संपादकीय लेख


VOLUME-38

हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलनमें
भारत और अफगानिस्तान की एकजुटता

डॉ. सीताकांत मिश्र

अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता के लिये दो भिन्न शांतिनिर्माण दृष्टिकोण अपनाये गये: पहला, अमेरिका के नेतृत्व में हस्तक्षेपपूर्ण दृष्टिकोण; और दूसरा चीन, रूस और, भारत सहित दूसरे पड़ोसी देशों को शामिल करते हुए क्षेत्रीय सांस्थानिक दृष्टिकोण.

चतुर्भुज समन्वय समूह (क्यूसीजी), और हार्ट ऑफ एशिया (एचओए) ऐसे कुछेक प्रयास हैं जो कि अफगानिस्तान को राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य तौर पर सुदृढ़ बनाने पर केंद्रित दूसरी रणनीति का हिस्सा हैं. हाल में अमृतसर (पंजाब) में संपन्न हार्ट ऑफ एशिया-इस्तांबुल प्रोसेस (एचओए-आईपी) मंत्रिस्तरीय बैठक में चर्चाएं ‘‘आतंकी हिंसा की बढ़ती समस्या के विरूद्ध कार्रवाई के संकल्प‘‘ की आवश्यकता पर केंद्रित थी, जो कि अफगानिस्तान और क्षेत्र के लिये गंभीर ख़तरा बनता जा रहा है.’’

हार्ट ऑफ एशियामें त्रुटियां

तुर्की में आरंभ हुई हार्ट ऑफ एशिया-इस्तांबुल प्रक्रिया (एचओए-आईपी) का उद्देश्य अफगानिस्तान और समूचे ‘‘हार्ट ऑफ एशियाक्षेत्र में शांति, सुरक्षा और विकास के लिये क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है. पूर्व की पांच मंत्रिस्तरीय बैठकें (इस्तांबुल-2011, काबुल-2012, अलमाटी-2013, पेईचिंग-2014, और इस्लामाबाद-2015) अफगानिस्तान के संघर्ष-उपरांत पुनर्निर्माण के लिये बहुपक्षीय समर्थन और अरबों डॉलर की सहायता चैनलबद्ध करने में सफल रही हैं.

हार्ट ऑफ एशिया-इस्तांबुल प्रोसेस (एचओए-आईपी) नि:संदेह ‘‘अफगानिस्तान और समूचे हार्ट ऑफ  एशिया क्षेत्र में स्थिरता, शांति और खुशहाली को प्रोत्साहन देने और शेष क्षेत्र से अफगानिस्तान के संपर्क को बढ़ाने के उद्देश्य से राजनीतिक वार्तालाप और निकट क्षेत्रीय सहयोग के लिये एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय मंच है.

अमृतसर में संपन्न हुई छठी मंत्रिस्तरीय बैठक में, जिसमें 14 साझेदार देशों और $करीब 40 समर्थक देशों तथा संगठनों ने भाग लिया, दुनिया के इस हिस्से में आतंकवादी कार्रवाइयों की कड़ी भत्र्सना की गई, और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने  ‘‘पाकिस्तान को इसका क्षेत्रीय सृजक और केंद्र बिंदु’’ बताया.

सम्मेलन के अंत में जारी घोषणा में ‘‘संयुक्त चुनौतियों से निपटने के लिये प्रभावी तरीकों के तौर पर उन्नत क्षेत्रीय सहयोग और हार्ट आफ एशिया क्षेत्र की स्थिरता और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा दिये जाने की आवश्यकता‘‘ पर ज़ोर दिया गया. इसमें उनकी ‘‘सदस्य राष्ट्रों के बीच यथार्थ और प्रभावी तरीके से वर्धित सहयोग को मज़बूत किये जाने की प्रतिबद्धता‘‘ नये सिरे से अभिव्यक्त की गई.

