संपादकीय लेख


Vol.26, 2017

पंडित दीनदयाल उपाध्याय: एक रचनात्मक दृष्टिकोण

स्वदेश सिंह

एक संयोजक, नेता, राष्ट्र सेवा प्रचारक-दीनदयाल उपाध्याय अनेक खूबियों से परिपूर्ण थे. वे अपने कॉलेज के दिनों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल हो गये थे और बाद में इसके एक पूर्णकालिक सदस्य के तौर पर काम किया. उस वक्त जैसा कि दो संगठनों के बीच होता था, उपाध्याय को भारतीय जन संघ को सौंप दिया गया, जब डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आरआरएस नेतृत्व के साथ विचारविमर्श करके इस पार्टी की स्थापना की थी. उन्हें पार्टी का महासचिव बनाया गया और डा. एस पी मुखर्जी 1951 में अध्यक्ष बन गये परंतु दो वर्ष के बाद संदिग्ध स्थितियों में उनकी मौत हो गई. दीनदयाल उपाध्याय ने पार्टी की गौरवपूर्ण राष्ट्रीय संरचना, वैचारिक जड़ें और सार्वजनिक स्वीकार्यता के वास्ते अथक प्रयास किये. दीनदयाल उपाध्याय ने उस कठिन दौर में पार्टी के महासचिव के तौर पर कार्य किया. वह 1967 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बन गये परंतु कुछ महीनों बाद ही उनकी मृत्यु हो गई. उनका शव 11 फरवरी, 1968 को वाराणसी के निकट मुगल सराय (अब दीनदयाल नगर) के प्लेटफार्म पर पड़ा मिला.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नाना देशमुख और कई अन्य नेताओं का मार्गदर्शन किया जिन्होंने भारतीय जनसंघ, और बाद में भारतीय जनता पार्टी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उनके निकटवर्ती साथी अटल बिहारी वाजपेयी 1996 में देश के प्रधानमंत्री बने और वे इस पद पर आसीन होने वाले भारत के पहले ग़ैर कांग्रेसी नेता थे. पंडित उपाध्याय एक चतुर राजनीतिक रणनीतिकार थे जिन्होंने गठबंधन की राजनीति के महत्व को समझा, जिसने आने वाले दशकों में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी. राम मनोहर लोहिया, चरण सिंह और अन्य के साथ उन्होंने पहली बार 1963 में कांग्रेस के खिलाफ एक गठबंधन खड़ा किया जिसके परिणामस्वरूप नौ राज्यों में कांग्रेस की भारी पराजय हुई. भारतीय राजनीति के इतिहास में यह एक मोड़ था क्योंकि इसने राजनीतिक क्षेत्र में बहुलता की जगह बनाई और इस विश्वास को तोड़ दिया कि कांग्रेस को हराने वाला कोई नहीं है. 1977 में गैर कांग्रेसी विकल्प के उनके सपने ने मूर्त रूप लिया जब जनता पार्टी ने केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार का गठन किया.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय उन असाधारण व्यक्तित्वों में से एक थे जिसने आधुनिक भारतीय राजनीति को मानवता के संघटनात्मक (ऑर्गेनिक) आधार पर खड़ा होने के लिये प्रेरित किया. उपाध्याय की मृत्यु के पश्चात् उनकी महानता की प्रशंसा उनके समर्थकों के साथ-साथ विरोधियों ने भी की. प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता नाथ पाई ने उन्हें तिलक, गांधी और सुभाष के चरित्र के बीच का संपर्क सूत्र बताया. सीपीआई नेता हिरेन मुखर्जी ने उन्हें अजात शत्रु (किसी का भी दुश्मन नहीं) और आचार्य कृपलानी ने उन्हें दैव संपदा बताया था. परंतु यह दुखद है कि अभी तक दीनदयाल उपाध्याय को भारत के बौद्धिक और राजनीतिक इतिहास में उचित स्थान मिलना बाकी है.
