संपादकीय लेख


volume-3, 20 -26 April, 2019

कौशल, शिक्षा और आय के बीच संबंध का बोध

डॉ. मेघा श्री, डॉ. पी. गीता रानी और डॉ. राजेश शुक्ला

आज के नीतिगत परिवेश में कौशल शब्द एक लोकप्रिय धारणा के रूप में उभरा है. नीति-समर्थित कौशल विकास कार्यक्रम पर बल देना भारतीय कार्मिकों की कार्य-क्षमता बढ़ाने और प्रकारांतर से उनकी रोज़गार सक्षमता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. स्किल इंडिया कार्यक्रम का लक्ष्य  संस्थागत प्रशिक्षण एवं प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण की बुनियादी सुविधाओं तथा सार्वजनिक ढांचे को मजबूत बनाना है ताकि बड़ी संख्या में कार्मिकों को स्थायी आजीविका प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोज़गार के अवसर बढ़ाए जा सकें. परन्तु, उच्चतर या वांछित स्तर के प्रशिक्षित कार्मिक तैयार करने के मामले में वर्तमान स्तर और वांछित लक्ष्यों के बीच निरन्तर रहने वाले व्यापक अंतर को पाटने के उपाय करने की आवश्यरकता है ताकि निकट भविष्य में भारत को एक विकसित राष्ट्र के रूप में देखा जा सके. लेकिन, भारत में औपचारिक रूप से प्रशिक्षित श्रमिकों का अनुपात 4.69 प्रतिशत है, जो चीन में 24 प्रतिशत, अमेरिका में 52 प्रतिशत, ब्रिटेन में 68 प्रतिशत, जर्मनी में 75 प्रतिशत, जापान में 80 प्रतिशत, और दक्षिण कोरिया में 96 प्रतिशत, की तुलना में बहुत कम है. स्पष्ट है कि भारत इस दिशा में बहुत पीछे है.

सबसे बड़ी चुनौती असंगठित क्षेत्र में अकुशल या अर्द्ध-प्रशिक्षित श्रमिकों का व्यापक अंतराल दूर करने की है, जहां रोज़गार सृजन के अवसर देश में सबसे अधिक हैं. बड़ी समस्या यह है कि प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 5) में दाखिलों की दर लगभग शत-प्रतिशत है, परन्तु  करीब आधे नामांकित बच्चे स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देते हैं और वे बुनियादी गणित और साक्षरता कौशल प्राप्त किए बिना ही कामगारों में शामिल हो जाते हैं. इस प्रकार, कौशल प्रशिक्षण का बड़ा हिस्सा स्व-शिक्षण पद्धतियों, पर्यवेक्षण या गुरु शिल्पकार से प्रशिक्षु को कौशल हस्तांतरण के माध्यम से प्रदान किया जाता है. राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क बड़े पैमाने पर अकुशल कामगारों को कौशल प्रदान करने के प्रयास करता है, लेकिन इस संबंध में बहुत कुछ करने की आवश्यकता है.

भारत में एक और समस्या कौशल, शैक्षिक प्रशिक्षण और रोज़गार के बीच तालमेल के अभाव की है और यह अभाव इस हद तक व्यापक हो गया है, कि एक तरफ, नियोक्ता उपयुक्त प्रशिक्षित लोगों की खोज करने में असमर्थ हैं, वहीं दूसरी तरफ, युवाओं को वांछित नौकरी खोजने में कठिनाई हो रही है. नवीनतम भारत कौशल रिपोर्ट (2019) के अनुसार, शैक्षिक संस्थानों से स्नातक करने वाले युवाओं में से केवल 45.6 प्रतिशत ही रोज़गार सक्षम हैं. इस संदर्भ में, कौशल के स्तरों, उनकी मांग और ''कौशल से लाभÓÓ की अवधारणाओं को समझना अनिवार्य है.

