संपादकीय लेख


Volume-12, 22 - 28 June 2019

 

 

पर्यावरण नीति: प्राचीन भारतीय और गांधीवादी विकल्प

डॉ. गौतम चौबे

जनवरी, 1910 में पेरिस ने एक ऐसी आपदा का अनुभव किया जिसने महानगर को अपनी आत्म-संतुष्टि की जड़ता से निकाल  बाहर किया और सभ्यता के आदर्शों, शहरी नियोजन, भौतिक सुख सुविधाओं के साथ आधुनिक दुनिया के जुनून और प्रगति की पर्यावरणीय लागत पर बहस छिड़ गई. विनाश के पैमाने से अधिक, यह इसके खुलासे का तरीका था जिसने दुनिया को स्तब्ध कर दिया था. सिएन नदी में पानी का स्तर नाटकीय ढंग से बढ़ गया और पेरिसवासी इससे अनभिज्ञ थे और उनकी आंख खुली तो स्थिति कुछ अलग थी, जिसका अक्सर सदी की बाढ़के तौर पर उल्लेख किया जाता है. एक शहर के लिये जिसने दुनिया में प्रगतिके प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा पाई थी. यह एक जागृत काल था जिसने लोगों को विकास और शहरीकरण के बारे में सोचने का तरीका बदल दिया.

प्रकृति अपने स्वयं के कानूनों के अनुसार काम करती है परंतु मनुष्य लगातार उनका उल्लंघन करता है. अलग-अलग तरीकों से और अलग-अलग समय में, प्रकृति मनुष्य को बताती है कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जो परिवर्तन के अधीन नहीं है.....पेरिस की इस नदी में इतनी भीषण बाढ़ आ गई कि विशाल इमारतें भी बह गईं.....पेरिस के लोगों ने हमेशा के लिये रहने के लिये शहर का निर्माण किया था. प्रकृति ने चेतावनी दी है कि पूरे पेरिस को भी नष्ट किया जा सकता है.

पेरिस 1910 के बाद से, पर्यावरणीय/औद्योगिक आपदाओं के साथ-साथ पारिस्थितिकी क्षरण दोनों प्रकरणों को बेरोकटोक जारी रखा गया है. इसके अलावा, हर बार जब हम किसी आपदा से घिर जाते हैं तो मूल्यांकन रिपोर्ट मानव और वाणिज्यिक आपदा पर सांख्यिकीय डेटा के साथ पूरी होती है, जो बदले में मौद्रिक क्षतिपूर्ति और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के उद्देश्य से सरकार के हस्तक्षेप के रूप में निर्धारित की जाती है. लगभग हर बार, हम ऐसी आपदाओं की पर्यावरणीय लागत अथवा कारणों का आकलन करने में विफल रहते हैं. आधुनिक विश्व की प्रमुख प्रगति की ओर झुकते हुए, गांधीजी ने एक आत्म-विनाशकारी आवेग का पता लगाया था. उनके लिये भौतिक समृद्धि की यह अतुलनीय खोज़ आधुनिक सभ्यता की विपत्ति थी. एक व्यक्ति जो ग्रामीण कुटीर उद्योग और विकेंद्रीकृत प्रशासन का आजीवन समर्थक बना रहा, गांधीजी ने शहरीकरण और औद्योगिकीकरण की तरफ जुड़वां अभियान को एक चिंताजनक सभ्यतावादी प्रवृत्ति के रूप में देखा. जर्मनी में जन्मे ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई एफ शूमाकर ने अपनी रिकॉर्ड बिक्री वाली पुस्तक स्माल इज ब्यूटीफुल: अ स्टडी ऑफ इकनॉमिक्स एज इफ पीपल मैटर्ड’ (1973) में तर्क दिया कि आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं और विकासात्मक प्रतिमानों ने प्रकृति को खर्चीली आय के रूप में, न कि एक अचल पूंजी के तौर पर, मानने की गंभीर त्रुटि की है. शूमाकर के अनुसार, प्रकृति के प्रति यह उदासीनता और विकास गतिविधियों से पर्यावरणीय लागत से दूरी के कारण एक अनिश्चित आर्थिक व्यवस्था बन गई है. शूमाकर लिखते हैं:

