संपादकीय लेख


ताज़ा अंक-19, 10-16 August 2019

 

बदलता भारत- भविष्य की ओर बढ़ते कदम

डॉ. गौतम चौबे

जैसा कि हम भारत में राजनीतिक स्वाधीनता के 73वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, हमें लेटिन देवता जेनस के विपरीत दिशा वाले दो चेहरों की तरह तैयार रहना चाहिये; यहां तक कि जब हम नये भारत की संभावनाओं की प्रत्याशा में आगे की तरफ देखते हैं, हमें पीछे मुड़कर महान बलिदानों और अतीत की स्मारकीय उपलब्धियों को अवश्य देखना चाहिये. 2022 में भारत के लिये नीति आयोग का दृष्टिकोण पत्र इन दोनों अनिवार्यताओं को उसी प्रकार आगे की ओर ले जाता है. यह स्पष्ट रूप से अतीत से विरासत में मिली चुनौतियों को हमारे समक्ष रखता है, यहां तक कि यह संतुलित समृद्धि और व्यापक सामाजिक न्याय के लिये रोडमैप भी तैयार करता है. यद्यपि, सभी लोकतांत्रिक लक्ष्यों के महत्व का मूल्यांकन पांच अक्षों पर किया जाना चाहिये: क्षेत्र, लिंग, समुदाय, वर्ग और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र. जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिये क्षेत्रीय विकास योजनाएं और नक्सल प्रभावित ज़िलों के लिये प्रधानमंत्री के एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम (एडीपी) का उद्देश्य देश के हर क्षेत्र में आर्थिक विकास के लाभों का प्रसार करना है, सतत पर्यावरण के लिये हमारी प्रतिबद्धता स्वच्छ भारत मिशन, अटल भूजल योजना में सुनिश्चित है, देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र में 33.3 प्रतिशत तक वन आवरण बढ़ाने और उत्सर्जन में स्वैच्छिक कमी लाने की प्रतिबद्धता के लिये हमारा संकल्प है. इसी तरह, अल्पसंख्यकों के लिये छात्रवृत्ति योजनाओं जैसे प्रयासों, 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के प्रस्ताव, जन आरोग्य अभियान, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान और महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर में सुधार के लिये ठोस प्रयास के माध्यम से, भारत को अल्पसंख्यकों, वंचितों और कमज़ोर लोगों के प्रति अपने वायदे को निभाना है. साथ ही हम विकासात्मक गतिविधियों के साथ निजी और निगमित क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करने के प्रयास भी कर रहे हैं. यह छोटे हिस्से में भी, नागरिकों को उनकी ज़िम्मेदारियों के प्रति समय-समय पर और वैधानिक अनिवार्यताओं से कहीं ऊपर जाकर संवेदनशील बनाता है.  

लेकिन क्या हम सदैव एक ऐसे समाज में रहे हैं जहां प्रेरित व्यक्ति सरकार द्वारा प्रायोजित कल्याणकारी गतिविधियों के पूरक हैं? एक देश को इस तरह की महत्वाकांक्षा के लक्ष्य, यहां तक कि अवधारणा के स्तर को निर्धारित करने के लिये क्या करना होता है? 75 वर्ष में भारत पर नीति आयोग के दस्तावेज की भावना के अनुरूप, इस आलेख में तीन भिन्न, परंतु परस्पर जुड़े हुए सार्वजनिक संस्कृति, विज्ञान और लोकतांत्रिक संस्थानों में ऐतिहासिक परिवर्तन के सबूतों की खोज़ के जरिए इन सवालों को हल करने का प्रयास किया गया है.

