संपादकीय लेख


EDITORIAL-51

उपभोक्ताओं के लिए भरोसेमंद डिजिटल व्यवस्था

डॉ. शीतल कपूर

आधुनिक विपणन की धारणा के अंतर्गत उपभोक्ता को सभी व्यापार संबंधी गतिविधियों का केंद्र बिंदु समझा जाता है, जिसका ध्येय उपभोक्ता को अधिकतम संतुष्ट करना है. भारतीय बाजारों में वस्तुओं और सेवाओं की भरमार होने के बाद यह देखा गया है कि एक उपभोक्ता के नाते अनेक बार हम उच्च गुणवत्ता के दावों, अनुचित व्यापार पद्धतियों, फैंसी पैकेजिंग के शिकार हो जाते हैं और कई बार युक्तिसंगत निर्णय नहीं कर पाते हैं. उपभोक्ता संरक्षण के दायरे में उपभोक्ताओं के कल्याण संबंधी सभी पहलू शामिल हैं और वर्तमान युग में इन पहलुओं को अंतर्राष्ट्रीय रूप में स्वीकार किया गया है. इसकी वजह यह है कि उपभोक्तावाद एक सामाजिक शक्ति के रूप में उभरा है, जो कानूनी, नैतिक और प्रशासनिक एवं आर्थिक नीति के जरिए उपभोक्ताओं की सहायता और उन्हें संरक्षण प्रदान करता है. उपभोक्तावाद में मुख्य बल का दायरा अब विस्तृत हो गया है, जिसमें मानव मूल्यों और पर्यावरणीय सरोकारों के साथ कार्रवाई समूहों का आधिक्य दिखाई देता है. इसके अतिरिक्त उपभोक्ता संरक्षण कानून, उत्पाद और मूल्य सूचना की उपलब्धता, धोखाधड़ी और कपटपूर्ण व्यापार पद्धतियों की रोकथाम और उत्पाद सुरक्षा जैसे मुद्दे भी इसमें शामिल हो गए हैं.

आज उपभोक्ता अपने धन के बदले मूल्य की मांग करते हैं, अर्थात् यह अपेक्षा करते हैं कि कोई उत्पाद या सेवा युक्तिसंगत आकांक्षाओं को पूरा करे, इस्तेमाल में सुरक्षित हो और उत्पाद संबंधी विशिष्टताओं का पूर्ण प्रकटीकरण किया गया हो. इन आकांक्षाओं को 'उपभोक्ता अधिकार कहा गया हैं विश्व के विभिन्न भागों में 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसकी शुरुआत जॉन एफ कैनेडी ने 15 मार्च, 1962 में की थी और इसके लिए अमरीकी संसद में उपभोक्ता अधिकार विधेयक पेश किया गया था. अपने भाषण मे राष्ट्रपति जॉन एफ  कैनेडी ने कहा था: ''यदि किसी उपभोक्ता को घटिया उत्पाद पेश किए जाते हैं, यदि वस्तुओं के मूल्य बढ़ा-चढ़ा कर लिखे जाते हैं, यदि औषधियां असुरक्षित हैं या असरकारक नहीं हैं, यदि उपभोक्ता जानकारी के आधार पर चयन करने में विफल रहता है, तो उसका डॉलर बर्बाद हो जाता है, संभव है, उसके स्वास्थ्य और सुरक्षा तथा राष्ट्रहित पर भी दुष्प्रभाव पड़े. जॉन एफ  कैनेडी ने सामान्य अमरीकी उपभोक्ता के अधिकारों को राष्ट्रीय हित के समान बताया था. उन्होंने अमरीकी उपभोक्ताओं को चार बुनियादी अधिकार प्रदान किए, सुरक्षा का अधिकार, चयन का अधिकार, सूचना का अधिकार और शिकायतें सुने जाने का अधिकार.

