संपादकीय लेख


volume-8, 25 May - 31, 2019

 

कृषि में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस

मुद्दे और संभावनाएं

नवीन पी सिंह और रंजीत पीसी

21वीं सदी के विश्व में प्रौद्योगिकी प्रमुख संचालक है. ट्रंक कॉल से लेकर वीडियो कॉल तक, भाप के इंजन से लेकर मेट्रो तक, स्प्रेयर से लेकर ड्रोन तक प्रौद्योगिकी ने विश्वभर में मानव के जीवन में क्रांति ला दी है. इसके अतिरिक्त विश्वभर में देशों के उद्योगीकरण में भी प्रौद्योगिकी ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है तथा उनकी अर्थव्यवस्था को महत्वपूर्ण ढंग से औपचारिक रूप प्रदान किया है. विश्व आज चौथी औद्योगिकी क्रांति को अपनाने की तैयारी कर रहा है, जिसका नेतृत्व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा किए जाने की संभावना है. इस मुकाम पर यह स्वाभाविक है कि एआई का लाभ उठाते हुए ऐतिहासिक तौर पर उपेक्षित और कम ध्यान दिए गए क्षेत्र, कृषि का उत्थान किया जाए. इससे न केवल इस क्षेत्र को बहाल किया जा सकता है बल्कि आने वाली पीढिय़ों के लिए स्थायित्व भी प्रदान किया जा सकता है.

उत्पादन और उत्पादकता का आकार बढ़ाने की दृष्टि से खेती में प्रौद्योगिकी एक निर्णायक तत्व है. विश्व खाद्य संगठन के अनुमानों के अनुसार भारत को 2050 तक अपनी बढ़ती आबादी की भोजन संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए कृषि उत्पादन को दोगुना करना होगा. खेतों के विखंडित और उप-विभाजित होने और सामूहिक एवं सहकारिता पूर्ण खेती पर कम ध्यान दिए जाने के कारण खेती योग्य भूमि का विस्तार नहीं किया जा सकता. हमारे समक्ष एकमात्र व्यवहार्य विकल्प यह है कि परिष्कृत प्रौद्योगिकी के जरिए उपलब्ध भूमि की उत्पादकता बढ़ाई जाए. परंतु, यह एक स्थापित तथ्य है कि कई अंतर्निहित कारणों से खेती के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी अपनाने की गति बहुत धीमी रही है. आधुनिक खेती प्रौद्योगिकी के संचालन के लिए व्यक्तिगत तौर पर किसान के स्तर पर अपेक्षित कौशल जरूरत से कम रहा है. इसके अलावा प्रौद्योगिकी को किसानों के अलग-अलग व्यावहारिक परीक्षणों (प्रौद्योगिकी स्वीकरण) की समस्या का भी सामना करना पड़ा है. इन समस्याओं और चुनौतियों को देखते हुए हमारे समक्ष तत्काल समाधान यह बचता है कि एआई के नेतृत्व में खेती में नवाचार लाया जाए, जिसमें निर्णय करने की प्रक्रिया में मानव हस्तक्षेप कम रहेगा और अपेक्षित प्रौद्योगिकियों को अधिक अपनाया जा सकेगा.

नीतिगत परिवर्तन की आवश्यकता

खेती की उत्पादकता बढ़ाना कोई सरल कार्य नहीं है. इसके अंतर्गत फसल के बारे में निर्णय करने से लेकर अंतिम पैदावार और कृषि उत्पादों के विपणन तक की गतिविधियां समाहित हैं. आमतौर पर जुताई, बुआई, उर्वरकों एवं कीटनाशकों के इस्तेमाल और फसल कटाई जैसी प्रक्रियाओं के बारे में निर्णय करने में हमारे अनेक किसान प्रयोगात्मक जानकारी/परंपरागत ज्ञान पर निर्भर करते हैं. परंतु, कीट, बीमारी, मानसून आदि व्यापक चुनौतियों से निपटने में यह जानकारी अधिक सशक्त सिद्ध नहीं हुई है, नतीजतन पैदावार कम होती है और किसानों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. अत: कृषि उत्पादकता बढ़ाने में किसान को जागरूक बनाने के लिए वैज्ञानिक हस्तक्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण है.

इस प्रकार इन समस्याओं और चुनौतियों के समाधान के लिए एक स्व-निर्देशित स्वचालित मॉडल आवश्यक है, जो सभी के लाभ के लिए विभिन्न प्रतिभागियों के व्यवहार को समझ सकता है. इतना ही नहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) परिष्कृत कृषि उत्पादकता की दिशा में समाधानों का हिस्सा है. एआई को सिम्युलेटिड अल्गोरिथमिक कम्प्यूटर मॉडलों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो मानव व्यवहार की नकल करते हैं. यह प्रक्रिया एक रोबोटिक मित्र/संस्थापित अनुप्रयोग की परिकल्पना से आरंभ होती है, जो हमारे किसानों का फसल उगाने के समय, फसल कटाई और उनकी उपज की बिक्री के बारे में मार्गदर्शन करती है तथा हमारे कृषि विशेषज्ञों को उन समस्याओं के समाधान का पता लगाने से जोड़ती है, जिनका सामना किसानों को सबसे अधिक करना पड़ता है. कृषि विशेषज्ञ किसानों द्वारा समाधान के लिए किए गए सर्च (गूगल विश्लेषण) पर ध्यान देते हैं ताकि तत्काल उन पर कार्रवाई और अनुक्रिया की जा सके. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नीति निर्माताओं के लिए डिजिटल डेटा के रूप में भी काम करती है, जिससे वे विभिन्न कारगर कार्यक्रमों/नीतिगत विकल्पों और तत्संबंधी उपायों की खोज कर सकते हैं. इसके अलावा एआई उन नीति प्रतिष्ठानों के लिए एक विवेकशील विकल्प के रूप में काम करती है, जो 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की दिशा में श्रम कर रहे हैं. कृषि के डिजिटीकरण से व्यापक आंकड़ा संग्रह खेती में एआई के विकास और उपयोग की दिशा में एक नया आयाम प्रदान करता है. पिछले वर्ष कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के किसान माइक्रोसॉफ्ट और सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स संबंधी अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) द्वारा एआई का इस्तेमाल करते हुए प्रदान किए गए फसल बुआई संबंधी संदेशों पर निर्भर रहे. विश्वभर में एआई ने किसानों, संगठनों और सरकारों को अधिक व्यापक अवसर प्रदान किए हैं. उदाहरण के लिए तंजानियां में, एआई ने गूगल मुक्त स्रोत के रूप में 98 प्रतिशत शुद्धता के साथ बीमारियों संबंधी डेटा उपलब्ध कराया और खर-पतवारों को निकालने के लिए रोबोट तैनात किए. अन्य देशों में भी इस तरह के साक्ष्य मिले हैं. संख्यात्मक संदर्भ में एआई के प्रभाव का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन निश्चित रूप से एआई कृषि पैकेज और पद्धतियों की दृष्टि से भू-परिदृश्य का कायाकल्प करेगा.

बाजार पूर्वानुमान और आपूर्ति शृंखला

कृषि में विपणन एक महत्वपूर्ण घटक है, जो विकास के लाभ किसानों की दहलीज पर पहुंचाता है. यह आमदनी सुरक्षा और ग्रामीण खुशहाली लाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. आधुनिक विपणन प्रणाली में दो बुनियादी वस्तुएं अर्थात् ग्रेडिंग और मूल्य पूर्वानुमान, खेती की आय के संचालन में महत्वपूर्ण हैं, जो कृषि आय को खुशहाली तक पहुंचाती हैं. उगाई गई फसलों को खेत के स्तर पर और बाजार के चित्रों के आधार पर स्वचालित गुणवत्ता विश्लेषण के जरिए (एआई के नेतृत्व में पक्षपात रहित) भौतिक मानदंडों (फलों और मेवों के मामले में रासायनिक संघटन) के अनुसार श्रेणीबद्ध करने की आवश्यकता पड़ती है. इससे दो तरह से मदद मिलती है. पहला यह है कि सही मानदंड की जानकारी होने से किसान अपने उत्पाद के मानदंड ई-नैम, ई-ग्राएमएस और अन्य ऑनलाइन प्लेटफार्मों पर अपलोड कर सकते हैं. और इस तरह विपणन की लागत, बर्बादी और बिचौलिए के दुष्प्रभाव में महत्वपूर्ण कमी ला सकते हैं. दूसरे, इससे फसल के स्थान से दूर बैठे व्यक्ति को खरीद फरोख्त की प्रक्रिया शुरू करने में मदद मिलती है. इसके अलावा उत्पादकों द्वारा लाभकारी मूल्य हासिल करने के लिए बाजार मूल्य का पूर्वानुमान महत्वपूर्ण होता है. अल्गोरिथमिक मॉडल पिछले वर्षों के मूल्य आंकड़ों का इस्तेमाल करके हमें संभावित मूल्य बताते हैं. वर्तमान में मूल्य का पूर्वानुमान लगाने के लिए हस्तचालित मूल्य जानकारी पद्धति काम में लाई जाती है. एआई मॉडलों की मदद से स्वचालित मूल्य फीडिंग उपलब्ध कराई जा सकती है, जिससे गलत फीडिंग के कारण मूल्य धोखेबाजी और त्रुटियों की आशंका कम हो जाती है. एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में एक प्राइवेट कंपनी मार्केट्स एंड मार्केट्स ने विश्वभर में कृषि बाजार में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का मूल्य 2016 में 432.2 मिलियन अमरीकी डॉलर आंका था, जिसके 2025 तक पूर्वानुमान अवधि के दौरान 22.5 प्रतिशत सीएजीआर के साथ (2016 को आधार वर्ष मानते हुए) 2628.5 मिलियन अमरीकी डॉलर पर पहुंचने का अनुमान व्यक्त किया गया है.

मूल्य पूर्वानुमान और कृषि जिन्सों के प्रवाह को सुचारू रूप प्रदान करने में अन्य महत्वपूर्ण घटक आपूर्ति शृंखला प्रबंधन हैं. यह एआई सहायता प्राप्त सॉफ्टवेयर द्वारा उपलब्ध कराई गई अधिशेष वस्तुओं (व्यस्त मौसम के दौरान) के आमेलन में मूलभूत बदलाव लाती है. एआई सॉफ्टवेयर बाजार में प्रतिभागियों के बीच (वस्तु के पिछले और अगले सम्पर्कों के जरिए) वस्तुओं के आदान प्रदान का सतर्कतापूर्वक प्रबंधन करता है. यह विभिन्न बाजारों (ई-नैम और एग्री सेंसस डेटा) के आंकड़ों और खुदरा मांग कार्यक्रम का इस्तेमाल करता है और प्रत्येक फसल के बारे में बुआई/निर्णय करने से पहले खास समय पर समनुरूप आंकड़े उपलब्ध कराता है. इसके अलावा मूल्य शृंखला-स्टॉक्स/ स्टोरेज स्थान (वर्तमान में स्टोरेज उपलब्धता का पता लगाने की कोई व्यवहारिक व्यवस्था नहीं है) के एकीकरण, खरीद और आईसीटी सक्षम बैंकिंग सेवा से मूल्य शृंखला में वैश्वीकरण लाने में मदद मिलती है. संभवत: बाजार पूर्वानुमान और मूल्य पूर्वानुमान के इस प्रयास में सीमित एआई मॉडल मदद कर सकते हैं, जो विकासात्मक सीढ़ी पर वस्तुओं का पूर्वानुमान लगाते हैं.

मृदा और जल प्रबंधन

आधुनिक कृषि पद्धतियों के अंतर्गत मृदा और जल गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं. इनमें अकार्बनिक रसायन शामिल हैं, जो फसल उत्पादकता पर दुष्प्रभाव डालते हैं. इससे संसाधनों के सक्षम उपयोग और दीर्घावधि में प्रौद्योगिकी अपनाने में रुकावट आती है, जिसकी परिणति पैदावार में कमी और खाद्य सुरक्षा के प्रति गंभीर खतरे के रूप में सामने आ सकती है. मृदा और जल के लाभों का पता लगाने में  एआई का सर्वाधिक उपयुक्त प्रकार रीएक्टिव एआई है, जहां यह बुनियादी तौर पर आसपास की स्थितियों की धारणा पर काम करता है और जो यह देखता है उस पर कार्य करता है. इस प्रकार मृदा और जल के स्वास्थ्य संबंधी किसी भी विचलन को आसानी से पहचान लिया जाता है ताकि भूमि की उर्वरता और जल की गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके. इसके अतिरिक्त एआई के नेतृत्व वाले पहचान और गहन शिक्षण वाले मॉडल उपग्रह से प्राप्त एकीकृत डेटा संकेत का इस्तेमाल कर सकते हैं और स्थानीय खेती चित्र के साथ उसकी तुलना कर सकते हैं, जिससे मृदा के स्वास्थ्य का पता लगाने और मृदा का स्वास्थ्य बहाल करने के लिए तत्काल कार्य योजना प्रस्तावित करने में मदद मिलती है. इस प्रकार इससे मृदा स्वास्थ्य निगरानी में प्रयोगशाला परीक्षण ढांचे की ऊंची लागत में कमी आती है और मृदा स्वास्थ्य कार्ड स्थल पर वितरित करने का मार्ग प्रश्स्त होता है. बर्लिन स्थित कृषि प्रौद्योगिकी स्टार्टअप टीवी-18 ने प्लैंटिक्स नाम का अप्लीकेशन विकसित किया है, जो मिट्टी में संभावित विकृतियों और पोषक तत्वों की कमी का पता लगाता है. यह विशेष प्रकार का सॉफ्टवेयर अल्गोरिथम्स विशेष वनस्पति पद्धतियों और विभिन्न भूमि विकृतियों, पादप कीटों और बीमारियों के साथ परस्पर संबंध स्थापित करता है और इस तरह लागत में तत्काल बचत लाता है.