परंतु समूची प्रक्रिया ‘‘आतंकवाद, हिंसक उग्रवाद, कट्टरवाद, अलगाववाद और क्षेत्रवाद तथा इनमें परस्पर संबंध’’ के इर्द-गिर्द बनी रही. विशेषतौर पर ‘‘खासतौर पर अफगानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति और तालिबान, आईएसआईएस/दाइस सहित आतंकवादी गुटों और इसे संबद्ध संगठनों, हक्कानी नेटवर्क, अलकायदा, इस्लामिक मूमैंट ऑफ उज़्बेकिस्तान, पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामी आंदोलन, लश्करे तैयबा, जैश ए मोहम्मद, टीटीपी, जमात उल अहरर, जुनडुल्लाह और अन्य विदेशी आतंकवादी लड़ाकों’’ को लेकर ‘‘आम सहमति के साथ अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र समझौते को शीघ्र अंतिम रूप दिये जाने’’ पर बल दिया गया.

शिखर सम्मेलन के सदस्यों ने सीमांत क्षेत्र के आस-पास आतंकी हमलों की वास्तविकता का पता लगाने के एक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था कायम किये जाने पर भी बल दिया. इस बात पर ज़ोर दिया गया कि जब तक कि आतंकवाद और इसके प्रायोजकों के उन्मूलन से अ$फगान लोगों की सुरक्षा और अ$फगान सरकार की स्थिरता सुनिश्चित नहीं होती, कितनी भी राशि की सहायता और सहयोग संघर्ष पीडि़त अफगानिस्तान की सूरत को नहीं बदल सकता.

व्यापक दृष्टिकोण

आतंकवाद के अलावा, अमृतसर घोषणा में नशीले पदार्थों के उत्पादन और तस्करी के खतरे तथा आतंकवादी संगठनों के राजस्व और इसके वित्तीय समर्थन की सांठ-गांठ को लेकर भी चिंता प्रकट की गई जिसने हार्ट ऑफ  एशिया क्षेत्र और इससे बाहर बुरी तरह से प्रभावित किया है. बैठक में अफगानिस्तान की एक क्षेत्रीय आतंकवाद-निरोधक रणनीति का पता लगाने में अग्रणी पहल का भी स्वागत और समर्थन किया गया तथा ढांचागत रणनीति पर विचार-विमर्श के लिये विशेषज्ञों की बैठक शीघ्र बुलाये जाने का आह्वान किया गया.

अधिक महत्वपूर्ण, घोषणा में सभी अफगान तालिबान गुटों और दूसरे सशस्त्र गुटों से अफगानिस्तान सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल होने का आह्वान किया गया क्योंकि यह विश्वास करती है कि अफगानिस्तान में स्थाई शांति केवल बातचीत करके समझौते के जरिये ही स्थापित की जा सकेगी. कासा-1000, तूताप, तापी, चाबाहार समझौता, पंच राष्ट्र रेलवे, तात -तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान और तजाकिस्तान को रेलमार्ग से जोडऩे, अफगान अंतर्राष्ट्रीय रेलवे कॉरिडोर आदि जैसे बहुआयामी ऊर्जा और संपर्क परियोजनाओं के जरिये एचओए-आईपी को दृढ़ विश्वास है कि अफगानिस्तान हार्ट ऑफ एशिया क्षेत्र में क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देने में एक प्राकृतिक भूमि सेतु बन जायेगा.

यह सम्मेलन उड़ी आतंकी हमले और तदुपरांत भारत की सर्जिकल स्ट्राइक के उपरांत भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव की पृष्ठभूमि में आयोजित हुआ. साथ ही यह ऐसे समय हुआ है जब अफगानिस्तान की पाकिस्तान पर विश्वास में कमी आई है.

