संपादकीय लेख


ताज़ा अंक 14, 6 - 12 जुलाई 2019

 

जल, ऊर्जा और खाद्य: मुद्दे और नीतिगत आयाम

प्रेम चंद और सुलक्षणा राव

तत् विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास कार्यसूची में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि 2030 तक सभी के लिये पानी की उपलब्धता और सतत प्रबंधन सुनिश्चित करना विकास की महत्वाकांक्षाओं को प्राप्त करने के लिये परम आवश्यक है. परिभाषा के अनुसार, इसका तात्पर्य है कि कोई भी इसमें पीछे न रहे. आज भी अरबों लोग सुरक्षित पानी के बिना जी रहे हैं, उनके घर, स्कूल, कार्यस्थल, खेत और कारखानें, जो भी हैं, वे जीवित बचे रहने और पनपने के लिये संघर्ष कर रहे हैं. 

भारत में, पानी का कृषि के साथ-साथ बुनियादी ज़रूरतों के लिये उपयोग को ध्यान में रखते हुए इसकी कमी निस्संदेह एक दीर्घकालिक मुद्दा बन चुका है. वल्र्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) ने अनुमान लगाया है कि देश के 54 प्रतिशत क्षेत्र में पानी की अत्यधिक कमी है. देश में 78 प्रतिशत जल उपयोग के लिये कृषि क्षेत्र जि़म्मेदार है (सीडब्ल्यूसी, 2014). बढ़ती आबादी के साथ, खाद्यान्न की कुल मांग बढक़र 375 मीट्रिक टन तक पहुंच जायेगी. प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी के साथ, पानी की अत्यधिक मांग वाली फसलों की तरफ खपत पद्धति में बदलाव से भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है. वर्तमान में, सरकार से सब्सिडी के साथ नि:शुक्ल विद्युत आपूर्ति वाले 20 मिलियन से अधिक पानी के कूप हैं. इसने कई राज्यों में पानी की बर्बादी को प्रोत्साहन मिलने और पानी का स्तर घटने की दिशा में (0.4 मीटर प्रति वर्ष) योगदान किया है. मौजूदा फसल पद्धति जल  संसाधनों का सतत् उपयोग सुनिश्चित नहीं करती है. जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के मद्देनजऱ भारतीय कृषि में इनका सतत् इस्तेमाल बुनियादी प्राथमिकता है.

क्या, कहां और कैसे उत्पादन करना है

स्थिरता के क्षेत्र में जल-खाद्य-ऊर्जा का तालमेल बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. इन विषय क्षेत्रों के मध्य व्यापक संबंध जल और खाद्य सुरक्षा से समझौता किये बिना टिकाऊ कृषि उत्पादन सुनिश्चित करने के लिये एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण की मांग करता है. कृषि अपने आप में संसाधन खपत क्षेत्र है. स्पष्ट चुनौती निवेशित प्राकृतिक संसाधन की प्रति इकाई अधिक उपज का उत्पादन करना है. कृषि में पानी सबसे सीमित कारक है, स्थिरता का मूल नियम प्रति बूंद अधिक खाद्य उत्पादन करना है.

खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से धान और गेहूं अद्वितीय हैं. यद्यपि, गन्ने के साथ-साथ ये दो फसलें देश में सिंचाई के लिये उपलब्ध 80 प्रतिशत से अधिक पानी की खपत करती हैं. हाल के वर्षों के दौरान सघन चावल-गेहूं फसल प्रणाली से जल स्तर की बढ़ती गहराई ने चावल-गेहूं पद्धति की स्थिरता पर सवाल उठाने का काम किया है. पंजाब और हरियाणा की पारंपरिक बेल्टों में व्यापक चावल-गेहूं प्रणाली ने न केवल कृषि उत्पादन में कमी की है, बल्कि भूजल स्तर में लवणता के मुद्दों, पीने योग्य पानी की कमी, व्यापक सामाजिक आर्थिक तनाव की ओर अग्रसर किया है. (मैकडॉनल्ड एट अल 2016). पानी के अत्यधिक इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक चावल उत्पादक बेल्ट पर्यावरणीय रूप से अस्थिर हैं. अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि यदि धान-गेहूं चक्र जारी रहता है तो मध्य पंजाब में जल की गइराई 60 फीट से नीचे, 34 प्रतिशत क्षेत्र में 100 फीट से नीचे और 7 प्रतिशत क्षेत्र में 130 फीट से नीचे चली जायेगी. (हमफ्रेज एट अल, 2010, सिधू एट अल, 2010). हालांकि पंजाब सरकार द्वारा लागू की गई चावल की बुआई (मई से जून तक) नीति एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल थी, इसने खऱीफ धान और रबी गेहूं के बीच की खिडक़ी को छोटा कर दिया. इस नीतिगत पहल से बड़े पैमाने पर फसल अवशेषों को जलाया गया, जिससे पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे पड़ौसी शहरों को अत्यधिक पर्यावरणीय क्षति पहुंची.