कैनेडी ने यह स्वीकार किया कि उपभोक्ता देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा आर्थिक समूह है, जो लगभग प्रत्येक सार्वजनिक और निजी आर्थिक निर्णय से प्रभावित होता है और निर्णय को प्रभावित करता है. परंतु, उपभोक्ता समूह एकमात्र महत्वपूर्ण समूह है, जो कारगर ढंग से संगठित नहीं है और जिसके विचार सुने नहीं जाते हैं. ये ऐसी परिस्थितियां थीं, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीकी अर्थव्यवस्था के विकास के समय व्याप्त थीं, जब मध्यमवर्ग का विस्तार हो रहा था. चूंकि व्यापार द्वारा उपभोक्ताओं का शोषण किया जा रहा था, इसलिए कैनेडी ने एक राजनीतिज्ञ होने के नाते उपभोक्ता अधिकारों का इस्तेमाल अपने चुनाव अभियान में एक राजनीतिक अवसर के रूप में किया. उन्हें अमरीकी जनता का समर्थन मिला. जब वे अमरीका के राष्ट्रपति चुने गए तो उन्होंने उपभोक्ता अधिकारों का कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए अनेक कदम उठाए.

इसलिए अमरीकी संघीय सरकार, जो स्वाभाविक रूप में सभी लोगों के लिए सर्वोच्च प्रवक्ता थी, ने उपभोक्ताओं की जरूरतों का विशेष दायित्व संभाला. 13 वर्ष बाद राष्ट्रपति गेराल्ड फोर्ड ने महसूस किया कि कैनेडी का अधिकार कानून एक ऐसी स्थिति में अपर्याप्त था, जहां ज्यादातर उपभोक्ता पर्याप्त शिक्षित न होने के कारण चयन के अधिकार से वंचित थे. अत: उन्होंने इन अधिकारों में उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार भी शामिल किया. किसी जानकार उपभोक्ता का आसानी से शोषण नहीं किया जा सकता.

द कन्ज्यूमर्स इंटरनेशनल, जो इंटरनेशनल आर्गेनाइजेशन ऑफ कन्ज्यूमर्स यूनियन (आईओसीयू) के रूप में विख्यात है और 100 से अधिक देशों में 250 संगठनों के लिए एक शीर्ष निकाय है, ने अमरीकी विधेयक में उपभोक्ता अधिकारों के चार्टर का विस्तार किया और अधिकारों की संख्या 8 कर दी, जो एक युक्तिसंगत क्रम में इस प्रकार हैं:- (1) बुनियादी जरूरतें, (2) सुरक्षा, (3) जानकारी, (4) चयन (5) प्रस्तुतिकरण, (6) शिकायत निवारण, (7) उपभोक्ता शिक्षा और (8) स्वस्थ वातावरण.

इस चार्टर का सार्वभौम महत्व है, चूंकि ये अधिकार निर्धन और उपेक्षित लोगों की आकांक्षाओं का प्रतीक हैं. इस आधार पर संयुक्त राष्ट्र ने अप्रैल, 1985 में उपभोक्ता संरक्षण के लिए दिशा-निर्देश पारित किए. उपभोक्ता अधिकार दिवस 2017 के लिए कन्ज्यूमर्स इंटरनेशनल (सीआई) ने ''उपभोक्ताओं के लिए भरोसेमंद डिजिटल जगत  को विषय बनाने के लिए प्रस्तावित किया है.

डिजिटल प्रौद्योगिकियों के तीव्र विकास और ई-कॉमर्स, स्मॉर्टफोन, क्लाउड और इंटरनेट के साथ व्यापार प्रतिमानों में एक बदलाव आया है. व्यापार प्रक्रियाएं तेजी से बदल रही हैं और इंटरनेट प्रौद्योगिकी, मुख्य रूप से एक इलेक्ट्रोनिक विनिमय माध्यम के रूप में वल्र्ड वाइड वेब (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू) ने क्षेत्रमुक्त वास्तविक बाजार स्थान को जन्म दिया है.

नए युग का उपभोक्ता अक्सर दूर-दराज से व्यापार में शामिल होता है, लेकिन परस्पर क्रियात्मक बाजार स्थल उच्चस्तरीय विविधता से युक्त है और इसीलिए उसका डिजिटल रूप में सक्षम होना आवश्यक है. व्यापार से उपभोक्ता सेग्मेंट में वेब के जरिए बिक्री में पिछले कुछ वर्षों में कई गुणा बढ़ोतरी हुई है. ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, जो इंटरनेट का इस्तेमाल सिर्फ  जानकारी तलाशने के लिए नहीं कर रहे हैं, बल्कि वस्तुएं खरीदने और सेवाएं प्राप्त करने के लिए कर रहे हैं.

