संपादकीय लेख


अंक 13, 29 जून - 5 जुलाई 2019

 

 

वैश्विक ब्रांड के लिए टेक्सटाइल स्रोत केंद्र के रूप में भारत की क्षमता

डॉ. रंजीत मेहता

भारत को वस्त्र मूल्य शृंखला के सभी क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में कच्चे माल और विनिर्माण की सुविधाओं का अनूठा लाभ प्राप्त है लेकिन इसे अभी अंतर्राष्ट्रीय ब्राण्डों से सोर्सिंग के लिये सबसे पसंदीदा स्थान की दिशा में तेज़ी से काम करना होगा. वस्त्र और परिधान उद्योग आउटपुट, विदेशी मुद्रा अर्जन और रोजग़ार की दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है. यह 45 मिलियन से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजग़ार प्रदान करता है और कृषि के बाद रोजग़ार का दूसरा सबसे बड़ा प्रदाता भी है. विश्व व्यापार संगठन की विश्व व्यापार सांख्यिकी समीक्षा 2018 के अनुसार भारत दुनिया में रेडीमेड गारमेंट्स के क्षेत्र में 5वां सबसे बड़ा निर्यातक है. यह देखते हुए कि रेडीमेड गारमेंट्स विनिर्माण आकार के सभी स्तरों पर व्यवहार्य हो सकते हैं, विशेष रूप से संयंत्र और मशीनरी की कम लागत होने के कारण, इसकी इकाइयां छोटे से लेकर बड़ी सभी तरह की हो सकती हैं. परिणामस्वरूप रेडीमेड गारमेंट्स के क्षेत्र में असंगठित प्लेयर्स का दबदबा कायम है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में ब्रांडेड परिधानों ने बाज़ार में प्रवेश कर लिया है.

विकेंद्रीकृत विद्युत से चलने वाले करघा और बुनाई क्षेत्र वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा हिस्सा हैं. कपड़ा क्षेत्र में शामिल होने वाले प्रमुख उप क्षेत्रों में संगठित कपास, मानव निर्मित फाइबर कपड़ा मिल उद्योग, मानव निर्मित फाइबर/रेशा यार्न उद्योग, ऊन और ऊनी वस्त्र उद्योग, सेरीकल्चर और रेशम वस्त्र उद्योग, हथकरघा, पटसन, पटसन वस्त्र उद्योग और वस्त्र निर्यात शामिल हैं. आंकड़ों के अनुसार भारतीय वस्त्र उद्योग दुनिया में सबसे बड़े कच्चे माल के आधार और विनिर्माण शृंखला में सबसे बड़ी ताकत हैं. भारत दुनिया में कपास का सबसे बड़ा उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है. भारत कपास का प्रमुख उपभोक्ता भी है. घरेलू वस्त्र और परिधान उद्योग भारत की जीडीपी में 2 प्रतिशत और औद्योगिक उत्पादन में 14 प्रतिशत का योगदान देता है तथा देश कीे विदेशी मुद्रा आय में 27 प्रतिशत और देश के निर्यात में 13 प्रतिशत का योगदान करता है जिससे देश की निर्यात आय बढऩे की बड़ी संभावना है. यह क्षेत्र बहुत अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें महिला श्रमिकों का वर्चस्व है जिसमें 70 प्रतिशत कार्यबल महिलाएं हैं. मेरे लिये यह एक ऐसा क्षेत्र है जो ग्रामीण महिलाओं की गऱीबी दूर कर सकता है और भारत के बड़े हित में महिलाएं सशक्त हो सकती हैं. अगर हम बारीकी से देखें तो भारतीय वस्त्र और परिधान क्षेत्र, बुनाई, प्रसंस्करण और परिधान के उप क्षेत्र में विखंडित हैं और वैश्विक बाजारों में सफलता के लिये अपेक्षित पैमाने का अभाव है. अधिकांश विनिर्माण इकाइयों में कम क्षमताएं हैं और अल्प विनिर्माण क्षमताएं होती हैं जिससे वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धा करना उनके लिये कठिन हो जाता है.

