संपादकीय लेख


Volume 47

अद्र्ध शहरी सब्जी उत्पादन की संभावना

डॉ. कृष्ण पाल सिंह, डॉ. बीना सिंह, डॉ. प्रेम चंद और रीना नायर

भारत 1,270,272,105 (1.27 अरब) की जनसंख्या के साथ दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला दूसरा देश है. आंकड़े दर्शाते हैं कि विश्व की 17.31 प्रतिशत जनसंख्या भारत में रहती है, जिसका अर्थ है कि इस ग्रह पर बसने वाले छह लोगों में से एक भारत में है. यद्यपि विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या का ताज़ दशकों से चीन के माथे पर था, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि भारत 2030 तक पहला स्थान हासिल करने की पूरी तैयारी में है. 1.58 प्रतिशत की जनसंख्या वृद्धि दर के साथ 2030 तक भारत की जनसंख्या 1.53 अरब हो जाने की आशा है. भारत का कुल क्षेत्र 3,287,260 वर्ग किलोमीटर और कुल फसल क्षेत्र कऱीब 192.2 मिलियन हेक्टेयर तथा कुल बुआई क्षेत्र 140 मिलियन हेक्टेयर है.

सीमित संसाधनों, सीमित भू क्षेत्र, पानी और गरीबों, अशिक्षितों की बहुलता और मानव संसाधनों के कम उपयोग के कारण हमारे शहर तेज़ी के साथ अस्थिर हो रहे हैं. शहरी गरीबों को रोजग़ार प्रदान करने के लिये अद्र्ध-शहरी सब्जियों की खेती एक बेहतर समाधान हो सकता है जबकि साथ-साथ ही निर्माण वातावरण में सुधार किया जाना चाहिये. धनी और गऱीब देशों में सैंकड़ों ऐसे शहर हैं जिन्होंने अपने को हरित और टिकाऊ शहर बनाने के लक्ष्य तय किये हैं. हरितकरण और स्वच्छता की लागत शहरी खाद्य उत्पादन और शहरी कृषि द्वारा वहन की जा सकती है. दुनिया में चीन, ऑस्ट्रेलिया, अमरीका, दक्षिण अमरीका, यूरोप जैसे कई देश और बहुत से एशियाई और अफ्रीकी देश ऐसा कर रहे हैं तथा इसमें लगातार सुधार कर रहे हैं. भारत में यद्यपि अद्र्ध-शहरी कृषि के लोकप्रिय होने की अभी शुरूआत है.

अद्र्ध-शहरी या शहरी क्षेत्रों में सब्जियों की खेती की बढ़ती खाद्य सुरक्षा, रोजग़ार और आय सृजन, गऱीबी उन्मूलन, समुदाय संसाधन विकास, कचड़ा प्रबंधन और पर्यावरण सुरक्षा में इसकी संभाव्य क्षमता के लिये पहचान है. विश्व जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अद्र्ध-शहरी क्षेत्रों में निवास करता है. अद्र्ध-शहरी क्षेत्रों की धनी सामाजिक और आर्थिक व्यवहार्यता नवाचार विज्ञान, रहन-सहन की स्थिति में सुधार और कृषि एवं पर्यावरण प्रबंधन के लिये महत्वपूर्ण नीतियां और समाज तथा प्रकृति और लोगों के समूहों के बीच सौहार्द को बढ़ावा देने के लिये नीतियां और अवसर प्रदान करती है.

अद्र्ध-शहरी कृषि का, जैसा कि शुरूआत में परिभाषित किया गया है, इन्ट्रा-अर्बन और अद्र्ध-शहरी कृषि में उप विभाजन किया जा सकता है. इन्ट्रा-अर्बन कृषि शहर के अंदरूनी हिस्से में संचालित होती है. ज़्यादातर शहरों और कस्बों में रिक्त और अल्प प्रयुक्त भूमि क्षेत्र होता है जिसे अद्र्ध-शहरी कृषि के लिये इस्तेमाल किया जा सकता है, इसमें वह क्षेत्र भी शामिल होता है जो कि निर्माण के लिये उपयुक्त नहीं है (नदियों से सटा, हवाई अड्डों के निकटवर्ती आदि), प्रयोग में नहीं लाई जा रही सार्वजनिक या निजी भूमि (निर्माण के लिये लंबित भूमि) जिसका अंतरिम इस्तेमाल किया जा सकता है, सामुदायिक भूमि और आवास क्षेत्र शामिल हंै और अद्र्ध-शहरी कृषि शहर की परिधि में संचालित की जाती है.