सार्वजनिक संस्कृति के रूप में सामाजिक न्याय

1957 में, मशहूर बंगाली लेखक-राजनीतिज्ञ हुमांयु कबीर ने फि डेल्टा कप्पन के विशेष खंड में एक लेख लिखा. प्रभावशाली अमरीकी जर्नल के इस खंड में 'एशिया में शिक्षा की समस्याएं और वादेÓ पूरा करने की बात कही गई. भारत के शिक्षा क्षेत्र के साथ अपनी सघन संलिप्तता, नेहरूजी के अधीन शिक्षा मंत्री के तौर पर अपने अनुभव और स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर भारत के प्रथम दशक के दौरान मिली सीख से कबीर ने तकनीकी शिक्षा की सार्वभौमिकता लागू करने के महत्व पर ज़ोर दिया. भारत में, पारंपरिक शिक्षण पद्धतियां हमेशा से ही उन्मुखीकरण में सैद्धांतिक और प्रामाणिक रही हैं. इसके अलावा, जब तक कोई अतीत से दूर नहीं होता, तब तक जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण आध्यात्मिक था कि भौतिक सुख साधनों का संचय त्याग के बहुप्रतीक्षित भारतीय नैतिकता के प्रति अनुराग के रूप में देखा जाता था. इसी टोकन के द्वारा व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास, अथवा यहां तक कि पहली जगह में ऐसी निजी इच्छाओं को पूरा करने के लिये, समुदाय जीवन की भावना के लिये अनाथ माना जाता था. हालांकि, जैसा कि राष्ट्र संक्रमण से गुजर रहा था, भारत को अपनी सामाजिक-आर्थिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करना था. परिस्थितियों के तहत और इस तथ्य को देखते हुए कि हमारे संविधान के निर्माताओं ने भारत को एक नागरिक केंद्रित राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित किया था, प्रत्येक नागरिक को बुनियादी आरामदायक जीवन की गारंटी देने की खोज़ एक समृद्ध भविष्य के रोडमैप के लिये महत्वपूर्ण बन गई थी. तकनीकी शिक्षा, शैक्षणिक पाठ्यक्रम में कौशल वृद्धि प्रशिक्षण को शामिल करना और युवा श्रम शक्ति की उद्यमशील क्षमताओं पर ज़ोर देने के लिये नव-स्वतंत्र राष्ट्र की ग़रीबी, अशिक्षा, बीमारी और अंधविश्वास के खिलाफ़ लड़ाई महत्वपूर्ण थी.

हालांकि, 1950 के भारत में चुनौतीपूर्ण जीवन की स्थितियों के बावजूद, राज्य-गारंटीकृत बुनियादी वस्तुओं और सेवाओं की स्वैच्छिक जब्ती के लिये अपील, जो एक आरामदायक जीवन के लिये आवश्यक थी, अक्सर की जाती थी. इन आदर्शवादी दुविधाओं का जवाब देते हुए, कबीर ने तर्क दिया कि ''स्वतंत्र भारत ने ठीक ही निर्णय लिया है कि मूलभूत मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति होने के बाद ही स्वैच्छिक सीमाओं का प्रश्न उठ सकता है. यह आज भारतीय लोगों के प्रमुख भाग के लिये संतुष्टिकारक नहीं है.ÓÓ यद्यपि सात से अधिक दशकों के बाद, चीजें बदल गई हैं. भारत आर्थिक समृद्धि के एक चरण में पहुंच गया है, जहां स्वैच्छिक त्याग और दान के लिये इस तरह के सुख उत्साह से मिलते हैं.

वास्तव में, ऐसी अपीलें सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिये सरकार के प्रयास के लिये तार्किक रूप से महत्वपूर्ण हैं. इन प्रवृत्तियों ने भारत में लोकतंत्र की मज़बूती में योगदान किया है. यह सही है कि हम एक कल्याणकारी राज्य से हैं और लाखों लोगों को जीवन के लिये जरूरी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की मुख्य ज़िम्मेदारी सरकार के कंधों पर है. फिर भी, व्यक्तिगत दान के ये कार्य इस विश्वास की पुष्टि करते हैं कि भारत में आर्थिक और सामाजिक न्याय हासिल करना राज्य की वैधानिक जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन व्यवहार और भावना में, यह एक सामूहिक कार्य है. जबकि हमारे पास जीत के लिये चुनौती है, स्तर और सीमाओं के लिये बाधाएं हैं, आशावाद और प्रगति उन्मुख सार्वजनिक संस्कृति के वातावरण को प्रोत्साहित करना भी महत्वपूर्ण है.