पारंपरिक बेल्ट में धान और गेहूं के लिये अत्यधिक जरूरी पानी की मांग पर आधारित मामले इस फसल पद्धति को फिर से संरेखित करते हैं. धवन (2017) ने भी इस बात पर ज़ोर दिया है कि भारत को पानी सघन फसलों जैसे कि गन्ना और धान आदि के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में उत्पादन करने की अपनी मौजूदा प्रवृत्ति की समीक्षा करनी चाहिये. धान की खेती का पंजाब से पूर्वी भारत में बदलाव किये जाने से मीठे पानी के स्रोतों पर बोझ कुछ हद तक कम हो सकता है. पूर्वी भारत में पंजाब की तुलना में 2-3 गुणा अधिक वर्षा होती है. नाबार्ड के अनुसार धान और गेहूं की सिंचाई जल उत्पादकता तुलनात्मक दृष्टि से पूर्वी राज्यों में अधिक है. इस क्षेत्र में जल आधारित फसल के लिये अनपेक्षित गुणवत्ता वाले भूजल स्रोत और सिंचाई के संसाधन भी हैं. फसल अवशेष प्रबंधन भी एक मुद्दे से कम नहीं है क्योंकि पूर्वी भारत के जलवायु कारक भी मशरूम की खेती के लिये अनुकूल हैं, जो अपने विकास को सब्सट्रेट के रूप में पुआल का इस्तेमाल करता है.   

खेती के तौर तरीके भी टिकाऊ खेती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. प्रौद्योगिकी ने बीज किस्मों या बुआई या उन्नत खेती के तरीकों के रूप में किसान की सहायता के लिये दीर्घकालिक स्थिरता की वकालत की है. उदाहरण के लिये सीधे बीज की बुआई करना, वैकल्पिक सिंचाई करना और धान को गीला करना और सुखाना, शहतूत की फसल उगाना और सोयाबीन की खेती जैसी प्रथाओं से कार्बन और पानी के स्तर में गिरावट रोकने में काफी हद तक सहायता मिलती है.

सीआईएमएमवाईटी द्वारा किये गये अध्ययनों से पता चलता है कि रुक-रुक कर बाढ़ की अपेक्षा निरंतर बाढ़ जैसी स्थितियां 3500 किलोग्राम CO2 ha-1 से 900 किलोग्राम CO2 ha-1 वैश्विक गर्मी की क्षमता को कम करती हैं. (जैन एट अल., 2013 पाठक एट अल, 2014). इसके अलावा उच्चतर सिंचाई दक्षता (स्प्रिंकलर के मामले में 75 प्रतिशत और ड्रिप सिस्टम में 90 प्रतिशत तक सतह प्रणाली की तुलना में) स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई प्रणाली 1276 किलोग्राम CO2e/हे./वर्ष की शमन क्षमता रखती है. (सपोटोटा एट अल) इसी प्रकार धान-गेहूं प्रणाली में संरक्षण कृषि जैसे व्यवहार इसकी वैश्विक गर्मी क्षमता को 6300 kg CO2 Ha-1 (परंपरागत) से घटाकर  4900 kg CO2 Ha-1करने की क्षमता रखते हैं. मक्का में संरक्षण कृषि पारंपरिक खेती की तुलना में क्रमश: ऊर्जा और सिंचाई के पानी को 48 प्रतिशत और 71 प्रतिशत तक बचाती है. शून्य जोत अपनाने की क्षमता 1796 किलोग्राम CO2/ हेक्टेयर/वर्ष है. फसल अवशेषों को जलाने की बजाय वैज्ञानिक अवशेष प्रबंधन से जीएचजी में 522 कि.ग्रा. CO2e/ हेक्टे./वर्ष की कमी आती है.

