संपादकीय लेख


Volume-2, 13 - 19 April 2019

 

जलियांवाला बाग हत्याकांड

पंजाब ने युद्ध-प्रयत्नों में सबसे अधिक योगदान दिया था. लेकिन वह सभी प्रांतों से अधिक कष्ट में था. इसके साथ ही उस प्रांत का दुर्भाग्य यह भी था कि उसे सर्वोच्च शासक के रूप में माइकेल ओ डायर मिला हुआ था जो मार्ले के तानाशाहों में सबसे ज्यादा बढ़-चढक़र था. रोलट बिल ने पंजाब के घावों पर नमक छिडक़ने जैसा काम किया था. उसके संबंध में न अपील, न वकील, न दलीलकी कहावत चरितार्थ होती थी. वह ओ डायर जैसे अफसरों के इशारे पर प्रत्येक सार्वजनिक कार्यकर्ता को धमका रहा था कि उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.

पंजाब में तनाव ज्यादा होने से आंदोलन की व्यापकता और जोर भी ज्यादा था. लोगों के उत्साह की थाह नहीं थी, भावनाएं कहीं अधिक ऊंचे स्वरों में मुखर हो रही थीं, भीड़ और जगहों से कहीं ज्यादा जुटती थीं. इस सबका परिणाम उग्र प्रदर्शनों, अधिकारियों के चौकन्नेपन और जब-तब होने वाली झड़पों के रूप में प्रकट हो रहा था. 1907 की कृषकों की उथल-पुथल के समय से ही पंजाब की ख्याति गड़बड़ी वाले प्रांत के रूप में फैल रही थी. तब से हालत और भी गिर चुके थे. प्रांत गहरी निराशा का अनुभव कर रहा था और गांधीजी के आह्वान से लोगों में बिजली-सी दौड़ गई.

पूरे प्रांत में अनेक विरोध सभाएं पहले ही हो चुकी थीं. 10 अप्रैल को लाहौर तथा अन्य नगरों में हड़तालें हुईं. इस पर गवर्नर की बहुत तीव्र प्रतिक्रिया हुई. उसने विधान परिषद में अपनी धमकी भरे भाषण में कहा :

‘‘मैं इस मौके का फायदा उठाकर उन सबको, जो इस प्रांत में राजनैतिक आंदोलनों से संबद्ध है, चेतावनी देता चाहता हूं कि अगर वे सभाओं का आयोजन करते हैं तो उसके ठीक ढंग से संचालन के लिए, उनमें होने वाले भाषणों के लिए, ऐसी सभाओं के अन्य परिणामों के लिए उन्हें ही जिम्मेवार माना जाएगा.’’

ट्रिब्यूनने इस भाषण को अविवेक का ज्वलंत उदाहरण बताया.

10 अप्रैल को गांधीजी की गिरफ्तारी का समाचार फैलने पर लाहौर में एक जुलूस निकाला गया. जुलूस मेें शामिल विद्यार्थियों पर पुलिस ने गोली चला दी. एक भीड़ और एक सभा पर भी गोली-वर्षा हुई. तीन नेताओं को निष्कासित कर दिया गया.

लेकिन जो कुछ लाहौर में हुआ वह अमृतसर की भयावह घटना के आगे फीका पड़ गया. अमृतसर में फरवरी से ही विरोध सभाएं हो रही थी. 23 मार्च को सत्याग्रह आंदोलन के समर्थन में एक सभा हुई जिसके छह दिन बाद एक और सभा हुई जिसमें 30 तारीख के हड़ताल के बारे में एलान और स्पष्टीकरण किया जाना था.

अधिकारियों की तात्कालिक प्रतिक्रिया यह हुई कि वे एक नेता सत्यपाल को सार्वजनिक भाषण देने से रोक दें. लेकिन इससे नागरिक भयभीत नहीं हुए और 30 तारीख को हड़ताल की गई तथा जलियांवाला बाग में सभा हुई. 4 अप्रैल को एक अन्य नेता सईफुद्दीन किचलू को भी सत्यपाल की तरह भाषण न देने का आदेश दिया गया. कुछ अन्य लोगों पर भी ऐसी ही रोक लगाई गई. 6 अप्रैल को पूर्ण हड़ताल रही लेकिन शांति बनी रही. डिप्टी कमिश्नर बहुत क्रुद्ध हुआ और उसने अतिरिक्त सैनिक सहायता मांगी. 9 अप्रैल को एक हिन्दू त्यौहार था और हिन्दुओं, मुसलमानों तथा सिखों का एक बड़ा जुलूस सडक़ों से होकर गुजरा.