राजनीतिक दार्शनिक
पंडित उपाध्याय एक महान विचारक और देशभक्त थे. वे 20वीं सदी की सर्वोत्कृष्ट बुद्धिशीलताओं में से एक थे जिन्होंने भारतीय राजनीति के क्षेत्र में एक समानांतर मार्ग प्रदान करने का प्रयास किया और भारत की सभ्यतामूलक यात्रा में योगदान किया. वह भारत की प्रकृति और परंपरा के अनुरूप राजनीतिक दर्शन की आकांक्षा रखते थे, जिसके तहत भारत का चहुंमुखी विकास सुनिश्चित हो सके. उन्होंने एकात्म  मानववादके राजनीतिक दर्शन को प्रतिपादित किया जो कि भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के हरेक कार्यकर्ता के लिये आधार स्तम्भ बना. अमरीकी समाजविज्ञानी नार्मेन पालमर ने उनके बारे में कहा था, ‘‘भारत में अनेक प्रभावशाली राजनीतिक नेता हुए हैं जो कि राजनीतिक दार्शनिक कहे जाने का भी दावा रखते थे. दीनदयाल उपाध्याय इस समूह से संबंधित थे... एक राजनीतिक विचारक और सामर्थ्यवान नेता दीनदयाल उपाध्याय, न केवल एक आंदोलन, पार्टी अथवा राष्ट्र से संबंधित हैं, बल्कि विचार और अनुभव की बहुत बड़ी दुनिया से जुड़े हैं.‘‘
अमरीकी राजनीतिक विज्ञानी वाल्टेर एंडरसन ने यह कथन दीनदयाल पर अमरीका में उनकी 10वीं जयंती के अवसर पर एक संगोष्ठी में व्यक्त किया था, ‘‘एक राजनीतिक दार्शनिक का कार्य मनुष्य की वास्तविक प्रकृति को स्पष्ट करना और उसके आधार पर  एक अच्छे राजनीतिक क्रम की स्थितियों को परिभाषित करना होता है. यह वह कार्य था जिसे उपाध्याय ने अपने लिये पुणे में ‘‘एकात्म  मानववाद’पर अपने भाषणों में निर्धारित किया था.
एकात्म  मानववाद
पंडित उपाध्याय ने एकात्म  मानववादके तौर पर जाने जाने वाले विचारों का सूत्रपात किया. उन्होंने इसे अप्रैल, 1965 में पुणे में दिये गये चार भाषणों में व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया. इस मामले में उनके विचार बिंदुओं को पहले ही विचारविमर्श के लिये जनसंघ के पास प्रस्तुत किया जा चुका था और जनवरी, 1965 में विजयवाड़ा में पार्टी के मौलिक वैचारिक बयान के तौर पर स्वीकार किया गया. उपाध्याय ने दिसंबर, 1967 में कालीकट में जन संघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन में व्यावहारिक राजनीति में एकात्म मानववाद की अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रणालीगत शुरूआत कर दी.
उपाध्याय के लिये, कोई भी व्यवस्था जिसमें मनुष्य को महत्व नहीं मिलता, अंतत: उसका पतन हो जाता है. एकात्म मानववाद के तौर पर उनके बौद्धिक विचार मनुष्य का स्थान सही परिप्रेक्ष्य में पुन:स्थापित करता है और उसे संपूर्ण व्यक्तित्व के तौर पर विकसित करने का प्रयास करता है. उपाध्याय के एकात्म मानववाद के इस सिद्धांत का मूल पुराने भारतीय संतों के ज्ञान से प्रेरित है जिसे उन्होंने कई हजारों वर्ष पहले मानवता को प्रदान किया था. वे लिखते हैं, ‘‘मनुष्य, परमात्मा की सर्वोत्तम कृति, अपनी खुद की पहचान को खो रही है. उसे हमें अपनी सही स्थिति में पुन:स्थापित करना चाहिये, उसे अपनी महानता की वास्तविकता में लेकर आना चाहिये, अपने प्रच्छन्न व्यक्तित्व की दिव्य ऊंचाइयों को छूने का प्रयास करना चाहिये. यह केवल विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था के जरिए ही संभव है. स्वदेशी और विकेंद्रीकरण दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें संक्षेप में वर्तमान स्थितियों के लिये उपयुक्त आर्थिक नीति के तौर पर उद्धृत किया जा सकता है.’’
पंडित उपाध्याय ने पूंजीवाद और साम्यवाद दोनों को नामंजूर कर दिया क्योंकि दोनों ही आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण से संबंधित संव्यवहार करते हैं. पूंजीवाद में धन का संकेंद्रण कुछ ही लोगों के हाथों में होता है और साम्यवाद के मामले में राज्य के हाथों में होता है. उपाध्याय 1965 के आरंभ में कम्युनिस्ट पुनरोदय से परिचित थे. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह सिद्ध करने के लिये कि कम्युनिस्ट देशों में उत्पीडऩ करने वाले अधिकारियों के एक नई श्रेणी का उद्भव हो गया है’, ‘नई श्रेणी’ (एम. डिजिलास) को उद्धृत किया था.
