संपादकीय लेख


Volume 48

अधिक उत्पादकता के लिए
कृषि यंत्रीकरण की आवश्यकता

अरुण खुराना

‘‘कृषि यंत्रीकरण’’ या ‘‘खेती में यंत्रों के  उपयोग’’ का अर्थ है - ऐसी मशीनों का विकास और इस्तेमाल, जो खेती में मानव और मवेशी की ताकत का स्थान ले सकें. 20वीं सदी में कृषि के यंत्रीकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई थी, उसके फलस्वरूप किसानों के लिए रोपाई, सिंचाई और फसल कटाई की पद्धतियों में व्यापक बदलाव आए. कम्बाइन्स, ट्रैक्टर्स, हार्वेस्टर्स और अन्य मशीनों ने किसानों को उत्पादन बढ़ाने में सक्षम बनाया और विस्तारित श्रम शक्ति पर निर्भरता कम की. दूसरे शब्दों में कृषि यंत्रीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें उपकरणों, मशीनों और औजारों का इस्तेमाल खेती को बढ़ावा देने और अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है. रोजमर्रा की कृषि गतिविधियों में मशीनों, उपकरणों और औजारों के इस्तेमाल की बदौलत जहां एक ओर अनाज के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई, वहीं दूसरी ओर गरीबी दूर करने में भी मदद मिली. कृषि यंत्रीकरण खेती कार्यों की नीरसता कम करता है, जिसकी वजह से अभी तक बड़े पैमाने पर अनाज का उत्पादन कठिन था और विभिन्न राष्ट्रों के लिए बढ़ती आबादी की भोजन की जरूरतें पूरी कर पाना दुष्कर कार्य था. खाद्य उत्पादन में नीरसता और अन्य समस्याओं के समाधान के लिए यंत्रीकरण के जरिए अनेक उपाय शुरू किए गए हैं. कृषि यंत्रीकरण के अंतर्गत सभी प्रकार के कृषि औजारों, उपकरणों और मशीनों का डिजाइन तैयार करना, विनिर्माण, वितरण, इस्तेमाल और उनकी मरम्मत जैसे कार्य शामिल हैं. इसके अंतर्गत  शक्ति के मुख्य तीन स्रोत शामिल हैं: मानव, मवेशी और मशीन, जिनमें यंत्रीकरण (संचालक शक्ति) पर विशेष जोर दिया गया है.

दूसरे शब्दों में ‘‘कृषि यंत्रीकरण’’ खेती में उत्पादन, उत्पादकता और मुनाफा बढ़ाने में मदद करता है, क्योंकि इसकी बदौलत कृषि कार्यों में समयबद्धता का अनुपालन संभव हो पाता है, निवेश का सही मापन और उपयोग संभव हो पाता है, निवेश की क्षति में कमी आती है, महंगे निवेश (जैसे बीज, रसायन, उर्वरक, सिंचाई, जल आदि) की उपयोगिता में वृद्धि होती है, उत्पादन की प्रति इकाई लागत में कमी आती है, प्रचालन लागत में प्रतिस्पर्धात्मकता और मुनाफे में वृद्धि होती है. यंत्रीकरण से फसल और उसके सह-उत्पादों को गुणात्मक और मात्रात्मक क्षति से संरक्षित करने में मदद मिलती है. यंत्रीकरण से मूल्य संवर्धन और कृषि प्रसंस्करण उद्यमों की स्थापना में मदद मिलती है, जिससे खेती की उपज से अतिरिक्त आय और रोजग़ार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं. यंत्रीकरण ग्रामीण भारत के चहुंमुखी विकास को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले महत्वपूर्ण निवेश में से एक है. यंत्रीकरण की प्रभावकारिता का मूल्यांकन इस तथ्य से किया जा सकता है कि आधुनिक हल देसी हल की तुलना में 200 से 300 प्रतिशत अधिक सक्षम है. सक्षम मशीनरी से उत्पादकता में करीब 30 प्रतिशत बढ़ोतरी करने में मदद मिलती है. इसके अतिरिक्त यंत्रीकरण किसानों को दूसरी फसल या बहु-फसल उगाने में सक्षम बनाता है, जिससे भारतीय खेती का आकर्षण बढ़ता है और यह मात्र आजीविका की बजाए एक वाणिज्यिक गतिविधि के रूप में विकसित की जा सकती है. 2020 तक अनाज का उत्पादन दोगुना करने की आवश्यकता है. इसके लिए यह जरूरी होगा कि एक वर्ष में अधिकाधिक फसलें उगाई जाएं और फसलों की अवधि को सीमित किया जाए. अधिक उत्पादन के लिए कृषि निवेश के अधिक उपयोग की आवश्यकता होगी और फसलों को जैविक और अजैविक दबावों से मुक्त करना होगा. इसके लिए अधिक इंजीनियरी निवेश की आवश्यकता पड़ेगी, जो ऐसे उपकरणों के विकास पर निर्भर है, जो उच्च क्षमता वाले, परिशुद्धता विषयक और भरोसेमंद हों तथा ऊर्जा की दृष्टि से सक्षम हों. इससे पहले, यह समझा जाता था कि यंत्रीकरण से बेरोजगारी बढ़ती है. यह भ्रम अब दूर हो गया है और यह देखा गया है कि कृषि यंत्रीकरण उत्पादन और उत्पादकता में बढ़ोतरी के अलावा आय और रोजग़ार के अवसर भी पैदा करता है. भारत के विभिन्न भागों में कराए गए अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि यंत्रीकरण से उत्पादन, उत्पादकता, आय और रोजग़ार बढ़ाने में मदद मिली है.