एक और केंद्र बिंदु फसल के उपरांत होने वाली खाद्यान्न की बर्बादी पर होना चाहिये. खाद्य के एक-एक दाने की बर्बादी अतिरिक्त कार्बन के उत्सर्जन तथा खपत के लिये खाद्य की इसी इकाई का उत्पादन करने के लिये अतिरिक्त पानी का प्रयोग होता है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एक अनुमान के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख कृषि उत्पादों की कटाई और कटाई उपरांत होने वाली वार्षिक हानियों का मूल्य रु. 92,651 करोड़ था जिसकी गणना 2014 थोक बिक्री मूल्यों के साथ 2012-13 के उत्पादन आंकड़ों का प्रयोग करते हुए की गई है (भारत सरकार, 2016). हालांकि भारत जैसे विकासशील देशों में, खाद्य अवसंरचना खराब बुनियादी ढांचे, भंडारण और परिवहन सुविधाओं से जुड़े खाद्य मूल्य शृंखला के शुरूआती चरणों में होती है.

हरित खाद्य

फसल विविधीकरण के रूप में आहार विविधीकरण भी महत्वपूर्ण है. नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1.6 कि.ग्रा./दिन की प्रति व्यक्ति उपलब्धता के साथ 750 मिलियन टन के वार्षिक उत्पादन के साथ खाद्य के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता है. यद्यपि आहार की 45 प्रतिशत खपत अनाज से जुड़ी होती है, जिसमें चावल और गेहूं जैसी जल रोधी फसल होती है (श्रीवास्तव, 2017). पोषण के लिहाज चावल और गेहूं प्रमुख अनाज हैं परंतु बाजरा, ज्वार, मक्का और रागी जैसे मोटे अनाज ऊर्जा और पौष्टिकता से परिपूर्ण होते. चावल, गेहूं और गन्ने की तुलना में इन पोषक तत्वों वाले अनाजों में बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है. उपभोक्ताओं को मिलने वाली खाद्य सब्सिडी (पीडीएस, मिड-डे मील) इन प्रमुख अनाजों पर केंद्रित होती है.

सतत् नीतियां

देश का खाद्य उत्पादन अब पूरी आबादी को खिलाने के लिये पर्याप्त है और अधिशेष प्रबंधन वर्तमान में एक बढ़ती हुई समस्या है. इसलिये, प्राकृतिक संसाधनों और पारिस्थितिक तंत्र पर किसी भी गतिविधि के प्रभाव का विश्लेषण करते हुए नीति स्थाई कृषि पर केंद्रित है. संसाधन की उपलब्धता और फुट प्रिंट के आधार पर कृषि फसल पद्धति को कम करने की आवश्यकता है. फसल पद्धति और पानी की उपलब्धता में वर्तमान असंतुलन मूल्य निर्धारण पहलू (इनपुट और आउटपुट मूल्य निर्धारण दोनों) और सुनिश्चित खऱीद पर समर्थन के साथ जुड़ा हुआ है. अति-शोषित क्षेत्रों में इनपुट सब्सिडी (पानी और बिजली) की धीरे-धीरे निकासी और पूर्वी क्षेत्रों में खरीद प्रणाली को मज़बूत करने की सिफारिश की जाती है ताकि उत्तर पश्चिमी बेल्ट में बोझ को कम किया जा सके.

न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी के निर्धारण में पर्यावरणीय फुट प्रिंटस (पानी और कार्बन) का समावेश स्थिरता के मुद्दे को हल करने का एक तरीका हो सकता है. जल उपजाऊ फैसलों जैसे कि दालें, अलसी और सरसों को पानी से परिपूर्ण बेल्ट में रखने की वकालत की जानी चाहिये. फसल की बर्बादी को कम करने के लिये सभी अकाल आकार समूह श्रेणियों के लिये फसल के बाद के प्रबंधन, फसल-वार बुनियादी ढांचे, भंडारण और रसद सुविधाओं को मज़बूत करने पर विचार किया जाना चाहिये. उपभोग पक्ष के लिये पोषक तत्वों-अनाज को समान मूल्य के पोषक तत्वों के समावेश के संदर्भ में खाद्य विविधता और कम पानी फुट प्रिंट को बढ़ावा देने की आवश्यकता है. कृषि वस्तुओं के रूप में यथार्थ जल प्रवाह अथवा पानी का निर्यात न्यूनतम करने के लिये निर्यात नीति बनाये जाने की आवश्यकता है.

लेखक राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान संस्थान, आईसीएआर, नई दिल्ली से संबद्ध हैं, ई-मेल: prem3281@gmail.com व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.

(छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)