मेट्रो शहरों के अद्र्ध-शहरी क्षेत्रों में संगठित तरीके से सब्जी उत्पादनों को लाने ले जाने के लिये रेल, सडक़ और हवाई परिवहन, शीत भण्डारण, प्रसंस्करण इकाइयां, निर्यात घराने और सुस्थापित बाज़ार नेटवर्क की उपलब्धता में सहायक होती हैं. साथ ही मेट्रो शहरों में ताज़ा सब्जी उत्पादों के रखरखाव और विपणन के दौरान बड़ी मात्रा में ठोस कचड़ा सृजित होता है, जो कि स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरे उत्पन्न कर रहा है, जैविक सब्जी उत्पादन में इस्तेमाल के लिये कृमि खाद आदि के उत्पादन के लिये इस्तेमाल या पुन:शोधित किया जा सकता है. अद्र्ध-शहरी सब्जी की खेती किसानों को भूमि के छोटे से टुकड़े पर खेती की सुविधा और अपनी अनिवार्य तथा मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये इससे आमदनी प्राप्त करने में मदद कर सकती है. हाल के वर्षों में बड़े शहरों के आसपास हरित पट्टियां विकसित की जा रही हैं जो कि शहरी उपभोक्ताओं की खपत के लिये जल्दी खऱाब होने वाली सब्जियों के उत्पादन में विशेषीकृत छोटे फार्मों के बहुत ही सघन और लाभदायक नेटवर्क उपलब्ध करा सकती हैं. इससे परस्पर लाभ और हितों के साथ किसानों और शहरी निवासियों के बीच एक सामाजिक सहजीवन का निर्माण होने की संभावना है. इसके लिये व्यवहार्य सहभागिता दृष्टिकोण में शहरी सब्जी खेती से संबंधित बहुत से मुद्दों को हल करने के लिये प्रभाव डालने और अद्र्ध शहरी जनसंख्या को संभावित परिणामों की सुपुर्दगी के वास्ते बड़ी संख्या में संस्थानों की संलग्नता अपेक्षित होती है.

 

शहरों में बेरोजग़ारी के उच्च स्तरों के कारण, बहुत से परिवार घरेलू खपत और बिक्री के लिये छोटे-छोटे प्लॉटों में अपने स्वयं के उत्पादनों, विशेषकर सब्जियों के उत्पादन पर निर्भर करते हैं. गरीब परिवार अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं. अत: अपनी स्वयं की सब्जियों के उत्पादन की क्षमता का घरेलू खाद्य और आयु सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान होता है. पोषण सुरक्षा में भी वृद्धि होती है, विविध सब्जी खुराक और इससे भी महत्वपूर्ण ये सूक्ष्मपोषकों, विटामिनों और खनिजों का भण्डार होता है जो कि अच्छे स्वास्थ्य के लिये महत्वपूर्ण है. (सारणी 2)

भारत में बहुत से अनुसंधान संस्थान और कृषि विश्वविद्यालय टमाटर से लेकर परंपरागत पत्तेदार फसलों तक विभिन्न प्रकार की सब्जियों का विकास और प्रोत्साहन करते हैं, जिन्हें शहरी और अद्र्ध-शहरी पर्यावरण में उगाया जा सकता है. सरलता से, इन मूल्यवान फसलों को कटाई के उपरांत रख-रखाव के लिये कम लागत की पद्धतियां शहरी और अद्र्ध-शहरी सब्जी उत्पादकों को कटाई उपरांत की हानियां कम करने और घर तथा स्थानीय बाज़ारों में अधिक और बेहतर गुणवत्ता की सब्जियां उपलब्ध करवाने में मदद कर सकती हैं.

फसल के उत्पादन के समय से ही सब्जी की गुणवत्ता को बनाये रखने की आवश्यकता होती है. यहां तक कि जब खेत के द्वार से लेकर उपभोक्ता तक की दूरी सामान्यत: शहरी तथा अक्सर अद्र्ध शहरी  बागवानी में कम होती है, उत्पादकों को फसल कटाई, भण्डारण, पैकिंग और परिवहन करते समय ताज़ा उत्पादों को क्षति से बचाये रखने और गुणवत्ता बनाए रखने के लिये अवश्य ध्यान रखना चाहिये.

