संपादकीय लेख


volume 21, 24-30 August, 2019

तनाव प्रबंधन सीखें

निधि प्रसाद

जैसा कि आज  हम अपने चारों ओर देखते हैं, हम प्राय: छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों से ये ही शब्द सुनते हैं कि ''हम तनावग्रस्तहैं. पहले के समय में छात्र-समुदाय के आम शब्द होते थे-हम पढ़ाई में व्यस्त हैं और आज इन सरल शब्दों ने रुग्ण शब्द  ''तनावग्रस्तका रूप ले लिया है और यह शब्द एक महामारी सा बन गया है. आज छात्र, शिक्षक एवं अभिभावक सभी इसका शिकार हो गए हैं.

मुझे अपनी बात इस तथ्य के साथ प्रारंभ करनी चाहिए कि समस्या का समाधान करना ''पवित्र गीताजैसे हमारे पवित्र ग्रंथों के मूल में है, जो  अनिवार्य रूप से भगवान श्री कृष्ण एवं अर्जुन के बीच एक संवाद है, जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन के उन प्रश्नों का समाधान करते हैं जो अर्जुन द्वारा  अपने ही संबंधियों पर आक्रमण करने के लिए उसकी आंतरिक अशांति से उत्पन्न होते हैं. अंतत: अर्जुन युद्ध करता है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण उसके प्रश्नों का समाधान करते हैं, इस तथ्य का साक्षी है कि समस्या का सामना करना पड़ता है तभी समाधान मिलता है. आज यही भूमिका किसी भी अभिभावक को अपनी पुत्री अपने पुत्र के लिए निभानी होती है. क्या यह विरोधाभास नहीं है कि आज जहां एक  ओर विश्व हमसे यह सीखने आता है कि ''तनावमुक्त कैसे रहें”. वहीं दूसरी ओर हम तनावग्रस्त हो रहे हैं? हम इसका शिकार कैसे हुए? पहले के समय में संयुक्त परिवार हुआ करते थे, जिसमें परामर्श लेने के लिए कोई भी बच्चा परिवार के किसी भी सदस्य के पास जा सकता था, अब उसके अभिभावक और भाई-बहन सभी अपनी जीवनचर्या में व्यस्त हैं इसलिए परामर्श हेतु बच्चा किस के पास जाए? परामर्श के इस संपूर्ण अभाव के अतिरिक्त बच्चों पर अपने अभिभावकों की महत्वकांक्षाओं को पूरा करने का भी भार होता है, जो उसे सभी सुविधाएं प्रदान करके चमत्कार होने की प्रतीक्षा करते हैं. यह कौन सोचेगा कि इस तनाव में बच्चा स्वयं को असहाय अनुभव कर रहा है? सौभाग्यवश आज हमारे पास ऐसे सलाहकार, मनोवैज्ञानिक  हैं जो इस कमी को पूरा कर सकते हैं. फिर भी किसी भी बच्चे के लिए प्रेरणा का श्रेष्ठ स्रोत उसका अपना निजी परिवार ही होता है.

हमें इस पर विचार करना चाहिए कि इस समस्या ने इतना विकराल रूप ले लिया है कि बेहतर कार्य-निष्पादन करने के लिए तनावमुक्त  रहने की आवश्यकता पर बल देने हेतु हमारे देश के प्रधानमंत्री को अपने व्यस्त कार्यक्रम में से दो घंटे का समय युवा वर्ग से बात करने के लिए निकालना पड़ता है. इसमें अभिभावकों के साथ-साथ शिक्षकों के लिए भी एक सीख निहित है कि अपने बच्चों की सहायता करने की जिम्मेदारी हमारी है. अभिभावकों को इस बात का आभास होना चाहिए कि वे अपने बच्चों पर अपनी महत्वकांक्षाओं का बोझ न डालें और शिक्षक निरंतर अपने छात्रों का मनोबल बढ़ाकर उन्हें प्रोत्साहित करते रहें.

तनाव क्या है और इससे मुक्ति कैसे पाएं? इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि यह छात्र वर्ग के लिए ''अवसादअधिक गंभीर रूप से कैसे आगे बढ़ रहा है.

पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी बच्चे में 'तनावÓ के संकेतों का पता लगाने के लिए, यहां कुछ संकेत दिए गए हैं :

·      चिड़चिड़ा, आक्रामक, अधीर या अजीब व्यवहार

·      अधिक बोझ महसूस करना

·      चिंता, घबराहट या डर होना

·      आपके विचारों की तरह आप में एक भावना दौड़ रही है और आप उसे बंद नहीं कर सकते

·      स्वयं का आनंद लेने में असमर्थ होना

·      उदास महसूस करना

·      जीवन में रुचि खोना

·      हास-परिहास की भावना खोना

·      डर का अहसास होना

·      स्वास्थ्य के बारे में चिंता

·      उपेक्षित या अकेलापन महसूस करना.

तनाव किन कारणों से होता है?