इसके अलावा, हार्ट ऑफ एशिया अमृतसर बैठक एक ऐसे सनसनीखेज़ बृह्त वैश्विक शक्ति संतुलन की पृष्ठभूमि में आयोजित हुई है जिसके पाकिस्तान के पक्ष में होने की बात कही जा रही है. रूस अब चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) में शामिल होने और निर्यात के लिये ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच कायम करने को उत्सुक है. पता चला है कि चीन ग्वादर बंदरगाह की सुरक्षा के लिये अपनी नौसेना को तैनात कर रहा है. अत: रूस ने पाकिस्तान की धरती से संचालित हो रही आतंकवादी कार्रवाई की भत्र्सना नहीं की है, उल्टे उसने कहा है कि अकेला पाकिस्तान अमृतसर में उस पर हुए हमलों की अपेक्षा नहीं रखता है.

सामरिक एक-जुटता

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत और अफगानिस्तान की सुरक्षा चिंताएं महत्वपूर्ण रूप से परस्पर जुड़ी हैं. सबसे पहले, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद न केवल अफगानिस्तान को बल्कि भारत को भी लक्ष्य कर रहा है, इस प्रकार संयुक्त आतंकवादी रोधी रणनीति की आवश्यकता है. दूसरे, चूंकि अफगानिस्तान का सुरक्षा दायरा भारत के साथ जुड़ा है, भारत के अफगानिस्तान में न्यायोचित सुरक्षा हित हैं. तीसरा, चूंकि अफगानिस्तान के व्यापक विकास में अन्य पड़ोसियों की अपेक्षा भारत का काफी योगदान रहा है उस पर यह देखने की नैतिक जि़म्मेदारी हो जाती है कि उसका योगदान और परिसंपत्तियां वहां सुरक्षित हैं. चौथा, अफगानिस्तान में गहरी जड़ें जमा रही ‘‘रणनीतिक गहराई’’ के अभिप्राय पर आधारित पाकिस्तान की ‘‘परमाणु अस्थिरता’’ को बेअसर करने के लिये भारत को अफगानिस्तान की रणनीतिक स्वायत्तता और स्थिरता सुनिश्चित करने की आवश्यकता है.

अंत में, एक मज़बूत और स्थिर अफगानिस्तान और खुशहाल भारत-अफगान संबंध स्पष्ट कारणों से पाकिस्तान के हित में नहीं हैं. डुरंड लाईन और वजीरिस्तान को किसी भी अफगान सरकार ने औपचारिक तौर पर पाकिस्तान का क्षेत्र स्वीकार नहीं किया है. यहां तक कि सीमावर्ती क्षेत्र के वजीरों का पाकिस्तान की अपेक्षा अफगानिस्तान के साथ अधिक लगाव है. पाकिस्तान को यह डर सता रहा है कि एक स्थिर और मज़बूत अफगानिस्तान डूरंड लाईन को अभिनिषेध कर सकता है और इसे अंतर्राष्ट्रीय सीमा में बदलने की पाकिस्तान की मंशा नेस्तनाबूद हो सकती है. साथ ही पाकिस्तान अफगानिस्तान के साथ अपने विवादित सीमा मुद्दे को प्रकाश में लाना नहीं चाहेगा जिससे कि इसके कश्मीर पर झूठे दावे से दुनिया का ध्यान न हट जाये.

अफगानिस्तान की पीड़ा

अफगान राष्ट्रपति द्वारा अफगान तालिबान को शरण किये जाने को लेकर पाकिस्तान की घोर निंदा किये जाने और विकास कोष में 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्रदान करने के उसके संकल्प से इन्कार किये जाने को पृथकता अथवा भारत-अफगानिस्तान खुशमिजाजी के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिये. अफगानिस्तान में असुरक्षा इसके पाकिस्तान के साथ और उसके तालिबान तथा अन्य आतंकी समूहों के साथ संबंधों के संदर्भ में महत्वपूर्ण रूप से उत्पन्न हुई है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, 30 आतंकी गुट, जिनका पाकिस्तान की धरती से संपर्क है, अफगानिस्तान में अड्डे स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे. बताया जाता है कि जल्द ही तालिबान नेताओं के अफगानिस्तान में स्थानांतरित हो जाने की संभावना है.

