संपादकीय लेख


Editorial 43

गणतंत्र दिवस : एक झलक

पुष्पेश पंत

ज्यों ही इंद्रधनुषी रंग प्रतिवर्ष 26 जनवरी को इंडिया गेट पर विजय चौक से अमर जवान ज्योति तक राजपथ पर आगे बढ़ता है, हजारों भारतीय गणतंत्र के जन्म का समारोह देखने के लिए उमड़ पड़ते हैं. यह परेड न केवल राष्ट्र की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करती है वरन् दैदीप्यमान विविधता को सगर्व प्रदर्शित करती है जो हमारी विरासत का प्रतीक है.

जैसे ही प्रभावकारी रूप में सुपरसोनिक जेट्स उड़ान भरने में आकाश को चीरते हुए गुजरते हैं तो एक सिंहरन-सी उठती है हमारा चितंन उस काल में चला जाता है जब भारत ने वर्षों संघर्ष करने के बाद आजादी हासिल की. हमें यह भी स्मरण हो जाता है कि हम कितने भाग्यशाली हैं कि हम आज गणतंत्र में रहते हैं.

हमारे संविधान की प्रस्तावना यह घोषित करती है कि भारत लोकतांत्रिक गणराज्य होगा. कुछ औचित्य के साथ यह बहस की जा सकती है कि यह सरकार की लोकतांत्रिक रूपरेखा है, जो अन्य मूल्यों की रक्षा करता है और हम लोकतंत्र, सामाजिक न्याय एवं धर्मनिरपेक्षता का आनंद उठाते हैं.

शब्द गणतंत्र उस परिवर्तनकारी उत्थान की स्मृतियों  से जुड़ा है, जिसने सदियों पुरानी वंशवादी तानाशाही का अंत किया और जनता का शासन जनता द्वारा शासन, जनता के लिए शासनकी शुरूआत की. अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांति को इस परिप्रेक्ष्य में याद किया जाता है और इसे बड़े पैमाने पर गणतंात्रिक पत्थर के रूप में मान्यता दी जाती है। जबकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इन क्रांतियों ने दुनिया भर के स्वतंत्रता सेनानियों को औपनिवेशन उत्पीडऩ को समाप्त करने के लिए उनके दीर्घकालिक संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, भारत में 6ठी सदी पूर्व में ही ज्ञात गणतंत्र था. बुद्ध का जन्म एक गणतांत्रिक राज्य में हुआ था, जो संघ का सदस्य था. कौटिल्य ने राजव्यवस्था पर अपने प्रतिष्ठित ग्रंथ में अपने समय में गणतंत्र की मजबूतियों और कमियों पर विस्तार से टिप्पणी की है.

भारत ने उपनिवेश नहीं रहने का चयन किया और आजाद होते ही यह घोषणा की कि वह गणतंत्र होगा। इसका अर्थ है कि यद्यपि इसने ब्रिटेन के साथ नजदीकी और सौहाद्र्र संबंध बनाये रखा और ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहा लेेकिन सम्राट या उसका प्रतिनिधि राज्य का अध्यक्ष नहीं रहा। इस भारतीय निर्णय ने यह आश्वस्त किया कि हम पूर्ण स्वराज’-पूर्ण आजादी से कम के लिए तैयार नहीं हैं, जो 1930 में रावी नदी के तट पर 26 जनवरी को ली गई प्रतिज्ञा को दुहराना था.

आज दुनिया भर की प्रमुख शक्तियां गणतंत्र हैं - यूएसए, रूस, फ्रांस, जर्मनी, चीनी गणराज्य, इंडोनेशिया और ब्राजील. कुछ में सरकार का रूप अध्यक्षात्मक है, जबकि अन्यों ने संसदीय (मंत्रीमंडल) प्रणाली को अपनाया. कुछ अन्य राष्ट्र भी हैं.