तनाव की भावना आमतौर पर आपके जीवन में घटित होने वाली घटनाओं से उत्पन्न होती है जिसमें निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

·      अत्यधिक दबाव में होना

·      बड़े बदलाव का सामना करना

·      किसी चीज की चिंता करना

·      किसी स्थिति के परिणाम पर अधिक या कोई नियंत्रण नहीं होना

·      जि़म्मेदारियां जिन्हें आप भारी मानते हैं

·      आपके जीवन में पर्याप्त कार्य, गतिविधियाँ या परिवर्तन नहीं होना

·      अनिश्चितता का समय.

अभिभावकों में तनाव: दुर्भाग्य से, माता-पिता अनजाने में अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ अपने बच्चों को यह एहसास कराए बिना उन पर डाल देते हैं कि वे इसके अनुकूल हैं या नहीं? प्रत्येक बच्चे की अपनी ताकत और कमजोरियां होती है, ''पुरानी स्कूली सोचÓÓ (पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब) इस सच के साथ अतीत का एक विचार बन गयी है कि आज एथलीट बनने वाली हस्तियों की कमाई क्या है? शायद किसी बच्चे के लिए अभिभावकों की सबसे बुरी बात यह हो सकती है कि वे अपने बच्चे की तुलना अन्य (अधिक सफल) बच्चों के साथ करते हैं. इसलिए हमेशा अपने बच्चों को प्रोत्साहित करें, उन पर भरोसा करें और उन्हें अपना रास्ता खुद चुनने दें, ऐसा नहीं है कि वे परवाह नहीं करते हैं, आपकी उनके प्रति निरंतर उपेक्षा उन्हें कभी-कभी घातक परिणामों की ओर ले जा सकती है. सभी माता-पिता महसूस करते हैं कि वे अपने बच्चे के लिए सबसे अच्छे परामर्शदाता हैं, उदाहरण के लिए, आपके पड़ोसी की बेटी विज्ञान स्ट्रीम लेती है और डॉक्टर बन गई है, अब माता-पिता के रूप में आप इस निष्कर्ष पर जाते हैं कि सफलता विज्ञान विषय लेने और डॉक्टर/इंजीनियर बनने में निहित है, इसलिए आप अपनी बेटी पर अपने पड़ोसी की बेटी का अनुकरण करने के लिए दबाव डालना शुरू करते हैं, यह अवास्तविक और असत्य है, आपको उसके सामर्थ्य का पता लगाना होगा, हो सकता है कि वह कॉमर्स की ओर झुकी हो और वह एक सफल चार्टर्ड अकाउंटेंट बन सकती है, या एक वकील हो सकती है. विधाएं आज सारहीन हैं, अध्ययन के लिए क्या महत्वपूर्ण है; आज बच्चे अनसुने क्षेत्रों में कॅरिअर संवार रहे हैं. कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति एक सफल गायक बनने के लिए संगीत या यहां तक कि एक डीजे की ओर अग्रसर है ये सभी समान रूप से पुरस्कृत कॅरिअर रहे हैं, आज केवल आवश्यक कठोर परिश्रम के साथ-साथ उनकी रुचि के क्षेत्र में जुनून की है, जो माता-पिता प्रशिक्षित कॅरिअर काउंसलर या उनके शिक्षक की मदद से पता लगा सकते हैं. यह मेरा व्यक्तिगत अवलोकन है कि इस तरह का माहौल छात्र समुदाय को 'अवसाद की ओर ले जाने वाली बड़ी घटना है.

शिक्षकों में तनाव

हम सभी जानते हैं कि तनाव महसूस करना कैसा होता है, लेकिन तनाव का अर्थ क्या है, यह बिल्कुल आसान नहीं है. जब हम कहते हैं कि 'यह तनावपूर्ण हैÓ या 'मैं तनावग्रस्त हूंÓ तो हम निम्नलिखित के बारे में बात कर सकते हैं:

·      ऐसी स्थिति या घटनाएं जो हम पर दबाव डालती हैं - उदाहरण के लिए, ऐसे समय जहां हमारे पास करने और सोचने के लिए बहुत कुछ होता है, या क्या होता है, इस पर हमारा बहुत अधिक नियंत्रण नहीं होता है.

हमारी प्रतिक्रिया को दबाव में रखा जा रहा है- ऐसी भावना हममें तब आती है जब हमारे पास मांगे होती हैं. जिनका हम सामना करना मुश्किल समझते हैं.

·      एक शिक्षक भी उतना ही तनावग्रस्त होता है जितना कि उसका छात्र, छात्र द्वारा परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने का दायित्व शिक्षक का होता है, क्योंकि खराब स्कोर के लिए दोषी उसे ही ठहराया जाता है. इसलिए वह छात्रों के साथ-साथ उसके माता-पिता द्वारा अनुभव किये गए तनाव से जुड़ा हो सकता है. कभी-कभी समय के साथ-साथ व्यक्तिगत परिस्थिति भी होती हैं जो कठिन चुनौतियां पेश करती हैं. लेकिन छात्रों का समर्थन करना और उन्हें सर्वश्रेष्ठ बनाना एक अच्छे शिक्षक की पहचान है. शिक्षक छात्रों को कठिन परिस्थितियों में शांत रहना सिखा सकता है, दुर्भाग्य से किसी भी स्थिति में कोई त्वरित समाधान नहीं होता है किंतु सबसे अच्छा समाधान खोजने के लिए उन्हें सक्षम होना जरूरी है.

