संपादकीय लेख


Editorial Article

नई कपड़ा नीति
रोज़गारों के अवसरों में बढ़ोतरी

डॉ. सीमा शर्मा

भारत सरकार द्वारा घोषित नई कपड़ा नीति भारतीय अर्थव्यवस्था के सर्वाधिक संभावनाशील क्षेत्रों में से एक वस्त्र क्षेत्र को प्रमुख शक्ति प्रदान करेगी। भारतीय वस्त्र क्षेत्र देश के लिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने वाला एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत विविध प्रकार के टेक्सटाइल्स का निर्यात करता है। इनमें प्राकृतिक, रीजेनेरेटिड सेल्यूलोस और सिंथेटिक फाइबर्स शामिल हैं। बांग्लादेश, चीन और पाकिस्तान जैसे कम लागत वाले आपूर्तिकर्ताओं के साथ प्रतिस्पर्धा के बावजूद देश के टेक्सटाइल निर्यात ने हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण कार्य किया है। सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए व्यापक सुधारों के बाद वस्त्र उद्योग के रचनात्मक मूड से इस क्षेत्र में निवेश और रोज़गार को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

भारत में वस्त्र उद्योग वर्तमान में 100 अरब अमरीकी डॉलर से अधिक मूल्य का होने का अनुमान है। यह कृषि के बाद रोज़गार प्रदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है, जिसमें 45 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष और 6 करोड़ लोगों को परोक्ष रोज़गार मिला हुआ है। इनमें सूती वस्त्रों, हथकरघा, ऊनी वस्त्रों के विनिर्माता, आपूर्तिकर्ता, थोक व्यापारी और निर्यातकों के साथ-साथ टेक्सटाइल मशीनरी और उपकरण विनिर्माता, रंजक और कच्चा माल आपूर्तिकर्ता, तैयार वस्त्र, फैब्रिक्स और गारमेंट्स के वितरक शामिल हैं। धागे का उत्पादन अधिकतर मिलों में होता है, जबकि फैब्रिक्स का निर्माण पावरलूम और हैंडलूम क्षेत्र में किया जाता है। वस्त्र उद्योग का सकल घरेलू उत्पाद में करीब 5 प्रतिशत प्रत्यक्ष योगदान है। यह क्षेत्र औद्योगिक उत्पादन के समग्र सूचकांक में करीब 14 प्रतिशत योगदान करता है।

भारत के समग्र वस्त्र उद्योग में करीब 60 प्रतिशत योगदान कपास आधारित है और भारत विश्व में फाइबर का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। अन्य प्रमुख उत्पादित फाइबरों में रेशम, पटसन, ऊन और कृत्रिम फाइबर शामिल हैं। भारतीय वस्त्र उद्योग का अतीत अत्ंयत समृद्ध रहा है। वैदिक साहित्य में न केवल वस्त्र विनिर्माण के बारे में बल्कि व्यापक व्यापार संबंधी उल्लेख मिलते हैं। इतिहास हमें बताता है कि भारत की विनिर्माण प्रौद्योगिकी विश्व में सर्वोत्कृष्ट प्रौद्योगिकियों में से एक थी। उपनिवेश काल से पहले कपड़ा बुनने की हस्त संचालित भारतीय मशीनें विश्व में सर्वश्रेष्ठ थीं। ब्रिटेन और जर्मनी जैसे नव-औद्योगिक देशों में प्रारंभिक टेक्सटाइल मशीनों के उत्पादन के लिए भारतीय मशीनों और प्रौद्योगिकी ने एक मॉडल के रूप में काम किया।

भारत में वस्त्र उद्योग कच्चे माल से लेकर तैयार माल तक यानी फाइबर से लेकर रिटेल तक लंबवत एकीकृत है। प्रौद्योगिकी उन्नयन कोश कार्यक्रम (टीयूएफएस) जैसे विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए भारत सरकार इस क्षेत्र को उदार सहायता प्रदान कर रही है। टीयूएफएस प्रारंभ होने के साथ ही 31 मार्च, 2014 तक इस क्षेत्र में ढाई लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया गया और 18,57940 करोड़ रुपये सब्सिडी के रूप में जारी किए गए।

नई सदी के प्रारंभ से ही भारतीय वस्त्र उद्योग में बढ़ोतरी का रुख देखा जा रहा है। निर्यात की बात करें तो इस दौरान (1999-00 से 2014-15 तक) यह मात्र 1052 अरब अमरीकी डॉलर मूल्य से बढ़ कर 3853 अरब अमरीकी डॉलर पर पहुंच गया। इससे भारतीय वस्त्र उद्योग में तेजी के रुख का पता चलता है।

रोज़गार सृजन और निर्यात संवर्धन के लिए विशेष पैकेज-सरकार ने अनेक ऐसे उपायों की घोषणा की है, जो श्रमिकों के अनुकूल हैं और जिनसे उत्पादन की संभावनाएं बढ़ेंगी, रोज़गार सृजन को बढ़ावा मिलेगा, बड़े पैमाने पर उत्पादन किफायती सिद्ध होगा और निर्यात में वृद्धि होगी। ये उपाय सरकार द्वारा घोषित सुधारों के पैकेज के परिप्रेक्ष्य में सामने आए हैं। इन सुधारों से बड़ी संख्या में रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे और अगले 3 वर्षों में 74,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा सकेगा। नए रोज़गार अधिकतर महिलाओं को मिलने की उम्मीद है, क्योंकि वस्त्र उद्योग में करीब 70 प्रतिशत महिला कार्मिक काम करती हैं। इस तरह यह पैकेज महिला सशक्तिकरण के जरिए सामाजिक परिवर्तन लाने में मददगार सिद्ध होगा। घोषित पैकेज की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं:-