जिस समय राष्ट्र ने अपना पहला गणतंत्र दिवस मनाया, भारतीय संघ में 550 देशी रियासतों का विलयहो चुका था. लेकिन सामंतवाद की जंजीरों से इन क्षेत्रों में प्रजा को मुक्त करने की चुनौती बनी रही. ये रियासतें और रजवाड़े कुछ अपवाद को छोडक़र ब्रिटिश द्वारा सीधे शासित क्षेत्रों से विकास में काफी पीछे थे और इनको अतिरिक्त देखभाल की जरूरत थी. यद्यपि राजाओं ने, जिन्हें मौलिक शासक माना गया, सभी प्रायोगिक कार्य के लिए ब्रिटिश संप्रभुता को स्वीकार किया, उन्होंने अपनी प्रजा पर सार्वभौम शक्ति का प्रयोग किया. कानून के समक्ष समानताकी अवधारणा जन्म द्वारा शासन के शाश्वत अधिकारके असंगत था. ग्रेट ब्रिटेन में सम्राट या साम्राज्ञी संवैधानिक रूप से शासन करनेके लिए बंधे थे और चयनित संसद की सार्वभौमिकता को अस्वीकृत नहीं कर सकते थे जबकि भारत में महाराजा और नवाब के समक्ष अपने निरंकुश प्राधिकार के समक्ष चुनौती थी. वे इस बात को स्वीकार करने के अनिच्छुक थे कि पुरानी परंपरा समाप्त की जाए.

दशकों बाद ही पूर्ववर्ती शासकों के प्रिवी पर्स और अनुलाभों को समाप्त किया जा सका.

दूसरा काम जो आंशिक रूप से ही पूरा हुआ था, विभाजन द्वारा घोषित लाखों शरणार्थियोंका पुनर्वास था. सांप्रदायिक दंगों के घाव को भरने में वर्षों लग गए और उसकी चोट दुर्दशा का कारण बनी रही. अब उल्लासपूर्ण समारोहों ने आत्म विश्वास को स्थापित किया है और आशा की किरण दी है कि किसी तरह हम उस किनारे से बाहर आ गए हैं.

लगभग दो वर्ष बाद भारत में पहला आम चुनाव हुआ. यह सैकड़ों, लाखों अशिक्षित गरीब आमजन को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लामबंद करने और प्रकट करने का व्यापक कार्य था.  भारतीय लोग इस अनुभव से रोमांचित थे. उन्होंने अपनी शक्ति का अनुभव किया और इसका इस्तेमाल किया, जिससे वे वंचित रहे थे.

उत्तेजना और प्राचुर्य से युक्त गुलामी से मुक्त भारतीयों ने अंशित स्वप्नों को अनुभव करने के लिए व्यापकता से भाग लिया. नए भारत के हर तरह से नव निर्माण के लिए पंचवर्षीय योजना बनाई गई. यु़द्धस्तर पर बड़े बांधों और कारखानों का निर्माण किया गया. अनुसंधान प्रयोगशालाओं और कला एवं साहित्य की राष्ट्रीय अकादमियों की स्थापना की गई. सभी ने यह अनुभव किया कि कोई समय गंवाया नहीं गया. आजादी की पूरी लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने इस बात पर जोर दिया कि बिना आर्थिक आत्मनिर्भरता के राजनीतिक आजादी उस खाली शैल की तरह रहेगा, जिसमें कुछ भी तत्व न हो. इसके लिए नियोजन का कार्य शुरू हुआ.

पहले दशक में काफी काम पूरा हुआ. रोगों पर विजय सुनिश्चित करने के लिए आधारशिलाएं रखी गई. कई बाधाएं थीं. शीत युद्ध की शुरूआत ने हमारे पड़ोस में वातावरण को दूषित कर दिया. भारत के लिए दोनों वैचारिक खंड से तकनीकी या वित्तीय सहायता प्राप्त करना बहुत कठिन था. यह कठिन था लेकिन धैर्य और दृढ़ संकल्प से अच्छा परिणाम प्राप्त हुआ. होमी भाभा और विक्रम साराभाई जैसे भारतीय वैज्ञानिकों ने परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष अन्वेषण के शांतिपूर्ण प्रयोग के क्षेत्र में भारत के लिए अच्छा काम किया.

दुर्भाग्यवश, चीन के साथ सीमा विवाद अचानक उठ गया और भारत को 1962 में अपने पड़ोसी के साथ अल्पकालिक लेकिन अत्यधिक घातक युद्ध में उलझना पड़ा. भारत को विकास कार्यों पर व्यय को काटने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि सीमित साधनों को रक्षा तैयारियों को उन्नत करने के लिए लगाना पड़ा. युद्ध क्षेत्र में हार से राष्ट्र बुरी तरह हतोत्साहित हो गया. पड़ोसी पाकिस्तान परिवर्तित रणनीतिक परिवेश का लाभ लेने का प्रयास करते हुए अतिक्रमण में शामिल हो गया और 1965 में भारत पर आक्रमण कर दिया. पाकिस्तान के साथ युद्ध ने गणतंत्र को और चमका दिया और भारत की सेना ने न केवल आक्रांताओं को पीछे कर दिया वरन् लाहौर की बाहरी सीमाओं तक विजयपूर्वक मार्च किया. जब भारतीय प्रधानमंत्री ने युद्धविराम के बाद फील्ड मार्शल अयूब खान से ताशकंद में मुलाकात की, 1962 का सदमा पूरी तरह मुरझा गया था. आत्मविश्वास और बढ़ गया और भारत ने राष्ट्र निर्माण के अधूरे कार्य को नए जोश के साथ पूरा करने के लिए स्वयं को समर्पित करने का संकल्प लिया.

