संपादकीय लेख


Editorial Volume-40

दिव्यांगों का सशक्तिकरण

गार्गी परसाई

संसद के अभी हाल में संपन्न शीतकालीन सत्र में सांसदों ने ऐतिहासिक नि:शक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक, 2016 को पारित कर दिया. विधेयक की मंजूरी का-जो कि संयुक्त राष्ट्र्र नि:शक्त व्यक्ति अधिकार समझौता (यूएनसीआरपीडी) की भावनाओं के अनुरूप है-की दिव्यांगजन अधिकार समूहों ने पूर्व के विधेयक में व्यापक सुधार के तौर पर अभिवादन किया है. यह पूर्ववर्ती नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों की संरक्षा और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 में कई संशोधनों के साथ उसका स्थान ग्रहण करेगा.

2016 के विधेयक की महत्वपूर्ण विशेषताओं में एक यह है कि अधिनियम सात नि:शक्तताओं के स्थान पर 21 विनिर्दिष्ट स्थितियों को मान्यता प्रदान करता है, परंतु नकारात्मक पहलू यह है कि इसमें सरकारी और निजी क्षेत्र सहित स्थापनाओं में नि:शक्त व्यक्तियों के लिये आरक्षण पांच प्रतिशत से घटाकर चार प्रतिशत कर दिया गया है. साथ ही विधेयक में कहा गया है कि निजी क्षेत्र के नियोक्ताओं को यह सुनिश्चित करने के वास्ते प्रोत्साहित किया जायेगा कि उनके कार्य बल का कम से कम पांच प्रतिशत नि:शक्त व्यक्तियों के लिये रखा जाना चाहिये.

प्रत्येक दिव्यांग बच्चे को 18 वर्ष की आयु तक मुफ्त शिक्षा का अधिकार होगा और सभी उच्चतर सरकारी संस्थान तथा सरकारी सहायता प्राप्त उच्चतर शिक्षा संस्थान पांच प्रतिशत सीटें नि:शक्त व्यक्तियों के लिये आरक्षित करेंगे, साथ ही वे ऊपरी आयु सीमा में पांच वर्ष की छूट प्रदान करेंगे.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह ऐतिहासिक विधेयक नि:शक्त व्यक्तियों के जीवन में रोशनी प्रदान करेगा जिनमें से अधिकतर वर्तमान सेवाओं और कार्यक्रमों से बाहर थे. दिव्यांगों के साथ भेदभाव नहीं होगा, उन्हें समान अवसर प्राप्त होंगे, स्वतंत्र रूप से जीवनयापन करेंगे और एक समावेशी समाज में जीवन के सभी पहलुओं में उनकी पूर्ण भागीदारी होगी.

विधेयक को राज्यसभा में 7 फरवरी, 2014 को पेश किया गया था और इसे विभाग से संबंधित स्थाई समिति को अपनी सिफारिशें देने के लिये संदर्भित किया गया. उस वक्त इस पर विचार नहीं किया गया क्योंकि इसके तुरंत बाद आम चुनाव होने वाले थे. इस वर्ष 14 दिसंबर को विधेयक को कुछ आधिकारिक संशोधनों के साथ पेश किया गया और राज्यसभा में पारित कर दिया गया. लोकसभा ने इसे 16 दिसंबर को स्वीकृति प्रदान की. अब इसे कानून का रूप धारण करने के लिये महामहिम राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतज़ार है.

कानून में दोनों सदनों में कई आधिकारिक संशोधनों को स्वीकार किया गया जिनसे देश में अनुमानित 2.68 करोड़ लोगों को उनके अधिकार और पात्रताएं हासिल होंगी. विधेयक को इस रूप और स्वरूप में देखने के लिये दिव्यांग अधिकार समूह लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे.

नि:शक्त व्यक्ति को एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर परिभाषित किया जाता है जो कि दीर्घावधि की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा मस्तिष्क संबंधी अपंगता से ग्रसित है जो कि उनके दूसरों के साथ समानता के साथ समाज में पूर्ण और प्रभावी भागीदारी में बाधक होती है. 1995 के अधिनियम में नि:शक्त व्यक्तियों को ऐसे व्यक्तियों के तौर पर परिभाषित किया गया है जिनमें न्यूनतम चालीस प्रतिशत की नि:शक्तता है और इसमें नि:शक्तता की सात श्रेणियों की पहचान की गई थी.

