संपादकीय लेख


Editorial Volume-35

संवैधानिक मूल्य
गऱीबों के लिये कानूनी सहायता सुनिश्चित करना

 

राघुल सुदीश

संविधान सभा ने, जिसे हमारे संविधान का मसौदा तैयार करने के लिये गठित किया गया था, वर्तमान संविधान को 26 नवंबर, 1949 को अंगीकृत किया था। तीस वर्ष बाद 1979 में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने 26 नवंबर को विधिक दिवस के तौर पर मनाया। इसके बाद, 26 नवंबर को पिछले कई वर्षों तक विधिक दिवस के तौर पर मनाया जाता रहा। पिछले वर्ष नवंबर से, भारत सरकार ने नागरिकों के बीच संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिये हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवसके तौर पर मनाने का निर्णय लिया है। अधिसूचना में कहा गया है:-

‘‘जैसा कि भारत के लोगों ने, अपने सभी नागरिकों के लिये न्याय, स्वतंत्रता, समानता सुनिश्चित करने और सभी के बीच भाईचारे को बढ़ावा देने का शपथपूर्वक संकल्प लेते हुए 26 नवंबर, 1949 के दिन संविधान सभा में भारत के संविधान को स्वीकार, अधिनियमित किया और स्वयं को प्रदान किया।

और जैसा कि डा. बी. आर. आम्बेडकर की अध्यक्षता में संविधान सभा की मसौदा समिति ने भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने में अपनी अमूल्य सेवाएं प्रदान कीं और राष्ट्र डॉ। बी. आर. आम्बेडकर के भारत के निर्माण में योगदान पर प्रकाश डालने के लिये उनकी एक सौ पच्चीसवीं जयंती मना रहा है।

अत: अब भारत सरकार ने हर वर्ष 26 नवंबर को नागरिकों के बीच संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा देने के लिये ‘‘संविधान दिवस‘‘ के तौर पर मनाये जाने का फ़ैसला किया है।

हमारे संविधान में, मुख्यत: भाग-III के अंतर्गतमौलिक अधिकारों से संबंधित, और भाग IV के अंतर्गत राज्य नीति निर्देशक सिद्धांतों से संबंधित, अनेक महान लक्ष्य प्रदान किये गये हैं। इन मूल्यों को बढ़ावा और संरक्षण प्रदान करना महत्वपूर्ण है, और संविधान दिवसमनाया जाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

जबकि भाग-III किसी कानूनी अदालत में लागू करने योग्य होता है, भाग ढ्ढङ्क के मामले में ऐसा नहीं है। अनुच्छेद 37 के तहत व्यवस्था के अनुरूप यह किसी कानूनी अदालत में लागू करने योग्य नहीं है। लेकिन संविधान में अनुच्छेद 37 के अधीन यह स्पष्ट किया गया है कि भाग IV में निर्धारित किये गये सिद्धांत देश के शासन में आधारभूत हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य की ड्यूटी होगी।

भाग ढ्ढङ्क के अधीन, अनुच्छेद 39ए में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के बीच, जिसमें मुफ्त कानूनी सहायता का प्रावधान है, विशेष महत्व के साथ चर्चा किये जाने की आवश्यकता है। न्याय की छानबीन प्रणाली में, जहां न्यायाधीश उसके समकक्ष मामले के लिये तथ्य निष्कर्षों में संलग्न होता है, भारत में हम न्याय की विरोधात्मक प्रणाली को अपनाते हैं जहां न्यायाधीश बचाव और अभियोजन पक्ष के बीच एक तटस्थ अधिनिर्णायक बन जाता है। यहां, न्यायाधीश केवल सही या गलत के निर्धारण में संलग्न हो जाता है और न कि सच्चाई का पता लगाने में, जैसा कि छानबीन प्रणाली में होता है। ऐसी प्रणाली में, यदि कोई व्यक्ति जिसका राज्य के साथ विवाद है, कानूनी अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं होता है, यह विवाद समाधान की संवैधानिक योजना के प्रावधान के विपरीत होगा।

1976 में 42वें संशोधन के साथ अनुच्छेद 39ए को जोड़ा गया और यह निम्नानुसार पठित है: ‘‘राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि समान अवसर के आधार पर कानूनी प्रणाली के प्रचालन में न्याय को बढ़ावा मिले, और विशेष तौर पर यह सुनिश्चित करने के लिये उपयुक्त विधेयन अथवा योजनाओं से अथवा किसी अन्य प्रकार से मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करेगा कि किसी भी नागरिक को आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय प्राप्त करने के अवसरों से वंचित न रहना पड़े।’’

संविधान में अनुच्छेद 39ए के शामिल किये जाने के कुछ वर्ष बाद, 1979 में हुसैनारा खातून के सुविख्यात मामले में, उच्चतम न्यायालय को कानूनी सहायता और अनुच्छेद 39ए पर संव्यवहार करने का अवसर प्राप्त हुआ। न्यायमूर्ति पी। एन। भगवती ने व्यवस्था दी कि,

‘‘मुफ्त कानूनी सेवा न्यायोचित, निष्पक्ष और न्यायसंगतप्रक्रिया का एक अपरिहार्य अंग है, जिसके बगैर आर्थिक या अन्य कठिनाइयों से पीडि़त कोई व्यक्ति न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित हो जायेगा। अत: मुफ्त कानूनी सेवाओं का अधिकार किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति के लिये न्यायसंगत, निष्पक्ष और न्यायिकप्रक्रिया का एक अनिवार्य घटक है और अनुच्छेद 21 की गारंटी में यह अवश्य निहित किया जाना चाहिये।’’