इस त्रुटि का उदय अत्यंत अहंकारी और गहरी जड़ों वाली के तौर पर हुआ  है जो कि दार्शनिकता के साथ घनिष्ठता से जुड़ी है, धार्मिक कहने के लिये नहीं, प्रकृति में मनुष्य के दृष्टिकोण में पिछली तीन या चार शताब्दियों के दौरान परिवर्तन.....आधुनिक मानव खुद को प्रकृति के भाग के तौर पर अनुभव नहीं करता है, लेकिन एक बाहरी शक्ति के रूप में हावी होने और इस पर जीत पाने के लिये प्रयासरत है, यहां तक कि वह प्रकृति के साथ लड़ाई की बात भी करता है.

पेरिस 1910 के प्रकाश में, गांधी और शूमाकर से, कोई व्यक्ति निम्नलिखित प्रश्न पूछने के लिये बाध्य महसूस करता है: प्रगति की हमारी धारणाओं पर पुनर्विचार करने के लिये हमें कितनी और विपत्तियां देखनी पड़ेंगी? क्या हम कभी उन चेतावनियों पर ध्यान देंगे जो प्रकृति हमारे मार्ग में बार-बार भेजती है? वे कौन से दार्शनिक और/या धार्मिक परिवर्तन हैं जिन्होंने प्रकृति के प्रति उदासीनता की संस्कृति का सृजन किया है? क्या मानव इतिहास में कभी ऐसा समय आया था जब प्रकृति एक निष्क्रिय संसाधन से अधिक, केवल लूट के लिये फिट थी?

प्राचीन भारतीय चिंतन में पर्यावरण

यहां, प्राचीन भारत में पर्यावरणीय नैतिकता के बारे में पता लगाना सार्थक हो सकता है. राजा पृथ्वी की कहानी के माध्यम से, जिसके बाद पृथ्वी को उसका नाम मिला, विष्णु पुराण मानव पारिस्थितिकी पर भारत के उत्कृष्ट दृष्टिकोण को चित्रित करता है. पृथ्वी ने वेना का स्थान लिया था, जिनके अत्याचारी शासन ने पृथ्वी को गाय के रूप में दूर खदेडऩे के लिये मज़बूर कर दिया था. शाप से बेना की मृत्यु के बाद, ऋषियों ने यग्न-भिक्षु पृथ्वी को अपने उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्त किया और गाय के आकार की पृथ्वी पर कब्जा करके अपने लोगों के दुखों को समाप्त करने का निर्देश दिया. पृथ्वी के पास एक विकल्प था: पाश्विक बल के उपयोग से पृथ्वी को हरा देना या उसे उसका इनाम देने के लिये उकसाना. उसने इनाम वाली बात को चुना. बुद्धिमान राजा ने पृथ्वी के रक्षक होने का वादा किया और अपने मातृ प्रवृत्ति की बहाली के लिए एक बछड़ा पैदा किया. बछड़े को देखते ही पृथ्वी स्नेह से अभिभूत हो गई और दूध के रूप में मानव समाज के निर्वाह के लिये आवश्यक अनाज, खेती और पोषण के अन्य स्रोत प्रदान किये. ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी से पहले, कोई कृषि, चारागाह या व्यापार नहीं होता था. सहानुभूति संरक्षकता के अपने वादे के माध्यम से पृथ्वी का सभ्यता का स्रोत बन गया. दूसरे शब्दों में मानव सभ्यता पारस्परिक विश्वास के एक कोमल बंधन पर आधारित है, जिसे पृथ्वी के पुत्रों को बनाए रखने की उम्मीद है. जब तक पुरुष पृथ्वी के वचन का सम्मान करते हैं, वे उसकी धरोहर का आनंद लेना सुनिश्चित करते हैं. वैदिक लोगों के लिये, यह बाल-मां/पौष्टिक-पोषित/ रक्षक-संरक्षित उपमा थी, जो प्रकृति के साथ सभी जुड़ावों के लिये परिभाषित रूपरेखा प्रदान करती थी. आखिऱकार, जैसा कि अथर्ववेद में बताया गया है, पृथ्वी माता है और हम उसके पुत्र हैं (माता भूमि, पुत्रोहम पृथ्वीव्या)

