संपादकीय लेख


ताज़ा अंक-19, 10-16 August 2019

आजादी, गांधी और नया भारत

पंकज चौबे

आज हमारा देश आजादी की 73वीं वर्षगांठ मना रहा है. आजादी पाने की जो कीमत और कुर्बानी हमारे पुरखों ने चुकायी है वह हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है. आजादी के 73 वर्षों के बाद भी हम सम्मानपूर्वक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे थे. आज की सरकार ने मजदूर, किसान, महिलाओं, शोषितों और वंचितों को सम्मान दिलाने की प्रतिबद्धता दिखाई है. यह न्यू इंडिया है. भारत की आजादी का स्वप्न महात्मा गांधी ने देखा और इसके लिए आजीवन संघर्ष किया. उनका मानना था कि आजाद भारत में अंतिम जन को भी उतना ही अधिकार सम्मान प्राप्त हो, जितना कि समाज के सबसे समृद्ध व्यक्ति को.

महात्मा गाँधी ने आजादी का सही मायने में जो स्वप्न देखा था, वह स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी साकार होना बाकी है. ऐसे में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किये गये न्यू इंडिया का आह्वान की उपयोगिता स्वत: स्पष्ट है. न्यू इंडिया से मतलब पहले से उपस्थित भारत को हटा कर उसकी जगह किसी अन्य की प्रतिष्ठा का आशय नहीं है. वास्तव में प्रधानमंत्री ने जिस समय नयेपन का आह्वान किया है वह सदियों-सदियों से निरंतर उपस्थित है. भारत पर समय के साथ जमी धूल को हटाने का आह्वान है. साथ ही इसमें भारत के प्रत्येक नजरिये के लिए उसके उत्तरदायित्व के प्रति सजग होने का आह्वान भी है. जिसके प्रति वह समय बीतने के साथ उदासीन-सा हो गया है. इस दृष्टिकोण से देखे तो नया भारत एक नये आविष्कार से अधिक पूरातन और प्रासंगिक हिन्दुस्तान का पुनरुद्धार ही है. आजादी के सात दशक बाद भी हम अपने गांव को स्वच्छ और स्वस्थ नहीं बना पाए हैं. नये भारत की संकल्पना में गांव प्राथमिक स्तर पर शामिल हैं. यह हर संभव प्रयास किया जा रहा है कि गांव स्वस्थ और स्वच्छ बने. इस कार्य को करने के लिए सरकार ने एक जनआंदोलन छेड़ा है. लोगों की सहभागिता के साथ-साथ सरकार भी गांधी के सपनों को पूरा करने में लगी हुई है. सफाई जैसे कार्यक्रमों से गांव और शहरों का कायाकल्प होने लगा है. आज हर भारतीय को सफाई संस्कार विकसित करने की आवश्यकता है. गांधी कहते थे- ''ग्राम उद्धार में सफाई अगर आवे, तो हमारे गांव कचरे के घूरे जैसे ही रहेंगे. ग्राम-सफाई का सवाल प्रजा के जीवन का अविभाज्य अंग है. यह प्रश्न जितना आवश्यक है उतना ही कठिन भी है. दीर्घकाल से जिस अस्वच्छता की आदत हमें पड़ गई है, उसे दूर करने के लिए महान पराक्रम की आवश्यकता है. जो सेवक ग्राम सफाई का शास्त्र नहीं जानता, खुद भंगी का काम नहीं करता, वह ग्राम सेवक के लायक नहीं बन सकता.” गांव की चिंता के साथ-साथ गांधी शहरों की गंदगी से चिंतित थे. उन्होंने शहरों की सफाई के संदर्भ में कहा है- ''पश्चिम से हम एक चीज जरूर सीख सकते हैं और हमें सीखनी चाहिए- वह है शहरों की सफाई का शास्त्र. पश्चिम के लोगों ने सामुदायिक आरोग्य और सफाई का एक शास्त्र ही तैयार कर लिया है, जिससे हमें बहुत कुछ सीखना है. बेशक, सफाई की पश्चिम की पद्धति को हम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बदल सकते हैं.” हमें आज भी गांधी के इस कथन को आत्मसात करने की आवश्यकता है. हमें सामाजिक सफाई शास्त्र विकसित करने की जरूरत है. जिसमें सामूहिक रूप से लोग गांवों और शहरों की सफाई में अपने को लगायें. इससे समाज में गैर बराबरी, ऊंच-नीच जाति प्रथा का अंत होगा. सामूहिकता की भावना विकसित होगी. आज हम जिस न्यू इंडिया की बात कर रहे हैं. उसमें इन विषयों को प्रमुखता से शामिल किया गया हैं. जिसका असर समाज पर स्पष्ट दिखाई देता है. प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में झाडू है भले ही यह प्रतीकात्मक लगे लेकिन इसने हाशिये के समाज के प्रति हमारी उस भावना को समाप्त किया है जिसमें अछूत जैसे शब्दों को हमने अपना लिया था. श्रम और बुद्धि का जो विलगाव हो रहा था. अब धीरे-धीरे लोगों में यह भाव समाप्त हो रहा है. गांधी कहते हैं- ''भगवान के प्रेम के बाद महत्व की दृष्टि से दूसरा स्थान स्वच्छता के प्रेम का ही है. जिस तरह हमारा मन मलिन हो तो भगवान का प्रेम संपादित नहीं कर सकते उसी तरह हमारा शरीर मलिन हो तो हम उसका आशीर्वाद नहीं पा सकते.”