विश्व उत्पादन के 50 प्रतिशत हिस्से पर, भारत दुनिया में कच्चे पटसन और पटसन के सामान का सबसे बड़ा उत्पादक है. मिल सेक्टर, जिसमें 3400 कपड़ा मिलें हैं, जिनकी क्षमता 50 मिलियन से अधिक स्पिंडल और 842,000 रोटार हैं, जो दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है. जहां तक कपास का प्रश्न है, भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और 6.3 अरब डॉलर का निर्यातक देश है जो चीन के कऱीब है. 2016-17 में 345 लाख गांठ के उत्पादन के साथ भारत दुनिया में कपास का सबसे बड़ा उत्पादक बनकर उभरा है और चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है. वर्तमान में कपास उद्योग 5.8 मिलियन किसानों और 40-50 मिलियन लोगों को आजीविका प्रदान कर रहा है जो प्रसंस्करण और व्यापार जैसी अन्य गतिविधियों में लगे हुए हैं.

रेशम, जो कि वस्त्र मूल्य शृंखला के सबसे महत्वपूर्ण भागों में से एक है, भारत दुनिया में रेशम का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है और यह दुनिया के कुल रेशम का लगभग 18 प्रतिशत उत्पादन करता है. शहतूत, एरी, तसर और मुगा देश में उत्पादित रेशम के मुख्य प्रकार हंै. यह एक श्रम प्रधान क्षेत्र है. भारत में कपड़ा हजार साल की अवधि में विकसित हुआ है. यह संस्कृति के साथ अपने जुड़ाव के लिये महत्वपूर्ण है, जो सैंकड़ों वर्षों से भारतीय समाजों को आकार दे रहा है. वस्त्रों का इतिहास उस अवधि तक है जब भारतीय उपमहाद्वीप ने काबुल, बाल्कन और यूरोपीय देशों के साथ व्यापार किया था.

वित्त वर्ष 19 की अवधि के दौरान निजी उपभोग व्यय में जोरदार वृद्धि से समर्थित, वस्त्रों की घरेलू मांग के अंत-उपयोगकर्ता क्षेत्रों से मज़बूत बने रहने की संभावना है. हमने पिछले चार वर्षों में देखा है कि सरकार द्वारा 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी उन्नयन कोष योजना को लागू करने के लिये गंभीर प्रयास और उपाय किये गये हैं ताकि कपड़ा उद्योग के विकास में तेज़ी आये. लेकिन उद्योग को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार  के लिये नवाचार और मूल्य संवर्धन पर ध्यान देने की पहल करने की आवश्यकता है. यदि हम वैश्विक क्षेत्र में अपने पदचिन्ह का विस्तार करना चाहते हैं तो हमें अभिनव और विशेष उत्पादों के साथ आना होगा. कपड़ा उद्योग की निरंतर वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा सकती है.

अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों जैसे कि माक्र्स एंड स्पेंसर, जेसी पेनी और गैप ने भारत से अपने कपड़ों का बड़ा हिस्सा हासिल किया है. एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कपड़ा उद्योग 61 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार और 20 प्रतिशत से अधिक वैश्विक बाज़ार को कवर करता है. वित्त वर्ष 2020 के दौरान निजी उपभोग व्यय में जोरदार वृद्धि से समर्थित, वस्त्रों की घरेलू मांग के अंत-उपयोगकर्ता क्षेत्रों के मज़बूत बने रहने की संभावना है.