कृषि सेवा केंद्रों का महत्व उजागर हुआ है और भारत सरकार उन्हें सफल बनाने पर जोर दे रही है. इस कार्यक्रम का उद्देश्य व्यक्तियों के लिए अलग-अलग या संयुक्त समूह आधार पर 5000 उद्यमों को सहायता पहुंचाना है. वर्तमान मॉडल कार्यक्रम में फसल उत्पादन के लिए जुताई से लेकर पैदावार को किसानों के घरों/बाजार स्थल तक पहुंचाने के लिए आवश्यक सभी बुनियादी उपकरण शामिल किए गए हैं. इनमें ट्रैक्टर, ट्रेलर और औजार; पॉवरटिलर, लघु ट्रैक्टर, पंपसेट और अनुषंगी उपकरण; पावर थ्रेशर, विन्नोवर, सेल्फ-प्रोपेल्ड रीपर; स्पेयर्स; मशीनों की मरम्मत संबंधी औजार; बीमा; वर्कशॉप शेड आदि शामिल हैं. 

पिछले एक दशक में भारत का कृषि निर्यात बढक़र लगभग 8 गुणा हो गया है, जो 2003 में 5 अरब अमरीकी डॉलर से 2013 में बढ़ कर 39 अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच गया. वृद्धि का यह सिलसिला इस वर्ष जारी रहने की संभावना है. खेती के निर्यात में तीव्र वृद्धि के कारणों में से एक यह रहा है कि सरकार ने कृषि को सहायता प्रदान की है. यह सहायता गेहूं और चावल के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है (इन दोनों फसलों के समर्थन मूल्य में पिछले 6 वर्षों में क्रमश: 40 प्रतिशत और 75 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई है). इससे, उत्पादन में सुधार लाने और मूल्य को प्रतिस्पर्धात्मक बनाए रखने में सहायता मिली.

खेती के लिए सरकार की कुल सहायता जो 2009-10 में 68 अरब अमरीकी डॉलर की थी, वह 2013-14 में बढ़ कर 85 अरब अमरीकी डॉलर पर पहुंच गई और 2014-15 के आंकड़ों में भी इसमें रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज होने की संभावना है. इससे भारत विश्व बाजार में एक महत्वपूर्ण प्लेयर बन गया है, विशेष रूप से चावल, कपास, चीनी और काराबीफ (भैंस का मांस) के क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी बढ़ी है.