प्राचीन भारतीय चिंतन में, पर्यावरण के साथ सभी लेन-देन संतुलन की जुड़वां अनिवार्यताओं और प्रकृति में मनुष्य की अंतर्निहितता द्वारा परिचालित थे. जबकि ऋग्वेद का तर्क है कि सूर्य, नदियों और जंगलों के अलावा, मनुष्य के पर्यावरण का गठन जानवरों; जंगली और घरेलू दोनों द्वारा किया जाता है, शुक्ल यजुर्वेद के प्रसिद्ध छंद इस पारिस्थितिकी तंत्र के सभी तत्वों के बीच सामंजस्य और संतुलन के लिये एक भावुक दलील देते हैं. मनुष्य से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह प्रकृति के साथ हर आदान-प्रदान में बड़े संयम का पालन करे, ऐसा न हो कि यह नाजुक संतुलन हमेशा के लिये बिगड़ जाए. यहां तक कि बच्चों की शिक्षा के लिये या राज्य की वस्तुओं की पेचीदगियों से निपटने के लिये शिक्षाप्रद संधियों में, पर्यावरण के साथ मनुष्य के जुड़ाव के प्रोटोकॉल को दोहराया गया. कौटिल्य का अर्थशास्त्र और याज्ञवल्क संहिता ग्रंथ दंडात्मक उपायों की एक विस्तृत यात्रा कार्यक्रम प्रदान करते हैं जो प्रकृति के प्रति आक्रामकता के मानव कृत्यों को आकर्षित करते हैं. इसी तरह की बातों में, पंचतंत्र के पाठकों द्वारा अक्सर सवाल पूछे जाते हैं, यदि कोई पेड़ों को काटकर और जानवरों को मारकर स्वर्ग तक पहुंचने की आशा करता है, तो नरक का रास्ता क्या है?’’ वहीं कई बौद्धों का भी सच है. प्राचीन भारतीय साहित्य में पर्यावरणीय नैतिकता पर टिप्पणी करते हुए, प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और अनुवादक आदित्य नारायण धरायाशील हस्कर बताते हैं कि प्राचीन भारतीय साहित्य, जानवरों, पक्षियों और वनस्पतियों की प्राकृतिक घटना का सटीक ज्ञान और संपूर्ण ज्ञान प्रदर्शित करता है. इसके अलावा, इन ग्रंथों के लेखक न केवल जानवर और पौधे के लिये, बल्कि मनुष्य के पर्यावरण के हर तत्व के लिये एक गहरी सहानुभूति प्रदर्शित करते हैं. प्राचीन भारत में लोग मुख्य रूप से कृषक होते थे और कुछ हद तक शिकारी भी. इन कारणों से, वे पारिस्थितिक तंत्र के ज्ञान के अधिकारी थे. हालांकि जो वास्तव में सामने आता है वह एक मुहावरा है जिसमें उनकी बुद्धिमत्ता का प्रयोग किया गया और उन्हें संरक्षित किया गया था- ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ अथवा संपूर्ण पृथ्वी का सर्वांगीण दर्शन एक ऐसी संस्कृति है जिसके तहत पेड़ों, जानवरों और बेटों का उल्लेख एक ही सांस में किया जा सकता है और कथित रूप से इन्हें माना जाता है. वृक्षायुर्वेद में यह तर्क दिया गया है कि दस पुत्रों को भूलकर एक वृक्ष लगाना फलदायी है. बौद्ध धर्मग्रंथ हमें बताते हैं कि किसी पेड़ को नुकसान पहुंचाना उतना ही पाप है जितना किसी दोस्त को नुकसान पहुंचाना. यह विश्वास प्रणाली, जिसमें प्रकृति को एक विस्तारित परिवार के एक अंतरंग सदस्य के रूप में पेश किया जाता है, ने उपभोग की एक नैतिकता को प्रबल किया है, जो कि शोषक नहीं, बल्कि पुनरावर्ती और पुर्योजी था. यह वास्तव में एक दार्शनिक और अद्र्ध धार्मिक दुनिया का दृश्य है जिसके क्षरण से प्रकृति से मनुष्य की प्रगतिशील दूरी बढ़ गई है और शूमाकर ने अपनी उक्त पुस्तक में यह लिखा है.