शहरी क्षेत्रों में सब्जी उत्पादन के लिये पानी की गुणवत्ता एक अन्य चिंता की बात होती है. फसल के उत्पादन और साफ-सफाई के लिये इस्तेमाल होने वाले पानी का स्रोत औद्योगिक और घरेलू कचड़े के कारण प्रदूषित हो सकता है. यदि फसलों पर कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, और स्थानीय जलापूर्ति, यदि उत्पादक इसमें पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं किये जाते हैं और रसायनों के उचित इस्तेमाल का अनुपालन नहीं करते हैं तो कीटनाशक तत्व उत्पाद को खऱाब कर सकते हैं. उत्पादकों को सूक्ष्मजीवों, कीटनाशक तत्वों और मानव स्वास्थ्य के लिये हानिकारक भारी धातुओं से प्रदूषण को रोकने के लिये प्रदूषित पानी के इस्तेमाल से बचना चाहिये. शहरी उत्पादकों को दूषित पानी के उपयोग के जोखि़मों की अच्छी समझ होने की आवश्यकता है.

 सारणी 1. शहरी जनसंख्या के आधार पर सर्वोच्च तीन राज्य
राज्य- महाराष्ट्र,  जनसंख्या-50.8 मिलियन, हिस्सा (%)-13.5       
राज्य- उत्तर प्रदेश, जनसंख्या-44.4 मिलियन, हिस्सा (%)-11.8
राज्य- तमिलनाडु, जनसंख्या-34.9 मिलियन, हिस्सा (%)-9.3

 बाज़ार में अच्छी गुणवत्ता की फसल प्रस्तुत करने का पहला कदम फसल तैयार होने के सही चरण में इसकी कटाई करना होता है. पत्तेदार सब्जियों की कटाई तभी की जानी चाहिये जब वे अपने अधिकतम आकार में पहुंच जायें और वे रंग छोडऩा शुरू न करें तथा रेशेदार न बनें. टमाटर तोडऩे के लिये उस वक्त तैयार हो जाता है जब इसके फल की शारीरिक बनावट पूरी हो जाये- अर्थात जब इसके फल पर पहली बार गुलाबी या लाल रंग दिखाई देने लगेे. बाज़ार में भेजी जाने वाली सब्जियों में से क्षतिग्रस्त अथवा खराब सामग्री को हटाकर अलग कर देना चाहिये (इससे वे खराब होने से भी बचेंगी) और एक समान लॉट में पैक की जानी चाहिये ताकि उपभोक्ताओं के लिये आकर्षक हों और उच्चतर मूल्य प्राप्त हो सके.

कटाई उपरांत क्षति को कम करने का एक आसान तरीका उस वक्त कटाई की जानी चाहिये जब तापमान बहुत अधिक नहीं होता है जैसे कि प्रात: काल अथवा दोपहर बाद और इसकी कटाई के उपरांत फसल को शैड में रखा जाना चाहिये. पत्तेदार सब्जियों को शैड में रखने से उनकी अपेक्षा अधिक लंबे समय तक गुणवत्ता को बनाए रखेंगी जो कि पूरी धूप में रख दी जाती हैं. कटाई उपरांत सब्जियों के तापमान को बर्फ कम कर सकता है. गीली सामग्री से उत्पाद को ढककर रखना, जैसे कि पुआल या नम बोरी (सब्जियों को सूखी अवस्था में बनाये रखने का ध्यान रखते हुए) वाष्पीय शीतण सिद्धांतों का लाभ उठाते हुए तापमान को कम करने में मदद करती हैं.

 एक अन्य सरल तकनीक अच्छी-गुणवत्ता की पैकेजिंग का प्रयोग होता है जो कि कटाई उपरांत फसल की संरक्षा करेगी. बहुत से उत्पादक अपनी नई पत्तेदार हरी सब्जियों को बड़े-बड़े पॉलीथीन बैगों में रखते हैं, परिवहन के दौरान पत्ते क्षतिग्रस्त या नष्ट हो सकते हैं. टमाटर जैसी नरम फलीय सब्जियों की पैकिंग के लिये बांस की टोकरियां उपयुक्त नहीं होती हैं क्योंकि खुरदरी सतह उत्पाद को क्षतिग्रस्त कर सकती है. चिकनी सतह वाले कठोर कंटेनर उत्पाद को रगड़, क्षति और नष्ट होने से बचाते हैं.