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 2.68 करोड़ नि:शक्त व्यक्ति (पीडब्ल्यूडी) हैं जो कि अनुमानत: कुल जनसंख्या का 2.21 प्रतिशत होता है। इनमें से 1.50 करोड़ पुरुष हैं और 1.18 करोड़ महिलाएं हैं. विश्व बैंक के अनुसार विश्व की 15 प्रतिशत जनसंख्या एक या अधिक नि:शक्तता से प्रभावित है.

विधेयक में जिन 21 दिव्यांग स्थितियों की पहचान की गई है उनमें शामिल हैं: दृष्टिहीनता, अल्प दृष्टि , श्रव्य विकलांगता (बहरापन और सुनने में कठिनाई), बोलने और भाषा संबंधी नि:शक्तता, बौद्धिक नि:शक्तता (विशिष्ट शिक्षण नि:शक्तताएं और ऑटिज्म स्पैक्ट्रम डिसआर्डर), मानसिक व्यवहार, गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति जैसे कि मल्टीपल सिरोसिस और पार्किन्सन बीमारी के कारण होने वाली नि:शक्तता, थैलीसीमिया, सिकल सैल बीमारी सहित रक्त विकार, धीमी दृष्टिबाधिता सहित बहु नि:शक्तताएं, गतिविषयक नि:शक्तता (ठीक हुआ कुष्ठ, प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात, बौनापन, मांसपेशी अपविकास और एसिड हमले के पीडि़त). केंद्रीय सरकार द्वारा नि:शक्तता की कोई अन्य श्रेणी को भी अधिसूचित किया जा सकता है.

यूएनसीआरपीडी ने नि:शक्त व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिये स्पष्ट सिद्धांत निर्धारित किये हैं जिनमें ‘‘अंतर्निहित गरिमा, व्यक्तिगत स्वायत्तता, भेदभाव रहित सम्मान और पुरुषों तथा महिलाओं के लिये समान अवसर, उपलब्धता और समानता के साथ समाज में पूर्ण समावेशी भागीदारी‘‘ सुनिश्चित करने की बात कही गई है. इसमें कहा गया है कि नि:शक्त व्यक्तियों में भिन्नता के प्रति सम्मान और स्वीकार्यता मानवीय विविधता और मानवीयता का हिस्सा होना चाहिये.

यद्यपि 2014 के विधेयक में नि:शक्त व्यक्तियों के प्रति ग़ैर भेदभाव के सिद्धांत पर चुप्पी थी लेकिन 2016 के विधेयक में कहा गया है कि नि:शक्तता के संबंध में भेदभाव से आशय विकलांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव, बहिष्कार, प्रतिबंध से है जो कि राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नागरिक या किसी अन्य क्षेत्र में सभी मानवाधिकारों और आधारभूत स्वतंत्रताओं की अन्य के साथ समान आधार पर प्रापण अथवा प्रयोग की नि:शक्तता अथवा पहचान समाप्त करने के उद्देश्य अथवा प्रभाव के लिये है और इसमें सभी प्रकार के भेदभाव तथा न्यायोचित सुविधा से वंचित किये जैसे मुद्दे सम्मिलित हैं.’’

हालांकि, यह एक शर्त के साथ आया है। अधिकार और पात्रताएं (अध्याय-ढ्ढढ्ढ) के अधीन अनुच्छेद 3(3) में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति के साथ नि:शक्तता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा, अन्यथा कि यह दर्शाया जाता है कि विवादित कृत्य या चूक ‘‘न्यायोचित उद्देश्य हासिल करने’’ का एक आनुपातिक साधन है. इस अनुच्छेद पर संसद में चिंताएं व्यक्त की गईं और सदस्यों ने आशंका व्यक्त की कि इस प्रावधान से कार्यान्वयन एजेंसियों को उन्मुक्त शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी. आशंकाओं पर विराम लगाते हुए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री श्री थावरचंद गहलोत ने आश्वासन दिया कि सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि ऐसा कुछ भी न हो.