यह एक अपरिहार्य तथ्य है कि एक बेहतर-कुशल व्यक्ति हमेशा कमाई के मामले में बेहतर स्थिति में रहता है.  परन्तु, रोज़गार और कमाई पर कौशल के प्रभाव को समझने के लिए हमें इस पर बारीकी और विश्लेषणात्मक रूप से ध्यान देने की जरूरत है. व्यवसायों के अंतर्राष्ट्रीय मानक वर्गीकरण के बारे में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की अवधारणा (आईएलओ, आईएससीओ-08) अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यावसायिक आंकड़ों की तुलना संभव बनाने के लिए एक फ्रेमवर्क प्रदान करती है. आईएससीओ-08 व्यवसायों के मौजूदा राष्ट्रीय वर्गीकरण को प्रतिस्थापित करने का प्रयास नहीं करती, बल्कि व्यावसायिक वर्गीकरणों को अवधारणा और संरचना में आईएससीओ-08 के अनुसार संरेखित करते हुए देशों के बीच तुलनाओं को संभव बनाती है.

भारतीय संदर्भ में कई अध्ययनों में, राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ), भारत मानव विकास सर्वेक्षण (आईएचडीएस) प्रथम और द्वितीय, भारत में बचत प्रवृत्तियों संबंधी राष्ट्रीय सर्वेक्षण, आदि के आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए, राष्ट्रीय  स्तर पर शिक्षा के लाभों के बारे में अनुमान लगाते हैं. परन्तु, कौशल आधारित आमदनी संबंधी आंकड़े उपलब्ध न होने के कारण, ऐसे अध्ययन नहीं किए गए हैं, जिनमें कौशल संबंधी श्रम-बाज़ार लाभों की जांच की गई हो.

कौशल मूल्यांकन

इस अंतर को पाटने के लिए, अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति के बहुआयामी पहलुओं को कवर करते हुए, 60,360 परिवारों और 2,50,720 व्यक्तियों पर किए गए सर्वेक्षण-आईसीई 3600 (2016) की  अहम भूमिका है.  भौगोलिक दृष्टि से, 25 प्रमुख राज्यों में फैले 216 जिलों, 1217 गांवों और 487 शहरों से लिए गए नमूनों के आधार पर यह सर्वेक्षण किया गया. आईएससीओ-08 की अवधारणों को लागू करते हुए आईसीई 3600(2016) सर्वेक्षण में लेखकों ने कौशल स्तरों का वर्गीकरण किया, जहां कौशल को ऐसे निर्दिष्ट रोज़गार संबंधी कार्यों और कर्तव्यों को पूरा करने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया गया है, जिनके लिए व्यक्ति पारिश्रमिक अर्जित करता है. इसमें विद्यार्थियों और काम करने में असमर्थ लोगों को छोड़कर, कुल आबादी के 62.4 प्रतिशत हिस्से को शामिल किया गया, जो 15 से 65 वर्ष के समर्थ कामकाजी आयु वर्ग से संबंधित है.

कौशल स्तरों के प्रकार

कौशल स्तर                                     परिभाषा                                                                                         उदाहरण

स्तर 1                       सरल और रोज़मर्रा के भौतिक या हस्त कृत             फेरी वाला, गली विक्रेता, माली,रसोइया, कार्यों के लिए अपेक्षित कौशल.                        घरेलू नौकर, निर्माण श्रमिक,राजमिस्त्री,आदि

 

स्तर 2                    मशीनरी और इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के प्रचालन     प्लम्बर, इलेक्ट्रिशियन, कारीग़र, नाई, मैकेनिक,                        

                                के लिए अपेक्षित कौशल.                                                  दर्जी, आदि.

स्तर 3                    कार्यों के लिखित रिकॉर्ड, सामान्य गणनाओं               लिपिकीय, सुपरवाइजरी स्तर, आदि.

                                विशेषज्ञतापूर्ण क्षेत्रों में बेहतर व्यक्तिगत

                                अभिव्यक्ति क्षमता के लिए अपेक्षित कौशल.