जब सामाजिक विचारक व्यवहार और बुद्धिमत्ता-आर्थिक व्यक्ति, प्रौद्योगिकीय व्यक्ति, चिंतनशील व्यक्ति और चौथा-एकात्म मानववाद के आधार पर विभिन्न प्रकार के लोगों के बारे में बात करते हैं तो एकात्म  मानववाद किसी व्यक्ति में पूर्णरूपेण चश्मे की तरह पक्षों की कल्पना करता है. प्रत्येक पक्ष एक दूसरे से अलग होता है, एक का दूसरे के बिना कोई अर्थ नहीं होता है. यह मनुष्य में ऊर्जा के चार केंद्रों-शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की विशेषताओं को प्रतिबिंबित करती है जिनसे उसके विविध विचार और कार्रवाइयां जन्म लेती हैं. सभी चारों केंद्र मनुष्य का अभिन्न हिस्सा होते हैं, यद्यपि समाज के नियमों और मनुष्य की अपेक्षाओं के अनुरूप उनकी प्रचालन सघनता भिन्न होती है.
एकात्म मानववाद पहला प्रयास मनुष्य की नई और क्रांतिकारी अवधारणा के इस्तेमाल का प्रयास करती है. अवधारणा से ऊपर जाकर यह सर्वप्रथम मानवीयता, संपर्क, सहकारी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के कुछ विवरण तैयार करता है और यही प्रथमत: हमें व्यवस्था की व्यवहार्यता के प्रति जागरूक करने वाला होता है यदि हम वास्तव में अपने उत्पीडऩ और अमानवीयता का कोई विकल्प चाह रहे होते हैं.
पंडित उपाध्याय का तर्क था कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से एक सामाजिक प्राणी है जो कि शरीर, मन और आत्मा की जरूरतों की संतुष्टि के लिये सामूहिक प्रयास करता है. धर्म वे नियम होते हैं जो कि मनुष्य को इन आवश्यकताओं को पूरा करने और सौहर्द से रहने में सहायता करते हैं. वास्तव में, सामाजिक सौहार्द के बिना मानवीय जरूरत की संतुष्टि असंभव है. अत: अच्छा समाज वह होता है जो कि एक ऐसे तंत्र के तौर पर काम करता है जिसमें हरेक व्यक्ति राष्ट्र की भलाई के लिये काम करता है. उनका कहना था कि प्रत्येक राष्ट्रीय संस्था (जिसे उन्होंने चिंटी के तौर पर संबोधित किया)  की अपनी पहचान अथवा राष्ट्रीय संस्कृति होती है जो कि एक विनिर्दिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के भीतर लोगों के साथ लंबे समय से संबद्ध रहती है.
पंडित उपाध्याय आर्थिक और राजनीतिक दोनों शक्तियों का विकेंद्रीकरण चाहते थे. वे जीवन को संपूर्णता मानते थे और जीवन के संपूर्णता की बात करते थे. उपाध्याय के सामाजिक-आर्थिक समानता का मूल मंत्र व्यक्ति विशेष के उचित कर्म और वह भी धर्म के अनुरूप की गई कार्रवाई था. उन्होंने धर्म को ऐसे अन्तर्जात नियमों के तौर पर परिभाषित किया जो कि संबद्ध संस्था की स्थिरता और आगे अस्तित्व तथा प्रगति के लिये उसकी सेवा में होते हैं.
सुब्रह्मणियन स्वामी ने एकात्म मानववाद के एक दर्शन में निबंध की रचना की थी. उनके लिये एकात्म मानववाद का उद्देश्य व्यक्ति की प्राथमिकता पुरुषार्थ के संतुलित विकास के जरिए अधिकतम राष्ट्रीय विकास, विकास रणनीतिक संघर्ष का संकल्प और सौहार्द, सरपरस्ती और तपस्या के जरिए संसाधन जुटाना तथा सांस्थानिक ढांचे का विकेंद्रीकरण और आत्मनिर्भरता के लिये है.
पंडित उपाध्याय ने पश्चिमी अवधारणा को अस्वीकार कर दिया और तर्क दिया कि प्रत्येक राष्ट्र की एक विशिष्ट राष्ट्रीय अवधारणा, उसके भौतिक वातावरण और सामूहिक अनुभव से निर्मित होती है जिससे उसके राजनीतिक और सामाजिक जीवन का पता चलता है. एकात्म मानववाद की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए दीनदयाल उपाध्याय ने दुनिया के समक्ष एक नया मौलिक वैकल्पिक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत किया था.
सरकार के विभिन्न स्वरूपों में से उन्होंने लोकतंत्र को सर्वाधिक स्वाभाविक माना क्योंकि यह राष्ट्र को अपने भाग्य के निर्माण में सीधे अवसर प्रदान करता है. 1965 में, जनसंघ के सिद्धांतों का बयान उनकी एकात्म मानववाद की अवधारणा पर आधारित था जिसमें चेतावनी दी गई थी कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक दिखावा मात्र है जब तक कि इसके साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को न जोड़ा जाये. इन शर्तों के बगैर राजनीतिक व्यवस्था का कुछेक विशेषाधिकार प्राप्त लोग अपने लाभ के लिये इस्तेमाल करते रहेंगे.