जिस नया भारत की हम बात कर रहे हैं वह आज के दौर में फिर से जगने जैसा है. स्वस्थ समाज निर्माण के लिए नागरिकों का स्वस्थ होना आवश्यक है. जब हम स्वस्थ होंगे तभी स्वस्थ देश बनेगा. नया भारत विजन के तहत सरकार ने संम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए अभियान चला रखा है. इसमें बच्चों के संम्पूर्ण टीकाकरण का अभियान बुजुर्गों के स्वास्थ्य की देखभाल शामिल है. कोई भी बच्चा कुपोषण से ना मरे इसके लिए व्यापक स्तर पर योजनाएं चल रही हैं. बीमार लोगों को सस्ती से सस्ती दवाएं उपलब्ध करायीं जा रही हैं. परंपरागत चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार अपने डॉक्टरों को गांव में चिकित्सा सेवा देने के लिए प्रोत्साहित कर रही है. गांवों के स्वास्थ्य सेवा के विषय में गांधी कहते हैं- ''मैं यह जानना चाहंूगा कि ये डॉक्टर और वैज्ञानिक लोग देश के लिए क्या कर रहे हैं? वे हमेशा खास-खास बीमारियों के इलाज के नये-नये तरीके सीखने के लिए विदेशों में जाने के लिए तैयार दिखाई देते हंै. मेरी सलाह है कि वे हिन्दुस्तान के साल लाख गांवों की तरफ ध्यान दें. ऐसा करने पर उन्हें जल्दी ही मालूम हो जाएगा कि डॉक्टरी की डिग्रियां लिए हुए सारे मर्द और औरतों की, पश्चिमी नहीं बल्कि पूर्वी ढंग पर, ग्राम सेवा के काम में जरूरत है.” हर तरह से आज सरकार नई चिकित्सा पद्धति के साथ-साथ परंपरागत चिकित्सा पद्धति को अपनाने पर जोर दे रही है. आहार के संतुलन का भी ख्याल रखा जा रहा हैं. लोगों को शरीर की आवश्यकता के अनुसार उनको आहार प्राप्त हो सके. आहार के संबंध में गांधी का मानना है कि- ''जो आदमी जीने की लिए खाता है, जो पांच महाभूतों यानी मिट्टी, पानी, आकाश, सूरज और हवा का दोस्त बन कर रहता है, जो उनको बनाने वाले ईश्वर का दास बनकर जीता है, वह कभी बीमार नहीं पड़ेगा.” गांधी स्वयं आहार को लेकर बेहद सजग थे. आगे वे कहते हैं- ''अगर चावल पुरानी पद्धति से गांवों में ही कूटा जाए, तो उसकी मजदूरी हाथ कूटाई करने वाली बहनों के हाथ में जाएगी और चावल खाने वाले लाखों लोगों को जिन्हें आज मिलों के पालिश किये हुए चावल से केवल स्टार्च मिलता है, हाथ कूटे चावल से कुछ पोषक तत्व भी मिलेंगे.” यहां गांधी आरोग्य के साथ-साथ हजारों हाथों को काम मिलने की बात करते हैं. आरोग्य के शास्त्र के साथ-साथ स्वावलम्बन की बात भी ध्यान रखने योग्य है. गांधी कहते हैं- ''रोगी प्रजा के लिए स्वराज्य प्राप्त करना मैं असंभव मानता हूं. इसलिए हमलोग आरोग्य-शास्त्र की जो अवगणना करते हैं वह दूर होनी चाहिए.” नये भारत में संम्पूर्ण स्वास्थ्य की बात प्रमुख है.