नवीन उत्पाद और सेवा वितरण प्रणालियां जैसे डायरेक्ट सेलिंग, मल्टी-लेवल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स, कभी-कभी वस्तुओं और सेवाओं, दोनों में सीमा पार लेनदेन के कारण खास तरह की समस्याएं पैदा करती हैं, जैसे गुणवत्ता का अभाव और असुरक्षित उत्पाद, परभक्षी, शोषक और अनुचित व्यापार पद्धतियां. ये समस्याएं उपभोक्ताओं का नुकसान रोकने के लिए उनमें जागरूकता पैदा करने की नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं. साथ ही, इनसे शिकायत निपटान की प्रक्रिया अवैयक्तिक और विवाद निपटान की प्रक्रिया जटिल, समय खपाऊ और महंगी हो जाती है. बाजार सूचना में असमानता, विज्ञापनों में विस्फोटक वृद्धि और आक्रामक विपणन जैसे कारणों से उपभोक्ता की प्रभुसत्ता पर दवाब बढ़ा है. यदि ई-कॉमर्स करते समय कोई व्यक्ति ठगा जाता है, या उसका अकाउंट हैक कर लिया जाता है, तो वह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 और आईटी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत शिकायत दर्ज कर सकता है. नेट से खरीद के संदर्भ में चूंकि प्रस्ताव और स्वीकृतियां अपने-अपने स्थानों पर बैठे कम्प्यूटर पर की जाती हैं, अत: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत मंचों/आयोगों द्वारा दोनों स्थानों पर अधिकार क्षेत्र समझा जाता है. वर्तमान में यही परिपाटी है और विभिन्न निर्णयों से भी इसकी पुष्टि होती है. अत: विक्रेता या सेवा प्रदाता की ओर से कोई त्रुटि होने के मामले में उपभोक्ता आसानी से अपने क्षेत्र के उपभोक्ता मंचों पर शिकायत कर सकता है.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986

देश में उपभोक्ताओं के समर्थन में पारित कानून उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986, मील का पत्थर है. यह कानून उपभोक्ताओं के हितों की बेहतर ढंग से संरक्षा करने के लिए एक विधायी फे्रमवर्क प्रदान करता है, जो एक ऐसी औपचारिक लेकिन अद्र्धन्यायिक विवाद निपटान व्यवस्था सृजित करता है, जो विशेष रूप से उपभोक्ताओं के लिए है. यह प्रगतिशील कानून एक तीन स्तरीय - यानी राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तरों पर अद्र्धन्यायिक उपभोक्ता विवाद समाधान व्यवस्था कायम करता है. देश में अभी तक 644 जिला फोरम, 35 राज्य आयोग और शीर्ष स्तर पर एक राष्ट्रीय आयोग काम कर रहे हैं.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की मुख्य विशेषताएं
क)इस अधिनियम में उपभोक्ताओं के 6 अधिकार वॢणत किए गए हैं - सुरक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, चयन का अधिकार, सुनवाई का अधिकार, शिकायत निवारण का अधिकार और उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार.
ख)इस अधिनियम के प्रावधान तत्समय प्रचलित किसी अन्य कानून के प्रावधानों के अतिरिक्त हैं और उनके विपरीत नहीं हैं.
ग)यह एक शीर्ष कानून है, जो वस्तुओं और सेवाओं को कवर करता है, लेकिन इसमें ऐसे लेनदेन शामिल नहीं हैं, जिनमें अधिनियम के परिप्रेक्ष्य में उपभोक्ता शामिल न हों.
घ)उपभोक्ता किन्हीं वस्तुओं के विनिर्माता और व्यापारी/सेवाप्रदाता के खिलाफ शिकायत निवारण की मांग तभी कर सकता है, जब उसने वस्तुओं या सेवाओं के लिए कोई मूल्य अदा किया हो. अधिनियम में उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण के लिए एक साधारण, किफायती और शीघ्र समाधान प्रदान करने का प्रावधान है.
ङ)अधिनियम के प्रावधान अपने स्वरूप में न केवल क्षतिपूरक हैं, बल्कि निवारक और दंडात्मक भी हैं.
च)अधिनियम केंद्र, राज्य, जिला स्तर पर उपभोक्ता संरक्षण परिषदों का प्रावधान भी करता है, जो उपभोक्ताओं के अधिकारों के प्रोत्साहन और संरक्षण से संबंधित सलाहकार निकाय है.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत उपभोक्ताओं के अधिकार