भारत अब विश्व में दूसरा सबसे बड़ा कपास निर्यातक (अमरीका के बाद) बन गया है. वह भैंस के मांस का विश्व में दूसरा (ब्राजील के बाद) सबसे बड़ा निर्यातक है और चावल के मामले में वह सबसे बड़ा निर्यातक है. इस बीच, भारत के कृषि उत्पाद निर्यात मैट्रिक्स में भी महत्वपूर्ण बदलाव आया है. उसका झुकाव विकासशील और कम विकसित देशों (एलडीसीज़) की तरफ अधिक हुआ है, जिनकी हिस्सेदारी अब भारत के कृषि निर्यात में करीब 80 प्रतिशत है. भारत ने 2013 में अल्प विकसित देशों को 5.2 अरब अमरीकी डॉलर मूल्य का कृषि उत्पादों का निर्यात किया, जो दूसरे सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता यूरोपीय संघ की तुलना से एक अरब अमरीकी डॉलर अधिक है और पिछले वर्ष अमरीका ने अल्प विकसित देशों को जो निर्यात किया, उसकी तुलना में 3 गुणा अधिक है.

खेती के ढांचे, जैसे सिंचाई सुविधाओं, गोदामों और शीतभंडारों में निवेश बढ़ाए जाने के कारण अगले कुछ वर्षों में भारत में कृषि क्षेत्र के विकास की बेहतर संभावनाएं हैं. कारोबार लागत और समय में कमी, बंदरगाह द्वार प्रबंधन में सुधार और बेहतर राजकोषीय प्रोत्साहनों जैसे घटक इस क्षेत्र की वृद्धि में योगदान करेंगे. आनुवांशिक दृष्टि से परिष्कृत फसलों के बढ़ते इस्तेमाल से भारतीय किसानों की आमदनी में वृद्धि होने की संभावना है. नेशनल इंस्टिट्यूशन फॉर ट्रांसफार्मिंग इंडिया आयोग (नीति आयोग) के अनुसार, यदि जून-सितंबर की अवधि में मानसून सामान्य रहता है, तो भारतीय कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर वित्तीय वर्ष 2016-17 में 6 प्रतिशत पर पहुंच जाने की उम्मीद है. 12वीं पंचवर्षीय योजना के अनुमानों के अनुसार अनाज भंडारण क्षमता बढ़ कर 35 मीट्रिक टन पर पहुंच जाएगी. अगले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4 प्रतिशत रहने पर भी खेती के ढांचे का पुनर्गठन करने में मदद मिलेगी.

खेती क्षेत्र में मांग-आपूर्ति अंतराल का बढऩा बाजार विकास के लिए एक प्रमुख संचालक होगा. जनसंख्या वृद्धि भारत में भोजन की मांग के प्रमुख संचालकों में से एक है. भारत की आबादी 2015 में बढ़ कर 1.22 अरब पर पहुंच गई है, जो 1996 में 93 करोड़ थी. भारत में कृषि-खाद्य मांग का वास्तविक मूल्य 2009 से 2050 की अवधि में 136 प्रतिशत बढ़ जाएगा. आबादी बढऩे के साथ भोजन की मांग में बढ़ोतरी हुई है. परंतु, खेती योग्य भूमि का क्षेत्र भोजन के लिए मांग मेें बढ़ोतरी के अनुपात में नहीं बढ़ा है. अत: किसान भोजन की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए, अत्याधुनिक कृषि मशीनरी और सक्षम कारगर खेत जुताई तकनीकों को अपनाते हुए उत्पादन में सक्षमता और तीव्रता लाने का प्रयास कर रहे हैं.

