संपादकीय लेख


volume-47, 23 February - 1 march, 2019

भारत में उभरती डिजिटल अवसंरचना

डॉ. रणजीत मेहता

भारत तेज गति से डिजिटल क्रांति की ओर बढ़ रहा है. हम एक उत्साही दौर से गुजर रहे हैं और डिजिटली सक्षम देश बनने के निकट हैं. भुगतान, व्यापार और सूचना क्षेत्र के सशक्तिकरण से लेकर सतत् और समावेशी विकास तक डिजिटल अवसंरचना की व्यापक संभावनाएं हैं. डिजिटल भारत अभियान के तहत गांवों को ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन से जोड़ा जाना है. मेकेंज़ी रिपोर्ट के अनुसार देश के सकल घरेलू उत्पाद में 2025 तक 550 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी होगी और देश का सकल घरेलू उत्पाद एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगा. सरकार की डिजिटल इंडिया पहल के साथ ई-कॉमर्स कंपनियां ग्रामीण भारत के बाजारों को लक्ष्य बनाने के प्रयास में हैं.

इसका परिणाम यह हुआ है कि ई-प्रशासन सरकारी एजेंसियों और सरकार के बीच कामकाज और सूचना संबंधी आदान-प्रदान की कुशलता, प्रभावकारिता, पारदर्शिता और जवाबदेही में बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार है. ई-प्रशासन नागरिकों को सूचना तक आसान पहुंच के माध्यम से सशक्त बना रहा है. वेब नेटवर्क के सर्वाधिक प्रभावशाली परिणामों में एक है, ई-सरकार का उदय. इंटरनेट समर्थित डिजिटल समुदायों के विकास तथा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों से जुडऩे की इसकी अपार क्षमता ने विभिन्न सरकारों के समक्ष जहां कई अवसर सृजित किए हैं, वहीं कई चुनौतियां भी खड़ी की हैं.

90 के दशक में विभिन्न देशों में सरकारों ने सूचना प्रौद्योगिकी का अधिक से अधिक इस्तेमाल शुरू किया और विश्वव्यापी वेब नेटवर्क सामने आया. भारत में अगले कुछ वर्षों में डिजिटल पहुंच में संख्यात्मक और गुणात्मक दोनों दृष्टि से अप्रत्याशित परिवर्तन देखे जाएंगे. हालांकि हमें यह समझना होगा कि इसके समक्ष आर्थिक बाधाएं काफी अधिक हैं. भारत के डिजिटल अवसंरचनात्मक सपने को साकार करने की दिशा में कई कारक हैं. इंटरनेट और सूचना प्रवाह का दायरा इतना व्यापक है कि सूचना संबंधी आंकड़ों का प्रयोग मासिक आधार पर, यहां तक कि दैनिक आधार पर करने का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता.

यह जानना लगभग अविश्वसनीय है कि इंटरनेट के एक मिनट में कितना कुछ घटित हो जाता है, केवल एक मिनट के दौरान वेब पर 46200 फोटो इंस्टाग्राम पर शेयर कर लिए जाते हैं, ऑनलाइन 751,522 डॉलर खर्च कर दिया जाता है, 1.8 मिलियन स्नैप बनाए जाते हैं और टिंडर पर 990000 स्वाइप कर लिए जाते हैं. गूगल हर एक मिनट में 3.5 मिलियन जानकारी सर्च करता है,  यूट्यूब पर एक मिनट में 4.1 मिलियन वीडियो देखे जाते हैं. सोशल मीडिया जगत में प्रवेश के लिए कोई अवरोध नहीं है, और प्रतिस्पर्धा के अपार अनगिनत अवसर हैं. लेकिन, लोगों के पास प्रत्येक मिनट भेजे जाने वाले 452,200 ट्वीट को देखने का समय नहीं है, यह लगभग असंभव है. इसलिए लोग स्वाभाविक रूप से सामाजिक स्वीकार्यता पा चुकी चीजों  की तरफ ही जाएंगे.