नेताओं के निमंत्रण पर गांधीजी पंजाब जा रहे थे लेकिन उन्हें पलवल में रोक दिया गया और वे उस प्रांत में प्रविष्ट नहीं हो सके.

अगली सुबह (10 अप्रैल को) किचलू और सत्यपाल को अमृतसर से चले जाने के आदेश दिए गए. उक्त दोनों घटनाओं से लोग भडक़ उठे. डिप्टी कमिश्नर से मिलने के लिए भीड़ जमा हो गई. वह उनके बंगले की ओर बढऩे लगी ताकि उनसे निष्कासन आदेश वापस लेने के लिए अनुरोध कर सके. सैनिकों ने उसे रोकने की कोशिश की. फिर घुड़सवार पुलिस ने उस पर गोली चला दी जिससे कुछ लोग मरे और बहुत से लोग घायल हुए. इस पर भीड़ तैश में आ गई. धक्कम-धक्का शुरू हो गया. इधर गोलियां चल रही थीं तो उधर से पथराव शुरू हो गया. भीड़ और बढऩे लगी जिसका स्वागत गोली-वर्षा से किया गया. आगजनी, लूटपाट और हत्याओं का बाजार गर्म हुआ. ओ डायर ने अमृतसर के अहिंसाव्रती नेताओं को निष्कासित करके जो विष बीज बोए उनकी फसल हिंसा के जहर के रूप में काटनी शुरू की- निरपराधों की हत्या के रूप में.

11 तारीख को अमृतसर सैनिक अधिकारियों को सौंप दिया गया और उसी रात ब्रिगेडियर डायर ने नगर का भार संभाल लिया. 12 और 13 अप्रैल को घोषणाएं जारी करके चेतावनी दी गई कि अगर सभाएं की गईं, जुलूस निकाले गए या हिंसात्मक कार्रवाइयां हुईं तो गंभीर परिणाम होंगे.

जनता ने इन धमकियों का प्रतिवाद करने का निश्चय किया. 13 अप्रैल को तीसरे पहर जलियांवाला बाग में एक सभा का आहवान किया गया. डायर ने इसे अपनी सत्ता को चुनौती माना और सभा को ऐसे बल प्रयोग द्वारा तितर-बितर करने का निश्चय किया जिससे लोगों को सबक मिल सके.

जलियांवाला बाग चारों ओर से मकानों से घिरा एक मैदान है जिससे बाहर निकलने का एक ही संकरा रास्ता है. इस रास्ते से होकर बख्तरबंद गाड़ी नहीं गुजर सकती. दूसरी ओर तीन या चार छोटे-छोटे मुखद्वार हैं. एक अनुमान के अनुसार इस मैदान में 15 से 25 हजार तक लोग जमा हुए. वे शांतिपूर्वक नेताओं के भाषण सुन रहे थे कि डायर और उसके सैनिक प्रवेश द्वार में दिखाई दिए. डायर ने तुरंत सैनिकों को तैनात किया और बिना कोई चेतावनी दिए गोली-वर्षा शुरू कर दी. सैकड़ों लोग मौत के मुंह में पहुंच गए. बहुत से लोग भगदड़ में दब गए, जो गोली-वर्षा के साथ ही मच गई थी. शवों का अंबार लग गया. घायलों की कराह आकाश से टकराने लगी. त्राही-त्राही की पुकार मच गई. लेकिन बंदूकें तब तक गोलियां उगलती रहीं जब तक वे चूक नहीं गई. डायर अपने हस्तकौशल के सबूत उस कत्लगाह पर विजय-दर्प से स्फीत दृष्टि डालता हुआ मृतकों और घायलों को उपेक्षित निगाहों से देखता हुआ लौट चला.