पहली बार विधेयक में नि:शक्ता से ग्रसित महिलाओं और बच्चों को स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में मान्यता प्रदान की गई है और कहा गया है कि उपयुक्त सरकार और स्थानीय प्राधिकारी यह सुनिश्चित करने के उपाय करेंगे कि नि:शक्त महिलाओं और बच्चों को दूसरों के समान अधिकार प्राप्त हों.’’

नि:शक्तता से ग्रसित बच्चों को अब उन्हें प्रभावित करने वाले सभी मामलों पर अपने विचार उन्मुक्त रूप से अभिव्यक्त करने के समान अवसर प्राप्त होंगे और उनकी आयु और नि:शक्तता के मद्देनजर उन्हें उपयुक्त समर्थन प्राप्त होगा. लिंग विनिर्दिष्ट उपबंध कई महत्वपूर्ण अध्यायों जैसे कि स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के साथ जोड़े गये हैं हालांकि गर्भ गिराने और महिला के साथ दुष्कर्म के लिये न्यूनतम जुर्माने से संबंधित प्रावधान अन्य दंडात्मक कानूनों के असंगत हैं.

नि:शक्त व्यक्ति की संरक्षता के प्रावधान पर, एक बदलाव हुआ है. जबकि पूर्ववर्ती विधेयक में व्यवस्था थी कि यदि कोई जि़ला अदालत यह मानती है कि ‘‘मानसिक रूप से बीमार‘‘ व्यक्ति अपना स्वयं का ख्याल रखने में सक्षम नहीं अथवा कानूनन बाध्यकारी फैसले लेती है, यह किसी व्यक्ति की संरक्षता के बारे में आदेश दे सकती है. यह इस प्रावधान के विपरीत प्रतीत होता है कि ‘‘सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि दिव्यांग व्यक्ति संपत्ति और वित्तीय मामलों के अतिरिक्त, समान आधार पर ‘‘कानूनी हैसियत’’ और जीवन के सभी पहलुओं पर समान मान्यताएं प्राप्त करेगा. संरक्षकता एक भावुकता से भरा मुद्दा है जब तक कि इसमें व्यक्ति की संपत्ति और परिसंपत्ति के संबंध में सुरक्षा की व्यवस्था नहीं होती है. यद्यपि कानूनी सहायता का अधिकार एक सकारात्मक कदम है.

विधेयक में नि:शक्त व्यक्तियों के लिये सरकारी और निजी अस्पतालों और अन्य स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों और केंद्रों में बाधा-रहित सुगम्यता के लिये प्रावधान किया गया है जिसमें ‘‘बाधा‘‘ से आशय संरचनात्मक, सांस्कृतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, सांस्थानिक, राजनीतिक, सामाजिक, व्यवहार या संरचनात्मक कारणों से है जो कि समाज में नि:शक्त व्यक्तियों की पूर्ण और प्रभावी भागीदारी से संबंधित है. सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुगम्य भारत अभियान को ध्यान में रखते हुए विधेयक में सार्वजनिक और निजी भवनों में सुगम्यता के लिये एक समय सीमा को निर्धारित किया गया है.

निर्वाचन आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि मतदान केंद्र और चुनाव सामग्री नि:शक्त व्यक्तियों के अनुकूल हो जबकि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी सार्वजनिक दस्तावेज सुगम्य स्वरूप में हैं.

यूएनसीआरपीडी की भावना के अनुरूप और नि:शक्त व्यक्तियों के प्रति संवेदनशीलता के दायरे का विस्तार करते हुए विधेयक में कहा गया है कि ‘‘उपयुक्त सरकारें अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमा के भीतर, नि:शक्त व्यक्तियों के लिये स्वतंत्र रूप से अथवा समुदाय में रहने के लिये जीवन के लिये पर्याप्त मानदंड हेतु उनके अधिकारों की संरक्षा और प्रोत्साहन के लिये आवश्यक योजनाएं और कार्यक्रम तैयार करेंगी.‘‘ एक बार फिर आर्थिक क्षमता का विस्तार कुछ मायने रखता है जिसके पत्ते आने वाले दिनों में ही खुलेंगे.

