संपादकीय लेख


ताज़ा अंक-22, 31अगस्त -06 सितम्बर 2019

धरती का बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन

 

डॉ. प्रियंका शर्मा

आज हमारे पास धरती से संबंधित हर एक मुद्दे का समाधान करने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी संसाधन और क्षमता विद्यमान है. मानव इतिहास में पहले हम इतना सक्षम कभी नहीं थे, जितने आज हैं. हम एक ऐसे युग में रह रहे हैं, जिसमें हमें उन सभी पहलुओं की रक्षा और संरक्षण की आवश्यकता है, जिनसे हम संचालित हैं. यह पहला अवसर है, जब हमें इस ग्रह के संरक्षण की चिंता करनी पड़ रही है. वास्तव में पहले यह ग्रह हमारी चिंता करता था.

औद्योगिक क्रांति, के प्रारंभ में ही वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड के यकायक संकेंद्रण की शुरुआत हुई. इसके लिए जिम्मेदार महत्वपूर्ण गैसों में से एक कार्बन डाइऑक्साइड है, जिसकी मात्रा सभी गैसों में 75 प्रतिशत से अधिक है, जो तापमान बढ़ने का कारण है. हरित ग्रह की अन्य गैसों की तुलना में यह 50 से 200 वर्षों तक वायु में संचित होती रहती है और हरित ग्रह दुष्प्रभाव का कारण बनती है. अर्थशास्त्रियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि आर्थिक विकास और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के बीच प्रत्यक्ष सह-संबंध है. यह बात विश्व के आर्थिक विकास की वर्तमान पद्धति को देखते हुए सहज ही समझी जा सकती है.

ग्लोबल वार्मिंग या धरती का तापमान बढ़ने का शाब्दिक अर्थ यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों और वातावरण में जमा होते जा रहे वायु प्रदूषकों की एक परत हमारे ग्रह के ऊपर मोटी होती जा रही है. गर्म-ग्रह गैसों की यह चादर सूर्य की ऊष्मा को संगृहीत करती है और धरती के तापमान को बढ़ाती है. सबसे खराब परिदृश्य इस रूप में सामने आया है कि ग्लोबल वार्मिंग विश्व के बड़े भू-भागों को रहने की दृष्टि से कठिन बना रही है, जिसकी वजह से व्यापक बाढ़ और पानी की कमी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं, जिनकी परिणति लोगों के एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन करने और युद्ध के रूप में सामने रही है.

औद्योगिक क्रांति और विश्व के अनेक देशों के आधुनिकीकरण के साथ ही ऊर्जा के इन संसाधनों की खपत में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और अब भी यह सिलसिला जारी है. अकेले पिछले तीन दशकों में विश्व में ऊर्जा की खपत तीन गुना हो चुकी है और उसमें से ज्यादातर हिस्सा धुआं देने वाले ईंधन (जीवाश्म ईंधन) का है. ये संसाधन इतनी तेजी से समाप्त हो रहे हैं कि कई पर्यवेक्षकों ने अनुमान व्यक्त किया है कि निकट भविष्य में कुछ खास ईंधन पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे. उदाहरण के लिए कुछ अनुमानों में यह दावा किया गया है कि 1997 और 2017 के बीच विश्व में प्राप्य तेल का लगभग आधा हिस्सा समाप्त हो चुका होगा.

विश्व के देश 1990 में हर रोज़ करीब 6.6 करोड़ बैरल (करीब 2.77 अरब गैलन) पेट्रोलियम की खपत कर रहे थे, जिसमें 1970 की तुलना में 40 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई. अमरीका में वर्तमान औद्योगिक ऊर्जा खपत में लगभग एक तिहाई पेट्रोलियम पदार्थों का है. हालांकि परिवहन को छोड़कर ऊर्जा के इस्तेमाल संबंधी सभी क्षेत्र 1970 से पेट्रोलियम और अन्य जीवाश्म ईंधनों की बजाए बिजली के इस्तेमाल की ओर बढ़े हैं. परंतु, अमरीकी ऊर्जा विभाग के अनुमानों के अनुसार पेट्रोलियम की खपत में बढ़ोतरी होगी और इसके लिए अधिक तेल विदेशी स्रोतों से आएगा.