मृतकों और घायल होने वालों की ठीक-ठीक संख्या का पता कभी नहीं चल पाएगा. लेकिन यह महत्वपूर्ण नहीं है कि 327 मरे, जैसा कि सरकारी आंकड़ों में कहा गया, अथवा हजार-दो-हजार. महत्व की बात यह है कि ऐसे समय में जबकि इंग्लैंड की सरकार एलान कर रही थी कि वह राजनैतिक सुधारों के जरिए भारतीयों को स्वशासन के लिए प्रशिक्षित करना चाहती है, भारत में उसके एजेंट वस्तुत: भयग्रस्तता के वे पाठ पढ़ा रहे थे जिनका उद्देश्य भारतीयों में चाटुकारिता, कायरता, दंभ और पराश्रयता के गुणविकसित करना था.

जलियांवाला बाग कांड कोई अलग-थलग घटना नहीं थी. पंजाब में अधिकारियों ने भय का जो साम्राज्य स्थापित करने की आम नीति अपनाई थी, वह उसी के अंतर्गत घटने वाली अनेक घटनाओं की शृंख्ला की एक कड़ी थी. अमृतसर में हत्याकांड के बाद कफ्र्यू लगा दिया गया जो दो महीने तक लगा रहा. इतना ही नहीं, शहर को पानी और बिजली से वंचित कर दिया गया. कोड़े मारने की सजा आम बात हो गई और यह आदेश दिया गया कि जिस गली में एक अंग्रेज महिला कुमारी शेरवुड के साथ दुव्र्यवहार किया गया था उससे गुजरने वाले प्रत्येक व्यक्ति के पेट के बल रेंगते हुए गुजरना होगा. 13 अप्रैल को घोषित किए गए मार्शल-लॉ के अधीन बहुत से लोगों पर मामले चलाए गए और बहुतों को सजा मिली - कुछ को मौत की, कुछ को काले पानी की, कुछ को वर्षों तक जेल में सड़ते रहने की.

लाहौर में एक जुलूस पर 10 तारीख को तीन बार और 17 तारीख को गोलियां चलाई गईं. 16 तारीख को लाहौर के तीन सामान्य नेताओं - रामभज दत्त चौधरी, हरकिशन लाल और दुनीचंद को डिप्टी कमिश्नर के घर पर निमंत्रित किया गया जहां उन्हें गिरफ्तार करके निष्कासित कर दिया गया. मार्शल-ला लागू कर दिया गया और सैन्य बल द्वारा हड़ताल तोड़ी गई. 15 अप्रैल से 29 मई तक मार्शल-ला की कहानी मनमाने अत्याचारों की नृशंस गाथा है- चाहे जिस सवारी को कब्जे में ले लेना, भूखों को मुफ्त भोजन का वितरण रोक देना, सरकारी अदालतों के जरिए तुरंत सजाएं सुनाना, गिरफ्तारियां, कोड़ों की मार, विद्यार्थियों को मई की तपती दोपहर में सोलह-सोलह मील तक मार्च कराना आदि. लोगों को डराने-धमकाने के लिए सरकार इतनी आतुर हो गई कि उसने कलकत्ता विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्राध्यापक मनोहरलाल को बिना कोई कारण बताए जेल में ठूंस दिया.

लाहौर और अमृतसर के निकट कसूर में 13 अप्रैल को भीड़ ने अमृतसर की घटनाओं से उत्तेजित होकर आगजनी और लूटपाट शुरू कर दी. अधिकारियों ने मार्शल ला लगा दिया. लाहौर और अमृतसर की नृशंसता वहां भी दोहराई गई. प्रभारी सैनिक अधिकारी ने अपनी सूझ-बूझ का इस्तेमाल मनमानी सजाएं देने में किया.

गुजरांवाला में एक बोर्डिंग हाउस पर बमबारी की गई, गावों में और शहर में मशीनगनों से गोलियां बरसाई गई, जिससे उनका नैतिक प्रभाव पड़े. मनमाने ढंग से गिरफ्तारियां की गईं और लोगों को कोड़े मारे गए तथा अन्य अनेक तरीकों से अपमानित किया गया.

यही क्रूर कहानी अन्य अनेक स्थानों में दुहराई गई. पंजाब को कमोबेश शत्रु देश मान लिया गया जिसे अभी विजित किया गया हो. वहां के निवासियों को उपयुक्त सजाएं देकर ऐसा सबक सिखाया गया कि वे सरकार को चुनौती देने तथा उसकी आलोचना करने के सभी इरादों से बाज आएं.

