संपादकीय लेख


Volume-3, 21-27April, 2018

 

लघु उद्योग के लिए अनुकूल परिवेश को प्रोत्साहन

अश्विनी महाजन

भारतीय अर्थव्यवस्था में लघु उद्यमों का सदैव एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है. चाहे वह उत्पादन, रोज़गार या निर्यात, किसी भी रूप में जुड़ा क्यों न हो. इसके अतिरिक्त लघु उद्योग समानता और विकेंद्रीकरण के साथ विकास के भी वाहक हैं. इसलिए आर्थिक नीति को लघु उद्योगों के संवर्धन और संरक्षण पर उचित रूप से लक्ष्य किया जाना चाहिए. हालांकि दो दशकों से अधिक समय से यह क्षेत्र एक गंभीर संकट से गुजर रहा है. बड़ी संख्या में लघु उद्योगों की समाप्ति न केवल नौकरियों के सृजन, बल्कि उनके एवं अर्थव्यवस्था के विकास में अवरोध उत्पन्न कर रही है.

उदारीकरण और भूमंडलीकरण का प्रभाव

स्वतंत्रता के बाद देश की औद्योगिक नीति ने बड़े पैमाने पर निजी उद्योगों के विकास पर रोक लगाई. उस दौर की औद्योगिक नीति लाइसेंस और  कोटा राज पर्याय बन गयी थी. मौजूदा उद्योगों ने तो इस आर्थिक नीति के दौर में अपना अस्तित्व बरकरार रखने के कला सीख ली, लेकिन नए उद्यमियों के लिए पनपना कठिन रहा.

जहां तक लघु उद्योगों का संबंध है, तत्कालीन नीति ने एसएसआई को उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में काम करने की अनुमति दी और कई वस्तुओं को एसएसआई के लिए आरक्षित कर दिया गया. १९९१ में नई आर्थिक नीतियों के पदार्पण से पूर्व ८१२ वस्तुओं के उत्पादन की जिम्मेदारी केवल लघु उद्योगों की थी. नई आर्थिक नीति (एनईपी) ने आरक्षण की इस नीति को कुचल दिया. इसी प्रकार लघु उद्योगों को सरकारी खरीद में वरीयता दी जाती थी, कीमतों और खरीद, दोनों के मामले में. धीरे-धीरे प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के नाम पर एसएसआई के लिए रियायतें समाप्त कर दी गयीं. यह कहा गया कि एसएसआई को आरक्षण देने से प्रौद्योगिकी का विकास बाधित होता है और प्रतियोगिता की भावना दम तोड़ देती है. यह भी कहा गया कि संरक्षण देने से अक्षमताएं उत्पन्न होती हैं और देश अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर पाता है. यह तर्क दिया गया कि अगर हम लघु उद्योगों सहित घरेलू उद्योग को संरक्षण देना जारी रखेंगे तो विदेशी निवेशकों को निराश करेंगे. साथ ही उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प प्राप्त करने का मौका नहीं मिलेगा. एनईपी के तर्कों ने रोज़गार, विकेन्द्रीकरण और ऐसी समानता की वकालत करने वाले पक्ष पर विजय हासिल कर ली, जो एसएसआई को रियायत देने की बात करती थी.

भूमंडलीकरण के युग में मुक्त आयात नीति ने हमें बड़ी संख्या में उत्पाद और कदाचित प्रौद्योगिकी हासिल करने में तो मदद की, लेकिन लाखों छोटे उद्यमों की तालाबंदी की कीमत पर, जो विश्व के दूसरे देशों से भयंकर प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर सके. हालांकि ऑटोमोबाइल जैसे कुछ क्षेत्रों में सहायक लघु स्तरीय इकाइयों में कुछ वृद्धि देखी गयी लेकिन सामान्य रूप से लघु उद्योगों पर बहुत बुरा असर हुआ, खासतौर से चीन से होने वाले आयात के कारण. खिलौने, बिजली के उपकरण, मोबाइल, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स उपसाधनों, प्रोजेक्ट माल, बिजली संयंत्रों आदि के भारी आयात के कारण देश पर विदेशी मुद्रा भुगतान का भारी बोझ आया, साथ ही हमारे उद्योग और व्यापार नष्ट हो गए जिससे बड़े पैमाने पर बेरोजगारी हुई.

मेक इन इंडिया को कैसे बढ़ावा दें

यद्यपि, चीन द्वारा डंपिंग और भारत के लघु उद्योगों पर उसके असर के विषय में कोई संदेह नहीं है, फिर भी यह समझना महत्वपूर्ण है कि चीनी सरकार अपने देश में उद्योग और उद्यमिता के विकास के लिए अनुकूल माहौल प्रदान करती है. इसी कारण चीन विश्व का विनिर्माण केंद्र बन गया है.

