संपादकीय लेख


Vol.26, 2017

 
समग्र प्रगति के उद्देश्य से तेज रफ्तार गलियारे की दिशा में भारत की छलांग

जी. श्रीनिवासन

एनडीए सरकार ने भारत स्वातंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 2022 में आज़ादी की हीरक जयंती मनाने के लिए कमर कस ली है. यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि देश में तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन चलाने के दशकों पुराने स्वप्न को हीरक जयंती वर्ष में इस तरह की पहली ट्रेन चलाकर साकार किया जाए. इस दिशा में पहला कदम 14 सितंबर को गुजरात में गांधीनगर में उठाया गया जब भारत यात्रा पर आए जापान के प्रधानमंत्री श्री शिंजो आबे और भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक अनोखे शहर के रूप में पहचान बना चुके अहमदाबाद और भारत की वाणिज्यिक राजधानी मुंबई के बीच 508 किमी लंबी तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन परियोजना की आधारशिला रखी. श्री मोदी ने इस रेल परियोजना से देश में विकास में आनेवाली तेजी के महत्व और उपयोगिता को यह कह कर स्पष्ट रूप से रेखांकित कर दिया कि राष्ट्र को इस परियोजना से ‘‘अधिक उत्पादकता के साथ तेज रफ्तार संपर्क’’ का तोहफा भी मिलेगा. उन्होंने कहा कि यह प्रतिष्ठित बुलेट ट्रेन युगांतरकारी सिद्ध होगी और यह उस न्यू  इंडियाकी प्रतीक बनेगी जो उनकी सरकार 2022 तक बनते देखना चाहती है.        
मुंबई-अहमदाबाद तेज रफ्तार रेल परियोजना (एमएएचएसआर) ने देश में खुशी की जो लहर दौड़ाई है उसे कुछ स्थायी बनाने और परियोजना के निर्माण में भारी चुनौतियों तथा इसके पूरा होने पर अनगिनत नये अवसरों पर रोशनी डालने से पहले इसकी पृष्ठभूमि जानना उचित होगा. यह परियोजना जापान सरकार की तकनीकी और वित्तीय सहायता से पूरी की जाएगी. राष्ट्रीय तेज रफ्तार रेल कार्पोरेशन लिमिटेड (एनएचआरसीएल) को इस परियोजना का कार्य पूरा करने के लिए विशेष उद्देश्य कंपनी (एसपीवी) के रूप में निगमीकृत किया गया है. संयुक्त परियोजना रिपोर्ट में कहा गया है कि परियोजना 2022-23 में पूरी हो जाएगी. इसे देश की आजादी के 75वें वर्ष में 2022 में पूरा करने में प्रधानमंत्री मोदी की गहरी दिलचस्पी को देखते हुए परियोजना को पूरा करने की अंतिम समय सीमा एक साल आगे यानी 2022 कर दी गयी है.   
यूरोप के देशों, जापान और चीन में तेज रफ्तार ट्रेनों की हैरतअंगेज कहानियां सुनने के बाद अब भारत में इसी तरह की ट्रेन की शुरूआत की बात सुनना देशवासियों के लिए एक सपने के पूरे होने जैसा है. वैश्विक भू-राजनीतिक प्रवृत्तियों का विश्लेेषण करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि प्लेटिप्स के थूथन वाली नीले और सफेद रंग की शिनकानसेन (जापान की बुलेट ट्रेन का नाम) को बर्फ से ढके माउंट फूजी के पास से गुजरते देखना जापान के लोगों के लिए उतनी ही आम बात हो चुका है जितनी लोकप्रिय जापानी व्यंजन सुशीको खाना. अक्तू्बर 1964 से जब शिनकानसेन की शुरूआत हुई तो इसने तोक्यो और जापान के वाणिज्यिक केन्द्र ओसाका के बीच की 582 किलोमीटर की दूरी तय करने में चार घंटे का समय लिया था (अब यह 2 घंटा 22 मिनट लेती है). शिनकानसेन विश्वयुद्ध के बाद जापान के आर्थिक समृद्धि के शिखर पर पहुंच कर दुनिया में आर्थिक वर्चस्व प्राप्त करने का प्रतीक बन गयी है. जापान की बुलेट ट्रेन इस द्वीप देश की इंजीनियरी में श्रेष्ठता और सुरक्षा तथा समयबद्धता का प्रतीक बन गयी है. अब तक यह ट्रेन 10 अरब यात्रियों को बिना एक भी दुर्घटना के उनके गंतव्यों  तक पहुंचा चुकी है. इसके आने-जाने में औसतन एक मिनट की देरी हुई है जो किसी भी अन्य रेल प्रणाली के लिए ईष्र्या की बात हो सकती है.     
ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं अगर प्रधानमंत्री मोदी इस बात से आश्वस्त हैं कि अपनी कार्यकुशलता से यह ट्रेन जो फायदे लेकर आएगी उनका आकलन नहीं किया जा सकता. यही वजह है कि परियोजना की नींव रखने के समारोह में उन्होंने कहा कि तेज रफ्तार रेल गलियारे को समग्र आर्थिक विकास के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
उनका अभिप्राय यह था कि जितना समय हवाई अड्डे जाने और वहां से विमान पकडऩे में लगता है उतने समय में बुलेट ट्रेन यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचा देगी. आम यात्रा में आने वाली ट्रैफिक जाम, प्रदूषण और रोड रेज़ जैसी तमाम बाधाओं से मुक्त यह ट्रेन यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने में सामान्य़ ट्रेन से आधा समय लेगी. इससे जीवाश्म ईंधन की कम खपत होगी जिससे काफी बचत होगी.
जापान के लिए यह प्रतिष्ठित परियोजना बड़ी मेहनत से अर्जित कार्य है क्योंकि वह भारत के साथ दोस्ती को नीतिगत उपलब्धि और एक तरह से भू-राजनीतिक जीत के रूप में देखता है क्योंकि उसने चीन को पछाड़ कर इस परियोजना का ठेका हासिल किया. जापान परियोजना के लिए 12 अरब डालर का ऋण 0.1 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर दे रहा है जिसे भारत को 50 साल में लौटाना होगा. इसमें परियोजना की अनुमानित लागत के 80 प्रतिशत का ध्यान रखा गया है. जापान ने तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण पैकेज के रूप में भी उदारता दिखाई है.
भारत में बुलेट ट्रेन परियोजना को नये परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है. भारत में पहली ट्रेन 1853 में मुंबई और ठाणे के बीच चली थी और 34 किलोमीटर की दूरी को तय करने में इस ट्रेन ने करीब एक घंटा लिया था. एक शताब्दी और कई दशकों के बाद अपनी औसत रफ्तार (60 किमी प्रति घंटा) के लिहाज से भारतीय रेल दुनिया की सबसे सुस्त रेल प्रणाली में शुमार होती है.       
यहां तक कि हमारी सबसे तेज रेलगाड़ी गतिमानकी अधिकतम रफ्तार 160 किमी प्रतिघंटा है. लेकिन अगर चीजें अधिकारियों के हिसाब से चलती रहीं तो भारत की तेज रफ्तार बुलेट ट्रेन इससे दुगनी से भी अधिक गति से चलेगी. और जब यह होगा तो बहुत से भारतीय सुविधा और आराम का सुखद अनुभव एकसाथ करेंगे.  
बुलेट ट्रेन के आलोचकों के लिए यह परियोजना एक बकवास हो सकती है, मगर यह बताना जरूरी है कि बुलेट ट्रेन मौजूदा सडक़, विमान और रेल यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करेगी. इसके साथ ही यह उन लोगों को भी रेल यात्रा के लिए आमंत्रित करेगी जो तेज गति से यात्रा के नये अनुभव का सुखद अहसास करना चाहते हैं.   
निजी क्षेत्र की तरफ से कम और धीमे निवेश की वजह से त्रस्त अर्थव्यवस्था में जब सरकार सार्वजनिक निवेश के रूप में बड़ी धनराशि हासिल कर रही है तो यह कम लागत वाली अतिरिक्त पूंजी के उपयोग का शानदार तरीका है. भारत को आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए दुनिया भर से अब पर्याप्त पूंजी कम लागत पर मिलने लगी है. शुरूआती परेशानियों और प्रबंधकीय अफरा-तफरी से निजात पाने के बाद तेज रफ्तार रेल परियोजना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए निश्चित रूप से अनगिनत फायदे लेकर आएगी. इसकी परेशानियों को सुविचारित योजनाओं और अनुपालन के कठोर मानदंडों पर अमल से तथा कार्यक्रमों को नियत समय पर पूरा करके दूर कर लिया जाएगा. 
लेखक द हिंदू ग्रुप में डिप्टी एडिटर रह चुके हैं और इस समय आर्थिक विषयों पर फ्रीलांस टिप्पणीकार हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके अपने निजी विचार हैं.
चित्र: गूगल के सौजन्य से