शहरी उत्पादकों को उचित रखरखाव के तौर तरीकों के प्रशिक्षण और कटाई उपरांत अच्छे रखरखाव के आर्थिक लाभों को दर्शाने वाली सूचना के विस्तार से यह सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि बेहतर गुणवत्ता की अधिक सब्जियां बाज़ार में पहुंचें. सुझाई गई तकनीकें और प्रौद्योगिकियां लागू करने के लिये अधिक समय लगने वाली अथवा खर्चीली नहीं होनी चाहिये क्योंकि पूंजी का अभाव इनके अनुकूलन में अक्सर एक बड़ी बाधा होती है. उन्नत कटाई उपरांत रखरखाव के परिणामस्वरूप उच्चतर गुणवत्ता के उत्पाद उपलब्ध होते हैं जो कि अधिक पोषक होते हैं और इन तकनीकों को अपनाने वाले उत्पादों के लिये एक महत्वपूर्ण प्रोत्साहन के तौर पर उच्चतर मूल्य प्रदान कर सकते हैं.

सब्जियां  अद्र्ध-शहरी खेती के लिये विशेष तौर पर उपयुक्त होती है क्योंकि पर्याप्त फसल के उत्पादन के लिये छोटे से भू-क्षेत्र की जरूरत होती है. उदाहरण के लिये कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित 6मी. 3 6मी.  गृह उद्यान मॉडल से प्रति वर्ष 250 से 500 किलोग्राम तक ताज़ा सब्जियों का उत्पादन किया जा सकता है. गृह उद्यान मॉडल से उत्पादित सब्जियां चार से छह व्यक्तियों के परिवार को प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 200 ग्राम सब्जियों की आपूर्ति कर सकता है.

 सारणी 2. कुछ सब्जी फसलों की पोषण बहुमूल्यता (100 ग्राम)
सामग्री- कार्बोहाईड्रेट्स (ग्रा.), टमाटर -3.9 ग्रा., पत्ता गोभी-6.6, पालक-5626µg, अमरन्थस-65.25, शकरकंद-20.1, मिर्च-8.8, खीरा3.63
सामग्री- प्रोटीन (ग्रा.), टमाटर-0.9, पत्ता गोभी-1.3, पालक-194µg, अमरन्थस-13.56, शकरकंद-1.6, मिर्च-1.9, खीरा0.65                                                    सामग्री- विटामिन सी (मि.ग्रा.), टमाटर-14, पत्ता गोभी-36.6, पालक-28 मि.ग्रा, अमरन्थस-4.2, शकरकंद-2.4, मिर्च-144, खीरा2.8
सामग्री- विटामिन ई (मि.ग्रा.), टमाटर-0.54, पत्ता गोभी-0.05, पालक-2 मि.ग्रा, अमरन्थस-1.19, शकरकंद-0.26, मिर्च-N/A, खीराN/A
सामग्री- आयरन (मि.ग्रा.), टमाटर-N/A, पत्ता गोभी-0.47, पालक-2.71 मि.ग्रा., अमरन्थस-7.61, शकरकंद-0.61, मिर्च-1, खीरा0.28                                       विभिन्न प्रकार के अद्र्ध-शहरी स्थानों को चुना जा सकता है, जैसे कि सामुदायिक उद्यान (औपचारिक और अनौपचारिक), गृह उद्यान, सांस्थानिक उद्यान (स्कूलों, अस्पतालों, जेलों, फैक्ट्रियों द्वारा प्रबंधित), नर्सरियां, छत के ऊपर बागवानी, तहखानों और खत्तों में खेती (उदाहरणार्थ: मशरूम, अर्थवार्मस). शोध विवरण यह इंगित करता है कि इंट्रा-अर्बन खेती खाली भूमियों के अस्थाई इस्तेमाल पर आधारित होती हैं, इस प्रकार यह अद्र्ध शहरी कृषि की अपेक्षा अधिक छोटे पैमाने पर और निर्वाह उन्मुख हो सकती है, यद्यपि इसमें नियमित रूप से अपवाद हो सकते हैं. (उदाहरणार्थ: सब्जी उत्पादन और मशरूम अथवा सुगंधित पौधों का उत्पादन)

बहुत-सी सब्जियों की फसलों को रूपाई के अल्प समय में ही प्राप्त किया जा सकता है. पालक, टमाटरकुकुरबिट्स मिर्च और अमरन्थस की फसल 30-50 दिनों में तैयार हो जाती है और प्रति फसल चक्र दस बार फसल प्राप्त की जा सकती है जिससे उत्पादन मौसम के दौरान ताज़ा हरी सब्जी की तीव्र आपूर्ति होती है. पालक, अमरन्थस और शकरकंद के पत्ते पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं और पौषक गुणवत्ता में पत्तागोभी जैसी फसलें अधिक परिपूर्ण होती हैं. (सारणी-2)

