संपादकीय लेख


Edition-17

विद्यार्थी और उपभोक्ता क़ानून

डॉ. शीतल कपूर

भारत में शिक्षा प्रदान करना अतीत काल से कभी भी व्यापारिक या वाणिज्यिक गतिविधि नहीं रहा है. परन्तु, आज शिक्षा के वाणिज्यीकरण ने विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को शैक्षणिक संस्थानों के प्रति सचेत कर दिया है. फिलहाल 12वीं कक्षा के परिणाम घोषित हो चुके हैं और विद्यार्थी विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने के प्रयास कर रहे हैं; ऐसे में यह जरूरी है कि वे अपने को सशक्त महसूस करें और कुछ कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों द्वारा अपनी विवरण पुस्तिकाओं तथा सूचना पुस्तिकाओं में किए जाने वाले लम्बे-लम्बे दावों और गुमराह करने वाली घोषणाओं के झांसे में न आएं.  
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत शिक्षा सेवाके दायरे में आती है, अत: कॉलेज और विश्वविद्यालय उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत आते हैं. कॉलेज और विश्वविद्यालय की सेवा में खामी होने या अनुचित पद्धति अपनाए जाने की स्थिति में विद्यार्थी/माता-पिता/अभिभावकों को उनके खिलाफ उपभोक्ता फोरम में शिकायत करने का अधिकार है.
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने इस बारे में एक ऐतिहासिक निर्णय भूपेश खुराना और अन्य बनाम विश्व बुद्ध परिषद, खंड-2(2001) सीपीजे 74 (एनसी), मामले में दिया, जिसमें यह प्रश्न उठाया गया था कि शिक्षा प्रदान करना क्या उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत आता है. मामले के तथ्यों के अनुसार   एक शैक्षिक संस्थान विश्व बुद्ध परिषद ने राष्ट्रीय अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित करते हुए विद्यार्थियों से बीडीएस पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे. परिषद ने विज्ञापन में लिखा था कि कॉलेज ‘‘मगध विश्वविद्यालय, बिहार और भारतीय दन्त्य परिषद, नई दिल्ली से ऐफिलिएटिड या संबद्ध है. 
विद्यार्थियों ने सदाशयता और विश्वास के साथ परिषद की सूचना को प्रामाणिक और सही समझा तथा बीडीएस कोर्स में दाखिला ले लिया. उन्होंने शैक्षिक संस्थान द्वारा विभिन्न शीर्षों के अंतर्गत मांगे जाने के अनुरूप भारी-भरकम रकम भी दाखिले के साथ अदा की. विद्यार्थियों ने पूरे सत्र के दौरान नियमित रूप से कक्षाओं में हिस्सा लिया. परन्तु, शिकायतकर्ता 11 विद्यार्थियों को उस समय बड़ा धक्का लगा जब उन्हें पता चला कि समय बीत जाने पर भी विश्वविद्यालय की परीक्षाएं आयोजित नहीं हुई. शिकायतकर्ताओं ने अपने माता-पिता के साथ इस शैक्षिक संस्थान से यह जानने का प्रयास किया कि मगध विश्वविद्यालय द्वारा वार्षिक परीक्षाएं आयोजित न करने का क्या कारण है? बार-बार अनुरोध करने और अनुस्मारक पत्र भेजने के बावजूद परीक्षाओं का कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया. शिकायतकर्ताओं ने अंतत: संचालन प्राधिकारी से संपर्क किया तो पता चला कि कॉलेज न तो मगध विश्वविद्यालय से संबद्ध है और न ही भारतीय दन्त्य परिषद से मान्यताप्राप्त है और यही वजह थी कि वह परीक्षाएं आयोजित नहीं कर पा रहा था. शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि उन्हें इस शैक्षिक संस्थान के कृत्यों से अपूर्णीय क्षति और आघात पहुंचा है और उन्होंने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करते हुए 1,21,94,000/- रुपये के हर्जाने का दावा किया. कॉलेज ने दलील दी कि उसने संस्थान को मान्यता दिलवाने के लिए सभी संभव उपाय किए, लेकिन उसके प्रयासों के बावजूद मंजूरी नहीं मिल सकी और इसका कारण शैक्षिक संस्थान के नियंत्रण से परे था. परीक्षाएं आयोजित न किए जाने का कारण भारतीय दन्त्य परिषद द्वारा निरीक्षण में विलम्ब था.
प्रतिवादी की दलीलों को नामंजूर करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने कहा कि विज्ञापन में दी गई यह जानकारी कि कॉलेज मगध विश्वविद्यालय से संबद्ध है और भारतीय दन्त्य परिषद से मान्यताप्राप्त है, किसी भी सामान्य जन के लिए यह समझने के लिए पर्याप्त है कि कॉलेज को भारतीय दन्त्य परिषद ने मान्यता प्रदान कर दी है और यह मगध विश्वविद्यालय से संबद्ध है.     
राष्ट्रीय आयोग ने व्यवस्था दी कि किसी शैक्षिक संस्थान द्वारा धन लेकर शिक्षा प्रदान करना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत सेवाके रूप में परिभाषित किया गया है. यह भी कि, विद्यार्थियों ने फीस का भुगतान शिक्षा संस्थान द्वारा शिक्षा प्रदान किए जाने के रूप में दी जाने वाली सेवाओं के लिए किया था. शिकायतकर्ताओं ने प्रतिवादी की सेवाएं खरीदी थीं, अत: वे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अनुसार उपभोक्ता समझे जाएंगे. अत: आयोग ने कॉलेज को आदेश दिया कि वह विद्यार्थियों को उनके द्वारा दाखिले के समय जमा करायी गई फीस वापस करे और उस पर फीस अदा किए जाने की तारीख से रिफंड की तारीख तक 12 प्रतिशत की दर से भुगतान करे. आयोग ने संस्थान को यह निर्देश भी दिया कि वह प्रत्येक विद्यार्थी को मानसिक पीड़ा और परेशानी के लिए रु. 20,000 का भुगतान भी करे.
इसलिए, माता-पिता और विद्यार्थियों को वांछित पाठ्यक्रम जिसमें वे दाखिला लेने के इच्छुक हों, और संबद्ध संस्थान के बारे में अपेक्षित जानकारी अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए, ताकि गुमराह करने वाले विज्ञापनों का शिकार होने से बचा जा सके.  यदि आपको लगे कि शैक्षिक संस्थान सेवा प्रदान करने में असक्षम है तो एक उपभोक्ता के रूप में आपको फीस रिफंड कराने का अधिकार है. अधिक ब्यौरे के लिए आप यूजीसी या एआईसीटीई की वेबसाइट देख सकते हैं ताकि यह मालूम किया जा सके कि जिस विश्वविद्यालय या कॉलेज में आप दाखिला लेने जा रहे हैं वह मान्यताप्राप्त है या नहीं है.
(लेखिका एक उपभोक्ता कार्य विशेषज्ञ हैं. ई-मेल: sheetal_kpr@hotmail.com लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं).
चित्र: गूगल के सौजन्य से