वैश्विक शक्ति वैमनस्य की अफगानिस्तान की गुत्थी में प्रतिद्वंदिता है. जबकि पाकिस्तान भारत के इरादों के प्रति नाराजग़ी रखता है, चीन, ईरान और रूस को अफगानिस्तान की पुनर्वास प्रक्रिया में अमेरिकी प्रभुत्व को लेकर शिकायत है. इसके अलावा चीन और तुर्की दोनों पाकिस्तान के सरपरस्त बने हुए हैं. अत: प्रधानमंत्री मोदी ने देश में स्थिरता लाने के लिये ‘‘अफगान नेतृत्व, अफगान-स्वामित्व और अ$फगान नियंत्रण वाली शांति प्रक्रिया का आह्वान किया है.’’

इसके अलावा 2014 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद काबुल में राजनीतिक अस्थिरता ने इसकी विदेश और सुरक्षा नीतियों को, विशेषकर राष्ट्रपति गनी के शासनकाल के शुरूआती वर्षों के दौरान, प्रभावित किया है.

क्या पाकिस्तान सीखेगा?

हार्ट ऑफ एशिया-इस्तांबुल प्रक्रिया (एचओए-आईपी) अमृतसर बैठक पाकिस्तान के लिये यह महसूस करने के लिये एक कड़ा सबक है कि आतंकवाद राज्य की नीति नहीं हो सकता है और 9/11 हमले के उपरांत दुनिया में अपनी आतंकवादी विचारधारा के लिये वह कोई सहानुभूति प्राप्त नहीं कर सकता है. काबुल की तरफ भारतीय नीति के आइने से झांकने की उसकी दोषपूर्ण नीति और शून्यता के खेल को लेकर दुनिया में कोई भी उसकी बातों में आने वाला नहीं है.

सरताज अजीज, पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जो कि सम्मेलन में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, के पास भारत को शांति वार्ता के लिये प्रस्ताव रखने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं था. साथ ही हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन के अवसर पर भारत-पाक की संभावित बैठक की सभी अटकलें भी उस वक्त समाप्त हो गईं जब भारत ने इसे कोई महत्व नहीं दिया. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अलग-थलग बने रहने के अहसास के साथ पाकिस्तान को सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को मात्र यह संदेश देने के लिये शामिल होना पड़ा कि उसकी पर्याप्त भागीदारी है और प्रक्रिया से अलग-थलग नहीं है. अजीज ने कहा कि पाकिस्तान समान रूप से आतंकवाद से पीडि़त है और उसने 60,000 लोगों की जानें खोई हैं. परंतु उसने अफगानिस्तान पर यह कहते हुए आरोप मढ़ दिये कि तहरीक-ए-पाकिस्तान के लड़ाके, जो कि पाकिस्तान के भीतर हमलों को अंजाम देते हैं, अफगानिस्तान से संचालित हो रहे हैं.

भारत की पुनरावृत्ति

अफगानिस्तान को हार्ट ऑफ एशिया इनिशिएटिव का दिलमानते हुए भारत ने अफगानिस्तान के परिवर्तनकाल के प्रति भारत की मज़बूत प्रतिबद्धता को दोहराया. प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘‘भारत की तरफ से हमारे बहादुर अफगान भाइयों और बहनों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता संपूर्ण और अटूट है.’’ उन्होंने दोनों देशों के बीच पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए एअर-कार्गो संपर्क की स्थापना सहित सहयोग बढ़ाने के वास्ते अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के साथ अलग से बैठक की. दोनों देश अब क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी ढांचे के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं जिसे आगे विचार के लिये विशेषज्ञ समिति के पास भेज दिया गया है.

भारत-अफगान सामरिक भागीदारी प्रबुद्ध भाई-चारे पर आधारित द्विपक्षीय सहयोग के अनुपम नमूने को प्रदर्शित करते हुए क्षेत्र में स्थायी शांति की स्थापना में एक लंबा रास्ता तय करेगी.

 

(डॉ. मिश्र पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी (पीडीपीयू), गुजरात में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का अध्ययन कराते हैं, ई-मेल: sitakanta.Mishra@ sls.pdpu.ac.in व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं)