संपादकीय लेख


Volume-11, 15 - 21 June 2019

 

योग : विश्व के लिए भारत का

सर्वोत्तम उपहार

एस.बी. सिंह

विश्व भर में प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है. पूरे विश्व में इसकी मांग को मान्यता देते हुए राष्ट्रसंघ ने 11 दिसम्बर, 2014 को प्रस्ताव सं. 69/131 द्वारा इस आशय का एक प्रस्ताव पारित किया था. इस प्रस्ताव को 173 सदस्य देशों ने प्रायोजित करने की स्वीकृति दी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी पांच स्थायी सदस्यों ने समर्थन किया. इस वैश्विक मांग का प्रभाव ऐसा हुआ कि योग आज वैश्विक समुदाय तक पहुंच गया. राष्ट्रसंघ में इस बात को महत्व दिया गया कि स्वास्थ्य एवं खुशहाली की दिशा में योग एक सम्पूर्ण पहल है और योग के फायदे के बारे में व्यापक तौर पर प्रचार-प्रसार करने से विश्वभर में लोगों के स्वास्थ्य को लाभ मिलेगा. इस वर्ष 21 जून को पांचवां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जा रहा है और ‘‘क्लाइमेट एक्शन’’ इसका मूल विषय है. यह मूल विषय अत्यंत समयानुसार है, क्योंकि सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन से जूझ रहा है, जो वास्तविक रूप में हम सभी के लिए है और जो धरती और मानवता के अस्तित्व के लिए चुनौती है. ऐसे में जब हम मानव-केन्द्रित गतिविधियों के कारण छठी व्यापक विलुप्ति का सामना कर रहे हैं, योग प्राकृतिक जीवन पद्धति के प्रति फिर से मानवीय विश्वास जाग्रत करके हमें रास्ता दिखा सकता है.

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रसंघ में इन शब्दों में योग के महत्व के बारे में चर्चा की, ‘‘योग में दिमाग और शरीर की एकात्मकता, सोच और कार्य, निरंतरता और उपलब्धि के बीच तालमेल, मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य सन्निहित है, जो स्वास्थ्य एवं खुशहाली की दिशा में एक सम्पूर्ण पहल है.’’

इसके लिए 21 जून का चयन किया गया, क्योंकि यह गरमी का मौसम होता है और वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है और भारतीय परम्परा में इसका विशेष महत्व है.

योग क्या है? राष्ट्रसंघ के अनुसार योग एक प्राचीन शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास है, जो भारत में शुरू हुआ. योग शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है और इसका अर्थ जुडऩा अथवा एकात्मक होना है, यह शरीर एवं चेतना की एकात्मकता का प्रतीक है.

एक महान भारत-विशेषज्ञ प्रो. ए.एल. बाशम के अनुसार योगशब्द का निकट संबंध अंग्रेजी के योकशब्द से है. इसका अर्थ आध्यात्मिक अनुशासन अथवा इस्तेमाल है. योग प्राचीन भारत में मुक्ति की छ: विचारधाराओं में से एक थी, जिसे सदादर्शनके रूप में जाना जाता था. योग में मुक्ति के प्रमुख माध्यमों के रूप में मानस प्रशिक्षण पर जोर दिया जाता है. योग का आधारभूत मूलपाठ दूसरी शताब्दी ई.पू. से संबंधित बद्रायन का ‘‘योग सूत्र’’ है. इस मूलपाठ में योग प्रशिक्षण के निम्नलिखित आठ चरण उल्लिखित हैं :

1.       यम : आत्म नियंत्रण - इसमें पांच नैतिक नियमों का अनुसरण शामिल है. जैसे-अहिंसा, सच्चाई, चोरी नहीं करना, सदाचार और लोभ से बचना.

2.       नियम : अनुपालन - उपर्युक्त नियमों का नियमित एवं सम्पूर्ण अनुपालन करना.

3.       आसन : भंगिमा - इसमें विभिन्न स्थितियों में बैठना शामिल है, जैसे-पद्मासन

4.       प्राणायाम:  सांस पर नियंत्रण - जिसके द्वारा सांस ली जाती है और उस पर नियंत्रण किया जाता है और महत्वपूर्ण आध्यात्मिक एवं शारीरिक मूल्यों के साथ असामान्य लय के रूप में सांस को स्थापित किया जाता है.

5.       प्रत्याहार : प्रतिरोध - जिसके माध्यम से संवेदनशील अंगों का अपने विचारों की ओर ध्यान नहीं जाने देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है.

6.       धरना : दिमाग केन्द्रित करना - किसी एक वस्तु, जैसे नाक के छोर, नासिका, किसी प्रतीक अथवा पवित्र प्रतीक पर ध्यान केन्द्रित करना.

7.       ध्यान : अंतध्र्यान - जब एकाग्रता की स्थिति में सम्पूर्ण सोच को महसूस किया जाता है.

8.       समाधि : गहरा अंतध्र्यान - जब सम्पूर्ण व्यक्तित्व को अस्थायी तौर पर विलीन किया जा रहा हो.

इस प्रकार, आम धारणाओं के विपरीत, योग महज शरीर की मजबूती के लिए खास आसनों पर आधारित शारीरिक अभ्यास ही नहीं है, परन्तु यह खुद जीवन के प्रति एक सम्पूर्ण पहुंच है. इसके निरंतर अभ्यास से हमें एक सार्थक, सुखी जीवन जीने का विकल्प मिलता है और आंतरिक शांति वं सद्भाव का मार्ग मिलता है. इससे सही आचार, सही सोच और सही कार्य के हमारे गुणों को बढ़ावा मिलता है. ये गुण बौद्ध और जैन के मूलभूत सिद्धातों में भी शामिल हैं. इससे हमारी, सोच, इच्छाओं और लालच के प्रबध्ंान में मदद मिलती है और हम नैतिक सिद्धातों पर आधारित गुणसम्पन्न जीवन की ओर प्रवृत्त होते हैं. इस प्रकार योग न केवल व्यक्तिगत तौर पर प्रासंगिक है, बल्कि सामाजिक तौर पर भी प्रासंगिक है.

राष्ट्रसंघ के पूर्व महासचिव बॉन की

मून ने निम्नलिखित शब्दों में योग का समर्थन किया है :

‘‘असंक्रामक रोगों की रोकथाम में योग मददगार हो सकता है और यह एक समावेशी रूप में समुदायों को एक साथ ला सकता है. योग एक ऐसा खेल है, जो विकास एवं शांति के प्रति योगदान कर सकता है और तनाव से मुक्त होने के लिए आपात स्थितियों में लोगों की मदद भी कर सकता है.’’

इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वास्थ्य और खुशहाली की ओर एक सम्पूर्ण पहुंच कायम करते हुए योग हमारे विचारों और कार्यों

को एक साथ करके सद्भाव की ओर ले जाता है.

किसी व्यक्ति के दीर्घकालिक लाभ के रूप में सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना बढ़ाने में योग के अनेक लाभों के परिणामस्वरूप एक अच्छे जीवन की शुरुआत होने से यह विश्वभर में लोकप्रिय हो गया है. इसके अलावा, विभिन्न क्षेत्रों में बहु-विषयी अनुसंधान के माध्यम से, योग का नैदानिक महत्व कायम हो गया है और लोग विभिन्न बीमारियों की रोकथाम के लिए योग अपना रहे हैं.

रहन-सहन, आहार प्रणाली में बदलाव और नशे की आदतों से कई प्रकार की बीमारियां बढ़ी हैं और लोगों के स्वास्थ्य एवं वित्त पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा है. एक ऐसे समय में, जब विघटन और विवाद की ओर इतना ध्यान दिया जा रहा है, हमारे मतभेदों को दूर करने और सद्भाव लाने में योग एक सशक्त माध्यम हो सकता है.

हमारे समाज में हमारा ध्यान उस ओर जाता है कि प्रजाति, रंग और नस्ल के रूप में हम एक-दूसरे से कितने भिन्न हैं, ऐसे में योग हमें इसका अनुभव करने के लिए एक अवसर देता है और इस बात से आनंदित करता है कि हम सभी एक ही प्रजाति-मानवता प्रजाति से संबंधित हैं.

योग के लाभ के वैज्ञानिक प्रमाण : योग पर वास्तविक अनुसंधान से इस बात की पुष्टि हुई है कि स्वास्थ्य के लिए यह लाभदायक है. तनाव और घबराहट में कमी लाकर योग से तनाव प्रत्युत्तर प्रणाली संतुलित होती है. इससे बीमारियां कम होती हैं, जैसे- हृदय की धडक़न में कमी होना, रक्तचाप घटना और सांस लेने में आसानी होना. इस बात के भी वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि योग अपनाने से हृदय की धडक़न सामान्य होने में मदद मिलती है, जो तनाव के समय अधिक आराम से प्रत्युत्तर देने में शरीर की क्षमता का संकेतक है. अवसाद, घबराहट अथवा तनाव से ग्रस्त अनेक मरीजों के लिए ऐसे लक्षणों में कमी लाने में योग काफी मददगार हो सकता है. वस्तुत:, योग के वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य न केवल निकटतापूर्वक जुड़े हैं, बल्कि अनिवार्य रूप से समतुल्य हैं. इस बात के भी अधिकाधिक प्रमाण मिल रहे हैं कि योग अपनाने में अपेक्षाकृत जोखिम कम है और कुल मिलाकर स्वास्थ्य में सुधार लाने में यह एक अधिक फलदायक माध्यम है.