करीब 89 प्रतिशत निष्कर्षित भूजल का इस्तेमाल खेती के लिए अक्षम ढंग से किया जाता है, जिससे जल उपयोग और इसके प्रबंधन की गंभीर समस्या पैदा होती है. इस स्थिति से भारत विशुद्ध जल आयातक के रूप में उभरा है, जिससे भविष्य में जल उपलब्धता और मानसून की अनिश्चितता का खतरा बढ़ गया है. अमरीका और चीन की तुलना में भारत अनाज (खाद्य सुरक्षा में प्रमुख घटक) की पैदावार बढ़ाने के संदर्भ में संसाधनों का उपयोग करने की दृष्टि से अक्षम स्थिति में है, इसलिए उसे समुत्थानशील संसाधन कार्यनीति अपनाने की आवश्यकता है. जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, रीएक्टिव एआई मॉडल फसल विषयक नमी आवश्यकता को स्टोर करते हैं और दूर उपग्रहों का इस्तेमाल करते हुए खेत में नमी की मात्रा का मूल्यांकन करते हैं और टेक्स्ट मैसेज के जरिए किसान को संकेत देते हैं. इससे बोरवेल से स्वत: सिंचाई की परत बढ़ाई जा सकती है. इससे फसल उत्पादन में पानी के अंधाधुंध इस्तेमाल में कमी लाने में मदद मिलती है.

भारत में जमीन रासायनिक अवशेषों का भंडारण बनती जा रही है, जिससे एक तरफ मृदा स्वास्थ्य में गंभीर असंतुलन पैदा होता है और दूसरी तरफ विभिन्न फसलों और क्षेत्रों के बीच पैदावार में अंतराल आता है. ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि आगे आने वाली पीढिय़ों को भोजन प्रदान करने के लिए मृदा का स्वास्थ्य बनाए रखने में एआई का लाभ उठाया जाए. नीति आयोग ने हाल ही में आशंका व्यक्त की थी कि देश को अगले दशकों में गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि 70 प्रतिशत जल विषाक्त हो चुका है. इसे देखते हुए संसाधन उपयोग की युक्तिसंगत पद्धतियों के विकल्प की तत्काल आवश्यकता महसूस होती है.

कृषि स्टार्टअप

निर्णायक प्रौद्योगिकी प्रदान करते हुए खेती की क्षमता बहाल करने में कृषि स्टार्टअप्स की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है. इन्टेलो लैब्स, अइबोनो, थरिथी रोबोटिक्स और सेटशोर जैसे कुछ एआई स्टार्टअप्स उपज के पूर्वानुमान, उपज में स्थिरता लाने, मृदा विश्लेषण और भावी फसल के आर्थिक मूल्य का पूर्वानुमान व्यक्त करने में एआई का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके अलावा एआई के नेतृत्व वाले नवाचार और स्टार्टअप्स पर बल देने और उन्हें प्रोत्साहित करने से रोज़गार के अवसरों में महत्वपूर्ण इजाफा किया जा सकता है. इस तथ्य को देखते हुए कि भारत में स्टार्टअप नए युग की प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं, इससे एक तरफ कृषि विकास में स्थिरता लाने और दूसरी तरफ खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है. इस तरह स्थायी विकास के लक्ष्यों को प्रभावकारी ढंग से हासिल करने में भी मदद मिलती है.