1992 में दुनियाभर में 364 वाणिज्यिक परमाणु विद्युत रिएक्टर काम कर रहे थे, जिनसे कुल करीब 19 खरब किलोवाट घंटे बिजली पैदा हो रही थी. 1970 की तुलना में इन रिएक्टरों की संख्या में 6 गुना बढ़ोतरी हुई, लेकिन विद्युत उत्पादन में बढ़ोतरी 3 गुना से भी कम हुई. परमाणु ऊर्जा को एक समय दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का सर्वाधिक व्यवहार्य समाधान समझा जाता था. लेकिन निर्माण और प्रचालन लागत में तीव्र बढ़ोतरी और परमाणु ऊर्जा से स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति जोखिमों को देखते हुए इस क्षेत्र में व्युत्क्रम दिखाई देने लगा, जो कभी संभावनाशील क्षेत्र समझा जाता था.

आधुनिक युग के प्रारंभ और विश्व के राष्ट्रों के औद्योगिकीकरण के साथ ही वातावरण प्रदूषकों को स्वयं स्वच्छ बनाने की धरती की प्राकृतिक क्षमता पर इतना दबाव बढ़ा है कि वह समाप्ति के बिंदु पर पहुंच गई है. अमरीका और अन्य विकसित देशों ने अपनी आबादी को ऊष्मा और शीतलता प्रदान करने की जरूरतें पूरी करने और अपनी सामाजिक खुशहाली को बनाए रखने वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए बिजली  प्रदान करने के वास्ते लाखों टन जहरीले प्रदूषक हर वर्ष हवा में डाले हैं. इसी प्रकार विकासशील देशों ने भी हर वर्ष लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के प्रयास में औद्योगिकीकरण और आधुनिकीकरण के लिए तेजी से उसी जीवाश्म ईंधन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन (सीएफसी) की बढ़ती मात्रा वायुमंडल में उत्सर्जित की है. यह विडम्बना है कि मानव के सामाजिक जीवन के वैश्विक उन्नयन के इस प्रयास का एक नतीजा भौतिक वातावरण के वैश्विक ह्रास के रूप में सामने आया है और अंतत: उसका दुष्प्रभाव मानव के सामाजिक जीवन पर पड़ा है. हमें अस्तित्व प्रदान करने वाला वातावरण आज अस्वच्छतर, अस्वास्थ्यकर, गर्मतर और क्षीण होता जा रहा है, जो इतिहास में किसी बिंदु पर कभी इतना दुर्बल नहीं रहा.

आधुनिक औद्योगिक समाज ऊर्जा की भारी आपूर्ति के बिना संभव नहीं हो सकता था. विश्वभर में ऊर्जा के गैर-नवीकरणीय संसाधनों की खपत स्तब्धकारी ढंग से बढ़ी है. 20वीं सदी के प्रारंभ में कोयला दुनिया में बिजली का प्रमुख स्रोत था और तेल का इस्तेमाल प्रारंभ मात्र हुआ था. इसके तीन पीढ़ियों के बाद अमरीका आज अपनी ऊर्जा का तीन चौथाई हिस्सा पेट्रोलियम से पूरा कर रहा है. पश्चिमी यूरोप और जापान इस स्रोत से अपनी बिजली की दो तिहाई जरूरतें पूरी कर रहे हैं और इसी तरह साम्यवादी राष्ट्र अपनी करीब 40 प्रतिशत जरूरतें इस संसाधन से पूरी कर रहे हैं.

गैर-नवीकरणीय ऊर्जा भंडारों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी से ऊर्जा की खपत में भारी वृद्धि की है. 1950 से 1973 के बीच विश्व की ऊर्जा खपत में हर वर्ष करीब 7 प्रतिशत वृद्धि हुई. 1960 से 1970 के बीच के दस वर्षों में अमरीका में बिजली की खपत में करीब दो तिहाई बढ़ोतरी हुई. इस विद्युत का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा सीधे औद्योगिक उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया गया. शेष खपत ऊष्मा देने, प्रकाश और परिवहन तथा रेफ्रिजरेटरों और एयर कंडिशनरों से लेकर इलेक्ट्रिक टूथब्रशों तक अनेक घरेलू सुख सुविधाओं के लिए की गई.

पूंजीवादी राष्ट्रों में आर्थिक और राजनीतिक प्रणालियां धनवान और शक्तिशाली लोगों को निर्धन और कमजोर लोगों का शोषण करने में मदद करती हैं. जब यह प्रणालियां वातावरण में प्रयुक्त की जाती हैं, तो मुट्ठीभर लोगों के लाभ के लिए बहुसंख्य लोगों की प्राकृतिक संपत्ति नष्ट हो जाती है. कम विकसित देश जैसे जैसे औद्योगीकीकरण का प्रयास कर रहे हैं, तो वह यह पाते हैं कि धनवान देशों की मदद करने वाले सस्ते ऊर्जा संसाधन और कच्चे माल संसाधन समाप्त हो गए हैं.