अमरीका की एक अग्रणी पत्रिका, ‘साइंटिफिक अमेरिकनने योग विज्ञान को समझने के लिए प्राचीन भारतीय लोगों को श्रेय दिया है. पत्रिका में प्राणायाम के योगदान को इस रूप में उल्लिखित किया गया है :

‘‘प्राणायाम (सांस नियंत्रण) योग सांस नियंत्रण के ईर्द-गिर्द एक प्रथम सिद्धांत है, जिसमें माना गया है कि सांस नियंत्रण से आयु बढ़ती है.’’

भारत की सूक्ष्म शक्ति के रूप में योग: एक अमरीकी विद्वान जोसेफ नेई ने १९९० के दशक में सूक्ष्म शक्ति की अवधारणा का प्रतिपादन किया था. उनके अनुसार, शक्ति वह क्षमता हे, जिससे आपके मन मुताबिक अन्य व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव होता है, और मूलत: ऐसा करने के तीन तरीके हैं :-

1.       क्रूरतापूर्ण (छड़ी)

2.       भुगतान (गाजर)

3.       आकर्षण (सूक्ष्म शक्ति)

नेई के अनुसार किसी देश की सूक्ष्म शक्ति मुख्य रूप से तीन संसाधनों पर निर्भर होती है

ए.) संस्कृति

बी.) राजनीतिक मूल्य

सी.) विदेश नीति

इस प्रकार, सूक्ष्म शक्ति वह क्षमता है जिसके द्वारा क्रूरता अथवा भुगतान से भिन्न आकर्षण के माध्यम से हम मनमुताबिक परिणाम प्राप्त करना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में सूक्ष्म शक्ति वह क्षमता है जिससे आग्रह के माध्यम से अन्य व्यक्ति का व्यवहार प्रभावित होता है.

भारत की विदेश नीति मूल्य आधारित है, जो इसे श्रेय और आदर दिलाती है. एक सूक्ष्म शक्ति खुद को आगे बढ़ाने के लिए भारत ने खान-पान, कला, संस्कृति, फिल्म, संगीत आदि से लाभों और विशेषताओं पर भी जोर दिया है. राष्ट्रसंघ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा के साथ हमारी सूक्ष्म शक्ति को और भी अधिक मजबूती मिली है तथा आज विश्व न केवल योग से लाभ प्राप्त कर रहा है, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य एवं खुशहाली के लिए एक प्राकृतिक विकल्प प्रस्तुत करने के लिए भारत के प्रति कृतज्ञता भी प्रकट कर रहा है. आंतरिक शांति और जीवन में सद्भाव की खोज में विश्व भर में लोग अपनी प्रजाति, धर्म अथवा नस्ल को भूलकर अधिक से अधिक संख्या में योग को अपना रहे हैं. आतंकवाद, हिंसा और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित विश्व में योग के माध्यम से समाधान मिलता है. आधुनिक सभ्यता को इन विशेषताओं के आधार पर परिभाषित किया जाता है: पृथ्वी के सीमित संसाधनों के बेहतर दोहन और उपभोग पर आधारित एक त्वरित जीवन प्रणाली. राष्ट्रवाद से दूसरों के बीच घृणा फैल रही है. राष्ट्रों के हिस्से पर संकीर्ण निजी हितों के कारण मानवता आपदा की ओर बढ़ रही है. विश्वभर में आतंकवाद अपने पांव फैला रहा है. मानवता के सम्मुख इन गंभीर चुनौतियों का समाधान योग द्वारा संभव है. जैसा कि विवेकानंद ने काफी पहले कहा था : विश्व में भारत आध्यात्मिक लक्ष्य के रूप में निर्धारित है. योग हमारी आध्यात्मिक परंपरा का हिस्सा है, यह विश्व को प्रभावित करने की क्षमता रखता है और सम्पूर्ण मानवता के लिए एक बेहतर विश्व की दिशा में योगदान करने में भारत को अग्रणी भूमिका दिला सकता है. इसलिए योग को विश्व के लिए भारत के सर्वोत्तम निर्यात के रूप में देखा जाना चाहिए.

(एस. बी.सिंह एक जाने-माने शिक्षाविद् और कमेंटेटर हैं.

ई-मेल: Sb_Singh2003@Yahoo.Com)

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.

(छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)