इसके अलावा, कपड़ा निर्यात बढऩे की संभावना है, परिधान निर्यातकों को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के मूल्यह्लास से लाभ होता है. भारत के रेटिंग और अनुसंधान के अनुसार प्रमुख परिधान निर्यात करने वाले देशों की मुद्राओं की तुलना में अप्रैल-अगस्त 2018 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में उच्च स्तर पर गिरावट दर्ज की गई.  रेटिंग एजेंसी ने वित्त वर्ष 19 के लिये सूती और सिंथेटिक वस्त्रों के लिये एक स्थिर दृष्टिकोण बनाये रखा है. यह उम्मीद की जाती है कि क्षेत्र के समग्र क्रेडिट प्रोफाइल में धीरे-धीरे सुधार होगा. अब तक यह दिखता है कि कारोबारियों को कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि के साथ-साथ उपयोगकर्ताओं को एंड यूजर्स के लिये अच्छी मांग को देखते हुए रुपये की कीमत और संरचनात्मक मुद्दों के प्रभाव को कम करने के साथ क्षेत्र की लाभप्रदता में धीरे-धीरे सुधार होने की संभावना है. हालांकि रेटिंग बेहतर मांग और लाभप्रदता का सकारात्मक प्रभाव आंशिक रूप से अस्थिर कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं से भी हो सकता है.

उन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक, जहां सेक्टर को बेहतर बनाने की जरूरत है, आपूर्ति शृंखला और आंतरिक प्रणालियां, अनुसंधान और विकास पर ध्यान केंद्रित करना, लागू अनुकूलन (ऊध्र्वाधर एकीकरण आदि से लागत की बचत) और अधिक प्रतिस्पर्धा को प्राप्त करने तथा उच्च स्तर की कमान के लिये वैश्विक बाज़ारों में कारोबार की शीर्ष वस्तुओं के उत्पादन और निर्यात में स्केलिंग-अप करना शामिल है. हमने हाल के दिनों में देखा है कि भारत का निर्यात प्रदर्शन कई कारणों से उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा है. यह सामान्य व्यापार नहीं हो सकता है और उद्योग को इस अवसर से ऊपर उठना होगा तथा यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पादों में विविधीकरण से भारत के निर्यात में हिस्सेदारी बढ़े तथा नये बाज़ारों का पता चले.

उद्योग द्वारा उठाये जाने वाले तत्काल कदमों को पुरानी तकनीक को छोडऩा होगा और अपनी मशीनरी को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना होगा. पिछले कुछ दशकों में, कपड़ा उद्योग ने विश्व स्तर पर एक नया रूप देखा है. यद्यपि मूल मशीनों और उनकी प्रक्रियाओं का अभी भी उपयोग किया जा रहा है, वे मूल से अधिक तकनीकी रूप से उन्नत संस्करणों में विकसित हुए हैं. अब जो मशीनें कुशल मजदूरों द्वारा मैन्युअल रूप से काम में लाई जाती थीं उन्हें आवश्यक कपड़ा सामग्री बनाने के लिये कम्प्यूटरीकृत और प्रोग्राम किया जा सकता है. बाद में छपाई जैसे नवाचार हुए हैं, कपड़ा मशीनों से जीन्स और शर्ट जैसे कपड़ों पर लेजर प्रिंट किया गया. सामग्री पर डिजाइन अधिक तेजी से बनाए जाते हैं अधिक सटीक होते हैं. लेयर्ड प्रिंटिंग का कपड़ों में परिवर्तन किया जाता है, जिससे डिजाइन अधिक जटिल हो जाते हैं. यद्यपि अधिकतर अभी केवल उच्च फैशन समुदाय में पाये जाते हैं, 3-डी मुद्रित वस्त्रों का उपयोग अब कपड़े बनाने के लिये किया जा रहा है. नाइक जैसी कंपनियां अभिनव जूते बनाने के लिये इस तकनीक का उपयोग करने के तरीके ढूंढ रही हैं. उम्मीद यह है कि अंतत: 3-डी प्रिंटिंग का उपयोग वास्तविक, नरम कपड़े बनाने के लिये पतले और लचीले फाइबर पर किया जायेगा.

नैनो टेक्नोलॉजी सबसे नया इनोवेशन है और अब भी शुरुआती चरणों में है. कपड़ा उद्योग पानी विकर्षक, स्वयं सफाई और आग-विकर्षक वस्तुओं जैसे अधिक वैज्ञानिक कपड़े बनाने के लिये नैनो तकनीक का उपयोग करना चाहता है. नैनो टेक्नोलॉजी कपड़ा उद्योग को कम ऊर्जा थ्रेेसहोल्ड पर उत्पाद बनाने की दिशा प्रदान करेगा जो पर्यावरण को बनाए रखने में मदद करता है.