यदि यह केवल विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शहरीकरण की बेपरवाह प्रगति से जुड़ी एक समस्या थी, तो कोई इसे आसानी से विकास के नए प्रतिमानों को संबोधित कर सकता था लेकिन यह इससे बहुत अधिक है. यह उपदेश, कथा और धारणा की भी समस्या है. वर्तमान पर्यावरण संकट प्रकृति के बारे में लोगों के महसूस, पढऩे, सुनने और बात करने के तरीके से जुड़ा है. यह बातचीत करने, वर्णन करने या वाद-विवाद के माहौल के लिये कितना अच्छा है?

क्या हमारे पास कोई ऐसा खाका है, जो वैश्विक जनसंख्या की जरूरतों से समझौता किए बिना, सतत् विकास लक्ष्यों के साथ पर्यावरण संरक्षण की विवेकाधीन अनिवार्यता का सामंजस्य स्थापित कर सकता है.

गांधीवादी विकल्प

उपर्युक्त प्रश्नों में से कई का जवाब गांधीजी से मिल जाता है. जब हम गांधीजी के चित्र को शूमाकर की पुस्तक के बारहमासी पुस्तकालय संस्करण के कवर पर उभरा हुआ देखते हैं तो हमें आश्चर्य नहीं होता. उनके जीवन और लेखन में, एक अवशिष्ट प्राचीन भारतीय पर्यावरण नैतिकता की झलक है; एक बंधन जो न केवल अस्तित्वगत कारणों के लिये उपयोग-मूल्य और अंतर-निर्भरता के स्तर पर संचालित होता है, बल्कि प्रभावकारिता के स्तर पर भी संचालित होता है.  इसकी व्याख्या नवजीवन के एक लेख से की जा सकती है जिसमें गांधी जी ने 1929 में उत्तराखंड आने के अपने अनुभव का वर्णन किया है. गांधीजी के अनुसार:

हिमालय न होता, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु नहीं होती, हिमालय नहीं होता तो वर्षा नहीं होती और ये नदियां नहीं होतीं, और वर्षा के बिना भारत सहारा जैसा रेगिस्तान बन जाता. हमारे दूर दृष्टि वाले पूर्वज जो यह जानते थे और जो हमेशा उन उपहारों के लिये भगवान के प्रति कृतज्ञ थे, जिन्होंने हिमाचल को तीर्थ स्थान में बदल दिया.

गांधीजी की उत्तराखंड यात्रा पर टिप्पणी करते हुए, पी.सी. जोशी बताते हैं कि यहां एक ओर गांधीजी को निर्मल एकांत की ओर अग्रसर किया गया था, वहीं दूसरी ओर वे भारत के लिये इसके महान लाभों के प्रति विशिष्ट रूप से सचेत थे. जोशी जी का तर्क है कि हिमालय के पर्यावरण को समग्र रूप से भारत के साथ जोडऩे के लिये किसी अन्य समकालीन राजनीतिक नेता या यहां तक कि वैज्ञानिकों के पास भी सूक्ष्मदर्शिता नहीं थी. यद्यपि, जोशीजी की अनदेखी गांधीजी की पवित्र नैतिकता का त्याग है जो कि अमर होने के बाद से हिमालय के साथ भारत के संबंधों की विशेषता है. यह अद्र्ध धार्मिक ढांचा, जो न केवल पर्यावरण के प्रति एक नैतिक प्रतिक्रिया को आमंत्रित करता है, बल्कि मानव पारिस्थितिकी का भी समर्थन करता है, गांधी के साथ जोड़ता भी है. 