औद्योगिक क्रांति के प्रारंभ से ही मानवीय गतिविधियों के कारण वातावरण में अधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड घुलती गई है. इसका अधिकतर हिस्सा सागरों द्वारा अवशोषित किया गया, जिनकी व्यापक 'सिंकÓ क्षमता का मतलब था कि पूर्व-औद्योगिक 280 भागों से प्रति मिलियन 300 (इनसेट ग्राफ) बढ़ाने के लिए 170 वर्षों की आवश्यकता थी. लेकिन 1050 (मुख्य ग्राफ) के बाद से ईंधन-जलने में भारी वृद्धि ने महासागरीय सिंक को भी समाप्त कर दिया है. वायुमंडलीय सांद्रता अब कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के लगभग समान रूप से बढ़ रही है.

भावी अनुमान

धरती का तापमान बढ़ रहा है. 18वीं सदी के उत्तरार्ध से तापमान में वृद्धि कम दिखती है, लेकिन लोगों पर इसका दुष्प्रभाव गहरा होने की आशंका है. तापमान बढ़ते रहने का प्रभाव और भी अधिक होगा, जिसके 2100 तक 6.4 सेंटीग्रेड की वृद्धि होने का अनुमान है. ग्रीन-हाउस गैसों और एरोसोल की वायुमंडलीय सांद्रता में अनुमानित बदलावों के परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर धरती के तापमान में 1990-2100 के बीच औसतन 1.1 से 6.4 सेंटीग्रेड बढ़ोतरी होने का अनुमान है. महासागरों की तुलना में भूमि क्षेत्रों के तापमान में अधिक वृद्धि होगी. इसी तरह, ऊष्म कटिबंधीय क्षेत्रों की तुलना में उच्च अक्षांशों पर तापमान अधिक बढ़ेगा. विश्व स्तर पर औसत वर्षा में बढ़ोतरी का अनुमान है, लेकिन  क्षेत्र विशेष में वृद्धि और कमी की प्रवृत्ति भिन्न होगी. विश्व के प्रमुख क्षेत्रों में वर्षा में बढ़ोतरी अधिक गहन होगी और समुद्र के स्तर में 1990-2100 के बीच वैश्विक औसत  0.5-2 मीटर का अनुमान है, हालांकि ग्रीनलैंड की बर्फ की चादरों के पिघलने के योगदान को इसमें शामिल नहीं किया गया है. मौसम की विषम परिस्थितियों की घटनाओं में वृद्धि होने का अनुमान है अर्थात् गर्मी, बाढ़ और सूखे की अवधियों में बढ़ोतरी की आशंका है.

धरती के तापमान में बढ़ोतरी के कारण पारिस्थितिकी में अन्य बदलाव होंगे, जिनमें समुद्र के स्तर में निरंतर वृद्धि और वर्षा की मात्रा और पैटर्न में बदलाव शामिल है. इन बदलावों से बाढ़, अकाल, भीषण गर्मी, अंधड़, चक्रवात जैसी विषम जलवायु घटनाएं बढ़ सकती हैं. अन्य दुष्परिणामों में कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी अथवा कमी, हिमनदों (ग्लेशियरों) का पिघलना, ग्रीष्म धाराओं के प्रवाह में कमी, प्रजातियों का विलुप्त होना और बीमारी फैलाने वाले कीटों की श्रेणियों में बढ़ोतरी शामिल है.

धरती का तापमान बढ़ने के कारण हाल ही में विभिन्न प्रकार की नई बीमारियां सामने आई हैं. धरती के औसत तापमान में बढ़ोतरी से ये बीमारियां बार बार फैल रही हैं. तापमान बढ़ने से बैक्टीरिया बेहतर ढंग से अपना अस्तित्व बनाए रख सकते हैं और अनुकूल स्थितियों के कारण उनकी संख्या और भी तेजी से बढ़ती है. वैश्विक तापमान से नमी के स्तरों में बढ़ोतरी के कारण मच्छरों के फैलने की आशंकाएं बढ़ती हैं और ऊष्म वातावरण में उनकी संख्या में इजाफा होता है. गर्म जलवायु में इबोला, हांटा और माचूको जैसे विषाणुओं के कारण अनेक रोग पैदा हो रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन से पलायन और अनुकूलन

जलवायु स्थितियों के प्रति दो प्रकार के दृष्टिकोण अपनाए जा सकते हैं. ये हैं - उपशमन और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन. जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर-सरकारी समिति ने उपशमन को ऐसी गतिविधियों के रूप में परिभाषित किया है, जो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाती है अथवा वातावरण से ग्रीनहाउस गैसों को अवशोषित करने वालेे कार्बन सिंकों की क्षमता को बढ़ाती है.