सैनिक और असैनिक - सभी वर्ग के अंग्रेज अफसरों पर से सभ्यता का पतला मुलम्मा छूट गया और वे मंच पर अपने असली रूप में प्रकट हुए. वे भय से ग्रस्त हो गए, अपनी ही छाया से डरने लगे, उस खूंखार और भयानक पशु के समान बन गए जिसे कहीं और भाग बचने की राह न मिल रही हो. सुधारों के दुराग्रही और उद्धत ठेकेदार और डायर ने ब्रिटिश शासन के नैतिक आधार का आडंबर त्याग दिया और नंगी तलवार की हुकूमत में अपना विश्वास व्यक्त किया. उनके लठैतों के जांच आयोग के समक्ष अपने काले कारनामों का बखान करने में एक-दूसरे को पछाडऩे की होड़ लग गई और उन्हें न शर्म महसूस हुई, न ग्लानि.

जवाहरलाल नेहरू ने उद्गार प्रकट किए कि ‘‘पंजाब अलग-थलग पड़ गया है, वह शेष भारत से कट गया है, लगता है कि उसे एक घने धुंध ने ग्रस लिया है ताकि उस पर बाहर की नजरें न पडऩे पाएं.’’ लेकिन धीरे-धीरे खबर बाहर रिसने लगी. भारत थर्रा गया. ‘‘जलियांवाला बाग ने देश में आग लगा दी.’’ सभी क्षेत्रों में थू-थू होने लगी. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपना खिताब त्याग कर ब्रिटिश शासकों के मुंह पर जिन्होंने सम्मान और अलंकरणों के वितरणकर्ता होने का दम भरा था, करारा तमाचा लगाया.

ओ डायर और चेम्सफोर्ड को वापस बुला लेने की मांग की गई तथा बंदियों के लिए क्षतिपूर्ति पर जोर दिया गया. पंजाब की घटनाओं की जांच करने का आग्रह किया गया. इन मांगों के लिए इंग्लैंड में होमरूल लीग और लिबरल फेडरेशन की ओर से प्रमुख भारतीयों के प्रतिनिधिमंडल सक्रिय थे और संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष बयान दे रहे थे. इनमें विट्ठलभाई पटेल, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल, श्रीमती बेसेंट, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, तेजबहादुर सपू्र्र, श्री निवास शास्त्री तथा अन्य लोग थे. उन्होंने भारतमंत्री से जोर देकर मांग की कि लोगों को शांत करने के लिए तुरंत जांच की व्यवस्था की जाए.

मांटेग्यू जानते थे कि भारत पर केवल तलवार के जोर से शासन कर पाना असंभव है क्योंकि आप किरचों से और सब कुछ तो कर सकते हैं लेकिन उन पर जम कर बैठ नहीं सकते. उन्होंने महसूस किया कि कोई भी सरकार, चाहे वह विदेशी हो या देशी, जनता पर बहुत समय तक तब तक राज नहीं कर सकती जब तक उसे जनता के प्रभावशाली वर्गों के एक भाग की असंदिग्ध मौन स्वीकृति का ऐच्छिक सहारा न मिलता रहे. इसके अलावा भारतीय मामलों में उनकी व्यक्तिगत दिलचस्पी भी थी. उन्होंने सुधारों को संवारने में रात-दिन एक कर दिया था और स्वाभाविक था कि वह उन्हें सफल होते देखा चाहते थे. वह एक निर्णय पर पहुंचे और 22 मई को बजट पर बहस के दौरान जांच करने का वचन दिया. उन्होंने चेम्सफोर्ड को लिखा कि ‘‘शासन का यह ढंग (ओ डायरवाद) देर-सबेर प्रतिक्रिया को जन्म देता ही है.’’

17 जुलाई को उन्होंने डायर के संबंध में वायसराय को लिखा. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे गुस्सा उसकी पाशविक एवं अनुचित मूर्खता पर आया. मैं नहीं मान सकता कि डायर ने जो सेवाएं कीं और कभी भी कीं है उनसे इस प्रकार की कार्रवाई का प्रायश्चित हो जाता है और मुझे बहुत चिन्नता है कि वह अपने उस आदेश के लिए सजा से बचा रह जाए जिसके परिणाम चिरस्थायी हो सकते हैं.’’