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा-6 उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध 6 अधिकारों का उल्लेख करती है. ऑनलाइन उपभोक्ता भी इन उपभोक्ता अधिकारों का लाभ उठा सकते हैं और यदि वे किसी ऑनलाइन पोर्टल द्वारा खराब या घटिया उत्पाद या सेवा प्रदान किए जाने या असत्य और भ्रामक विज्ञापनों से पीडि़त हैं, तो वे भी इस उपभोक्ता मंच पर अपनी शिकायतें कर सकते हैं. ये अधिकार इस प्रकार हैं:-

1. सुरक्षा का अधिकार : इसका अर्थ है, सभी संभव खपत पैटर्नों और सभी वस्तुओं और सेवाओं के जोखिमपूर्ण प्रभावों, जिनमें जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुंचने की आशंका हो, के खिलाफ उपभोक्ताओं को अधिकार प्रदान करना. बाजारों के वैश्वीकरण के संदर्भ में, जहां आयातित वस्तुओं तक उपभोक्ताओं की आसान पहुंच हो, गुणवत्ता, सभी उत्पादों में मानकों और सेवाओं के लिए सुरक्षा का अधिकार एक पूर्वापेक्षा बन गया है. कन्ज्यूमर इंटरनेशनल के अनुसार सुरक्षा के अधिकार का अर्थ है, ''स्वास्थ्य या जीवन के प्रति जोखिमपूर्ण उत्पादों, उत्पादन प्रक्रियाओं और सेवाओं के संदर्भ में संरक्षा का अधिकार

हम ऐसी अनेक दुर्घटनाओं के बारे में सुनते हैं, जो खराब इलेक्ट्रिकल उपकरणों, मिलावटी भोजन, स्वच्छता सुविधाओं के अभाव, खराब भवन सामग्री आदि के परिणामस्वरूप होती हैं. इससे पहले, सुरक्षा के अधिकार की व्याख्या सिर्फ इलेक्ट्रिकल उत्पादों और इसी तरह के अन्य उत्पादों के संदर्भ में की जाती थी.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम सुरक्षा के अधिकार को प्रथम और सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपभोक्ता अधिकार मानता है. बीआईएस द्वारा प्रमाणन और समनुरूपता मूल्यांकन के लिए आईएसआई स्कीम संचालित की जाती है, जिसमें राष्ट्रीय मानकों के संदर्भ में उत्पादों की गुणवत्ता का मूल्यांकन किया जाता है. उपभोक्ताओं को उत्पादों की खरीद से पहले आईएसआई, एफएसएसएआई, बीईई जैसे चिन्हों की पड़ताल करनी चाहिए.

2. सूचना का अधिकार :- प्रत्येक उपभोक्ता को वस्तुओं की गुणवत्ता, मात्रा, सक्षमता, शुद्धता, मानक और मूल्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, ताकि वह खराब वस्तुओं, सेवा में खामी, अनुचित व्यापार पद्धतियों और प्रतिबंधात्मक व्यापार पद्धतियों के मामले में स्वयं को संरक्षित कर सके. उपभोक्ता को चयन करने या निर्णय करने से पहले उत्पाद या सेवा के बारे में समस्त जानकारी प्राप्त करने का आग्रह करना चाहिए. इससे वह बुद्धिमतापूर्वक और जिम्मेदारीपूर्ण ढंग से निर्णय कर सकेगा और अपने को दवाब डालने वाली बिक्री तकनीकों का शिकार होने से बचा सकेगा. कुछ उपभोक्ता संगठनों द्वारा किए जाने वाले तुलनात्मक परीक्षण के जरिए उपभोक्ता निष्पक्ष जानकारी प्राप्त कर सकते हैं. ब्रांडिड वस्तुओं और सेवाओं के परीक्षण से गुणवत्ता की विशेषताओं के बारे में निष्पक्ष जानकारी मिल सकती है. इसके निम्नांकित लाभ भी हैं:-