भारत में ऐसी कई समस्याएं हैं जिनके कारण लघु उद्योगों का विकास प्रभावित होता है. इनमें महंगी बिजली, पुराना श्रम कानून, जटिल कर प्रणाली, करों की उच्चदर, वित्त पोषण की समस्याएं, बुनियादी ढांचे की कमियां, उद्यम लगाने को हतोत्साहित करने वाले कानून, इंस्पेक्टर राज और विकृत पर्यावरण कानून शामिल हैं. इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि लघु उद्योगों को न केवल आयात संबंधी प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ती है, बल्कि उद्योग शुरू करने से लेकर अंतिम उत्पाद को मार्किट तक पहुंचाने में भी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

अलग श्रम कानूनों की जरूरत

श्रम की सुरक्षा और कल्याण के महत्व से कोई इंकार नहीं करता. हालांकि अनुचित तरीके से काम पर रखने और निकालने की नीति अच्छी नहीं है और हमें श्रमिकों के हितों की रक्षा करनी चाहिए लेकिन बड़े और लघु उद्यमों के लिए एक ही कानून का औचित्य नहीं है. परिदृश्य अब बदल गया है और जटिल श्रम कानूनों के कारण लघु उद्यमों ने नियमित श्रमिकों की भर्ती के बजाय अनुबंध पर कामगारों को रखना शुरू कर दिया है. बिचौलियों द्वारा ठेके पर काम करने वालों का शोषण किया जाता है जिससे उद्यमियों एवं श्रमिकों के बीच का संबंध समाप्त होता है और दोनों, उद्यमियों और श्रमिकों का नुकसान होता है. इस समस्या को देखते हुए, दूसरे श्रम आयोग ने लघु उद्यमों के लिए अलग कानून बनाने की सिफारिश की थी. श्रमिक संगठनों ने भी ऐसी पहल का समर्थन किया था. कुछ समय पहले अति लघु, लघु एवं मध्यम उद्योग विधेयक तैयार किया गया था. हालांकि लघु उद्यमों के लिए अलग श्रम कानूनों की अब भी आवश्यकता है.

वित्त बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों का मानना है कि लघु उद्यमों को उधार देना जोखिम भरा काम है. इस सोच में कोई सच्चाई नहीं है. खासकर यह देखते हुए बड़े कर्ज के  बदले बैंक एनपीए जैसे जबरदस्त संकट का सामना कर रहे हैं. इस पूर्वव्यापी धारणाओं के कारण बैंक लघु उद्यमों को ऋण देने से बचते हैं, इसके बावजूद यह उनके लिए कानूनी बाध्यता है कि वे लघु उद्यमों को ऋण में वरीयता दिखाएं. इसके अतिरिक्त लघु उद्यमों को उच्च ब्याज दरों पर ऋण लेना पड़ता है, जबकि बड़े उद्यमों को बिना परेशानी के, बहुत सस्ती दरों पर ऋण मिलता है और वह भी आसान शर्तों पर.

वर्तमान सरकार ने माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रीफाइनांस एजेंसी (मुद्रा) स्टार्ट अप स्कीम इत्यादि के माध्यम से लघु और अति लघु उद्यमों का मार्ग सुगम बनाने का प्रयास किया है. अब केवल मुद्रा योजना के अंतर्गत ३.९ लाख करोड़ रुपये का कुल ऋण संवितरित किया गया है. इसके बाद मुद्रा ऋण के ९.३ करोड़ लाभार्थियों ने न केवल खुद स्वरोज़गार चालू किया है बल्कि रोज़गार सृजन भी किया है.

भारी आयात और डंपिंग पर प्रतिबंध

हालांकि, विदेशी व्यापार आधुनिक काल में एक सामान्य घटना है लेकिन यह लघु उद्योगों के लिए संकट का बायस है. इसका कारण कुछ विदेशी देशों, विशेष रूप से चीन द्वारा की जाने वाली डंपिंग है. केंद्र सरकार ने अब बड़े पैमाने पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाया है. राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में, तत्कालीन वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने कहा था कि चीन से आयात किए गए ९३ उत्पादों पर एंटी डंपिंग शुल्क लागू है. इसके अतिरिक्त एंटी डंपिंग एंड एलीइड ड्यूटी के महानिदेशालय ने चीन से आयात के ४० मामलों में पहल की है.

वर्ष २०१६-१७ में कुछ वस्तुओं पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाने के वांछनीय परिणाम मिले. चूंकि चीन की अनेक वस्तुओं पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाया जा रहा है  इसलिए यह उम्मीद की जा रही है कि चालू वर्ष में चीन से आयात में गिरावट होगी. इससे न केवल घरेलू उद्योग को राहत मिलेगी, बल्कि चीन   के साथ व्यापार घाटा भी कम होने की संभावना है.

सरकारी खरीद में वरीयता

लघु उद्यमों को संरक्षण और बढ़ावा देने के लिए ऐसी व्यापक और स्पष्ट सरकारी नीति थी कि एसएसआई से खरीद को वरीयता दी जाएगी. लेकिन बदलते दौर में यह वरीयता समाप्त या कम कर दी गई.