स्तर 4                    निर्णय करने और सैद्धांतिक एवं तथ्यात्मक डॉक्टर, वकील, चार्टर्ड अकाउन्टेंट, इंजीनियर,

                                ज्ञान पर आधारित रचनाशीलता के लिए                    वास्तुकार, वैज्ञानिक, अभिनेता, लेखक, आदि.

                                अपेक्षित कौशल. 

 

कौशल स्तरों के अनुसार कार्यबल का स्वरूप:

श्रम बाजार में आधे से अधिक (56 प्रतिशत) उन लोगों का प्रभुत्व है, जिन्हें टाइप 2 कौशल स्तर के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जबकि टाइप 1 कौशल स्तर में 30 प्रतिशत लोग शामिल हैं. लगभग 11 प्रतिशत जनसंख्या को कौशल स्तर 3 में वर्गीकृत किया जा सकता है और सबसे कम हिस्सेदारी कौशल स्तर 4 रखने वाले लोगों की है.

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि रोज़गार के अवसरों की अधिक उपलब्धता के कारण उच्च कौशल स्तर के व्यक्ति शहरी क्षेत्रों में निवास करते हैं. इसके विपरीत, कौशल स्तर 2 वाले केवल 26 प्रतिशत व्यक्ति शहरी क्षेत्रों में रहते हैं.

कौशल स्तर 1 से संबंधित आधे से अधिक व्यक्ति 15-35 वर्ष के आयु वर्ग में हैं. यह एक गंभीर चिंता का कारण है कि युवा भारत का एक बड़ा हिस्सा केवल निम्न कौशल रखता है. शेष लगभग 40 प्रतिशत युवा कार्यबल अन्य कौशल स्तरों से संबंधित है.

यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि कौशल स्तर और शिक्षा के बीच उच्च संबंध है. शिक्षा जितनी ऊंची होगी कौशल का स्तर भी उतना ही अधिक होगा. यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता कि कौशल स्तर-1 रखने वाले व्यक्तियों में केवल 3 प्रतिशत ही उच्च शैक्षिक योग्यता रखते हंै जबकि कौशल स्तर-4 रखने वाले 65 प्रतिशत श्रमिक उच्च शैक्षिक योग्यता रखते हैंं. समान रोज़गार प्रकार के भीतर भी, विभिन्न कौशल स्तरों में कमाई में महत्वपूर्ण अंतर हैं. कौशल स्तर 4 पर एक नियमित वेतनभोगी, औसतन 500,000 रुपये प्रति वर्ष (7000 अमरीकी डॉलर) अर्जित करता है जो कौशल स्तर 1 के उसके समकक्ष से लगभग 2.2 गुना अधिक है.

आंकड़ों से पता चलता है कि जिन व्यक्तियों को कौशल स्तर-4 के रूप में वर्गीकृत किया गया है, उनकी वार्षिक औसत आय 420,000 रुपये है (2019 में औसत विनिमय दर के आधार पर 6000 अमरीकी डॉलर). यह कौशल स्तर-3 वाले श्रमिक की आय (रु. 280,000 या 4000 अमरीकी डॉलर) की तुलना में लगभग 1.5 गुना अधिक है. इस स्तर के कामगार की कमाई कौशल स्तर 2 के कामगार की आमदनी (176,000 रुपये या 3000 अमरीकी डॉलर) की तुलना में लगभग 2.4 गुना अधिक है. इसी प्रकार कौशल स्तर 2 के कामगार की आमदनी कौशल स्तर 1 के कामगार की (137,000 रुपये या 2000 अमरीकी डॉलर) की तुलना में लगभग 3.1 गुना अधिक है. इस तरह कौशल स्तरों के बीच आय में अन्तर एकदम स्पष्ट है. इसमें शिक्षा, आयु, लिंग, क्षेत्र, आदि अनेक घटकों का योगदान हैं.