कुछ क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति पहले ही शुरू हो चुकी है. किसान अब अपने खेतों का उत्पादन अनुकूलतम स्तर पर पहुंचाने के लिए नई पद्धतियों का इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें लागत और समय बचाने संबंधी नई प्रौद्योगिकियां अपनाना शामिल है. पिछले 4 दशकों में ट्रैक्टरों और टिलरों के इस्तेमाल में 5 गुणा बढ़ोतरी होना इसी बात का प्रमाण है. कृषि विभाग के अनुसार कृषि श्रमिकों और भारवाही पशुओं के योगदान  (खेती के शक्ति स्रोतों में) में काफी कमी आई है, जो 1971-72 में 63.5 प्रतिशत होता था वह 2009-10 में घट कर 13.67 प्रतिशत रह गया. दूसरी तरफ ट्रैक्टरों, पावर टिलरों और मोटरों का योगदान इसी अवधि में 36.51 प्रतिशत से बढ़ कर 86.33 प्रतिशत तक पहुंच गया. कृषि मंत्रालय अपने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से कृषि यंत्रीकरण पर विशेष बल दे रहा है. कृषि यंत्रीकरण के बारे में 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिए एक प्रतिबद्ध सब-मिशन प्रस्तावित किया गया है, जिसमें खेती की मशीनरी के लिए किराया सुविधाओं की शुरुआत एक प्रमुख घटक के रूप में शामिल है. इसमें इस बात पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा कि कृषि यंत्रीकरण की पहुंच छोटे और सीमांत किसानों तथा उन क्षेत्रों तक हो सके, जहां खेती की क्षमता कमजोर है. 2020-21 तक 280 मीट्रिक टन अनाज की अनुमानित मांग को देखते हुए देश में विद्युत क्षेत्र की उपलब्धता 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक कम से कम 2.0 कि.वा/हेक्टेयर तक पहुंचानी होगी. इसे हासिल करने के लिए कृषि मशीनरीकरण को प्राथमिकता देनी होगी.

सरकार ने देश में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेबीवाई), समेकित बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच), राष्ट्रीय तिलहन और आयल पाम मिशन (एनएमओओपी) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) जैसे कार्यक्रमों के जरिए देश में विभिन्न प्रकार के कृषि यंत्रीकरण कार्यक्रम लागू किए हैं. ऐसे कार्यक्रमों के विकास के अतिरिक्त, सरकार ने राष्ट्रीय कृषि विस्तार और प्रौद्योगिकी मिशन (एनएमएईटी) भी लागू किया है, ताकि इन कार्यक्रमों के अंतर्गत परस्पर इस्तेमाल संभव बनाने के लिए मशीनों के विस्तार की सुदृढ़ व्यवस्था की जा सके.

कृषि मशीनरी क्षेत्र में नवाचार से देश में अगले चरण की वृद्धि का मार्ग प्रश्स्त होगा, जिसमें छोटे और सीमांत किसानों और उन क्षेत्रों तक कृषि यंत्रीकरण के प्रसार पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जहां खेती के लिए विद्युत की उपलब्धता कम है. परिणामस्वरूप भारतीय कृषक पहले से अधिक तेजी से कृषि यंत्रीकरण अपना रहे हैं. भारत में कृषि उपकरण बाजार 6.5  अरब अमरीकी डॉलर मूल्य का है और उसके विकास की व्यापक संभावनाएं हैं. ट्रैक्टर बाजार अगले 5 वर्षों में सीएजीआर का 8.9 प्रतिशत बढऩे की उम्मीद है. सरकार और कृषि उपकरण उद्योग के संयुक्त प्रयासों के फलस्वरूप देश में पिछले वर्षों में यह प्रगति संभव हुई है.

भारत में अनुसंधान और विकास के प्रयासों और कृषि यंत्रीकरण की प्रवृत्तियों में इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि लागत की दृष्टि से किफायती और खेती की स्थान विषयक समस्याओं के समाधान में सहायक यंत्रों का विकास किया जा सके. नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), एक शीर्ष संगठन है, जो अनुसंधान और विकास गतिविधियों की जरूरतों, क्षेत्र विषयक जरूरत आधारित प्रौद्योगिकियों और विभिन्न मुद्दों से संबंधित विशेष समस्याओं के समाधान के उपायों पर बुनियादी ध्यान देता है. आईसीएआर की इंजीनियरी डिविजन में 5 अनुसंधान संस्थान, 6 अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजनाएं (एआईसीआरपीएस), एक नेटवर्क प्रोजेक्ट/आउटरीच प्रोग्राम और जलवायु अनुकूल कृषि परियोजना के बारे में एक राष्ट्रीय संस्थान शामिल है.  एआईसीपीआर्स के 4 समन्वित सेल्स अपने केंद्रों के साथ भोपाल स्थित केंद्रीय कृषि इंजीनियरी संस्थान से प्रचालित हैं, जो देश में स्थाई कृषि यंत्रीकरण पर बल देेते हुए इंजीनियरी की जरूरतें पूरी करते हैं, ये हैं:- द्ब) कृषि सामग्री और मशीनरी (24 केंद्र), द्बद्ब) कृषि में श्रम दक्षता और सुरक्षा (10 केंद्र), द्बद्बद्ब) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (18 केंद्र), और द्ब1) मवेशी ऊर्जा इस्तेमाल (13 केंद्र).

