का ज्ञान नहीं होगा, तब तक जल संकट दूर होने वाला नहीं है और दिन-ब-दिन बढ़ता जाएगा.

सकल घरेलू उत्पाद की दर में तीव्र वृद्धि के लिए विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ होड़ करना सुनने में अच्छा लगता है और कोई उससे बच भी नहीं सकता, परंतु प्रगति और समृद्धि के शिखर पर पहुंचने की लालसा के साथ क्या प्रत्येक सजग नागरिक को इस बात पर विचार नहीं करना चाहिए कि - क्या धरती मानव प्रजाति की कभी समाप्त न होने वाली इच्छाओं और हर रोज बढ़ती जरूरतों का बोझ वहन कर पाएगी? एक और बड़ा सवाल, जो किसी भी तरह कम महत्वपूर्ण नहीं है, वह यह है कि मानव द्वारा पैदा किए गए इन संकटों और दबावों के चलते धरती कितना टिक पाएगी. अंतिम लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम उस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार हैं, जब धरती हमारी मनमानियों और इच्छाओं को पूरा करने में असमर्थता व्यक्त कर देगी.

मानव मात्र और स्वयं पृथ्वी के अस्तित्व में जल की महत्वपूर्ण और जीवनदायी भूमिका को ध्यान में रखते हुए हमें उपरोक्त प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करना होगा और ईमानदारी से उनके उत्तर एवं समाधान तलाश करने होंगे. अन्यथा हम कल उनका उत्तर देने और समाधान करने के लिए बचे नहीं रहेंगे.

 (लेखक जवाहर नवोदय विद्यालय के प्रधानाचार्य हैं. ई-मेल: spsharma.rishu@gmail.com)