कौशल से आमदनी में बदलाव में योगदान करने वाले घटक:

कार्मिकों की विशेषताओं से पता चलता है कि उच्च कौशल स्तर पर उच्च शिक्षित श्रमिकों का वर्चस्व है, जबकि कम शैक्षिक योग्यता वाले लोगों को अस्थायी नौकरी की पेशकश की जाती है. अतीत में, महिला श्रमिकों के लिए उच्च शिक्षित होने का कोई फायदा नहीं था क्योंकि उनके उच्च-शिक्षित समकक्षों की तुलना में उनकी योग्यता उच्च वेतन आय में तब्दील नहीं होती थी. लेकिन हाल के दिनों में, उम्र, शिक्षा, कौशल स्तर, लिंग, रोज़गार के क्षेत्र के साथ-साथ डिजिटल एक्सेस जैसे कारक आय अंतर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये संबंध मजबूत सांख्यिकीय कवायदों के माध्यम से स्थापित किए गए हैं.

आय अंतर में लिंग एक प्रमुख निर्धारक है. महिलाओं की मजदूरी की तुलना में पुरुष 1.2 गुना अधिक कमाते हैं. यह कमाई का अंतर पुरुषों को समग्र नौकरी बाजार में एक फायदा देता है. परन्तु, उच्च कौशल स्तरों वाली नौकरियों के लिए भर्ती होने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई है.

कौशल से लाभ के आकलन में कौशल और शिक्षा के बीच संबंध महत्वपूर्ण है: इसके पीछे मूल विचार यह है कि उच्च शिक्षा को वरीयता दी जाती है, अत: बेहतर-शिक्षित श्रमिकों को उच्च आय प्राप्त होती है. आयु आम तौर पर व्यक्ति के अनुभव से जुड़ी होती है और इस प्रकार वह कमाई का निर्धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. बुनियादी कौशल स्तरों पर - अर्थात 1 और 2 पर  आय उम्र के साथ बढ़ती है, परन्तु, वृद्धि की दर मामूली होती है. कौशल स्तर 3 और 4 में प्रवेश स्तर के कार्यकर्ता 21 से 25 वर्ष के आयु समूह के होते हैं, जिसका अर्थ है कि इन कौशल स्तरों को पूरा करने के लिए न्यूनतम शिक्षा आवश्यक है, इसलिए उनसे आय भी अधिक होती है. इससे कौशल स्तर 3 और 4 तथा कौशल स्तर 1 और 2 के श्रमिकों के बीच आमदनी का अंतर और भी गहन हो जाता है.

शिक्षा के स्तर से होने वाली आमदनी को जनसंख्या के आयु-आय प्रोफाइल के साथ दर्शाया गया है. अनुमान के अनुरूप, शिक्षा के स्तरों और आमदनी के बीच एक स्पष्ट सकारात्मक संबंध है, क्योंकि अनुभव और वर्षों तक रोज़गार के साथ प्रशिक्षण से कौशल में निरन्तर बढ़ोतरी होती है. व्यक्ति की शिक्षा के स्तर में बढ़ोतरी के साथ यह संबंध निरंतर मजबूत होता जाता है.नियमित वेतनभोगी आय एक ठोस आमदनी का जरिया प्रदान करती है और इसके साथ बेहतर नौकरी सुरक्षा जुड़ी होने की संभावना रहती है। कौशल स्तर 1 के कामगारों में केवल 13 प्रतिशत रिपोर्ट करते हैं कि उन्हें नियमित वेतन दिया जाता है. इसके विपरीत, कौशल स्तर 4 के रूप में वर्गीकृत 60 प्रतिशत श्रमिकों को नियमित वेतन मिलता है. दूसरी ओर, कौशल स्तर 1 श्रमिक, गैर-कृषि मजदूरी श्रम से अपनी कमाई का 75 प्रतिशत दैनिक मजदूरी के रूप में प्राप्त करते हैं. यह बड़ा महत्वपूर्ण है कि कौशल स्तर 3 और 4 के श्रमिक नियमित वेतनभोगी और स्व-नियोजित गैर-कृषि व्यवसायों में केंद्रित हैं. श्रम बल के कौशल स्तरों में यह व्यापक असमानता रोज़गार के संदर्भ में चिंता का कारण है.

