संपादकीय लेख


Volume-12

योग : प्राणायाम के शारीरिक प्रभाव


डॉ. के के दीपक

हमें अपने शरीर और मन को अच्छी हालत में रखने के लिये जीवनशैली आधारित अनेक सिद्धांत विरासत में मिले हैं. जीवनशैली के इन मार्गों में से एक योग है जो हमारे पूर्वजों ने हमें दिया है. योग खूबसूरती इस बात में है कि यह हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व - शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पहलुओं की देखरेख करता है. शारीरिक भाग लयबद्ध योग आसन द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है, मानसिक पहलु ध्यान और प्राणायाम से तथा इन सबसे ऊपर है, आध्यात्मिक पहलु जिसकी देखभाल दिव्यता पर एकाग्रता के जरिए की जाती है. जहां तक योग के फायदों का संबंध है, इसके विभिन्न घटकों के बीच परस्पर निर्भरता होती है.
 सबसे प्रचलित योग की परंपरा हठ योग है. इसमें मूलत: आठ चरण होते हैं: यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि. प्राणायाम सबसे महत्वपूर्ण चरण है. प्राणायाम श्वास का नियमन होता है. इसे वैज्ञानिक और सुंदर तरीके से, न केवल हमारे फेफड़ों, बल्कि अन्य कई शारीरिक प्रणालियों और अंगों को सघन व्यायाम के लिये डिज़ाइन किया गया है. इससे प्रभावित होने वाली प्रणालियां हैं - हृदय संबंधी प्रणाली, केंद्रीय नाड़ी प्रणाली, श्वास प्रणाली. इससे पेट, गुर्दे और लसीका प्रणाली भी प्रभावित हो सकती है लेकिन इनके बारे में कम अध्ययन हुआ है.
प्राणायाम की प्रक्रिया और प्रकृतियां
 प्राणायाम श्वसन चक्र के नियमन की एक विशिष्ट तकनीक है. चूंकि श्वसन इच्छाशक्ति के नियंत्रणाधीन है और यह एक स्वत: संचालित क्रिया है. हालांकि इसमें सीमाओं के भीतर रहकर संक्षेप में परिवर्तन किया जा सकता है. हम तीव्रता (दर) और आयाम (श्वास की गहराई) को बदल सकते हैं. हम तीन द्वारों से (मुंह, बाईं नासिका, दाईं नासिका और विभिन्न संयोजन) कई तरह से श्वास ले सकते हैं. प्राणायाम को विभिन्न प्रकृतियों में वर्गीकृत किया जा सकता है जो कि तीव्रता (दर), प्रयुक्त गहराई की डिग्री, खुलने के लिये प्रयुक्त प्रकृतियों और शारीरिक जोड़-तोड़ की संलग्नता. हमें विशेष सौभाग्य प्राप्त है कि हमारे पूर्वजों ने 5000 वर्ष पूर्व श्वसन पद्धति में बहुत ही सटीक वैज्ञानिक ढंग से परिवर्तन के बारे में सोचा था.
 कुछेक प्रकार के प्राणायामों के बारे में जानकारी सामान्य बात है जैसे कि अनुलोम विलोम प्राणायाम, दाईं नसिका से श्वास लेना और बाईं नसिका से श्वास लेना. कई अन्य प्रकार की प्रकृतियां भी हैं जिन्हें सारणीबद्ध किया गया है.
श्वसन व्यवहार की कई अन्य प्रकृतियां हैं जैसे कि सुदर्शन क्रिया, सुख प्राणायाम, सावित्री प्राणायाम, प्राणव प्राणायाम और कई अन्य प्रकृतियां. श्वसन क्रियाएं करते हुए इनमें विभिन्न क्रियाएं और भिन्न-2 स्थितियां होती हैं.
प्राणायाम शरीरक्रिया के प्रभाव