अनेक विकसित और विकासशील देश स्वच्छतर, कम प्रदूषण करने वाली प्रौद्योगिकियां अपना रहे हैं. इन प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल से उपशमन में मदद मिलती है और कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी आती है. तत्संबंधी नीतियों में उत्सर्जन में कमी लाने के लक्ष्य निर्धारित करना, अक्षय ऊर्जा के इस्तेमाल में बढ़ोतरी और ऊर्जा के किफायती इस्तेमाल को प्रोत्साहन शामिल है. अध्ययनों से पता चलता है कि भविष्य में उत्सर्जनों में कमी लाने की व्यापक संभावनाएं हैं. सर्वाधिक आशाजनक और अनुकूल परिदृश्य के बावजूद जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल भाविष्य में वर्षों तक जारी रहने का अनुमान है. उपशमन के अंतर्गत कार्बन संग्रह और उसका भंडारण भी शामिल हो सकता है, जो एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें फैक्टरियों और गैस या कोयला बिजली स्टेशनों द्वारा उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड को ट्रैप किया जाता है और फिर स्टोर किया जाता है, जो आमतौर पर भूमिगत होता है.

अनुकूलन के अंतर्गत जीवन और जीवनशैलियों में परिवर्तन शामिल है ताकि जलवायु परिवर्तन के हमले का असर कम किया जा सके. अस्तित्व बनाए रखने के लिए लोग जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने के लिए अनुकूलन परिवर्तन और सुधार की रणनीति अपना रहे हैं. इसके अलावा भारत में तटवर्ती आबादी का पुनर्वास, सार्वजनिक परिवहन में बढ़ोतरी और वानिकी जैसे उपाय अनुकूलन के अंतर्गत बेहतर विकल्प हो सकते हैं.

कुल भौगोलिक क्षेत्र का एक तिहाई भाग वन क्षेत्र के रूप में निर्धारित करना वनों के ह्रास का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 से 25 प्रतिशत योगदान है. यह चेतावनी दी गई है कि राष्ट्र की जैव विविधता का एक तिहाई भाग 2030 तक समाप्त हो जाएगा या समाप्ति के कगार पर पहुंच जाएगा. राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक वनों के संरक्षण की तत्काल कार्ययोजना बनाए जाने की आवश्यकता है, ताकि धरती का तापमान बढ़ने की गति पर अंकुश लगाया जा सके और वन प्रजातियों को नष्ट होने से रोका जा सके. इसके अतिरिक्त कार्बन अवशोषण के हिस्से के रूप में विभिन्न कार्यक्रमों जैसे वनरोपण, कृषि-वन, सामाजिक वानिकी और खेत स्तरीय वृक्षारोपण को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए. वन संरक्षण, पुन: वनरोपण, धरती को हरा-भरा बनाने के उपाय और स्थायी वन प्रबंधन पद्धतियां अपनाने, जैसे उपायों के जरिए जैव विविधता संरक्षण, जलसंभर संरक्षण, ग्रामीण रोजगार सृजन, वनवासियों की आमदनी में वृद्धि और कार्बन अवशोषण क्षमता में बढ़ोतरी के लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं.

कार्बन फुटप्रिंट में कमी लाने के लिए गहरी जड़ों वाली फसलें उगाकर भूमि की कार्बन अवशोषण क्षमता में वृद्धि करना: गहरी जड़ों वाले फसली मिट्टी को अधिक बायोमास देने में सहायता करती हैं और ये जड़ें अपघटित होने पर भूमि में कार्बन की महत्वपूर्ण मात्रा समायोजित करती हैं तथा पारिस्थितिकी अनुकूल प्रणाली में भूमि की उत्पादकता में वृद्धि करती हैं.