अंत्योदय
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय की अवधारणा को भी प्रतिपादित किया जिसका अर्थ है कतार में खड़े आखिऱी व्यक्ति तक का कल्याण. दीनदयाल उपाध्याय ने आम आदमी के उद्धार के लिये बहुत कुछ लिखा और आवाज़ उठाई. उनके विचार में राजनीति का संपूर्ण उद्देश्य गरीबों और वंचितों के लिये काम करना था. दीनदयाल की प्रेरणा का स्रोत गऱीब, मज़बूर, परंपरागत-बंधुआ आम आदमी थे, जो कि सदियों तक विदेशी उत्पीडऩ और कुशासन को सहते रहे और राष्ट्र की आत्मा को जीवंत रखा. उनके अधिकतर राजनीतिक बयानों में वे इस बात पर सहमति होते दिखाई दिये कि देश का भविष्य इस आम आदमी के हाथों में है और महसूस किया कि उसे आधुनिक वास्तविकताओं के समकक्ष लाना बहुत जरूरी है. उन्होंने लिखा था, ‘‘मैं अपने देश की उन्नति का मूल्यांकन इस बात से नहीं करूंगा कि सरकार ने क्या कुछ किया है अथवा वैज्ञानिकों ने क्या हासिल किया बल्कि मैं अपने देश की उन्नति का मूल्यांकन एक गांव में किसी व्यक्ति की उन्नति के संबंध में, अपने बच्चों को बेहतर जीवन प्रदान करने की उसकी योग्यता के दृष्टिगत करूंगा.‘‘
उन्होंने इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये स्वयं को कर्म योगी घोषित कर दिया और सबसे इसी प्रकार से काम करने को कहा. 1967 में अपने अध्यक्षीय भाषण में, उन्होंने गरीबों और शक्तिहीन लोगों के लिये मज़बूत समर्थन अभिव्यक्ति के साथ किया, ‘‘प्रत्येक देशवासी हमारे खून का खून है और मांस का मांस है. हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक कि हरेक को ये स्वाभिमान नहीं प्राप्त होगा कि वह भारत माता के पुत्र हैं. हम भारत माता को सुजला, सुफला (फलों से लदी और किनारों से बहता पानी) शब्दों के सही अर्थों में खड़ा करेंगे.’’
पंडित दीनदयाल उपाध्याय 20वीं सदी के वास्तविकता से सर्वाधिक कम करके आंके गये भारतीय राजनीतिज्ञों में से एक हैं. उन पर अधिक से अधिक अध्ययन करने की आवश्यकता है. वही एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कांग्रेस पार्टी का एक व्यवहार्य विकल्प उपलब्ध करवाते हुए भारतीय लोकतंत्र को मज़बूती प्रदान की थी जिसकी चमक आज़ादी के वर्षों के बीतने के साथ-साथ फ़ीकी होती जा रही थी. नई पीढ़ी एक विकल्प की प्रतीक्षा कर रही थी जिसके लिये दीनदयाल उपाध्याय ने आधार तैयार किया. उनका दर्शन इस मिट्टी में गहरी जड़ें जमा चुका था और उनके दर्शन चिह्नों को इस देश की सांस्कृतिक प्रकृति में ढूंढा जा सकता है जो कि हजारों वर्षों पुरानी है. उन्होंने न केवल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिये एक संवर्ग को तैयार किया बल्कि अपने आदर्शों को हकीकत में बदलने के लिये संगठन को मज़बूत आधार प्रदान किया.
निष्कर्ष
पार्टी, जिसकी उपाध्याय ने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर स्थापना की थी अब पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में है और आधे से अधिक राज्यों में उसकी सरकारें हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ, सबका विकासके मंत्र के साथ लगातार काम कर रहे हैं, जो कुछ ओर नहीं बल्कि आधी सदी पहले उपाध्याय द्वारा सुविचारित अवधारणा-अंत्योदय के 21वीं सदी के अवतार हैं.
भाजपा के कार्यक्रम और नीतियां दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की कल्पना के अनुरूप हैं जिन्हें अब प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हक़ीकत में बदला जा रहा है. अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वर्तमान सरकार समाज के वंचित वर्गों को सशक्त करने और सभी के लिये सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के सभी प्रयास कर रही है, दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का अध्ययन करना बहुत आवश्यक हो जाता है.
(लेखक सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाते हैं) ई-मेल :swadesh171@gmail. Com लेखक के विचार उनके निजी हैं.
चित्र: गूगल के सौजन्य से