स्वास्थ्य- आजादी के बाद भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बहुत बेहतर नहीं रहा. हमें आजादी तो मिल गयी, परन्तु एक स्वास्थ्य समाज ही स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण कर सकता है. आज भारत सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं की तरफ ध्यान देना आवश्यक समझा है, और कई तरह की स्वास्थ्य योजनाओं को लागू करने का कार्य किया है. आज भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के बजट पर बीमारी रोकने के लिए 6.7 प्रतिशत बीमारी के इलाज पर 5 प्रतिशत राशि खर्च की जाती है. मोटे तौर पर एक आंकड़ा देखें तो भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत जनसंख्या है. वहीं बीमारी की बात करें तो टी.बी. जैसी घातक बीमारी से जूझने वाले मरीजों की 34 प्रतिशत जनसंख्या भारत में पाई जाती है. वहीं डायरिया के 26 प्रतिशत मरीज भारत में पाए जाते हैं.

सरकार के सामने दो बड़ी चुनौतियां रही हैं. एक तो बीमार होने से अपने देशवासियों को बचाने की और दूसरा बीमार होने के बाद मरीज के सर्वोत्तम इलाज की. सरकार ने इन दोनों पहलुओं पर ध्यान दिया है. पहला बीमारी की रोकथाम की जाए. दूसरा बीमार पड़े लोगों का प्राथमिक इलाज बेहतर ढंग से हो सके, ताकि बड़े अस्पतालों पर बोझ कम से कम पड़े. भारत सरकार ने 'आयुष्मान भारत ' अर्थात प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत भारतीय लोगों को बीमार होने से बचाया जा सके. इसके लिए सरकार ने 1.5 लाख हैल्थ एंड वैलनैस सेंटर (एचडब्ल्यूसी) खोलने की योजना बनाई है. इसके साथ ही सरकार ने देश में डॉक्टरों की कम संख्या को भी एक चेलैंज के रूप में लिया है. डब्ल्यूएचओ के मानक के अनुसार एक हजार प्रति व्यक्ति पर एक डॉक्टर होना चाहिए, जबकि हमारे देश में 1613 व्यक्ति पर एक डॉक्टर है. वहीं शहरी क्षेत्र में ग्रामीण क्षेत्र के मुकाबले 4 गुणा डॉक्टर हैं.

आज सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए कई स्तर पर योजना का निर्माण किया है. इसमें आज दुनिया भर में योग का प्रचलन बढ़ा है. योग मनुष्य को बीमार होने से बचाने का सबसे बेहतर साधन है. आज विश्व भर के तमाम देशों ने योग के महत्व को समझा है. आज विश्व भर में 21 जून को योग दिवस मनाया जा रहा है. यह हमारे लिए गौरव की बात है कि हम दुनिया को स्वस्थ रहने का पाठ पढ़ा रहे हैं. आजादी को बनाए रखने के लिए अपने नागरिकों को प्रत्येक दृष्टि से सम्मान दिलाना या देना सरकार की जिम्मेदारी है. आज अपनी जिम्मेदारी को बेहतर ढंग से निभा रही है. आजादी की वर्षगांठ के अवसर पर हमें सरकार को सहयोग देने की आवश्यकता है. आजादी सही मायने में हमारे जीवन जीने की कला है. यह हमारे संपूर्ण जीवन को प्रभावित करती है. सरकार हमारी आजादी की सबसे बड़ी संरक्षक है.