सामाजिक न्याय के लिये विज्ञान

सौभाग्य से, इस देश में वैज्ञानिक, राष्ट्रवादी आंदोलन के शुरुआती वर्षों से, एक सार्वजनिक/प्रगति उन्मुख कार्य शैली के सदस्य थे. प्रशंसित पत्रिका करंट साइंस के अगस्त 1947 के अंक में भारत के भविष्य के बारे में एक रोचक भविष्यवाणी की गई थी. प्रमुख वैज्ञानिकों के समूह, जिनमें सी वी रमन, मेघनाद साहस और एस एस भटनागर की रूचियों का संयोजन था, द्वारा 1932 में शुरू की गई पत्रिका में कहा गया कि गांधी के प्रतिनिधित्व के रूप में पूरब की आत्मा और नेहरू द्वारा प्रतिपादित राष्ट्रीय नेतृत्व के वैज्ञानिक स्वभाव के संयोजन से भारत के लिये शांति और समृद्धि के एक नये युग की शुरुआत होगी. पत्रिका में घोषणा की गई, ''हम अपने राष्ट्रीय नेताओं को आश्वासन देते हैं कि वैज्ञानिकों का उत्साही सहयोग राष्ट्र की सेवा में है.....जो कि असंभव लगता था और केवल एक वर्ष पहले अब हासिल करना आसान है.ÓÓ गांधी की प्रेरक आवाज, जिसने सभ्य मानवता के एक नए हथियार का आविष्कार किया था, जो घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही तरह के संघर्षों को हल करने में सक्षम था, नेहरू द्वारा भारत को विज्ञान के सामाजिक फलागम के एक अध्ययन में बदलने के संकल्प के पूरक थे. यहां ध्यान देने के लिये दो चीजें महत्वपूर्ण हैं. सर्वप्रथम एक स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों से, शायद एक अवधि पहले से भी, हमारे वैज्ञानिकों ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति उनके कर्त्तव्यों का गहन संज्ञान लिया है. दूसरा, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रधानमंत्री मोदी तक, ज़्यादातर प्रधानमंत्री, जिन्होंने हमारे वैज्ञानिकों के कार्यों पर भरोसा करते हुए उनका उत्साह बढ़ाया है, वे ग़ैर-वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से आते हैं. यद्यपि नेहरू ने कैम्ब्रिज से प्राकृतिक विज्ञान में डिग्री प्राप्त की थी, उन्हें एक उत्कृष्ट अधिवक्ता और 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया अर्थात 'भारत की खोज़Ó के लेखक के तौर पर बहुत याद किया जाता हैज्ञान और समाज के बीच तथा हमारे सबसे उत्कृष्ट मस्तिष्क और लोकप्रिय नेताओं के मध्य समकालिक आदान प्रदान, जैसा कि क्रमिक सरकारों और हमारे वैज्ञानिक समुदाय के बीच संबंधों से स्पष्ट है, इस तथ्य से जुड़ा है कि भारत में अनुसंधान और नवाचार की परंपरा का हमेशा से सामाजिक पहलू के साथ जुड़ाव रहा है.

पिछले सात दशकों में भारतीय वैज्ञानिक समुदाय ताकतवर होता हुआ आगे बढ़ रहा है. हमने अनुसंधान में एक वैश्विक नेतृत्व के तौर पर अपने आपको सुस्थापित किया है. भारत आउटसोर्सड अनुसंधान और विकास परियोजनाओं के लिये एक प्रमुख उभरता हुआ गंतव्य बन गया है. 2022-23 तक वैश्विक नवाचार सूचकांक में सर्वोच्च 50 देशों में शामिल होने की हमारी महत्वाकांक्षा पूर्णत: हासिल होने वाली है. हमने हाल में अंतरिक्ष में उपग्रहों को मार गिराने की क्षमता रखने वाले देशों की सूची में जगह बनाई है, जिससे हमारी अंतरिक्ष सुरक्षा मज़बूत हुई है. चंद्रयान 1 (2008), चंद्रयान 2 (2019) और मंगल आर्बिटर (2014) के साथ हमने केवल प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता में नये कीर्तिमान हासिल किये हैं बल्कि विशिष्ट तौर पर लागत प्रभावी परियोजनाओं के मॉडल भी विकसित किये हैं. इसके अलावा, 2017 में एकल रॉकेट से रिकार्ड 104 उपग्रहों का एक साथ प्रक्षेपण करके इसरो ने अंतरिक्ष व्यापार में अपना स्थान ऊंचा किया है. इस बात ज़ोर दिया जाना चाहिये कि इस तरह के मिशन प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवाद या वैश्विक प्रतिष्ठा के लिये मैदान से बाहर किये गये नहीं हैं. ये पानी के मानचित्रीकरण, खनिजों की खोज़, मौसम के पूर्वानुमान और अन्य उद्देश्यों की मेज़बानी करते हैं जो औसत भारतीय किसान के सरल जीवन के साथ सबसे जटिल विज्ञान परियोजनाओं को जोड़ते हैं. हाल के दशकों में, नेशनल इनोवेशन फाउण्डेशन (2000) और अटल इनोवेशन मिशन (2016), कुछ नाम और भी हैं, रोज़गार सृजन और सतत् विकास लक्ष्यों के साथ नवाचार को जोड़ने में कामयाब हुए हैं. जबकि नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि नवाचार, विपणनयोग्य प्रौद्योगिकी अंतरण, स्मार्ट शहरी नियोजन और अनुसंधान में निगमित निवेश के क्षेत्रों में भारत की वर्तमान क्षमता में बहुत कुछ हासिल किया जाना है, यह आशा की जा सकती है कि प्रधानमंत्री का अनुसंधान (रिसर्च) पर ज़ोर निकट भविष्य में फलदायी परिणाम लेकर आयेगा.