पहली बार ‘’जय जवान जय किसानका नारा प्रतिध्वनित होने का आधा दशक बीत गया. कुछ ही लोगों को व्यक्तिगत रूप से खाद्यान्न की घोर कमी और विदेशों से आयात पर देश की अपमानजनक निर्भरता का स्मरण होगा. खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता को सर्वोपरि प्राथमिकता दी गई. भारतीय वैज्ञानिकों ने इस अवसर का लाभ उठाया और उत्साहवर्धक सहयोग से इस दिशा में काम किया और इस प्रकार हरित क्रांतिउभरकर सामने आई.

भूख और रोग पर विजय यकीनन गणतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि थी. छोटी चेचक, पोलियो और प्लेग रोग, जिसने अनगणित लोगों को मारा और पंगु बना दिया, का उन्मूलन किया जा चुका है. मलेरिया पर बड़े पैमाने पर नियंत्रण किया जा चुका है. शिशु मृत्यु दर गिरी है और जीवन प्रत्याशा में उत्तेजक रूप से वृद्धि हुई है. यह सत्य है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी गरीबी रेखा से नीचे रहता है, लेकिन जीवन की गुणवत्ता में समग्र सुधार देखा गया है. बच्चे एवं वयस्कों को बेहतर पोषण मिलता है और वे अधिक शिक्षित हैं.  कुछ ही अन्य देशों के पास भारत के आकार और गुणवत्ता का कुशल मानव शक्ति का पूलहै.

भारतीय प्रवासी ने यूरोप और अमेरिका में अपने लिए विशेष स्थान बनाया है. वे स्वयं को भारतीय मूल का व्यक्ति के रूप में स्वयं का परिचय देने में गौरव का अनुभव करते हैं. उन्होंने अपनी मृदु कौशलको प्रकट करने में भारत को आपवादिक रूप से अनुकूल स्थान पर पहुंचा दिया है. उन्नत देशों में शीर्ष विभागों में काम कर रहे अनेक वैज्ञानिक और प्रबंधन आईआईटी एवं आईआईएम में प्रशिक्षित भारतीय हैं. कुछ सर्वाधिक जानी मानी बहुराष्ट्रीय निगमों के सीईओ भारतीय हैं और वास्तविक अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति के साथ भारतीय और भारतीय उद्यमी और कंपनी इस्पात और औषधीय उद्योग में प्रमुख कर्ता-धर्ता हैं.

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काम करने वालों के साथ कदम मिलाते हुए भारत की सृजनात्मक भावना भी खिल उठी है. भारतीय लेखक, कलाकार, संगीतकार और फिल्म निर्माता अब अजीब या नृजातीय प्रस्तुतिकर्ता के रूप में नहीं रह गए हैं.

यह दिन हमारी प्रगति का जायजा लेने और उभरती चुनौतियों के क्षितिज को मापने का अनोखा अवसर प्रदान करता है. हमने पिछले 67 वर्षों में पर्याप्त दूरी तय कर ली है, लेकिन संघर्ष के दिन समाप्त नहीं हुए हैं. भूमंडलीकरण के युगके आगमन ने राष्ट्र के समुदाय में अपना ठीक स्थान लेने के लिए भारत के लिए अप्रत्याशित अवसर खोल दिये हैं और भूमंडलीय क्षेत्र में उभरती शक्ति के रूप में इसकी क्षमता को व्यापक रूप से मान्यता दी जाती है. गणतंत्र ने एक अरब और पच्चीस करोड़ भारतीय, जिसमें से अधिकांश विचार एवं आशा से भरे-पड़े हैं, के लिए ऊर्जा को उजागर करने का मौका दिया है. भारत सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और जैव-प्रौद्योगिकी (बीटी) में अधुनातन स्थिति में है. यह फलों, सब्जियों और दूध के बड़े उत्पादकों में है. इसरो समसामयिक रूप से बहु उपग्रहों के सर्वाधिक समर्थन प्रक्षेपकों के रूप में जाना जाता है.