विधेयक में नि:शक्त व्यक्तियों के लिये व्यावसायिक प्रशिक्षण और स्वरोजग़ार पर ज़ोर दिया गया है ताकि उन्हें औपचारिक और अनौपचारिक कौशल प्रशिक्षण की मुख्य धारा में शामिल किया जा सके, विनिर्दिष्ट प्रशिक्षण का लाभ उठाने के लिये पर्याप्त समर्थन और सर्वाधिक महत्वपूर्ण और पूर्ववर्ती विधेयक से हटकर-नि:शक्त व्यक्तियों द्वारा बनाये गये उत्पादों की मार्केटिंग पर भी ध्यान दिया गया है.

नि:शक्त व्यक्तियों के विरुद्ध क्रूरता और उन्हें अमानवीय व्यवहार से बचाने के लिये नि:शक्तता पर शोध के लिये समिति की पूर्व अनुमति प्राप्त की जायेगी। यह पूर्व की प्रस्तावित आचार समिति का स्थान लेगी. विधेयक के प्रावधानों के अनुरूप कार्रवाइयों के लिये सुधारात्मक कार्यों की पहचान और सुझाव देने के लिये राष्ट्रीय और राज्य आयोगों के स्थान पर मुख्य आयुक्त और राज्य आयुक्त नियुक्त किये जायेंगे जो कि उपलब्ध सुरक्षात्मक प्रावधानों की समीक्षा करेंगे और नि:शक्त व्यक्तियों के लाभ के लिये निधियों के इस्तेमाल की निगरानी करेंगे. नि:शक्त व्यक्तियों के लिये एक राष्ट्रीय कोष और राज्य स्तरीय कोष होगा. नि:शक्तता पर सलाह देने के लिये केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्ड गठित किये जायेंगे. राज्य प्रत्येक जिले में एक विशेष अदालत के तौर पर सत्र न्यायालयों को अधिसूचित करेंगी. पहले से भिन्न, इसके कार्याधिकार क्षेत्र में जम्मू एवं कश्मीर राज्य भी होगा.

नि:शक्त व्यक्तियों की यह एक सामान्य शिकायत रहती है कि प्रमाणन एक बहुत लंबी और परेशान करने वाली प्रक्रिया है और एक राज्य में दिया गया प्रमाणपत्र दूसरे में मान्य नहीं होता है। विधेयक में समयबद्ध (90 दिनों में) नि:शक्तता प्रमाण-पत्र जारी किये जाने अथवा इसे प्रदान न किये जाने के कारण बताये जाने के बारे में प्रावधान किया गया है. सरकार पहले ही अखिल भारतीय विशिष्ट नि:शक्तता पहचान पत्र (यूडीआईसी) प्रदान करने के लिये कदम उठा चुकी है.

किसी भी कानून को लागू करना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. परंतु 2014 के विधेयक में मौद्रिक जुर्माने के प्रावधानों को बरकरार रखते हुए नये विधेयक में कैद के प्रावधान को हटा दिया गया है, जो कि कुछ हद तक ग़ैर-कार्यान्वयन के लिये दंडात्मक उपायों को कम करना है. दूसरी तरफ नि:शक्त व्यक्तियों के लिये किसी भी तरह का लाभ धोखाधड़ी से प्राप्त करने के लिये दंड के तहत दो वर्ष की कैद साथ में एक लाख रुपये का जुर्माना अथवा दोनों किये जा सकते हैं.

जो भी हो विधेयक में जांचकर्ता का इतिहास है। पूर्ववर्ती नि:शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकारों की संरक्षा और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995 में एशिया और प्रशांत क्षेत्र में नि:शक्त व्यक्तियों के लिये पूर्ण भागीदारी और समानता पर घोषणा को लागू किया है. लेकिन नि:शक्त व्यक्तियों के सशक्तिकरण के लिये संबद्ध पक्षों द्वारा पालन किये जाने वाले सिद्धांतों का निर्धारण करते हुए नि:शक्त व्यक्तियों पर संयुक्त राष्ट्र के समझौते पर 1 अक्तूबर, 2007 को भारत के हस्ताक्षर किये जाने से इस समझौते के प्रावधानों का अनुपालन अंतर्राष्ट्रीय दायित्व बन गया है. यह समझौता 3 मई, 2008 से प्रभाव में आया. समझौते के अनुरूप इसके लिये एक नये विधेयक की अपेक्षा थी.