नये भारत में स्वावलंबन सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. शिक्षा की हमारी अबतक की प़द्धति एकांगी रही है. इस पद्धति से हमने युवाओं को सिर्फ  अक्षर ज्ञान दिया है. उनके हाथों को हुनरमंद नहीं बनाया है. शिक्षा की आवश्यकता सिर्फ  अक्षर ज्ञान आधारित डिग्री हासिल करना नहीं है बल्कि रोज़गार परक होना चाहिए. बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ उनके हाथों को हुनरमंद बनाना जरूरी है. गांधी इस तरह की शिक्षा पद्धति के बड़े समर्थक थे. गांधी का मानना था कि उन्होंने अपनी स्वेच्छा से खादी धारण करना स्वीकार कर लिया. दरअसल खादी का अपना एक अर्थशास्त्र है. स्वावलंबन और स्वदेशी की मजबूत भावना इसके साथ जुड़ी हुई है. बाद के दिनों में खादी और चरखा आजादी का प्रतीक बन गया. गंाधीजी कहते हैं- ''मैं जितनी बार चरखे पर सूत निकालता हूं. उतनी ही बार भारत के गरीबों का विचार करता हूं. गाँधीजी ने खादी और चरखे के साथ अंतिम जन को जोड़ा. गांधी इसके आर्थिक पहलू से भी वाकिफ  थे. गाँधीजी कहते हैं- 'मेरा पक्का विश्वास है कि हाथ-कताई और हाथ-बुनाई के पुनरुजीवन से भारत के आर्थिक और नैतिक पुनरूद्धार में सबसे बड़ी मदद मिलेगी. आजादी की लड़ाई में खादी के प्रति लोगों की भावना ऐसी जुड़ी कि वह आजादी का पोशाक बन गया.

आज दुनिया भर में युवाओं की सबसे ज्यादा आबादी भारत में है. कुल आबादी का 54 प्रतिशत, 25 वर्ष से कम आयु वर्ग के युवाओं का है. आयु के लिहाज से अगले 25 वर्ष तक सबसे युवा राष्ट्र का गौरव भारत के पास रहेगा. इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारी दोहरी हो जाती है. सबसे युवा राष्ट्र होने की वजह से हमारे पास एक अवसर है. यह अवसर है राष्ट्र निर्माण का. अर्थात हम भारत वर्ष को उस ऊंचाई तक ले जा सकते हैं, जहां हम दुनिया में सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बना सकें. इस पर पहल करते हुए माननीय प्रधानमंत्री जी ने कई तरह के नवन्मेषण कार्य का शुभारंभ किया. भारत को सशक्त राष्ट्र बनाने के लिए आवश्यक है कि इसकी ऊर्जावान आबादी को सही दिशा दी जाए. इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमारी युवा आबादी का कौशल विकास अपरिहार्य है. कौशल विकास का अभिप्राय है-युवाओं के हाथों को हुनरमंद बनाना. ताकि स्किल्ड युवा समाज निर्माण में अपना योगदान दे सकें. आज हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती विश्व में कौशलमंद युवाओं की है. विश्व के कई देश कौशल विकास के मामले में हमसे बहुत आगे हैं. उदाहरण के तौर पर साउथ कोरिया, चीन, यूएसए, जापान के युवाओं का औसत कौशल विकास 80 प्रतिशत से ऊपर है. जबकि भारत के युवाओं के कौशल विकास की दर 4 प्रतिशत है. इस तरह हमने अपने युवाओं की सबसे बड़ी आबादी को अगर हुनरमंद नहीं बनाया, तो विकास के दौर में हम पीछे रह जाएंगे.