इस मामले के जरिये, न्यायमूर्ति भगवती ने मुफ्त कानूनी सेवाओं के अधिकार को अनुच्छेद 21 का अनिवार्य अंग बना दिया जो कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, भाग III के अधीन एक मौलिक अधिकार, की संरक्षा से संबंधित है, जो कि किसी कानूनी अदालत के समक्ष लागू करने योग्य होता है। अन्य शब्दों में, न्यायमूर्ति भगवती ने न्यायिक व्याख्या के जरिये राज्य नीति के एक निर्देशक सिद्धांत का मौलिक अधिकार के दर्जे के रूप में उन्नयन कर दिया। यह एक महत्वपूर्ण फैसला था और गरीब और दबे कुचले लोगों को मुफ्त कानूनी सेवा उपलब्ध करवाने के मार्ग में बहुत मददगार रहा।

नागरिकों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के लिये संवैधानिक अधिदेश को पूरा करने के लिये सरकार ने 1987 में कानूनी सेवाएं प्राधिकरण अधिनियमप्रस्तुत किया। अधिनियम में कानूनी सहायता और सेवाएं सुनिश्चित करने के लिये एक समग्र तंत्र की व्यवस्था की गई। अधिनियम के अनुच्छेद 12 के अधीन लोगों के कई वर्ग मुफ्त कानूनी सहायता के हकदार हैं और उनमें शामिल हैं:

1.अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचित जनजाति का कोई सदस्य

2.संविधान के अनुच्छेद 23 में यथा संदर्भित, तस्करी का पीडि़त कोई व्यक्ति या भिखारी

3.कोई महिला अथवा बच्चा

4.मानसिक रूप से बीमार अथवा अन्य प्रकार से नि:शक्त कोई व्यक्ति

5.खराब स्थितियों जैसे कि बड़ी आपदा, जातीय हिंसा, जातिगत दंगे, बाढ़, अकाल, भूकंप या औद्योगिक आपदा की स्थिति के अधीन कोई व्यक्ति

6.कोई औद्योगिक कामगार

7. हिरासत में कोई व्यक्ति

8.कोई व्यक्ति जिसकी वार्षिक आय नौ हजार रुपये अथवा ऐसी कोई अन्य उच्चतर राशि, जिसे राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है, यदि मामला उच्चतम न्यायालय से अलग अदालत में है, से कम है और बारह हजार रुपये अथवा कोई अन्य उच्चतर राशि, जिसे केंद्रीय सरकार द्वारा निर्धारित किया जाता है, यदि मामला उच्चतम न्यायालय में है, से कम है।

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा प्रदान की जा रही मुफ्त कानूनी सहायता में निम्नलिखित शामिल है:

1.किसी कानूनी कार्यवाही में एडवोकेट द्वारा प्रतिनिधित्व करना

2. उपयुक्त मामलों में किसी कानूनी कार्यवाही के संबंध में प्रोसेस फीस, गवाहियों के खर्च और अन्य देय या लागू प्रभारों का भुगतान

3.कानूनी कार्यवाहियों में दस्तावेजों के मुद्रण और अनुवाद सहित अभिवचनों, अपील के ज्ञापन, पेपर बुक तैयार करना।

4.कानूनी दस्तावेज, विशेष याचिकाओं आदि का मसौदाकरण

5.कानूनी कार्यवाही में निर्णयों, आदेशों, गवाहियों की टिप्पणी और अन्य दस्तावेजों की आपूर्ति

इसके अतिरिक्त विधिक सेवाएं प्राधिकरण अधिनियम में केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय विधिक सेवाएं प्राधिकरण, राज्य स्तर पर राज्य विधिक सेवाएं प्राधिकरण और जि़ला स्तर पर जि़ला विधिक सेवाएं प्राधिकरण की स्थापना का प्रावधान है। अधिनियम में तालुका विधिक सेवाएं समिति, उच्चतम न्यायालय विधिक सेवाएं समिति की स्थापना का भी प्रावधान है। अधिनियम के अनुच्छेद 19 के अधीन, इन प्राधिकरणों और समितियों के लिये विवादों के निपटारे के लिये लोक अदालत संचालित करना भी अपेक्षित होता है। अनुच्छेद 21(1) में प्रावधान है कि लोक अदालत द्वारा सुनाया गया कोई भी फैसला अंतिम और सभी पक्षों के लिये बाध्यकारी होगा और अवार्ड के खिलाफ किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकेगी।

अधिनियम के अनुच्छेद 22बी के अनुसार, केंद्रीय के साथ-साथ राज्य प्राधिकरणों को स्थाई लोक अदालतों की स्थापना के अधिकार दिये गये हैं। अनुच्छेद 22डी में प्रावधान है कि स्थाई लोक अदालतें, समाधान कार्यवाहियां संचालित करते हुए अथवा विवाद पर मैरिट पर निर्णय करते हुए स्वाभाविक न्याय के सिद्धांत, निष्पक्षता, निष्पक्ष व्यवहार, समानता और न्याय के अन्य सिद्धांतों से निदेशित होंगी और किसी सिविल प्रक्रिया की संहिता तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम से बाध्य नहीं होंगी। इसमें किसी समझौते पर पहुंचने के लिये नियमित न्यायिक प्रक्रिया में शामिल जटिल प्रक्रियाओं से मुक्ति सुनिश्चित होती है।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के संवैधानिक अधिदेश को पूरा करने के लिये एक व्यापक तंत्र मौजूद है और यह समाज के गरीब तथा दबे कुचले वर्गों के लिये एक वरदान बनता जा रहा है। यदि यह तंत्र नहीं होता तो न्याय की हत्या हो गई होती!  

 

राघुल सुदीश कोच्चि पोस्ट में एग्जि़क्यूटिव एडिटर हैं। (ई-मेल: raghulsudheesh@gmail.com)