एक तथ्य हमें सबसे महत्वपूर्ण विषय पर लाता है और वह यह है कि तनाव को कैसे नियंत्रित किया जाए?

छात्र

·      कभी भी स्वयं पर पाबंदी न लगाएं क्योंकि आपके लिए अपनी पसंद की गतिविधियों में लगे रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.

·      टीवी देखने, न्यूज पेपर्स पढ़ने, समय पर सोने जैसी बात के लिए उचित समय निर्धारित करें.

·      शांत रहने के लिए योग जैसे हल्के व्यायाम करें.

·      कभी भी किसी भी स्थिति में घबराएं नहीं

·      परीक्षा देते समय अंतिम समय में घबराहट से बचने के लिए समय-प्रबंधन करें.

·      सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कभी भी अकेलेपन की भावना से बचने के लिए स्वयं को समाज से जुड़ने से न रोकें.

शिक्षक

·      कभी-कभी शिक्षक के लिए 'रोगीÓ जैसा दिखना बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि उसे यह महसूस करना होगा कि कभी-कभी उसे कठिन छात्र से निपटना पड़ता है, यदि आप अपना नियंत्रण खो देते हैं तो आप न केवल उस छात्र को बल्कि अन्य छात्रों को भी हतोत्साहित करते हैं. उन्हें जितनी बार चाहें उतनी बार प्रश्न पूछने दें.

·      जो छात्र कमजोर हैं, उनसे बार-बार ''क्या आप समझ गए?ÓÓ पूछकर उन पर विशेष ध्यान दें. आप उस छात्र को कक्षा में अधिक चौकस रहने के लिए मजबूर करते हैं, यह कुछ ऐसा है जिसे हम 'सकारात्मक दबावÓ कहते हैं जो, बहुत महत्वपूर्ण है.

·      छात्रों के लिए बहुत अधिक भविष्यवाणी न करें, कक्षा में हमेशा एक इंप्रूवमेंट परीक्षा के लिए तैयार रहें, ताकि छात्रों को अनुमान लगाना छोड़ दिया जाए और वे हमेशा ध्यान दें.

·      छात्रों को प्रेरक कहानियों सुनाएं जो उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करती हैं.

·      अंत में इस तथ्य से कभी न हारें कि आप एक अभिभावक भी हैं, छात्रों को अपने बच्चों के रूप में लें, उन्हें प्यार, स्नेह दें और उनका ध्यान रखें, वे आपको कभी असफल नहीं होने देंगे.

अभिभावक

·         बच्चों को फलने-फूलने दें, बेहतर होगा कि किसी बच्चे को दो घंटे अपना पसंदीदा खेल खेलने दें और बच्चे को तीन घंटे पढ़ाई के लिए बैठने के लिए मजबूर करने के बजाय सिर्फ एक घंटे का समय दें और पढ़ाई के दौरान उसका समय बर्बाद न करें. ऐसा करने से अधिकांश समय उसका मन विचलित होगा, उस पर कोई पाबंदी नहीं लगायी जानी चाहिए. उसे दोस्तों, रिश्तेदारों या उसके पसंदीदा लोगों के साथ घुलने-मिलने की अनुमति दी जानी चाहिए. बोर्ड परीक्षाओं को एक डरावनी स्थिति की तरह  प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह सिर्फ एक परीक्षा है और फर्क सिर्फ इतना है कि यह परीक्षा आपके स्कूल के बजाए दूसरे स्कूल में आयोजित की जाती है.

·         आपके बच्चों से अधिक आपको 'विश्राम तकनीकÓ सीखने की ज़रूरत है इसलिए कुछ योग करना शुरू करें, साथ ही साथ आध्यात्मिक गतिविधियों के लिए समय देना भी महत्वपूर्ण है.

·         दूसरों की सलाह न मानें, अपने आप पर और अपने बच्चों पर भी विश्वास रखें.

·         कभी भी अपनी व्यक्तिगत चिंताओं को अपने बच्चों को न दें.

·         अंत में एक स्मार्ट माता-पिता बनें, याद रखें, आज आप सूचना के युग में रह रहे हैं, बच्चों को आपसे अधिक जानकारी होती है, उन्हें सबसे अच्छा रास्ता चुनने दें.

हमें हमारा तनाव नहीं बल्कि उस पर नियंत्रण रखने की हमारी प्रतिक्रिया हमें परेशान करती है.

(लेखक एक वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक सलाहकार हैं. ई-मेल आईडी: nidhiprasadcs@ gmail.com

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.  

(छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)