क)अंतनिर्हित गुणवत्ता और मूल्य एवं निष्पादन की तुलना.
ख)वाणिज्यिक प्रभाव से मुक्त जानकारी प्रदान करना.
ग)उपलब्ध बहुसंख्य ब्रेंडों के बीच उपभोक्ताओं को बुद्धिमत्तापूर्ण चयन में सक्षम बनाना.
घ)असुरक्षित वस्तुओं और अनुचित व्यापार पद्धतियों के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित करना
ङ)निर्माताओं पर उपभोक्ता दवाब पैदा करना, ताकि वे अपने उत्पादों की गुणवत्ता में वृद्धि करें.
च)जन जागरूकता बढ़ाते हुए उत्पादों के मानकों में वृद्धि.

3. चयन का अधिकार :- चयन के अधिकार का अर्थ है, जहां कहीं संभव हो, प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर विविध प्रकार की वस्तुओं और सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना. निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि उपभोक्ता को न्यूनतम लागत के अधिकतम विकल्प उपलब्ध कराए जा सकें. विनिर्माता को बिक्री उपरांत विश्वसनीय सेवा और हिस्से पुर्जों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए. चयन का अधिकार उपभोक्ता संतुष्टि की अवधारणा पर आधारित है. एक-तरफा अनुबंधों जैसे अनुबंधात्मक दुरूपयोगों, अनुबंध में अनिवार्य अधिकारों को शामिल न किए जाने और विक्रेताओं द्वारा ऋण की अनर्थक शर्तें शामिल किए जाने के खिलाफ उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए.

विकसित देशों के मामले में, जहां प्रचुर मात्रा में वस्तुएं उपलब्ध होती हैं, इस अधिकार का अर्थ है, अधिक किस्म के उत्पादों और सेवाओं में से चयन का अधिकार. लेकिन विकासशील देशों में चयन के अधिकार की परिभाषा पृथक है. ऐसी आबादी, जो जीविका के लिए वातावरण पर निर्भर हो, के लिए चयन का अधिकार और अन्य उपभोक्ता अधिकारों के मामले में केंद्र बिंदु बदलने की आवश्यकता है. ऐसे में केंद्र बिंदु बेहतर पद्धति के चयन को बनाया जाना चाहिए, जैसे कार्बनिक खेती और प्राकृतिक धरोहर का संरक्षण. शहरों में लोगों के पास प्रदूषण फैलाने वाले विकल्पों की बजाए स्वच्छ और सुरक्षित तरीके अपनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए. इसी प्रकार जंक फूड की तुलना में स्वस्थ और ताजा भोजन का विकल्प होना चाहिए.

4. सुनवाई का अधिकार :- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों में सुनवाई का अधिकार सर्वप्रथम है. सुनवाई के अधिकार का अर्थ है - उपभोक्ताओं को अपनी राय व्यक्त करने और शिकायतों के निवारण के लिए एक समुचित मंच उपलब्ध कराना. उदाहरण के लिए यदि आपके साथ बाजार स्थल पर कोई धोखा हुआ है अथवा आप सही क्वालिटी की सेवा से वंचित किए गए हैं, तो आपकी शिकायत सुनी जानी चाहिए और सम्बद्ध व्यापारिक प्रतिष्ठान द्वारा उस पर समुचित ध्यान दिया जाना चाहिए. बड़े व्यापारों के मामले में उपभोक्ता शिकायत प्रकोष्ठ और ग्राहक देखभाल केंद्र होने चाहिए, जो उपभोक्ताओं की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करें. जिस समय उपभोक्ताओं से संबंधित नियम और विनियम बनाए जा रहे हों, या विभिन्न नियमों या विनियमों में उपभोक्ताओं पर असर डालने वाले संशोधन किए जा रहे हों, तो ऐसे में उपभोक्ताओं को अपनी आवाज उठाने का अधिकार होना चाहिए.