यह समझा जा रहा है कि कृषि और सहकारिता मंत्रालय के अंतर्गत कृषि यंत्रीकरण संस्थान की स्थापना का एक प्रस्ताव तैयार किया गया है. यह संस्थान कृषि यंत्रीकरण के विभिन्न पहलुओं के बारे में गहन अनुसंधान करेगा. इनमें दीर्घावधि की कृषि यंत्रीकरण नीति विकसित करने के लिए तकनीकी सामाजिक-आर्थिक पहलू शामिल हैं. कृषि यंत्रीकरण नीति का एक मसौदा तैयार किया गया है और इसे सरकार के अनुमोदन का इंतजार है.

सार रूप में हम कह सकते हैं कि कृषि यंत्रीकरण एक गतिशील प्रौद्योगिकी विकास प्रतिक्रिया है. कृषि के विविधीकरण और पारिस्थितिकी अनुकूल स्थायी खेती के विकास के लिए अग्रणी प्रौद्योगिकियां अपनाए जाने को देखते हुए अत्यंत कारगर कृषि मशीनरी प्रौद्योगिकियों के विकास और इस्तेमाल की आवश्यकता होगी. लागत में कमी और गुणवत्ता में परिष्कार, ये दो लक्ष्य हासिल करने होंगे. कृषि यंत्रीकरण प्रौद्योगिकी के लिए पूंजी घनत्व की आवश्यकता को देखते हुए यह अनिवार्य है कि कृषि यंत्रीकरण संबंधी सभी अनुसंधान और विकास परियोजनाएं मांग-संचालित हों और अद्यतन इंजीनियरी दृष्टिकोण का अनुसरण अवश्य किया जाए. विनिर्माण क्षमताओं का उन्नयन, कम्प्यूटर-एडिड डिजाइन का इस्तेमाल और संयुक्त परियोजनाओं के जरिए उद्योग के साथ घनिष्ठ सहयोग, ये कुछ ऐसे उपाय हैं जो कृषि उपकरणों की क्वालिटी और विश्वसनीयता को बढ़ाने में मदद करेंगे. आने वाले वर्षों में उच्चतर हॉर्सपावर ट्रैक्टर और उच्च क्षमता वाली मशीनें निर्यातोन्मुखी कृषि, सहकारी खेती, कस्टम हायरिंग और बहु-खेती उपयोग की जरूरतें पूरी करने के लिए आवश्यक होंगी. सुरक्षा, आराम और शोर के स्तर एवं प्रदूषण उत्सर्जन की दृष्टि से संगतता सुनिश्चित करना मानव इंजीनियरी अनुप्रयोगों के लिए अनिवार्य होगा. भारत में कृषि इंजीनियरी का भविष्य उज्ज्वल है. परंतु, हमें अग्रणी क्षेत्रों में अनुसंधान, वित्त पोषण और प्रयासों को सघन बनाना होगा. कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि यंत्रीकरण कार्यक्रम उप-मिशन (एसएमएएम) का कार्यान्वयन देश में कृषि उत्पादकता बढ़ाने की दिशा में एक रचनात्मक कदम है. यह कार्यक्रम भारत में कृषि यंत्रीकरण के समावेशी विकास के लिए प्रेरक सिद्ध होगा और छोटे और सीमांत किसानों के लिए कृषि यंत्रीकरण की पहुंच अंतिम मील तक सुनिश्चित करेगा. कस्टम हायरिंग की अवधारणा अर्थात् किराए पर कृषि यंत्र प्रदान करने की सुविधा से बीज, उर्वरक और उपकरण जैसे कृषि निवेशों के सभी प्रचालनों के एकीकरण की संभावना है, जो पारिस्थितिकी प्रणाली में विभिन्न भागीदारों के बीच साझेदारी के जरिए संभव होगी. प्रशिक्षण, प्रदर्शन और सूचना संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के उपयोग के जरिए कृषि यंत्रीकरण को अपनाए जाने, उसके विकास और प्रोत्साहन के प्रति नीतिगत समर्थन की बदौलत कस्टम हायरिंग की उचित संभावनाओं का दोहन किया जा सकता है. भारत में खेती योग्य कुल भूमि का 80 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसानों से सम्बद्ध है. इसे देखते हुए देश में कस्टम हायरिंग की व्यापक संभावनाएं हैं, जो विस्तृत क्षेत्र तक कृषि मशीनरी उपकरणों की जरूरत पूरी कर सकेगा. इस क्षमता को पहचानते हुए भारत सरकार ने कृषि विद्युत उपलब्धता का वर्तमान स्तर 0.93 कि.वा/हेक्टेयर से बढ़ा कर 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2012-2017) में 2 किवा/हेक्टेयर किए जाने की व्यवस्था की है. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब सरकार सरकारी-निजी भागीदारी (पीपीपी) के आधार पर प्रशिक्षण, प्रदर्शन और वित्तीय प्रोत्साहनों के जरिए कस्टम हायरिंग को प्रोत्साहित कर रही है.