डिजिटल अनुप्रयोगों ने कौशल स्तरों में आमदनी के अंतर को विस्तृत किया है. आंकड़ों से पता चलता है कि जैसे-जैसे कौशल स्तर बढ़ता है, आईसीटी का उपयोग भी बढ़ता है. इसके अलावा, व्यक्तिगत स्तर पर इंटरनेट का उपयोग भी कौशल के साथ सकारात्मक संबंध दिखाता है. इंटरनेट का उपयोग करने वाला व्यक्ति गैर-उपयोगकर्ता से दोगुना से अधिक कमाता है. उदाहरण के लिए, यदि एक औसत भारतीय 100 रुपये कमाता है, तो आईसीटी उपयोगकर्ता 169 रुपये कमाता है जबकि गैर-आईसीटी उपयोगकर्ता की कमाई केवल 80 रुपये है. यह बात कौशल स्तर के सभी प्रकारों में स्पष्ट है. इसके आधार पर, कोई यह तर्क दे सकता है कि बढ़ी हुई कमाई में इंटरनेट का उपयोग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

फिर भी, आमदनी में एक और बदलाव कार्यबल की आवास इकाइयों से हो सकता है. कौशल स्तर 4 के तीन-चौथाई से अधिक कामग़ार पक्के घरों में रहते हैं जबकि कौशल स्तर 1 कामग़ार केवल 35 प्रतिशत ही इस श्रेणी में आते हैं. कौशल स्तर 4 के श्रमिकों के घरों में नल का पानी, एक अलग रसोईघर, घर में एक शौचालय और तरल पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) स्टोव जैसी घरेलू सुविधाएं ज्यादातर पायी जाती  हैं. विभिन्न घरेलू सुविधाओं के मामले में कौशल स्तर 4 के साथ श्रमिकों की घर की स्थिति वास्तव में बेहतर है. हालांकि, बिजली कनेक्शन तक पहुंच सभी कौशल स्तर के घरों में एक सामान्य विशेषता है.

स्पष्ट है कि कौशल स्तर की यह अवधारणा हमें श्रम शक्ति की आमदनी और गुणवत्ता के बीच संबंध को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकती है. इस तरह के विश्लेषण से कौशल के स्तर के बारे में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि मिलने की संभावना है, जिसके लिए तेजी से बदलते वैश्वीकृत भारत में प्रतिस्पर्धा करने के लिए श्रम बल की पुन: योग्यता और पुन: विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी. इसका उपयोग कार्यबल को फिर से प्रशिक्षित करने और पर्याप्त कौशल के साथ लैस करने के लिए किया जा सकता है. सार रूप में कह सकते हैं कि जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कौशल स्तर 1 और 2 (86 प्रतिशत) की श्रेणी में आता है और इस प्रकार कौशल स्तर 3 और 4 की तुलना में बहुत कम कमा रहा है. भारत के नीति निर्माताओं के साथ-साथ युवाओं के लिए भी यह बहुत बड़ी चिंता है. मौजूदा विसंगतियों को ठीक करने के लिए तकनीकी व्यावसायिक प्रशिक्षण सहित शिक्षा प्रणाली पर गंभीर रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि वर्तमान में कुशल श्रमिकों की बढ़ती मांग पूरी करने के साथ-साथ उनकी आय में सुधार लाया जा सके.

डॉ. मेघा श्री प्राइस में अनुसंधान फेलो हैं, ई-मेल: megha.shree@ice360.in

डॉ. पी. गीता रानी एनयूईपीए में असोशिएट प्रोफेसर हैं, ई-मेल: geethselva@gmail.com.

डॉ. राजेश शुक्ला प्राइस में निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) हैं

ई-मेल: rajesh.shukla@ice360.in.

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.

(छायाचित्र: गूगल से साभार)