5. शिकायत निवारण का अधिकार :- इसका अर्थ है - अनुचित व्यापार पद्धतियों या उपभोक्ताओं के बेईमानीपूर्ण शोषण के खिलाफ उनकी शिकायतें दूर किए जाने का अधिकार. इसके अंतर्गत उपभोक्ताओं की उचित शिकायतों के निष्पक्ष निपटारे का अधिकार शामिल है. उपभोक्ताओं को अपनी उचित शिकायतों को अवश्य दर्ज करना चाहिए. कई दफा उनकी शिकायत मामूली होती है, लेकिन व्यापक समाज पर उसका प्रभाव महत्वपूर्ण होता है. भारत में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत गठित उपभोक्ता फोरम नाम की शिकायत निवारण व्यवस्था है, जो राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तरों पर काम करती है. परंतु उपभोक्ताओं में स्वयं बुनियादी उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरूकता का अभाव होने के कारण इस व्यवस्था का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा है. उपभोक्ता अपनी शिकायतों का निवारण कराने के लिए उपभोक्ता संगठनों की भी सहायता ले सकते हैं.

6. उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार :- इसका अर्थ है - जीवन पर्यंत एक सुविज्ञ उपभोक्ता बनने के लिए ज्ञान और कौशल अर्जित करने का अधिकार. उपभोक्ताओं की अज्ञानता, विशेषकर ग्रामीण उपभोक्ताओं में जानकारी का अभाव उनके शोषण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है. उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए और उनका इस्तेमाल अवश्य करना चाहिए. इसके बाद ही वास्तविक उपभोक्ता संरक्षण में सफलता हासिल की जा सकती है.

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को सुदृढ़ बनाना

सरकार ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है कि उपभोक्ताओं के मामलों से सम्बद्ध वैधानिक फे्रमवर्क को आधुनिक रूप दिया जाए. उपभोक्ता मामले विभाग ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में व्यापक संशोधन प्रस्तावित किए हैं और 10.08.2015 को उपभोक्ता संरक्षण विधेयक-2015 लोकसभा में पेश किया गया. ये विधेयक सदन ने खाद्य उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय से सम्बद्ध स्थायी समिति को सौंप दिया है ताकि वह इसकी पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट दे.

नए उपभोक्ता संरक्षण विधेयक-2015 में प्रस्तावित संशोधनों का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ता शिकायत निवारण व्यवस्था शीघ्र, कम लागत पर और सरल तरीके से उपभोक्ताओं की शिकायतों का निपटारा करने में सक्षम हो. इसमें अनुचित व्यापार पद्धतियों की रोकथाम के लिए संस्थागत प्रबंध करने, उपभोक्ता संरक्षण में उत्पाद देयता की धारणा शामिल करने और एक वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) व्यवस्था का इस्तेमाल मध्यस्थता के रूप में करने जैसे प्रावधान भी शामिल हैं. प्रस्तावित प्रमुख संशोधनों में निम्नांकित शामिल हैं:

*केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण नाम के प्राधिकरण की स्थापना, जो अनुचित व्यापार पद्धतियों की जांच करेगा, समुचित मामलों में कार्रवाई शुरू करेगा, खराब उत्पादों के मामले में रिफंड, रीकॉल या स्थानापन्न करने, और भ्रामक विज्ञापनों को वापस लेने तथा उपचारात्मक/क्षतिपूरक विज्ञापन जारी करने के आदेश जारी करेगा.
*उत्पाद देयता की शुरूआत करेगा ताकि उपभोक्ता खराब उत्पादों/अक्षम सेवाओं द्वारा पहुंचाई गई हानियों या क्षति के खिलाफ  मामला दर्ज कर सकें.
*जिला फोरम, राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग के दंडात्मक अधिकारों को बढ़ा कर क्रमश: 50 लाख, 10 करोड़ और 10 करोड़ से अधिक करना ताकि नागरिकों के लिए अधिक पहुंच प्रदान की जा सके.
*मामलों की ई-फाइलिंग की अनुमति देना और अनुमोदन के चरण तक व्यक्तिगत रूप से उपस्थित न होने का प्रावधान करना. 21 दिन के भीतर अनुमोदित न किए गए मामलों को अनुमोदित समझना.
*उपभोक्ताओं की पहुंच आसान बनाने के लिए अपने निवास स्थान से सम्बद्ध अधिकार क्षेत्र वाले जिला फोरम में मामले दाखिल करने की अनुमति देना, ताकि उनके लिए लेनदेन के स्थान पर मामला दर्ज करना अनिवार्य न रहे.

साइबर अपराध और आईटी अधिनियम 2000

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में ऑनलाइन खरीददारी को व्यापक स्वीकृति प्रदान की गई है. ऑनलाइन बैंकिंग और धन अंतरण गतिविधियों के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए गए विभिन्न परिपत्र उपभोक्ताओं को ऑनलाइन लेनदेन में सक्षम बनाते हैं. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 (आईटी अधिनियम) की धारा 10(ए) ई-अनुबंधों की वैधता का प्रावधान करती है. ट्राइमेक्स इंटरनेशनल एफजैडई लिमिटेड दुबई बनाम वेदांता एल्युिमनियम लिमिटेड 2010 (1) एससी 574 मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने ऑनलाइन लेनदेन की वैधता को स्वीकार किया है और व्यवस्था दी है कि आपसी दायित्वों के बारे में पार्टियों के बीच किए गए ईमेल एक तरह का अनुबंध हैं. उक्त अधिनियम की धारा 65 कम्प्यूटर स्रोत दस्तावेज में हेराफेरी से सम्बद्ध है. धारा 66 कम्प्यूटर संबंधी अपराधों के बारे में है. धारा 66(ए) में संचार सेवा आदि के माध्यम से आपत्तिजनक मैसेज भेजने के लिए दंड का प्रावधान है. धारा 66(सी) चोरी सिद्ध होने के लिए दंड और धारा 66(बी) कम्प्यूटर स्रोत का इस्तेमाल करते हुए छद्म रूप लेकर धोखाधड़ी करने से सम्बद्ध है. धारा 66(ई) में किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसकी निजता के उल्लंघन के लिए सजा का प्रावधान करती है. ऐसे मामलों में दोषी को 3 साल तक के कारागार अथवा एक लाख रुपये तक जुर्माना या दोनों सजा देने का प्रावधान है.

एक सतर्क उपभोक्ता बनें

पूर्ववर्ती 3 संशोधनों के बाद उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 में उपयुक्त संशोधन की कवायद पहले से जारी है, लेकिन उपभोक्ताओं का भी यह दायित्व है कि अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए वे ऑनलाइन लेनदेन और डिजिटल खरीददारी करते समय समुचित सावधानी बरतें. ऑनलाइन शापिंग करते समय ग्राहकों को कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, जैसे स्ट्रांग पासवर्ड का इस्तेमाल करना, ई-पोर्टल के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करना, ई-मर्चेंट की प्राइवेसी पॉलिसी के बारे में पता लगाना, व्यक्तिगत जानकारी को गोपनीय रखना, केवल ज्ञात ई-मर्चेंटों के साथ खरीददारी करना और मासिक बैंक एवं क्रेडिट कार्ड ब्यौरों की समीक्षा करना.

इस तरह समाज के प्रत्येक स्तर पर  उच्च स्तरीय उपभोक्ता जागरूकता और संरक्षण की आवश्यकता है, ताकि व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही स्तरों पर उपभोक्ताओं का सशक्तिकरण किया जा सके और वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल और दायित्वों का निवर्हन कर सकें.

(लेखिका , कॉमर्स विभाग, कमला नेहरू कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में असोसिएट प्रोफेसर हैं. ईमेल:sheetal_kpr@hotmail.com)

 

चित्र: गूगल के सौजन्य से