आज 100 परिवारों में से केवल 15 की पहुंच इंटरनेट तक है. मोबाइल ब्रॉडबैंड केवल कुछ सुविधा संपन्न लोगों को ही उपलब्ध है. विश्व आर्थिक मंच के अनुसार प्रत्येक 100 लोगों में केवल 5.5 लोग इसके ग्राहक हैं. हालांकि भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में लंबी छलांग लगाई है. केवल दो दशक से भी कम समय में शून्य कनेक्टिविटी से बढक़र मोबाइल इंटरनेट उपयोग करने वालों की संख्या 350 मिलियन हो गई है. भारत में डिजिटल पहुंच की योजना बनाते समय इसे ध्यान में रखा जाना जरूरी है.

डिजिटल संसाधनों के संभावित विकास ने भारत के समक्ष भौतिक संसाधन संबंधी पारंपरिक अभाव से निकलने का अवसर सृजित किया है. इससे दूर-दराज के क्षेत्रों में आर्थिक स्थिति मजबूत करने, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए व्यवसाय के नए अवसर सृजित करने और देश को एक सशक्त डिजिटल पहचान दिलाने में मदद मिलेगी. सबसे बढक़र डिजिटल अवसंरचना विकास से सरकार को नवाचारों, कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए संसाधन मुहैया कराने, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं पहुंचाने और मृत्यु दर नीचे लाने में मदद मिलेगी. इससे समाज के वंचित और बैंक सुविधा के अभाव वाले ग्रामीण समुदायों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाना आसान होगा और सबके लिए शिक्षा के लक्ष्य को पूरा किया जा सकेगा.

मौजूदा समय में भारत का स्थान ब्रॉडबैंड सुविधा वाले देशों में, यहां तक कि विकासशील देशों में भी काफी पीछे है. शहरी तथा प्रथम श्रेणी और द्वितीय श्रेणी के कस्बों में मोबाइल हैंड सेट के जरिए इंटरनेट सेवा काफी बढ़ चुकी है, लेकिन, ब्रॉडबैंड सेवा से देश का बड़ा हिस्सा अभी भी वंचित है. मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि ब्रॉडबैंड सेवा अभी 600 कॉरीडोर तक ही उपलब्ध है और ये देश के शीर्ष 50 से 100 शहरों में है. दूसरी तरफ  लक्ष्य ब्रॉडबैंड सुविधा के साथ डिजिटल भारत के सृजन का है, जिसके तहत दो लाख पचास हजार ग्राम पंचायतों को 100 एमबीपीएस संपर्क उपलब्ध कराया जाना है. राष्ट्रीय इंटरनेट प्रोटोकोल आधार सृजित करने और अंतिम सिरे तक कनेक्टिविटी पहुंचाने के लिए आवश्यक कोष का स्रोत स्पष्ट नहीं है. डिजिटल भारत का लक्ष्य साकार करने के लिए नियामक रूप रेखा में मूलभूत बदलावों की जरूरत है, जिससे समावेशी ब्रॉडबैंड विकास के लिए जरूरी मॉडल सामने आ सके. राष्ट्रीय ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के वित्त पोषण के लिए सार्वजनिक निधि स्रोत उपलब्ध हैं, लेकिन निजी क्षेत्र के ऑपरेटरों ने शीर्ष शहरों को छोडक़र अन्य क्षेत्रों में फाइबर नेटवर्क लगाने में कम रुचि दिखाई है. इसके लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी के एक सुदृढ़ मॉडल की जरूरत है, जिसके तहत राजस्व सृजन के लिए अनुकूल प्रणाली की व्यवस्था हो. 

2020 तक भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वालों की संख्या 500 मिलियन हो जाएगी. एसएमएस आधारित अनस्ट्रक्चर्ड सप्लीमेंट्री सर्विस डेटा (यूएसएसडी) को छोडक़र यूपीआई और भीम जैसे अन्य प्लान के लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी की जरूरत है. कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए सरकार ने विश्व के सबसे बड़े ग्रामीण ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी परियोजना भारत-नेट के लिए 2017-18 में योजना व्यय  बढ़ाकर 10,000 करोड़ रुपये किया है. इस परियोजना से डेढ़ लाख ग्राम पंचायतों तक हाईस्पीड कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी. मुफ्त वाईफाई उपलब्ध कराने संबंधी गूगल के साथ शुरू की गई भारतीय रेलवे की रेल-टेल वाईफाई परियोजना 110 स्टेशनों पर काम कर रही है और इसके जरिए ऑनलाइन लेन-देन की अपार संभावनाएं हैं.