6 अगस्त, 1919 को उप भारतमंत्री सिन्हा ने लार्ड सभा में अपने भाषण में मांटेग्यू के 22 मई के वचन को दुहराया और कहा, ‘‘जब इस ढंग से और इतने व्यापक ढंग से गड़बड़ी हो तो उसके कारणों की जांच करनी ही पड़ती है और उन उपायों को खोजना पड़ता है जिनसे उसे शांत किया जा सके.’’

लेकिन मांटेग्यू का दुर्भाग्य यह था कि ‘‘भारत में सत्ता जिनके हाथों में है वह कर्मचारी वर्ग पूरी तरह हमारे विरुद्ध है.’’ अत: उन्होंने गवर्नर जनरल को राजी करने की कोशिश की कि, हमें डायरवाद का ‘‘वही सही हो या गलत, बचाव करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. भारत जैसे विकासशील देश में ब्रिटिश साख के लिए अधिक घातक और कुछ भी नहीं है कि लोग विश्वास करने लगे कि उनके प्रति की गई गलती का कोई प्रतिकार नहीं है तथा कोई अफसर चाहे कुछ भी करे, उसकी पीठ ही ठोकी जाएगी, उसके तौर-तरीकों को बराबर बनाए रखा जाएगा.’’

भारत सरकार ने जांच के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया. लेकिन भारतमंत्री वचनबद्ध हो चुके थे और वायसराय के सामने उसे मानने के सिवाय कोई और चारा न रहा. 14 अक्तूबर, 1919 की समिति की घोषणा की गई. उसके अध्यक्ष हंटर बनाए गए और चार अंग्रेज तथा तीन भारतीय, सीतलवाड, साहबजादा सुलतान अहमद खां तथा जगत नारायण - सदस्य नियुक्त हुए.

समिति ने अनेक गवाहों के बयान लिए और उनसे पूछताछ की जिनमें डायर, मार्शल लॉ अधिकारी, सैनिक अधिकारी तथा असैनिक अफसर तथा गड़बड़ी से संलग्न अनेक व्यक्ति थे. पंजाब सरकार ने उनके ढेर सारे रिकार्ड दिए जिनमें मार्शल ला अदालतों और कमीशनों की कार्रवाइयों तथा आदेशों आदि का ब्यौरा भी था. लेकिन कांग्रेस ने समिति का बहिष्कार किया क्योंकि ‘‘सरकार ने पंजाब के उन प्रमुख नेताओं को, जिन्हें जेल के सीखचों के पीछे डाल दिया गया था, समुचित जमानत पर अस्थायी तौर पर रिहा करने से इनकार कर दिया है.’’ अत: राजनैतिक नेता समिति के समक्ष पेश नहीं हुए.

समिति की रिपोर्ट सर्वसम्मत नहीं थी. यूरोपीय सदस्यों ने, जिनका बहुमत था, एक रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किया और तीन भारतीय सदस्यों ने पृथक रिपोर्ट तैयार की. बहुमत की रिपोर्ट के निष्कर्ष इस प्रकार थे :

1.       गड़बड़ी एक विद्रोह के समान थी जिसके क्रांति में बदल जाने की आशंका थी,

2.       दंगे एक सुनियोजित योजना के परिणाम थे और सुसंबद्ध थे,

3.       इन परिस्थितियों में मार्शल ला की घोषणा का पूरा-पूरा औचित्य था तथा भीड़ की ज्यादतियों को दबाने के लिए गोली वर्षा जरूरी थी,

4.       भारत सरकार निर्दोष थी तथा

5.       डायर की कार्रवाई की आलोचना इसलिए की जा सकती थी कि उसने चेतावनी दिए बिना ही गोली चलवा दी और गोली-वर्षा बहुत देर तक जरूरत से ज्यादा हुई, और डायर का ऐसा करके पर्याप्त नैतिक असर पैदा करने के उद्देश्य की बात सोचना कर्तव्य-पालन की गलत धरणा थी.

अल्पसंख्यक सदस्यों ने प्रथम दो निष्कर्षों से असहमति व्यक्त की, यह माना कि गोली-वर्षा का औचित्य था, लेकिन कहा कि लोगों को घिसटकर चलने को कहना, संपत्ति जब्त करना, कोड़े मारना, सलाम करने को विवश करना आदि का उद्देश्य भारतीयों में डर बैठना और उनको अपमानित करना था.