हालांकि, हमारी बुनियादी लोकतांत्रिक संरचना वैज्ञानिक बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक संस्कृति दोनों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. इसलिये यह जानना महत्वपूर्ण है कि क्या हमने अपनी लोकतांत्रिक साख के मामले में भी अच्छा प्रदर्शन किया है.

हमारी लोकतांत्रिक साख को मज़बूत करना

हमारी संविधान सभा, जिसने 9 दिसंबर 1946 को अपना कामकाज आरंभ किया था, ने भारतीय समाज की भावना को विषमता, जबर्दस्त असहमति के बावजूद एकता के उद्देश्य के साथ मूर्त रूप दिया. संविधान सभा की बहसों से संबंधित बारह खण्ड हमारे संस्थापकों के डोजिअर हैं; खण्ड उनकी शिथिलता, न्याय के लिये चिंता, राजनीतिक विवेक, कानूनी निपुणता और लोकतांत्रिक कल्पना की बात करते हैं. हालांकि अधिकांश प्रतिनिधि कांग्रेस से थे और केवल 9 महिलाओं ने इन बहसों में भाग लिया, फिर भी वस्तुत: हर कल्पनीय वैचारिक दल ने सभा में आवाज़ बुलंद की, समाजवादी, सामंतवादी, रियासतों, हिंदू संगठनों, अल्पसंख्यक संघों, कथित निचली जातियों के संगठनों और कानून के प्रख्यात विद्वानों, उनमें से प्रत्येक ने मेज पर विरोधाभासी दृष्टिकोण लाकर स्वतंत्र भारत के लिये प्रस्तावित ख़ाके को समृद्ध किया. इस व्यापक सामाजिक आधार को अभी एक ऐसे व्यवहार से, जो समकालीन भारत में मौजूद हो, व्यापक सार्वजनिक फीडबैक संग्रह के साथ अधिक प्रतिभागी स्वरूप प्रदान करना थासंविधान सभा के सामाजिक आधार और इसके प्रतिनिधित्व चरित्र के व्यापक रूप के प्रति मुस्लिम लीग और विंस्टन चर्चिल जैसे ब्रिटिश नेताओं के मन में संदेह वाली प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई थी, जिन्होंने वास्तव में इस धारणा के साथ संविधान सभा के अखिल भारतीय स्वरूप के विचार को ख़ारिज कर दिया कि इस कार्रवाई से बहुसंख्यकों के विचार ही दबकर रह जायेंगे.