मैनुअल श्रम, बागवानी, कृषि, शिल्प और प्रकृति केंद्रित शिक्षा के एकीकरण के माध्यम से, गांधी जी ने जीवन का एक तरीका उजागर किया जो आत्मनिर्भरता थी. इसने हाल के दशकों में बहुत रुचि पैदा की है और गांधीजी के आधुनिक विकास प्रतिमानों की आलोचना को समझने का गंभीर प्रयास किया गया है. महात्मा गांधी: एन एपोस्टल ऑफ एप्लाइड ह्यूमैन इकोलॉजी (1996) में टी एन खोशू का तर्क है कि टालस्टाय फार्म, फीनिक्स फार्म और साबरमती आश्रम जैसे प्रयोगों के माध्यम से गांधीजी ने यह सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया था कि समाज के प्रत्येक सदस्य के लिये प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करना संभव था.

 विवेक पिंटो की गांधी की दृष्टि और मूल्य, भारतीय कृषि में बदलाव के लिए एक नैतिक खोज (1998), हिंद स्वराज में निहित सिद्धान्तों के आधार पर गऱीबी मुक्त, आत्मनिर्भर समुदाय की स्थापना की संभावना, नियोजित कृषि के ख़तरों से विपरीत है. स्थानीयकी केंद्रीयता एक केंद्रके बजाय एक ऐसा स्थान है जो गांधीवादी पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था दोनों को टिकाऊ बनाता है. यह स्थानीय में बदले में पारिस्थितिकी तंत्र को देखने और अनुभव करने के अद्र्ध धार्मिक और पवित्र संरचनाओं से प्रेरित है.

निष्कर्ष

स्थानीय नदी उत्सव को बढ़ावा देकर प्रकृति के साथ मनुष्य के जुड़ाव को पुन: सक्रिय करने के प्रयासों के परिणाम सामने आये हैं. बिहार के बक्सर जिले में गंगा के किनारे स्थित एक घनी आबादी वाले गांव अहिरौली का उदाहरण इस मामले में एक बिंदु हो सकता है. गांव, जहां मछली पकडऩे से लेकर खेती करने तक, व्यावसायिक गतिविधियों का पूरा सरगम नदी पर केंद्रित है.  फिर भी, वर्षों से नदी के तट पर प्रदूषण और कचरे के ढेर बढ़ रहे हैं. हालांकि जब से पंचायत ने गंगा दशहरा मनाने का फैसला किया है तब से किनारे के साथ-साथ स्वच्छता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है. हालांकि सरकारी सहायता प्राप्त शौचालयों के निर्माण के जरिए खुले में शौच के खिलाफ अभियान ने भी निर्णायक भूमिका निभाई है लेकिन वार्षिक उत्सव के माध्यम से नदी के साथ भावनात्मक जुड़ाव मज़बूत और इससे लोगों में अपनी मांगंगा के प्रति दृष्टिकोण में वास्तविक बदलाव आया है. इस बात ज़ोर दिया जाना चाहिये कि यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के खिलाफ कोई प्रस्ताव नहीं है. यह केवल स्थानीय निवासियों को अपनी पारिस्थितिकी का ट्रस्टी बनाते हुए उन्हें संरक्षण गतिविधियों में संलग्न करने का एक प्रयास है. और वहां कुटीर उद्योग और स्थानीय त्योहारों को पुनर्जीवित करने की तुलना में ऐसा करने के लिये ये एक बेहतर तरीका हो सकता है.

(डॉ. गौतम चौबे एआरएसडी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाते हैं.

ई-मेल: Gautam.choubey 922@gmail.com)

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.

(छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)