भारत को वैश्विक बाजार में निर्यात बनाए रखने के लिये गुणवत्ता का मुख्य आधार होना चाहिये, विशेषकर तब जब हम बंगलादेश और वियतनाम जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं. बढ़ती आय के स्तर के साथ, खुदरा उद्योग निरंतर वृद्धि से, कपड़ा क्षेत्र को भविष्य में मजबूत घरेलू खपत के साथ-साथ वैश्विक बाज़ारों में बढ़ती मांग के कारण उच्च भागीदारी का अनुभव होने की उम्मीद है.

दुनिया भर के व्यापारिक नेताओं ने अपनी जगह भारत में बना ली है. कई प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय परिधान और विनिर्माण प्लेयर्स भारत में पहले ही निवेश कर चुके हैं. इनमें टेक्सटाइल मशीनरी निर्माता रीटर और द्रुट्जस्लर और जारा तथा मैंगो (स्पेन), प्रोमोद (फ्रांस), बेनेटन (इटली), एस्प्रिट, लेविस एंड फारएवर 21 (यूएसए) जैसे मशहूर एकीकृत फैशन ब्रांड शामिल हैं. सस्ती कच्ची सामग्री और श्रम, कपड़ा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण संघर्ष मिलकर भारत को न केवल एक पसंदीदा बल्कि कपड़ा और परिधान व्यवसाय में विदेशी निवेश के लिये एक शानदार गंतव्य बना सकते हैं. लग्जरी फैशन क्षेत्र के दृष्टिकोण से, विशेष रूप से दिलचस्प बात यह है कि भारत की वस्त्र कथा का दूसरा हिस्सा हथकरघा के बारे में है. यह एक ऐसा उप क्षेत्र है जो वैश्विक लग्जरी उद्योग को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. उद्योग का ध्यान भारतीय बुनकरों की अंतर्निहित प्रतिभा का फिर से निर्माण करने पर है जो हर दिन परिधान के लिये छटपटा रहा है और इसके लिये सबसे अग्रणी बना हुआ है. 

प्रगतिशील अर्थव्यवस्था, बढ़ती डिस्पोजेबल आय और भारतीय उपभोक्ताओं की बढ़ती आकांक्षाओं से भारतीय वस्त्र और परिधान उद्योग में विकास की उम्मीद है. इसके अलावा यह कपास, पटसन ऊन, रेशम, मानव निर्मित और सिंथेटिक फाइबर जैसी विभिन्न सामग्रियों का उपयोग करता है. हमें यह याद रखना चाहिये कि ब्रिटिश काल में खादी के कपड़े गांधी जी के स्वावलंबन के प्रतीक कैसे बने. यह वस्त्र क्षेत्र का महत्वपूर्ण अंश है जो आज के समय में भी एक सार्थक पहल के लिये सही संदर्भ प्रदान करता है. यह एक सार्वभौमिक कथा का वर्णन करता है कि कैसे एक हस्तनिर्मित वस्त्र आज के अत्यधिक परिवर्तनशील और तेजी से बढ़ते वैश्विक फैशन उद्योग में दिल को छूने वाला संदर्भ पा सकते हैं. सभी हितधारकों को वैश्विक बाज़ार के लिये कच्चे माल से लेकर उत्पादों और हस्तशिल्प तक के लिये कपड़ा वस्तुओं के मुख्य स्रोत के रूप में भारत को प्रभावी ढंग से मज़बूत स्थिति में लाने के लिये निरंतर प्रयास जारी रखने चाहियें. यह न केवल अर्थव्यवस्था को विकसित करने में मदद करेगा बल्कि महिला उद्यमियों को सशक्त बनाकर समावेशी और सतत् आर्थिक विकास में सहायता करेगा.

(लेखक प्रधान निदेशक, पीएच.डी चेम्बर ऑफ  कॉमर्स एंड इंडस्ट्री, नई दिल्ली.)

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