वर्तमान डिजिटल अभियान की शुरुआत

कृषि के डिजिटीकरण का मार्ग प्रश्स्त हुआ है. हालांकि डिजिटीकरण की स्थिति संबंधी औद्योगिक सर्वेक्षणों में इसका रैंक अभी बहुत नीचे है. डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के जरिए भारत में डिजिटीकरण का ओएफसी के जरिए गांवों तक पहुंचना खेती में एआई तकनीकों का लाभ उठाने की दिशा में एक अनिवार्य घटक है. तीन करोड़ से अधिक स्मॉर्ट फोन रखने वाले किसानों और ग्रामीण भारत में 2020 तक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 3.15 करोड़ पर पहुंचने को देखते हुए कनेक्ट, कम्युनिकेट और कोआर्डिनेट का मार्ग आसान हो गया है. एक अध्ययन से पता चला है कि डिजिटल खेती और कनेक्टिड खेती सेवाओं से 2020 तक 7 करोड़ भारतीय किसानों को जोड़ा जा सकेगा, जिससे किसानों की आय में 9 अरब अमरीकी डॉलर का इजाफा होगा.

डिजिटल साक्षरता में बढ़ोतरी के प्रयास हमारे समक्ष एआई को बढ़ावा देने की दिशा में अन्य लाभकारी घटक हैं, जो गेमचेंजर साबित हो सकते हैं. इसके अलावा फसल उत्पादन और विपणन के दौरान सूचना उपलब्धता से फसल और आय की हानि कम करने में मदद मिलेगी, जिससे किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य शीघ्र हासिल किया जा सकेगा. नीति आयोग और आईबीएम ने एक आशय पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसका लक्ष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करते हुए फसल पैदावार पूर्वानुमान मॉडल विकसित करना है ताकि आकांक्षी जिलों में किसानों को वास्तविक समय पर सलाह प्रदान की जा सके. यह सही दिशा में एक कदम है.

भारत में प्रौद्योगिकी एक लंबा रास्ता तय कर चुकी है और 1.3 अरब लोगों के जीवन और आकांक्षाओं को प्रभावित कर चुकी है. प्रौद्योगिकी से अनेक लोगों के जीवन में सुधार आया है और अधिक पैदावार देने वाली किस्मों से लेकर अल्गोरिथम व्यापार रणनीतियों/ मॉडलों तक खेती के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है. परंतु, पैदावार में अंतराल और आपूर्ति के क्षेत्र में सुधारों की दृष्टि से यह क्षेत्र अभी भी अविकसित बना हुआ है. इस क्षेत्र में बाजार और मूल्य पहुंच कायम करने के लिए आपूर्ति की बाधाएं दूर करना आवश्यक है. मांग और आपूर्ति स्थितियों का मूल्यांकन, फसल प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय फसल आयोजना जैसे उपाय एआई की मदद से आसानी से किए जा सकते हैं. खेती के क्षेत्र में स्टार्टअप्स उभर रहे हैं और उनके द्वारा विकसित की जा रही प्रौद्योगिकियां वैश्विक मानदंडों के अनुरूप हैं. वे एआई के जरिए इन समस्याओं का समाधान करने की आकांक्षा रखते हैं. परंतु, प्रारंभिक चरणों में विस्तार नेटवर्क के जरिए उनकी प्रौद्योगिकी के संप्रेषण में सरकार की सहायता आवश्यक है. एआई नीति के रूप में तात्कालिक सुधार आवश्यक है ताकि वरीयता के आधार पर महत्वपूर्ण और सर्वाधिक आवश्यक समस्याओं के शीघ्र समाधान में एआई का उपयोग शामिल किया जा सके. इस नीति के अंतर्गत वर्तमान में सर्वाधिक जरूरत वाले क्षेत्र और भविष्य में महत्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल करना होगा. एआई के नेतृत्व वाले नवाचार को अपनाने में प्रारंभिक उपायों के अंतर्गत दूसरी हरित क्रांति को आगे बढ़ाना अनिवार्य है ताकि किसानों को आमदनी की सुरक्षा प्रदान की जा सके. अंतत: खेती में सभी प्रतिभागियों को एआई के भावी लाभ पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच नीतिगत समन्वय को बढ़ावा देना अत्यंत अनिवार्य है.

लेखक राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली से संबद्ध है. ई-मेल: naveenpsingh@gmail. com

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.

(छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)