लेकिन सच्चाई यह है कि संविधान सभा केवल समावेशी थी, बल्कि यह पुरुषों और महिलाओं की अद्वितीय एकता तथा राजनीतिक कौशल के लिये प्रेरित थी. यदि नेहरू इसका उदार चेहरा थे, जिन्हें फ्रांसीसी अमेरिकी क्रांतियों के प्राचीन भारतीय स्रोतों और इतिहास, दोनों से, उद्धृत कर सकते हैं, तो पटेल वास्तविक कार्यपालक थे जिन्होंने कुछ सबसे महत्वपूर्ण खण्डों को शामिल किया और आम सहमति बनाई. उनका मौलिक अधिकारों के समावेश, अवसर की समानता, नागरिकता के मानदंड का उदार निर्धारण, उपाधियां प्रदान करने की प्रथा का उन्मूलन, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और नागरिक सेवकों के अधिकारों को शामिल करने में महत्वपूर्ण योगदान था. राजेंद्र प्रसाद के रूप में संविधान सभा को सबसे अधिक योग्य मध्यस्थ मिला तथा बी. आर अंबेडकर एक निर्णायक परंपराओं और सामाजिक रूढ़िवादिता के कठोर आलोचक के रूप में मिले. कानूनी सलाहकार के रूप में बी एन राव का अनुभव अमूल्य था तथा एस एन मुखर्जी के शब्दों के महत्व का कोई मुकाबला नहीं था. इस सहयोग के परिणामस्वरूप एक दस्तावेज इतना व्यापक हो गया कि वस्तुत: भारत के लोकतांत्रिक विरोधाभास के हर पहलू को इसमें पर्याप्त रूप से संबोधित किया गया. यद्यपि हमने भारत सरकार अधिनियम, 1935 से उदारतापूर्वक बहुत कुछ लिया है और स्वतंत्रता पूर्व और उपरांत भारत के मध्य कई अधिव्यापन हैं, परंतु महत्वपूर्ण भिन्नताएं भी हैं. जैसा कि पॉल ब्रास ने आज़ादी के बाद से भारत की राजनीति में उल्लेख किया है कि हमारे सार्वभौमिक मताधिकार और मौलिक अधिकारों को अपनाना, जो औपनिवेशिक शासन के दौरान अकल्पनीय थे, भारत के राष्ट्रवादी संघर्ष और उसके औपचारिक नेतृत्व के लोकतांत्रिक लोकाचार के लिये प्रमाणिक हैं. यहां तक कि जब हमारे संस्थापकों ने वास्तव में समावेशी लोकतंत्र की दिशा में श्रमसाध्य कदम उठाए, तो वे हमेशा स्वतंत्र और अपरिवर्तनीय प्रक्षेपवक्र को तराशने के लिये तैयार थे, इसलिये तब तक उन्होंने देश के लिये उज्ज्वल संभावनाओं का वादा नहीं किया. इस प्रकार, हमारे संविधान में 103 बार संशोधन किये गये हैं और पिछले चार वर्षों में, 1420 पुरातन कानूनों को निरस्त किया गया है.

यह लोकतंत्र के साथ भारतीय प्रयोग की कहानी रही है. और इस बात पर ज़ोर दिया जाना चाहिये कि यह कहानी आकांक्षाओं के बेंचमार्क की तरफ धीरे धीरे बढ़ती जा रही है. लोकसभा के संयोजन की दृष्टि से महिला सांसदों की संख्या 1951 में मात्र 22 के मुकाबले 17वीं लोकसभा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बढ़ोतरी के साथ 78 है. आम चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीदवारों की संख्या में भी जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है. 1951 में यह संख्या 45 थी जबकि 2019 में बढ़कर 716 हो गई. इसके अलावा, तथ्य यह है कि 17वीं लोकसभा में पहली बार चुनकर आये 300 सांसद इस संस्था की संरचना में निहित गतिशीलता और जीवन शक्ति को रेखांकित करते हैं. यह भी पता चलता है कि हम राजनीतिक समूहों और वंशवादी राजनीतिक के एकाधिकार से धीरे-धीरे दूर हट रहे हैं.

काफी हद तक, एक लोकतांत्रिक देश के रूप में हमारे स्थायित्व को लोकतंत्र की संस्थाओं के लिये ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है. भारत का चुनाव आयोग दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी लोकतांत्रिक कवायद की निगरानी करता है, हमारा सर्वोच्च न्यायालय सामाजिक न्याय और मौलिक अधिकारों के गारंटर के रूप में काम करता है और हमारी विधायिका यहां तक कि संवैधानिक संशोधनों की कीमत पर भी औसत मतदाता की मांगों के लिये संवैधानिक संकल्पों की तलाश करता है. यद्यपि लोगों ने भारतीय लोकतंत्र के लिये अपने मन की विविधता का हवाला देते हुए कई विरोधाभासी बातें लिखी हैं, कई विरोधाभासी दावे भी हैं जो इसे अपनी तरफ खींचने का प्रयास करते हैं, परंतु भारतीय समृद्ध और खुशहाल होते जा रहे हैं. यह नकारात्मक भविष्यवाणियों की खींचतान होती है क्योंकि वे हमारे लोकतंत्र की जीवंतता और इसके केंद्रीय संचालन: चुनावों के लिये हमारे प्रेम को कम करके आंकते हैं.

लेखक एआरएसडी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाते हैंGautam.choubey922@gmail.com

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.     

 

            (छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)