आज आबादी बढ़ती जा रही है और बेरोजगारी का स्तर भी उसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है. जिस व्यवस्था को हमने अपनाया, इस व्यवस्था में सभी के लिए रोज़गार सृजन की क्षमता नहीं थी. दरअसल शिक्षित युवाओं को काम नहीं मिल पा रहा है. इसकी वजह तलाशने पर समझ आता है कि अक्षर ज्ञान में तो हमारे युवा शिक्षित हैं पर हाथों में कौशल का ज्ञान नहीं. गांधीजी कहते हैं- ''उद्योग, हुनर, तन्दुरुस्ती और शिक्षा इन चारों का सुंदर समन्वय करना चाहिए. नई तालीम में उद्योग और शिक्षा तन्दुरुस्ती और हुनर का सुन्दर समन्वय है. इन सबके मेल से मां के पेट मे आने के समय से लेकर बुढ़ापे तक का एक खूबसूरत फूल तैयार होता है. यही नई तालीम है. इसलिए मैं शुरू में ग्राम-रचना के टुकड़े नहीं करूंगा, बल्कि यह काशिश करूंगा कि इन चारों का आपस में मेल बैठे. इसलिए मैं किसी उद्योग और शिक्षा को अलग नहीं मानूंगा, बल्कि उद्योग को शिक्षा का जरिया मानंूगा और इसीलिए ऐसी योजना में नई तालीम को शामिल करूंगा.” ये था गांधी का सपना. जिसे आज हम पूरा करने को तत्पर्य हैं. दरअसल यही है न्यू इंडिया का मूल आधार. आज ऐसे कॉलेज और विद्यालय खोले जा रहे हैं जिसमें कौशल पर अधिक जोर दिया जा रहा है. 

हमारे माननीय प्रधानमंत्री महोदय ने कहा कि ''रोज़गार से जुड़ी योजनाओं में ट्रेनिंग के तरीके में 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुसार मानव संसाधन के विकास के लिए भारत सरकार ने नई योजनाएं हाथ में ली हैं. राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन के तहत देश में दक्ष एवं कुशल श्रमशक्ति की कमी को देखते हुए प्रधानमंत्री ने 15 जुलाई, 2015 को पहले विश्व युवा कौशल दिवस के अवसर पर इस मिशन का उद्घाटन किया. इस योजना के तहत वर्ष 2022 तक 40 करोड़ युवाओं को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य है. प्रधानमंत्री कहते हैं- ''अगर कोई हैंडीक्राफ्ट बनाने वाले को कोई नई टेक्नोलॉजी के साथ, ग्लोबल आवश्यकता के अनुसार, उस हैंडीक्राफ्ट को आधुनिक समय में मॉडिफाई करने के लिए उसको सिखाना है क्या? अगर वे ट्रेनिंग भी साथ-साथ करता है तो हम हमारे सामान्य गरीब व्यक्ति को जो हैंडीक्राफ्ट के क्षेत्र में काम करता है, उसका एक प्रकार से वोकेशनल टे्रनिंग कहो, स्किल ट्रेनिंग कहो, टेक्नोलॉजिकल ट्रेनिंग कहो, उसको मार्केट की समझ कैसी है. उसको समझाया तो वो थोड़ा बढ़ाकर देता है. आज यह शिक्षा पद्धति सिर्फ  युवाओं को स्वावलम्बी बना है बल्कि देश को मजबूत करने का काम करेगा. समरस समाज की स्थापना होगी.

हम आज ऐसी कोशिश कर रहे है जहां गांव में स्वरोज़गार की संभावना बढ़ेगी वहीं कौशल के आधार पर हम शहर के साथ-साथ गांवों में भी रोज़गार सृजन करेंगे. इससे पलायन की समस्या कम हो सकेगी. गांव का सुंदर स्वरूप बना रहेगा. शहर अतिरिक्त बोझ से बच जाएगा. सरकार ऐसी व्यवस्था कर रही है जिसमें लोगों का कौशल बढ़े और उन्हें घर के आसपास ही सम्मानजनक रोज़गार मिल सकेगा. हम पलायन की पीड़ा से बच सकेंगे. न्यू इंडिया गांधी के सपनों को सकारात्मक रूप देने का प्रयास है. सही मायने में न्यू इंडिया गांधी के स्वप्न को सच करता है.

गांधी के सपनों का भारत है. सकारात्मक तरीके से हमें न्यू इंडिया को साकार करने की आवश्यकता है. यही इसमें जनभागीदारी जितनी बढ़ेगी उतनी ही इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा. हमारे पूरखे महात्मा गांधी ने इस देश को लेकर जो स्वप्न देखा था आज व्यवहार रूप में लाने की आवश्यकता है. हमारी सरकार उस दिशा में निंरतर बढ़ रही है. आज जरूरत है विचार को व्यवहार रूप में उतारने की और आजादी को सही मायने में साकार करने की आवश्यकता है.

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

Pankaj.chaubey9@gmail.com

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.     

(छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)