 चूंकि यह महत्वपूर्ण गैसों (ऑक्सीजन और कार्बन-डाई ऑक्साइड) के नियमन से संबद्ध है, इसमें परिचालन के नियम में बदलाव की क्षमता होती है. श्वसन वक्ष (सीने का खोल) में परिवर्तनकारी दबाव डालता है जहां हृदय, अन्य प्रमुख अंग और फेफड़े होते हैं. अत: वक्ष गृह दबावों में परिवर्तनों के कारण हृदय और बड़ी धमनियों में रक्त की उपलब्धता में बदलाव आता है. इस प्रकार श्वसन हृदय की गतिविधि को प्रभावित करता है. हृदय की गतिविधि से रक्त संचार प्रभावित होता है जिसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क का संचार प्रभावित होता है. वस्तुत: श्वसन पद्धति में परिवर्तन नियमन और विनियमित परिवर्तन बिंदुओं को सामान्य सीमाओं के भीतर हिलाता है. सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संकेतक हृदय और रक्त वाहिकाओं की स्थिति होती है. प्राणायाम इन महत्वपूर्ण पैरामीटर्स में प्रभाव और सुधार का सुविख्यात जरिया है.
श्वास से हृदय की गति में उतार चढ़ाव होता है:
  यह एक सुस्थापित तथ्य है कि जब हम श्वास अंदर लेते हैं तो हमारे हृदय की गति बढ़ जाती है और जब हम श्वास बाहर निकालते हैं तो हृदय की गति धीमी हो जाती है. यह प्रत्येक श्वसन चक्र (श्वास लेना और बाहर छोडऩा) में घटित होता है. यह व्यवस्था हमारी प्रणाली में स्वत: निर्मित और पक्की तार की तरह एक व्यवस्था है. यह प्रणाली हमारे स्वैच्छिक नियंत्रण में नहीं है बल्कि स्वत: नियंत्रित है. इस तंत्र की मज़बूती हमारे स्वायत्त स्वास्थ्य और इस तरह हमारे हृदय संबंधी स्वास्थ्य का संकेतक होती है. बच्चों की श्वसन क्रिया के साथ हृदय की धडक़न अधिक तेज़ होती है. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है श्वास और हृदय के बीच की इस दर में धीरे धीरे कमी होती जाती है. हमारी श्वसन क्रिया स्वचालित है लेकिन स्वैच्छिक नियंत्रण भी बहुत हद तक किया जा सकता है. शायद हमारे पूर्वजों को इसकी जानकारी थी. 5000 वर्ष पूर्व हमारी कथाओं में इस तथ्य का जिक्र है और श्वसन व्यायामों का उल्लेख है जो कि मनुष्य के संपूर्ण स्वास्थ्य लाभ के लिये श्वास क्रिया और हृदय के बीच के महत्वूपर्ण संबंध को स्थापित करते हैं.
श्वास से रक्त चाप में उतार चढ़ाव होता है
जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है कि हमारी श्वसन क्रिया हर समय हमारे हृदय की गति को प्रभावित करती है, इसी प्रकार से श्वसन हमारे रक्त चाप की प्रोफाइल में सही दोलन उत्पन्न करता है. यह क्रिया अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक होती है. श्वसन से रक्तचाप में दोलन होता है जो कि जटिल तंत्र के जरिये सृजित होता है. सबसे पहले श्वसन चक्र हमारे वक्ष में परिवर्तनकारी दबाव उत्पन्न करता है और इस तरह इसके प्रभाव से रक्तचाप बनता है और बड़ी मात्रा में रक्त हमारी छाती की गुहा में जमा हो जाता है. दूसरे श्वसन हृदय की गति को प्रभावित करते हुए रक्त चाप में भी दोलन संचारित कर सकता है.
धीमी और गहरी सांस से हृदय की धडक़न और रक्त चाप सिंक्रनाइज होते हैं
हमने अध्ययन में पाया है कि जब हम धीमी गति से श्वास लेते हैं, हृदय की धडक़न भी उसी फ्रिक्वेन्सी से संचालित होती है. रक्त चाप भी नई आवृत्तियों के अनुसार दोलन करना शुरू कर देता है.
विश्लेषण बताते हैं कि हृदय की धडक़न में परिवर्तन के कारण रक्तचाप में परिवर्तन होता है. हृदय की धडक़न और रक्त चाप दोलन में परिवर्तन प्रभावी संचार उपलब्ध करवाने के उद्देश्य के लिये एक दूसरे से जुड़े हैं.
 