हाल ही में सरकार ने जनरल फाइनांशियल नियम (जीएफआर) बनाकर एक नई खरीद नीति लागू की है. जीएफआर के नियम १५३ में कहा गया है : ‘‘५० लाख रुपये और उससे कम मूल्य के माल की खरीद में, और जहां नोडल मंत्रालय यह निर्धारित करता है कि पर्याप्त स्थानीय क्षमता और स्थानीय प्रतियोगिता है, केवल स्थानीय आपूर्तिकर्ता ही पात्र होंगे.

५० लाख रुपये और उससे अधिक मूल्य की खरीद के लिए (या जहां अपर्याप्त स्थानीय क्षमता/प्रतियोगिता है). यदि न्यूनतम बोली गैर-स्थानीय आपूर्तिकर्ता की नहीं है, तो निम्नतम लागत वाले स्थानीय आपूर्तिकर्ता, जो न्यूनतम बोली के २० प्रतिशत के अंतर के भीतर है, को निम्नतम बोली से मेल खाने का अवसर दिया जाएगा.’’ (or where there is insufficient local capacity/ competitionउम्मीद की जाती है कि घरेलू माल की खरीद को वरीयता देने से घरेलू उद्योग को सामान्य रूप से और लघु स्तरीय उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा.

इंस्पेक्टर राज की समाप्ति

एसएसआई पर ४० से अधिक कानून लागू हैं और ५० से ज्यादा निरीक्षक उनके कारखानों का दौरा करते हैं. उनमें से कई में एसएसआई को दंडित करने के लिए व्यापक शक्तियां हैं. इन खतरों के साथ एसएसआई के लिए उत्पादन, विपणन और प्रौद्योगिकी के उन्नयन जैसे मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल होता है. कई ऐसे कानून हैं जो आधुनिक समय में उपयोगिता खो चुके हैं और कई सामान्य रूप से अर्थव्यवस्था और विशेषरूप से उद्योग के स्वस्थ कामकाज में बाधक हैं. इस त्रासदी को समाप्त करने की सख्त आवश्यकता है. हालांकि अर्थव्यवस्था के सुचारू रूप से कार्य करने के लिए वर्ततमान सरकार ने कुछ बेमानी कानूनों को निरस्त करने का काम शुरू कर दिया है. अब तक १२०० अधिनियम रद्द किए गए हैं और १८२४ अधिनियमों को निरस्त करने के लिए चिन्हित कर लिया गया है.

नए उद्यमियों की सुविधा हेतु सभी प्रकार की मंजूरी के लिए एकल खिडक़ी की आवश्यकता है. कुछ राज्यों ने इस प्रक्रिया को शुरू किया है. जैसे ही अधिक से अधिक राज्य सरकारें ऑनलाइन होंगी,  इस प्रक्रिया में तेजी आएगी. स्टार्टअप्स के लिए नई पहल के तहत, ऑनलाइन अनुमतियां पहले ही दी जा चुकी हैं.

बुनियादी ढांचे  का निर्माण

एक दुर्गम क्षेत्र में लघु उद्यमों को शुरू करना और चलाना लगभग असंभव है. वे न  तो रेल या सडक़ से जुड़े हैं, न ही वहां ऊर्जा का विश्वसनीय स्रोत है. बड़े और विकसित स्थानों में भी बिजली की आपूर्ति एक बड़ा मुद्दा है. कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर जनरेटर का उपयोग किया जाता है. इससे लागत बढ़ती है और प्रदूषण भी होता है. जनरेटर वाली इकाईयों का संबंधित विभागों के निरीक्षकों द्वारा शोषण भी किया जाता है. हमें रेल, सडक़, बिजली, कौशल विकास, बाजार (ई-पोर्टल्स सहित) सहित विभिन्न प्रकार के बुनियादी ढांचे को विकसित करने की जरूरत है. गांवों का सार्वभौमिक विद्युतीकरण, सौर ऊर्जा को बढ़ावा, वर्तमान सरकार द्वारा सडक़ों का तेजी से निर्माण, यह सब लघु और अति लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए ही किया जा रहा है, खासतौर से ग्रामीण इलाकों में. सरकार द्वारा ई-प्रोक्योरमेंट को भी शुरू किया गया है.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वभाव से भारतीय लोग उद्यमी, मेहनती और उत्साही हैं. उन्हें उद्यमिता विकास के लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता है. यह प्रमुख रूप से सरकार का काम है. सरकार को अच्छे कानून बनाने पड़ते हैं, वातावरण को अनुकूल बनाना पड़ता है. भौतिक अवसंरचना को छोडक़र इसके लिए बहुत ज्यादा बजट की  आवश्यकता नहीं होती है. बुनियादी ढांचे को भी सार्वजनिक निजी साझेदारी से विकसित किया जा सकता है. हाल के वर्षों में सुधार के बावजूद व्यापार में सहजता के मामले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हमारी रैंकिंग अब भी १३० है. सरकार द्वारा बहुत कुछ किया जा चुका है और अभी बहुत अधिक की उम्मीद है.

लेखक पीजीडीएवी कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के अर्थशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. ई-मेल:ashwanimahajan@rediffmail.com