शहरी और अद्र्ध-शहरी स्थानों में सब्जी उत्पादन से आशय है कि खेत से उपभोक्ता तक की दूरी छोटी हो. घर में सब्जी उगाने वाले व्यक्ति अपने द्वार पर ही ताज़ा सब्जियां प्राप्त करते हैं और लघु शहरी उत्पादक जो कि अपनी फसलों को बेचते हैं परिवहन की कम लागत का लाभ उठाते हैं. इन उत्पादकों को बिचौलियों या दलालों से ग्रामीण कृषकों की तरह रूबरू नहीं होना पड़ता है और इस प्रकार वे मूल्यों के उतार चढ़ाव को लेकर तेज़ी से प्रत्युत्तर करते हैं.

सब्जियों की अद्र्ध-शहरी खेती के सर्वाधिक महत्वपूर्ण भिन्न विशेषता इसका स्थान नहीं है परंतु यह तथ्य है कि यह शहरी आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिकी प्रणाली का अभिन्न भाग है. इसमें शहरी संसाधनों (भूमि, श्रम, शहरी जैविक कचड़ा और पानी) का प्रयोग किया जाता है, शहरी नागरिकों के लिये उत्पादन किया जाता है, यह शहरी स्थितियों (नीतियां, भूमि के लिये प्रतिस्पर्धा, शहरी बाज़ारों और मूल्यों) से काफी प्रभावित होता है, तथा शहरी व्यवस्था पर प्रभाव डालता है (शहरी खाद्य सुरक्षा और गरीबी, पारिस्थितिकीय और स्वास्थ्य प्रभाव). यद्यपि अद्र्ध-शहरी खेती के कुछ स्वरूप रिक्त भूमियों के अस्थाई उपयोग पर आधारित होते हैं, अत: यह सतत शहरी विकास के लिये एक महत्वपूर्ण अवयव है.

अधिकतर विकासशील देशों में तेज़ी से शहरीकरण हो रहा है. शहरी गरीबी, खाद्य असुरक्षा और कुपोषण में वृद्धि के साथ शहरी क्षेत्रों को ग्रामीणों का पलायन शहरीकरण से जुड़ा है. बहुत से शहर अपनी जनसंख्या में व्यापक वृद्धि के अनुरूप अपने को ढाल नहीं पाते हैं, जो कि शहरी आश्रय में कमी और कार्य आवधिक सुरक्षा, बुनियादी सेवाओं की सुपुर्दगी में बैकलॉग, असमानता और अलगाव में वृद्धि, शहरी पर्यावरण में गिरावट और गरीबी, कुपोषण तथा खाद्य असुरक्षा में वृद्धि में योगदान करता है.

सब्जियों की दीर्घावधि अद्र्ध-शहरी खेती टिकाऊ होती है, विशेषकर जब इसमें भूमि के बहु कार्य उपयोग की पहचान और पूर्ण विकास की क्षमता है. इस अद्र्ध-शहरी खेती की बहु-संकार्यता इसे सार्वजनिक वस्तुओं का सस्ता उत्पादक बना देती है. शहरी कृषि का टिकाऊपन एक स्थाई शहर के विकास में इसके मज़बूत योगदान से जुड़ा है-अर्थात जो कि समावेशी, खाद्य सुरक्षित, उत्पादक और पर्यावरण के अनुकूल है.

लेखकों के बारे में:
डॉ.कृष्ण पाल सिंह सहायक प्रोफेसर/वैज्ञानिक, बागवानी महाविद्यालय और अनुसंधान केंद्र, आईजीकेवी, जगदलपुर हैं, ई-मेल:drkpsingh2010@gmail.com
डॉ. बीना सिंह सहायक प्रोफेसर/वैज्ञानिक, एसजीसीएआरएस, आईजीकेवल, जगदलपुर हैं
डॉ. प्रेम चंद, वैज्ञानिक, आंचलिक परियोजना निदेशालय, जोन-VII
जेएनकेवीवी, जबलपुर हैं, ई-मेल:-prem3281@gmail.com
रीना राय बागवानी विभाग, जेएनकेवीवी, जबलपुर में कार्यरत हैं.
इमेजिज: गूगल के सौजन्य से