धीमी श्वसन तकनीक
श्वसन क्रिया की प्रकृति- अनुलोम-विलोम (आल्टरनेट ब्रिदिंग)
युक्ति- बाईं नाक से सांस लेना और दाईं नाक से बाहर निकालना और इस क्रिया को जारी रखना
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- हृदय संबंध और स्वायत्त प्रभाव
      
श्वसन क्रिया की प्रकृति- दाईं नासिका से श्वास लेना
युक्ति- दाईं नाक से सांस लेना और बाईं नाक से बाहर निकालना
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- उत्तेजक प्रभाव, चयापचय में वृद्धि     
             
श्वसन क्रिया की प्रकृति- बाईं नासिका से श्वास लेना
युक्ति- दाईं नाक को बन्द करके बाईं नाक से सांस लेना
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- आराम प्रभाव, चयापचय में कमी, मस्तिष्क को सक्रिय करता है
                               
श्वसन क्रिया की प्रकृति- उज्जयी
युक्ति- दोनों नासिकाओं का प्रयोग करते हुए धीमे और गहरी सांस छोडऩा
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- स्वायत्त प्रभाव
             
तीव्र श्वसन तकनीकें                  
श्वसन क्रिया की प्रकृति- कपालभाति
युक्ति- तेज़ और बलपूर्वक श्वास छोडऩा और ग्रहण करना (दोनों नासिकाओं का प्रयोग करते हुए)
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- मस्तिष्क में संचार की वृद्धि, संज्ञानात्मक उत्तेजना, श्वसन प्रभाव
 
             
श्वसन क्रिया की प्रकृति- भ्रामरी  
युक्ति- गुनगुनाहट की ध्वनि के साथ सांस छोडऩा (दोनों नासिकाओं का प्रयोग करते हुए)
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- मस्तिष्क में संचार में वृद्धि, संज्ञानात्मक उत्तेजना
                      
श्वसन क्रिया की प्रकृति- शीताली  
युक्ति- जीभ मोडक़र मुंह के जरिए श्वास लेना (बाहर सांस छोडऩे के लिये दोनों नासिकाओं का प्रयोग करें)
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- श्वसन प्रभाव
 
श्वसन क्रिया की प्रकृति- भस्त्रिका (तीव्र एवं मुख से)
युक्ति- तेज़ी से श्वास बाहर छोडऩा
ज्ञात शारीरिक सिद्धांत प्रभाव- मस्तिष्क में संचार में परिवर्तन, संज्ञानात्मक उत्तेजना, श्वसन प्रभाव
      