दुर्भाग्यवश, हमारे निकटवर्ती पड़ोस में रणनीतिक वातावरण चिंता का कारण रहा है.  पाकिस्तान का द्वार घातक आतंकवादियों को शरणस्थली प्रदान करता आ रहा है. यह शाश्वत अस्वीकृति में रहता है और हमें अस्थिर करने के लिए नियंत्रण रेखा के पार क्रमिक रूप से आतंकवादियों को भेजता रहता है. यह जम्मू एवं कश्मीर राज्य में पृथकतावादी तत्वों को सहायता देने और उकसाने से बाज नहीं आ रहा है. इसने बहिष्कार से स्वयं को बचाने के लिए अपनी भूराजनीतिक अवस्थिति का लाभ लेने के लिए पश्चिम एशिया में संघर्ष से लाभ लेने का प्रयास किया है. इसने बार-बार बढ़ाए गए दोस्ती के हाथ को ठुकरा दिया है. आने वाले वर्षों में इस संगदिल पड़ोसी की शत्रुता को बेअसर करना भारत के लिए प्रमुख चुनौती रहेगा. भारत अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ सौहाद्र्रपूर्ण संबंध बनाए रखने का इच्छुक है, लेकिन एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य और आधुनिक राज्य के रूप में मुखौटा धारण किए धार्मिक कट्टरपंथ से जुड़े छद्मवेश में सैन्य तानाशाही के बीच आधारभूत असाम्यता के प्रति अंधा रहना बुद्धिमानी नहीं होगी.

पर्यावरणीय क्षरण और जलवायु परिवर्तन वैश्विक चिंताएं हैं. इस मामले में जो भारत को वास्तविक रूप से संवेदनशील बनाता है वह यह है कि यह गरीब ही है जिनका जीवन पारिस्थितिकी के एक मिनट के असंतुलन से प्रभावित होता है. पानी, जो हम पीते हैं और हवा, जिसमें हम सांस लेते हैं, का प्रदूषण  जीवन एवं मृत्यु का मामला है. हमारी भोजन और ऊर्जा सुरक्षा ग्रह के जीवन पर पूर्णत: निर्भर है. कार्बन उत्सर्जन स्तर, हिमनदों का पिघलना और मौसम से संबंधित जोखिमपूर्ण घटनाओं जैसे कि सुनामी और चक्रवात की पुनरावृत्ति केवल विशेषज्ञों की चिंता का विषय नहीं है. ये लाखों के जीवन से पूर्णत: अंतग्र्रथित हैं. प्रकृति मानवकृत नहीं सीमाओं की पहचान करती है. हम धरती नामक इस मातृभूमि पर साथ ही पार उतरेंगे या डूबेंगे.

ज्वारीय तरंगों की तरह आशाएं सतत बढ़ रही हैं और जो पीढिय़ों से वंचित और सामाजिक भेदभाव में जीवन बिताएं हैं, अधैर्य हो रहे हैं.  भारत को आवेग के आवधिक प्रस्फुटन (अवांछित भी) सहित सामाजिक अशांति को दूर करना सीखना होगा और उत्कृष्टता के सतत अनुसरण पर जोर देना होगा. प्रधानमंत्री जी ने अपने भाषण में बार-बार समावेशी विकास की अनिवार्यता पर जोर दिए हैं. हम सामाजिक एवं लैंगिक न्याय में देरी को बर्दास्त नहीं कर सकते हैं. इसे चुनाव के समय पहचान राजनीतिकी बाध्यता के समक्ष झुकने हेतु वोट बैंक के तुष्टीकरण के साथ दिग्भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए. विकास के सतत उच्च दर के बिना पीडि़तों को सुधारा नहीं जा सकता है. जब तक की साम्प्रदायिक सौहाद्र्र को पोषित नहीं किया जाता है और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक असंतोष के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान नहीं किया जाता है, भारत की शांति और संपन्नता पर खतरा बना रहेगा.

गणतंत्र दिवस के अवसर पर हम भारत को ऐसा स्थान बनाने और संरक्षित करने की अपनी प्रतिज्ञा, जहां दिमाग हमेशा भयरहित हो और हर कोई अपना सिर उठा सके, को नवीकृत करें. जय हिंद!

लेखक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन पीठ, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर हैं. ईमेंल : : pushpeshpant@gmail.com व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.