इसके अलावा समय के साथ ही नि:शक्त व्यक्तियों के अधिकारों को समझने की अवधारणा स्पष्ट हो गई और नि:शक्त व्यक्तियों से संबंधित मुद्दों की देखरेख के लिये दृष्टिकोण में विश्वव्यापी बदलाव आया. भारतीय अधिकार समूहों ने भी नि:शक्तता अधिकारों पर एक नया कानून बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाया.

2010 में सरकार ने भारतीय प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात संस्थान, कोलकाता की उपाध्यक्ष डॉ. सुधा कौल की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति की स्थापना की. पैनल ने 2011 में रिपोर्ट पेश की और एक विधेयक का मसौदा तैयार किया। मसौदा विधेयक पर विभिन्न स्तरों पर गहन विचार-विमर्श किया गया जिसमें राज्य सरकारों और संघ शासित प्रदेशों तथा विभिन्न हितधारकों को शामिल किया गया. बाद में फरवरी, 2014 में, तत्कालीन सरकार ने राज्यसभा में विधेयक को पेश किया जिसे अब पारित कर दिया गया है.

विधेयक में ऐसे कई प्रावधान हैं जिसके लिये विधेयक के विभिन्न प्रावधानों के कार्यान्वयन के लिये निधियां जारी किया जाना अपेक्षित है, निधियों की आवश्यकता के बारे में कोई अनुमान नहीं है और आशा की जाती है कि राज्य सरकारें निर्बाध सुगम्यता के सृजन सहित विधेयक के प्रावधानों को व्यवहार में लाने के लिये कार्य करेंगी. वित्तीय ज्ञापन में कहा गया है कि ‘‘चूंकि नि:शक्तता संविधान के अंतर्गत राज्य का विषय है, यह भी आशा की जाती है कि राज्यों द्वारा दिया जाने वाला अतिरिक्त समय नि:शक्त व्यक्तियों के लाभ के लिये कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में योगदान करेगा जिससे वे विधेयक के प्रावधानों के कार्यान्वयन में योगदान कर सकेंगी.’’

ज्ञापन में सूचीबद्ध की गई कुछेक गतिविधियों में मुफ्त शिक्षा, नि:शक्त बच्चों की पहचान, रियायती दरों पर ऋणों के प्रावधान, पानी, स्वच्छता, सहायता, मनोरंजन केंद्र, सहायक अवसंरचना, विभिन्न भत्तों, बाधा-मुक्त सुगम्यता, सभी नि:शक्त व्यक्तियों के लिये स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजग़ार में पुनर्वास, बस स्टॉपों, रेलवे स्टेशनों, हवाई अड्डा शौचालयों, टिकट काउंटरों आदि में सुगम्यता मानदंडों के अनुरूप सुविधाएं, विभिन्न प्रकार के कार्मिकों के लिये प्रशिक्षण आदि को शामिल किया गया है.

विधेयक नि:शक्त व्यक्तियों के लिये अधिकार-अनुकूल विधेयन की अत्यधिक अपेक्षित आवश्यकताएं पूरी करता है. यह इस बात से स्पष्ट है कि इसे संसद के दोनों सदनों में सर्व-सम्मत समर्थन मिला है। यह न केवल नि:शक्त व्यक्तियों को सशक्त करता है बल्कि उनकी शिकायतों को हल करने के लिये एक तंत्र भी उपलब्ध कराता है. यद्यपि, केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही स्तर पर इसका कार्यान्वयन एक बड़ी चुनौती है.

 

(गार्गी परसाई नई दिल्ली स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ई-मेल: gargiparsai@yahoo.com, व्यक्त किये गये विचार उनके अपने हैं)