पानी का युक्तिसंगत इस्तेमाल: गर्मी के दौरान मॉनसून से पहले की बारिश होने की स्थिति में सूखे का दुष्प्रभाव कम करने के लिए वर्षा जल संरक्षण, जल संग्रह, पानी का किफायती इस्तेमाल और भूमि की नमी को स्व-स्थाने संरक्षित रखने जैसे उपायों को लोकप्रिय बनाया जाना चाहिए.

आवश्यकता के अनुसार जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल कम करें और धरती का तापमान बढ़ने के लिए जिम्मेदार कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों में कमी लाने में अपना योगदान करें. मेट्रो रेल जैसी सक्षम, तीव्र और भरोसेमंद सार्वजनिक परिवहन प्रणालियां शहरी भीड़-भाड़, स्थानीय प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाने में योगदान कर सकती हैं.

सौर/पवन ऊर्जा स्रोतों का अधिक इस्तेमाल: बिजली उत्पादन ट्रांसमिशन, वितरण और अंतिम इस्तेमाल में लागत की दृष्टि से किफायती ऊर्जा-सक्षम प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करने से स्थानीय प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाई जा सकती है.

जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति किसानों को जागरूक बनाना: वन प्रबंधन, ग्रामीण ऊर्जा, सिंचाई जल प्रबंधन और ग्रामीण विकास में आमतौर पर भागीदारीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने से स्थायी विकास गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा सकता है और दीर्घावधि तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी अथवा कार्बन अवशोषण क्षमता में वृद्धि की जा सकती है. खतरे को बेहतर ढंग से समझने, भौतिक, पारिस्थितिकी विषयक और सामाजिक प्रणालियों की जलवायु परिवर्तन संबंधी कमजोरी के प्रति क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर संवेदनशीलता और अनुकूलनता अत्यंत आवश्यक है.

जलवायु परिवर्तन संबंधी अंतर-सरकारी समिति द्वारा सुझाए गए उपाय:

·         किफायती ईंधन का इस्तेमाल.

·         ऊर्जा के सक्षम इस्तेमाल के उपाय लागू करना और ऊर्जा के सक्षम उपयोग सुधार कार्यक्रमों के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना.

·         उत्सर्जन को सीमित करने के लिए मौजूदा नीतियों और पद्धतियों में सुधार लाना.

·         कार्बन डाइऑक्साइड को टैप करने वाले कार्बन अवशोषण सिंकों में बढ़ोतरी और उनका विस्तार करने के उपाय करना, जैसे वन प्रबंधन और समुचित भूमि प्रबंधन आदि.

·         सबसे खराब स्थितियों में जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों के प्रति अनुकूलन के लिए पहले से योजना तैयार करना.

·         उत्सर्जनों में कमी लाने के लिए वैश्विक स्तर पर ऊर्जा सक्षमता मानकों में संशोधन और उन्हें लागू करना.

·         जलवायु परिवर्तन और उससे सम्बद्ध पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में विद्यालयों और कॉलेजों में पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता प्रशिक्षण को प्रोत्साहित करना.

अधिकाधिक लोग यह महसूस करते हैं कि मनुष्य के लिए जीवन को आरामदायक बनाने वाली शानदार प्रौद्योगिकी विषयक प्रगति का एक अन्य अंधकार विषयक पहलू भी है. हमने यह देखा है कि औद्योगिक प्रौद्योगिकी पर्यावरण को क्षति पहुंचा रही है, कृषि प्रौद्योगिकी जैवमंडल पर कहर बरपा रही है और सैन्य प्रौद्योगिकी इतिहास में पहली बार स्वयं मानवता को नष्ट करने का माध्यम बन गई है. भले ही हम परमाणु बमों से स्वयं को प्रत्यक्ष रूप में नष्ट भी करें, तो भी परोक्ष रूप में पारिस्थितिकी प्रणालियों, खाद्य शृंखलाओं और जीवन को आधार देने वाली समूची प्रणाली को क्षति पहुंचा कर हम अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं. आधुनिक विश्व ने अब यह  महसूस करना शुरू कर दिया है कि विस्फोटक प्रौद्योगिकी के अंधाधुंध इस्तेमाल की बड़ी कीमत आने वाली पीढ़ियों को चुकानी पड़ेगी.

(संपादित अनुसंधान आलेख से लिए गए अंश)

-मेल: drpriyankasharma2010@gmail.com

व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.     

(छायाचित्र: गूगल के सौजन्य से)