डिजिटल क्रांति की दहलीज पर भारत में डिजिटल भुगतान आम बात बनती जा रही है. ऑनलाइन लेन-देन करने वालों की बढ़ती संख्या के साथ भारत में आने वाले समय में नए ढंग से कर का भुगतान करने वाले लोगों की अधिकता होगी और आय सृजन मेें बेहतर पारदर्शिता सुनिश्चित होगी. नकदी रहित अर्थव्यवस्था यानी कैशलेस इकोनॉमी के भारत का लक्ष्य डिजिटल लेन-देन के लिए लोगों को प्रेरित करने के सरकार के विभिन्न उपायों के साथ जोर पकड़ता जा रहा है.

डिजिटल भुगतान कंपनियां इस प्रयास को और तेजी दे रही हैं. सरकार भी डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहित करने के नए उपायों की तलाश में लगी है. विभिन्न सरकारी योजनाओं के साथ गति मिला कर चलने के लिए निजी कंपनियां उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के उपायों में लगी हैं.

डिजिटल भारत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिजिटल भारत पहल सरकार की प्रमुख परियोजनाओं में अनावश्यक विलम्ब को दूर करने का एक सशक्त उपाय है, जिसके तहत व्यापक ब्रॉडबैंड एक्सेस और मोबाइल कनेक्टिविटी पर ध्यान दिया जा रहा है. भारत संचार निगम लिमिटेड, रेल-टेल और पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ  इंडिया लिमिटेड जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों के माध्यम से प्रत्यक्ष व्यय सीमित होगा लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में रह रही 68 प्रतिशत आबादी के ऑनलाइन आ जाने से महत्वपूर्ण अप्रत्यक्ष मांग बढ़ेगी.

डिजिटल भारत कार्यक्रम का लक्ष्य इलेक्ट्रॉनिक सेवाओं, उत्पादों, निर्माण और रोज़गार के अवसरों में समावेशी वृद्धि लाना है. यह तीन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करता है।

·         प्रत्येक नागरिक के लिए डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर सुलभ बनाना

·         मांग पर प्रशासन और सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना

·         नागरिकों का डिजिटल सशक्तिकरण

इन लक्ष्यों के अनुरूप डिजिटल इंडिया कार्यक्रम का उद्देश्य ब्रॉडबैंड हाइवे, मोबाइल कनेक्टिविटी तक व्यापक पहुंच, सार्वजनिक इंटरनेट पहुंच कार्यक्रम, ई-प्रशासन, प्रौद्योगिकी के माध्यम से सरकारी कामकाज में सुधार, ई-क्रांति- सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक आपूर्ति, सबके लिए सूचना सुलभ बनाना, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण-आयात शून्य बनाने के लक्ष्य के साथ तथा रोज़गार के संदर्भ में सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल सुनिश्चित करना है. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत विभिन्न पहल आते हैं. इनमें से प्रत्येक का लक्ष्य भारत को ज्ञान आधारित व्यवस्था बनाना और नागरिकों के लिए उत्तम प्रशासन सुनिश्चित करना है.

ई-प्रशासन क्षेत्र में कई नीतिगत पहल भी की गई हैं, जैसे ई-क्रांति फ्रेमवर्क, भारत सरकार के लिए ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर अपनाने से संबंधित नीति, ई-प्रशासन प्रणालियों में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर अपनाने संबंधी रूपरेखा, भारत सरकार के लिए                                                                                ओपन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस नीति, भारत सरकार की ईमेल नीति, भारत सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी संसाधनों के उपयोग संबंधी नीति, क्लाउड रेडी एप्लीकेशंस के लिए डेवलपमेंट और रीइंजीनियरिंग संबंधी दिशा-निर्देश. इनके अलावा ये कदम भी उठाए गए हैं -

·         विभिन्न पूर्वोत्तर राज्यों में और अन्य राज्यों के छोटे शहरों में बीपीओ सेंटर खोलने के लिए बीपीओ नीति को मंजूरी दी गई है.