डायर के आचरण पर भारतीय सदस्यों ने अंग्रेज सदस्यों की अपेक्षा अधिक कड़े शब्दों में टिप्पणी की. उन्होंने उसकी कार्रवाइयों की तुलना 1914 में बेल्जियम और फ्रांस में जर्मनों द्वारा किए गए भयोत्पादक कार्यों से की. उन्होंने लिखा, ‘‘हम महसूस करते हैं कि डायर ने महामहिम सम्राट की प्रजा के साथ व्यवहार में अमानुषिक और ब्रिटिश परंपरा के विरुद्ध तरीके अपना कर भारत में ब्रिटिश शासन ने हितों का बहुत हानि पहुंचाई.’’

कांग्रेस ने अपनी अलग जांच समिति नियुक्त की. इसके सदस्य थे: मोतीलाल नेहरू जिन्होंने 1919 में कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर त्यागपत्र दे दिया, फजलुलहक जो महत्वपूर्ण कामों में फंसे होने के कारण जांच-कार्य में भाग नहीं ले सके, एम. आर. जयकर (फजलुलहक की जगह), चित्तरंजन दास, अब्बास तैयबजी तथा मोहनदास करमचंद गांधी. उन्होंने 20 फरवरी, 1920 को रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए.

समिति ने माइकेल ओ डायर को सीधे-सीधे दोषी ठहराया ‘‘जिसने प्राय: निरपवाद रूप से विवेक की जगह आवेश और अज्ञानता से काम लेने के लिए प्रेरित किया’’ और इस प्रकार ‘‘जनता तथा अपने ऊपर के अधिकारियों को गुमराह करने में उसकी गंभीर जिम्मेदारी थी.’’ समिति ने उस पर आरोप लगाया कि उसने युद्ध के लिए सैनिकों की भर्ती करने में अत्याचारी तरीकों से काम लिया जिससे लोगों में असंतोष एवं प्रतिरोध की भावना पैदा हो गई जो अप्रैल 1919 में गड़बड़ी के रूप में प्रकट हुई. रिपोर्ट में आगे कहा गया.

‘‘हम यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर सकते कि उसने (ओ डायर ने) लोगों को हिंसा के लिए उकसाया ताकि वह उन्हें कुचल सके. प्रमाण से सिद्ध है कि उसने पंजाबियों को गंभीरतम ढंग से उत्तेजित किया जिसके प्रभाव से कुछ क्षणों के लिए आत्मसंयम खो बैठे.’’

चेम्सफोर्ड के विषय में उनकी राय थी, ‘‘अतएव हम यह तो नहीं सोचते कि महामहिम वायसराय ने जानबूझकर उन लोगों के हितों  की उपेक्षा की जिनका भार उनको सौंपा गया है, लेकिन हमें खेदपूर्वक यह कहना पड़ रहा है कि महामहिम चेम्सफोर्ड ने अपने आपको उस उच्चपद पर प्रतिष्ठित रहने के योग्य नहीं सिद्ध किया और इसीलिए हमारा मत है कि उन्हें वापस बुला लिया जाना चाहिए.’’

सभी उपलब्ध सामग्री पर सावधानी से विचार करने के बाद समिति के सदस्यों का निष्कर्ष था कि

(1) ‘‘पंजाब में सरकार का तख्ता पलटने की कोई साजिश नहीं थी.’’

(2) ‘‘मार्शल लॉॅ लागू करने का औचित्य सिद्ध करने के लिए कोई समुचित कारण नहीं दिए जा सके हैं.’’

(3) ‘‘जलियांवाला बाग हत्याकांड नितांत  निरपराध तथा निहत्थे लोगों के प्रति, जिनमें निरीह बच्चे भी शामिल थे, योजनाबद्ध नृशंसता का कार्य था और ब्रिटिश शासन के इतिहास में इस प्रकार की कू्ररता की कोई और मिसाल नहीं है..’’