अंतत:, ‘‘कृषि यंत्रीकरण’’ हमारे समग्र फैक्टर उत्पादकता के लक्ष्यों को हासिल करने और पृथ्वी ग्रह की बढ़ती हुई जरूरतों के अनुसार भोजन उपलब्ध कराने में प्रमुख भूमिका अदा करेगा. भविष्य में यह संभावना है कि कृषि मशीनें डेटा-समृद्ध सेंसिंग और निगरानी प्रणालियां बन जाएंगी, जो मशीनों और पर्यावरण, दोनों के कार्य निष्पादन को माप सकेंगी, क्योंकि वे सही संकल्प और शुद्धता से काम करेंगी और यह क्षमता कृषि उत्पादन के बारे में जानकारी के विभिन्न स्तर उद्घाटित करेगी, जो अभी तक उपलब्ध नहीं थी.

कुल मिला कर भारत में कृषि यंत्रीकरण उद्योग के तीव्र विकास की संभावनाएं हैं, क्योंकि सरकार अगली पंचवर्षीय योजना (2013-2017) में अनुसंधान एवं विकास एवं प्रौद्योगिकी प्रयासों के जरिए खेती में मांग और आपूर्ति का अंतराल दूर करने के प्रयास कर रही है. खेतों का आकार सिकुडऩे से भी यंत्रीकरण की आवश्यकता बढ़ेगी, ताकि यंत्रीकरण के अनुकूलतम प्रयासों के जरिए कृषि की उपज अधिकतम की जा सके. भारत में कृषि उपकरण क्षेत्र में सुदृढ़ मांग देखी जा रही है और भविष्य में खेती में प्रौद्योगिकी की दृष्टि से अत्याधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल अधिकतम होने की संभावनाएं हैं. भारतीय कृषि उपकरण उद्योग के महत्वपूर्ण वृद्धि प्रेरकों में निम्नांकित शामिल हैं:

*अंतरिक्ष में शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति.
*अनुसंधान और विकास के लिए निवेश में वृद्धि
*विश्व बैंक, भारतीय सरकारी और निजी संस्थानों के जरिए वित्त पोषण
*किसानों को ऋणों की अधिक उपलब्धता.
*प्रशिक्षित श्रमिक आपूर्ति का अभाव.
*कृषि उपकरणों पर सरकारी सब्सिडी.
सरकार उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृषि यंत्रीकरण पर जोर दे रही है और खेती कार्यों के लिए यंत्रों के इस्तेमाल के प्रति किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए सस्ती दरों पर कृषि मशीनरी उपलब्ध करा रही है. कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने जो उपाय किए हैं, उनमें से कुछ का ब्यौरा नीचे दिया गया है:-
*भारत निर्माण और संवर्धित ग्रामीण जलापूर्ति, सिंचाई, ग्रामीण आवास, ग्रामीण विद्युतीकरण, ग्रामीण दूर संचार आदि कार्यक्रमों के जरिए, ग्रामीण ढांचे के विकास में मदद पहुंचाना.
*न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था, ताकि किसानों को न्यूनतम जोखिम पर अपने उत्पाद बेचने में मदद की जा सके.
*कृषि मशीनरी पर सब्सिडी, ताकि किसान मशीनें खरीद सकें और स्वामित्व की कुल लागत कम रखी जा सके.
*ग्रामीण ढांचा विकास कोष (आरआईडीएफ), जिसका उद्देश्य बैंकों के जरिए धन संवितरित करते हुए ग्रामीण ढांचे के लिए वित्त पोषण करना है.

परंपरागत और अक्षम उपकरणों के स्थान पर परिष्कृत उपकरण प्रदान करने के लिए नीतियां और कार्यक्रम विकसित किए गए हैं, ताकि किसान ट्रैक्टर, पावर टिलर्स, हार्वेस्टर्स और अन्य मशीनें खरीद सकें, उन्हें कस्टम हायर सेवाएं उपलब्ध कराई जा सकें, मानव संसाधन विकास परीक्षण, मूल्यांकन और अनुसंधान एवं विकास संबंधी सहायता सेवाएं मुहैया कराई जा सकें. कृषि मशीनों के विनिर्माण के लिए एक व्यापक औद्योगिक आधार भी विकसित किया गया है. प्रौद्योगिकी की दृष्टि से अत्याधुनिक उपकरणों को अपनाया जा सके, इसके लिए संस्थागत ऋण की व्यवस्था के अलावा विस्तार और प्रदर्शन जैसे उपाय भी शुरू किए गए हैं. किसानों द्वारा संसाधन संरक्षण के लिए भी उपकरण अपनाए जा रहे हैं. सरकार द्वारा प्रायोजित विभिन्न कार्यक्रमों जैसे वृहत्त कृषि प्रबंधन; दलहनों, तिलहनों और मक्का के लिए प्रौद्योगिकी मिशन; बागवानी के लिए प्रौद्योगिकी मिशन; कपास के लिए प्रौद्योगिकी मिशन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत किसानों को वित्तीय सहायता दी जा रही है, ताकि वे चुने हुए कृषि उपकरण और मशीनें खरीद सकें. वर्तमान में भारत के कृषि क्षेत्र में उत्पादन लागत तेजी से बढ़ रही है. इससे किसानों के लाभ का मार्जन कम होता जा रहा है. अत: लागत में कमी लाने, उत्पादकता और सक्षमता बढ़ाने के लिए कृषि यंत्रीकरण अत्यंत आवश्यक है. भारत में कृषि यंत्र बाजार में 2016-2020 की अवधि में सीएजीआर का 7.53 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हो रही है. यह बाजार उत्पाद के आधार पर निम्नांकित खंडों में विभाजित है, जैसे हार्वेस्टर; लेजर लैंड लेवलर; पावर टिलर; राइस ट्रांसप्लांटर; ट्रैक्टर आदि. इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि कृषि यंत्रीकरण की बजाय ग्रामीण यंत्रीकरण शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए, ताकि यह संभव नहीं हो सकता कि कृषि यंत्रीकरण को ग्रामीण आर्थिक गतिविधियों से पृथक किया जा सकता है. 

 

(लेखक सोशल रेस्पांसिबिल्टिी काउंसिल, नई दिल्ली के संस्थापक/निदेशक हैं ई-मेल : khurana@arunkhurana.com)  (चित्र-गूगल के सौजन्य से)