हमारे अध्ययन में हमने यह ढूंढने का प्रयास किया है कि क्या श्वसन हृदय की धडक़न और रक्त चाप की दर के बीच कोई संबंध है. हमने पाया कि धीमे सांस लेने से श्वसन, हृदय की धडक़न और रक्तचाप दोलन में बेहतर तालमेल होता है. हमारे अध्ययन से एक ऐसा तंत्र उभरकर आया जिसमें धीमे श्वास लेने से हमारे हृदय संबंधी स्वास्थ्य पर पडऩे वाले प्रभावों का उल्लेख है. हमारे शोध में यह भी दर्शाया गया है कि श्वासक्रिया स्वचालित नियंत्रणों में होने वाले परिवर्तनों का हमारी शारीरिक बेहतरी से संबंध है. जेआईपीएमईआर पुदुच्चेरी से एक भारतीय अध्ययन में पाया गया कि दोनों प्रकार के प्राणायाम (धीमे और तीव्र) मानसिक संचालन में सुधार के लिये लाभदायक हैं, परंतु हृदय संबंधी सुधार के लिये, धीमा श्वास लेना फायदेमंद है.
अनेक अध्ययनों के अनुसार श्वसन क्रियाओं का कार्यात्मक बीमारियों से लडऩे के लिये हस्तक्षेप रणनीतियों के भाग के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. कार्यात्मक बीमारियां वे होती हैं जिनका रोग के संबंध में शरीर में निश्चित संरचनात्मक प्रभाव नहीं होता है. हमने स्वयं सुदर्शन क्रिया के दौरान स्वचालित परिवर्तनों के प्रलेखन के लिये अध्ययन संचालित किये हैं (भिन्न-भिन्न दरों पर श्वसन और निश्चित अंतराल के साथ गहरी सांस लेने की अच्छी तरह परिभाषित श्वसन किया). श्वसन की भिन्न-2 दरों पर पर्याप्त अंतरालों के साथ तेजी से श्वास लेने की क्रिया से अनेक फायदेमंद प्रभाव दजऱ् किये गये हैं. साहित्य में अनेक सकारात्मक बदलावों का उल्लेख किया गया है.
हृदय और रक्त वाहिकाओं पर श्वसन प्रभावों के तंत्र को समझने के वास्ते हमने 2002 में हाइपोथेसिस नामक एक तंत्र के बारे में सुझाव दिया था. हमारी शारीरिक प्रणालियों में सहनयोग्य सीमाओं के दौरान कोई भी सघन शारीरिक उत्तेजनाओं के अनुकूलन की व्यापक क्षमता है. एक अवधि के साथ शरीर प्रणाली प्रतिक्रिया अपनाने का प्रयास करता है. इन सिद्धांतों के सबूत मोटेे तौर पर शारीरिक प्रणालियों से उस वक्त उभर कर सामने आये जब पर्यावरणीय विपरीत स्थितियों जैसे कि ऊंचाई वाले स्थानों और वातावरण में उच्च परिवर्तनों के साथ गंभीर हाइपोक्शिया और गंभीर ताप परिवर्तनों की स्थिति सामने आई.
 सामान्य सीमाओं से अधिक श्वसन व्यायाम के रोज़ाना अभ्यास से तत्काल परिवर्तन और दीर्घावधि परिवर्तन देखने को मिलते हैं. यह अनुमान लगाया गया कि सामान्य सीमाओं से अधिक श्वसन की बार-बार होने वाली घटनाओं के परिणामस्वरूप संभावित उत्तेजना उत्पन्न होती है. यह उत्तेजना अगली बार बेहतर प्रणाली के निर्माण में मदद करती है. हमने धीमे श्वसन क्रिया के दौरान स्वचालित उत्तेजना स्तरों के मापन से इस हाइपोथेसिस का परीक्षण किया. हमने पाया कि तीव्र प्रयोगों के दौरान संवेदनशील गतिविधि में वृद्धि हुई है.
प्राणायाम के स्वास्थ्य और बीमारी में लाभकारी प्रभाव धीमी प्रकृति का प्राणायाम उच्च रक्त चाप, जो कि इन दिनों एक सुविख्यात मूक हत्यारा है, में सबसे अधिक फायदेमंद होता है. कई अध्ययनों से पता चला है कि धीमे श्वास लेने से हृदय की धडक़न में कमी होती है और उच्च रक्तचाप वाले मरीजों में ब्लड प्रेशर कम होता है. अनुलोम-विलोम (वैकल्पिक नासिका श्वसन) से रक्तचाप में कमी दजऱ् की गई है. अत: यह उच्च रक्तचाप से ग्रसित लोगों में अधिक प्रभावकारी है.
 मस्तिष्क के कामकाज पर प्राणायाम के अनेक सकारात्मक प्रभाव दजऱ् किये गये हैं. यह अनुभूति और व्यवहार दोनों में प्रभावकारी होता है. प्राणायाम स्मृति, एकाग्रता और समस्या समाधान में फायदेमंद होता है. प्राणायाम चिंता दूर करने और अवसाद के रोगियों के लिये फायदेमंद होता है. विभिन्न प्रकार के प्राणायाम तनाव दूर करने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं और इस तरह अनेक बीमारियों में फायदेमंद होते हैं जिनमें बीमारी का कारण अथवा इसे बढ़ाने का मुख्य घटक तनाव होता है. इस प्रकार विभिन्न प्रकार के प्राणायाम में शरीर के संकार्यों के संबंध में भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रभाव डालने की क्षमता होती है. इसका अर्थ है कि इनका मानव शरीर क्रिया में विनिर्दिष्ट प्रभाव होता है. वे विभिन्न प्रकार की बीमारियों में लाभकारी होते हैं.
 निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि धीमे प्राणायाम अभ्यास हृदय संबंधी समस्याओं के निदान और स्वायत्त स्थिति में सहायता करते हैं जबकि तीव्र श्वसन केंद्रीय नाड़ी तंत्र को सक्रिय करने में मददगार होता है. प्राणायाम से जुड़े व्यायामों का मिलाजुला लाभ होता है.
डा. के के दीपक प्रोफे़सर एवं अध्यक्ष, शरीरक्रिया विज्ञान विभाग, एम्स, नई दिल्ली-110029 हैं
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