संपादकीय लेख


Volume-28, 13-19 OCTOBER, 2018

 

मानव सशक्तीकरण के लिए स्वच्छ पर्यावरण

श्री नरेंद्र मोदी (४ अक्तूबर, २०१८)

संयुक्त राष्ट्र ने कल मुझे चैम्पियंस ऑफ द अर्थ अवॉर्डसे सम्मानित किया. यह सम्मान प्राप्त करके मैं बहुत अभिभूत हूं, लेकिन महसूस करता हूं कि यह पुरस्कार किसी व्यक्ति के लिए नहीं है. यह भारतीय संस्कृति और मूल्यों की स्वीकृति है, जिसने हमेशा प्रकृति के साथ सौहार्द बनाने पर बल दिया है.

जलवायु परिवर्तन में भारत की सक्रिय भूमिका को मान्यता मिलना और संयुक्त राष्ट्र महासचिव श्री एंटोनियो गुटेरस तथा यूएनईपी के कार्यकारी निदेशक श्री इरिक सोलहिम द्वारा भारत की भूमिका की प्रशंसा करना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का क्षण है. मानव और प्रकृति के बीच विशेष संबंध रहे हैं. प्रारंभिक सभ्यताएं नदियों के तट पर स्थापित हुईं. प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहने वाले समाज फलते-फूलते हैं और समृद्ध होते हैं.

मानव समाज आज एक महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़ा है. हमने जो रास्ता तय किया है, वह न केवल हमारा कल्याण निर्धारित करेगा, बल्कि हमारे बाद इस ग्रह पर आने वाली पीढिय़ों को भी खुशहाल रखेगा. लालच और आवश्यकताओं के बीच असंतुलन ने गंभीर पर्यावरण असंतुलन पैदा कर दिया है. हम या तो इसे स्वीकार कर सकते हैं या पहले की तरह ही चल सकते हैं या सुधार के उपाय कर सकते हैं.

तीन बातों से यह निर्धारित होगा कि कैसे एक समाज सार्थक परिवर्तन ला सकता है. पहली, आंतरिक चेतना. इसके लिए अपने गौरवशाली अतीत को देखने से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता. प्रकृति के प्रति सम्मान भारत की परंपरा के मूल में है. अथर्ववेद में पृथ्वी सूक्त शामिल है, जिसमें प्रकृति और पर्यावरण के बारे में अथाह ज्ञान है: यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टय: संबभूवु:। यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमि: पूर्वपेये दधातु ॥  3  अर्थात्- माता पृथ्वी अभिनंदन. उनमें सन्निहित हैं, महासागर और नदियों का जल; उनमें सन्निहित है, भोजन जो भूमि की जुताई द्वारा वे प्रकट करती हैं; उनमें निश्चित रूप से सभी जीवन समाहित हैं; वे हमें जीवन प्रदान करें. ऋषियों ने पंचतत्व- पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश के बारे में यह बताया है कि किस तरह हमारी जीवन प्रणाली इन तत्वों की समरसता पर आधारित है. 

महात्मा गांधी ने ऐसी जीवन शैली को व्यवहार में उतारा, जिसमें पर्यावरण के प्रति भावना प्रमुख है. उन्होंने युक्तिसंगत खपत का आहन किया, ताकि विश्व को संसाधनों की कमी का सामना न करना पड़े. समरस जीवन शैली का पालन करना हमारे लोकाचार का अंग है. जब हमें अनुभव होगा कि हम एक समृद्ध परंपरा के ध्वज-वाहक हैं, तब हमारे कार्यकलाप पर अपने आप सकारात्मक प्रभाव पडऩे लगेगा.

दूसरा पक्ष जन जागरण का है. हमें पर्यावरण संबंधी प्रश्नों पर यथा संभव बातचीत करने, लिखने, चर्चा करने की आवश्यकता है. इसके साथ पर्यावरण संबंधी विषयों पर अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहन देना भी महत्वपूर्ण है. जब हम एक समाज के रूप में पर्यावरण संरक्षण से अपने मजबूत रिश्तों के बारे में जागरूक होंगे और उसके बारे में नियमित रूप से चर्चा करेंगे, तब सतत् पर्यावरण की दिशा में हम स्वयं सक्रिय हो जाएंगे. इसीलिए सकारात्मक बदलाव लाने के लिए मैं सक्रियता को तीसरे पक्ष के रूप में रखता हूं. इस संदर्भ में मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत के 130 करोड़ लोग स्वच्छ और हरित पर्यावरण की दिशा में सक्रिय हैं और उसके लिए बढ़-चढक़र काम कर रहे हैं. 