·         नवाचार, अनुसंधान और विकास, उत्पाद विकास और इंटरनेट प्रोटोकॉल के संसाधन पूल तैयार करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स विकास कोष नीति.

·         फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स के उभरते क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय फ्लेक्सिबल इलेक्ट्रॉनिक्स केंद्र की पहल की है.

·         इंटरनेट ऑन थिंग्स उत्कृष्टता केंद्र, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, अर्नेट और नेस्कॉम की संयुक्त पहल है.

चर्चा का समापन करते हुए कहा जा सकता है कि 2017-18 के दौरान भारत के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में रोज़गार सृजन की दर धीमी रही है, लेकिन वर्ष 2019 और इससे आगे इस क्षेत्र में नई प्रतिभाओं की अत्यधिक आवश्यकता पड़ेगी. टीम लीज़ सर्विसिज के अनुसार भारत में सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियोंं को आने वाले समय में काफी व्यावसायिक अनुबंध मिलेंगे और ये क्षेत्र 2019 में रोज़गार के लगभग ढ़ाई लाख अवसर सृजित करेगा.

नेस्कॉम के अनुसार 2017 में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने रोज़गार के एक लाख अवसर जुटाए थे. अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और रोबोटिक्स ऑटोमेशन जैसी नई प्रौद्योगिकी अपनाने से यह उद्योग काफी विकसित हुआ है. नई प्रतिभाओं को मौका देने के अलावा भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां अपने कर्मचारियों के कौशल विकास पर व्यय करना जारी रखेंगी. टीमलीज़ के अनुमानों के अनुसार 2019 में इस क्षेत्र में लगभग 20 प्रतिशत की दर से वृद्धि की संभावना है. अगले कुछ वर्षों में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में समग्र रोज़गार परिदृश्य में भारी बदलाव आएगा और इस क्षेत्र के कुछ रोज़गारों की मांग में काफी वृद्धि होगी. जिन क्षेत्रों में भारी मांग की संभावना है, वे हैं- गणित, स्थापत्यकला, अभियांत्रिकी से जुड़े क्षेत्र, डेटा विश्लेषण, मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस.

विश्वास है कि 2020 तक सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विश्व स्तर पर रोज़गार के 20 लाख नए अवसर सृजित होंगे. इनमें से 13 प्रतिशत अवसर भारत में होंगे. रोज़गार के सबसे अधिक अवसर डेटा विश्लेषण क्षेत्र में होंगे. विभिन्न उद्योगों के लिए यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण बनता जा रहा है. इसके बाद कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर डेवलेपर, सूचना सुरक्षा विश्लेषक, मशीन लर्निंग, मोबिलिटी, क्लाउड इंजीनियर, नेटवर्क विश्लेषक और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का स्थान होगा. स्वास्थ्य विज्ञान और वित्तीय प्रौद्योगिकी दो ऐसे उद्योग होंगे, जिनमें डेटा विश्लेषक और मशीन लर्निंग विशेषज्ञों की जरूरत पड़ेगी. अनुमान है कि बिग डेटा, बिजनेस इंटेलिजेंस और एनालिटिक्स में रोज़गार अवसरों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी, जबकि क्लाउड कम्प्यूटिंग में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी रहेगी. अगले 2 वर्षों में स्टार्ट अप उद्यमों का रोज़गार सृजित करने मेें महत्वपूर्ण योगदान होगा, क्योंकि इनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, ब्लॉक चेन, इंटरनेट ऑफ  थिंग्स की विस्तारित भूमिका रहेगी. सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में रोज़गार बहु-आयामी होंगे और इस उद्योग को अपने कर्मचारियों को कौशल प्रशिक्षित करने की दिशा में भारी प्रयास करना होगा. उन्नत कौशल प्रशिक्षण के लिए संगठनों को अत्यधिक कुशल और प्रौद्योगिकी सक्षम पेशेवरों को नियुक्त करना होगा.

(डॉ. रणजीत मेहता पीएच.डी. चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, नई दिल्ली में प्रधान निदेशक हैं, ई-मेल: ranjeetmehta@gmail.com)

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.

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