भारत सरकार ने हंटर समिति की रिपोर्ट पर विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंची के जलियांवाला बाग में डायर की कार्रवाई अनौचित्यपूर्ण थी, उसने मौके की समुचित जरूरत के बहुत आगे जाकर काम किया और उसकी अपने कर्तव्य की धारण गलत थी. इसलिए यह उचित नहीं समझा गया कि उसे उसके पद पर बने रहने दिया जाए. अतएव 23 मार्च, 1920 को उसे सेवानिवृत्त कर दिया गया.

डायर ने मामले को लेकर संसद में बहस उठाई गई. मांटेग्यू ने भारत सरकार के निर्णय को इस आधार पर सही बताया कि ब्रिटेन भारत को आतंक के सहारे अधिकार में नहीं रख सकता. चर्चिल ने भारत सरकार का पक्ष समर्थन किया और इस विचार की भत्र्सना की कि डायर ने अपनी क्रूरता से साम्राज्य की रक्षा की है. उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड को ‘‘एक पैशाचिक कांड’’ बताया जो बहुत पहले हमारे जोन ऑफ आर्क  को आग में जला डालने के बाद अंग्रेजों के इतिहास की सबसे अधिक कलंकित घटना है. बोनार लॉ ने भी डायर की निंदा की. लेकिन जब मतदान हुआ तो डायर के पक्ष में 129 वोट पड़े और विरोध में मत देने वाले 230 सदस्यों ने सरकार का पक्ष समर्थन किया.

लार्ड सभा में कंजरवेटिव सदस्यों ने, जिसमें अनेक सेवानिवृत्त ऐंग्लो-इंडियन अधिकारी भी थे बहुमत से डायर के पक्ष को उचित ठहराया. लेकिन सरकार अपने निर्णय पर कायम रही, उसने डायर की निंदा की और उनको कमान से मुक्त कर दिया.

इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप डायर के पक्ष में प्रतिक्रिया हुई. 26 हजार पौंड की एक निधि जमा की गई. यह निधि और एक तलवार उसके प्रशंसकों द्वारा उसकी सेवाओं के उपलक्ष्य में भेंट की गई.

इसी बीच, गांधीजी ने जिन्हें पंजाब में (अमृतसर, लाहौर, कसूर, गुजरावाला आदि), गुजरात में (अहमदाबाद, बीरमगाम, नाडियाड) तथा बंगाल में (कलकत्ता) हुई हिंसा से बहुत आघात पहुंचा, दुखी मन से कहा, ‘‘मैंने लोगों को सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए कहा जबकि वे इसके लिए अपने-आपको योग्य नहीं बना पाए थे, और मुझे अपनी भूल हिमालय जैसी भारी लगी.’’ उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगिति कर देने की घोषणा की.

दुर्भाग्य से, सरकार के रूप में कोई परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं हुआ. मार्शल लॉ प्रशासन की अवधि इस बहाने आगे बढ़ा दी गई कि अफगान शत्रुतापूर्ण रुख दिखा रहे हैं और सीमा पर आक्रमण की शुरूआत कर रहे हैं. इसके कारण शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद  से इस्तीफा दे दिया.

एक अध्यादेश जारी करके पंजाब सरकार को यह अधिकार दे दिया गया कि वह 30 मार्च, 1919 को या उसके बाद किए गए किसी अपराध के मामले को मार्शल लॉ अदालत को सौंप सकती है. गांधीजी को पहले ही पंजाब से निष्कासित कर दिया गया था. सी. एफ. ऐंड्रूज को पंजाब जाकर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया, लेकिन उन्हें प्रांत में आने से रोक दिया गया. बाद में यही व्यवहार वकील इयर्डली नार्टन के साथ हुआ जिन्हें अभियुक्तों की वकालत करने के लिए भेजा गया था. भारत सरकार ने ओ डायर की नीतियों का अनुमोदन किया और अफसरों के मनमाने कार्यों की अनदेखी की. जांच आयोग के काम शुरू करने से पहले ही उन अफसरों के बचाव के लिए एक क्षतिपूर्ति विधेयक  स्वीकृत किया गया जो प्रशासन से संबद्ध थे तथा जिन्हें दोषी पाया जा सकता था. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ब्रिटिश कमेटीने इन पर टिप्पणी की, ‘‘जर्मनी का सैन्यवाद भी इसके आगे मात था.’’

प्रकाशन विभाग की पुस्तक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास सेwww.publictionsdivision.nic.in (छायाचित्र: गूगल से साभार)