स्वच्छ भारत मिशन में हम यह अग्रसक्रियता देखते हैं, जो भविष्य में सतत् विकास से सीधे जुड़ी है. देशवासियों के आशीर्वाद से 8.5 करोड़ आवासों की पहली बार शौचालयों तक पहुंच बनी है और 40 करोड़ से अधिक भारतीयों को अब खुले में शौच करने की आवश्यकता नहीं है. स्वच्छता का दायरा 39 प्रतिशत से बढक़र 95 प्रतिशत हो गया है. प्राकृतिक परिवेश पर दबाव कम करने की खोज में यह ऐतिहासिक प्रयास हैं. उज्ज्वला योजना में भी हम यही अग्रसक्रियता देखते हैं, जिसकी वजह से घरों में होने वाला वायु प्रदूषण बहुत कम हुआ है.

 भारत की जीवन रेखा कही जाने वाली नदी गंगा नदी कई हिस्सों में काफी प्रदूषित हो चुकी थी और नमामि गंगे मिशन इस ऐतिहासिक गलती में परिवर्तन कर रहा है. पर्यावरण क्षेत्र में कौशल भारत में हमने समन्वित उद्देश्य अपनाए हैं और विभिन्न योजनाओं जिनमें हरित कौशल विकास कार्यक्रम शामिल है, की शुरूआत की है जिससे पर्यावरण, वानिकी, वन्यजीव और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में वर्ष 2021 तक 70 लाख युवाओं को कुशल बनाना है. इससे पर्यावरण क्षेत्र में कुशल रोज़गारों और उद्यमिता के लिए अनेक अवसर पैदा होंगे.

हमारा देश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर विशेष ध्यान दे रहा है और पिछले चार वर्षों में यह क्षेत्र काफी सुगम और वहन करने योग्य बन गया है. उजाला योजना के तहत करीब 31 करोड़ एलईडी बल्ब बांटे गए. इससे जहां एक तरफ एलईडी बल्बों की कीमतें कम हुईं, वहीं बिजली के बिलों और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आई.

भारत की पहल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखी जा रही है. मुझे गर्व है कि भारत पेरिस में 2015 में हुई सीओपी-21 वार्ता में आगे रहा है. अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरूआत के मौके पर मार्च, 2018 में दुनिया के कई देशों के नेता नई दिल्ली में इकट्ठा हुए. यह गठबंधन सौर ऊर्जा की क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल करने की एक पहल है. इसके जरिये उन देशों को साथ लाने का प्रयास किया गया है, जहां सूरज की ऊर्जा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. ऐसे समय में जबकि दुनिया में जलवायु परिवर्तन की बात हो रही है, भारत से जलवायु न्याय का आह्वान किया गया है. जलवायु न्याय का अर्थ समाज के उन गरीब और हाशिये पर खड़े लोगों के अधिकारों और हितों से जुड़ा है, जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं.

जैसा कि मैंने पहले भी लिखा है, हमारी आज की गतिविधियों का प्रभाव आने वाले समय की मानव सभ्यता पर भी पड़ेगा और यह अब हम पर निर्भर करता है कि सतत् भविष्य के लिए वैश्विक जिम्मेदारी की शुरूआत हम ही करें. विश्व को पर्यावरण के क्षेत्र में एक ऐसी मिसाल की तरफ बढऩे की आवश्यकता है, जो सिर्फ सरकारी नियमों तथा कानूनों तक ही न हो, बल्कि इसमें पर्यावरण जागरूकता भी हो. इस दिशा में जो व्यक्ति और संगठन लगातार मेहनत कर रहे हैं मैं उन्हें बधाई देना चाहूंगा, क्योंकि वे हमारे समाज में चिरस्मरणीय बदलाव के अग्रदूत बन चुके हैं. इस दिशा में उनके प्रयत्नों के लिए मैं सरकार की ओर से हर तरह की मदद का आश्वासन देता हूं. हम सब मिलकर एक स्वच्छ पर्यावरण बनाएंगे, जो मानव सशक्तीकरण की दिशा में आधारशिला होगी.

(लेखक भारत के प्रधानमंत्री हैं)