कर्मचारी भविष्यनिधि सुधार कार्यक्रम-भारत सरकार वस्त्र उद्योग के 15,000 रुपये प्रति माह से कम वेतन पाने वाले नए कर्मचारियों के लिए प्रथम तीन वर्ष की अवधि हेतु कर्मचारी भविष्यनिधि योजना के अंतर्गत नियोक्ता का समूचा 12 प्रतिशत अंशदान वहन करेगी। वर्तमान में प्रधानमंत्री रोज़गार प्रोत्साहन योजना (पीएमआरपीवाई) के अंतर्गत नियोक्ता के अंशदान का 833 प्रतिशत पहले ही सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है। कपड़ा मंत्रालय अगले 3 वर्षों में नियोक्ता के अंशदान के रूप में 367 प्रतिशत अतिरिक्त भुगतान करेगा, जो 1,170 करोड़ रुपये से अधिक होगा। प्रति माह 15,000 रुपये से कम वेतन वाले कर्मचारियों के लिए ईपीएफ वैकल्पिक होगा। इससे श्रमिक के हाथ में अधिक धन आएगा और औपचारिक क्षेत्र में रोज़गार को बढ़ावा भी मिलेगा।

समयोपरि भत्ते की सीमा में बढ़ोतरी-श्रमिकों के लिए समयोपरि घंटे अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के नियमों के अनुरूप प्रति सप्ताह 8 घंटे से अधिक नहीं हो सकते। इनमें वृद्धि से श्रमिकों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी।

नियत कालिक रोज़गार की शुरुआत- वस्त्र उद्योग के मौसम आधारित स्वरूप को देखते हुए कपड़ा क्षेत्र के लिए नियत कालिक रोज़गार प्रणाली शुरु की जाएगी। श्रम के घंटों, मजदूरी, भत्तों और अन्य सांविधिक देयों के संदर्भ में नियत कालिक श्रमिक को स्थायी कार्मिकों के समकक्ष समझा जाएगा।

एटीयूएफएस के अंतर्गत अतिरिक्त प्रोत्साहन- पैकेज के अंतर्गत निवेश के स्थान पर उत्पादन आधारित प्रोत्साहन को अपनाते हुए नई जमीन तैयार करने का प्रयास किया गया है, जिसमें रोज़गार सृजन को बढ़ावा देने हेतु कपड़ा क्षेत्र के लिए संशोधित -टीयूएफएस के अंतर्गत सब्सिडी 15 से बढ़ा कर 25 प्रतिशत की गई है। इस कार्यक्रम की एक बेजोड़ विशेषता यह है कि सब्सिडी का संवितरण प्रत्याशित रोज़गार के अवसर सृजित करने के बाद किया जाएगा।

संवर्धित ड्यटी ड्राबैक कवरेज- अपनी तरह के प्रथम उपाय के रूप में, ऐसे राज्य करों को रिफंड करने का एक नया कार्यक्रम शुरु किया जाएगा, जो अभी तक रिफंड नहीं किए जाते थे। इस उपाय से सरकारी खजाने पर 5500 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा, लेकिन विदेशी बाजार में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाने में व्यापक मदद मिलेगी। सभी औद्योगिक मूल्यों पर ड्राबैक की सुविधा घरेलू शुल्क अदा किए गए इनपुट्स पर दी जाएगी, भले ही फैब्रिक्स अग्रिम प्राधिकरण कार्यक्रम के अंतर्गत आयात किए गए हों।

आयकर अधिनियम की धारा 80 जेजेएए का दायरा बढ़ाना- वस्त्र उद्योग के मौसमी स्वरूप को देखते हुए आयकर अधिनियम की धारा 80 जेजेएए के अंतर्गत 240 दिन का प्रावधान वस्त्र उद्योग के मामले में 150 दिन तक शिथिलनीय किया गया है।

कच्चे माल और मानव कौशल की सुनिश्चित आपूर्ति के अंतरनिहित फायदों से युक्त इस उद्योग को दी जा रही विस्तृत सुविधाओं से विश्व के समान प्रौद्योगिकी उन्नयन के संदर्भ में मूलभूत परिवर्तनों को बढ़ावा मिलेगा। कोर क्षेत्र में निवेश और इस उद्योग के आधुनिकीकरण से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ेगी और उत्पादन, निर्यात में बढ़ोतरी के साथ साथ देश में रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे। कपड़ा इकाइयों की बढ़ती संख्या से इस क्षेत्र में मूल्य संवर्धन होगा और यह वैश्विक बाजार की जरूरतें पूरी कर सकेगा। सुधारों से इस उद्योग को न केवल मूल्य के संदर्भ में बल्कि गुणवत्ता के संदर्भ में भी वैश्विक दृष्टि से प्रतिस्पर्धात्मक बनाने में मदद मिलेगी, क्योंकि इस क्षेत्र में किए जा रहे उपायों से कुछ ऐसी बड़ी अड़चनें दूर होंगी, जिनकी वजह से यह उद्योग लंबे समय से पिछड़ रहा था। आने वाले वर्षों में निवेश, रोज़गार और निर्यात में बढ़ोतरी के रूप में इन उपायों के परिणाम दृष्टिगत होने लगेंगे।

ड्यूटी ड्रॉबैक गणना में राज्य स्तरीय करों को शामिल करना विनिर्माताओं और निर्यातकों के लिए एक बड़ी सुविधा प्रदान करना है। इससे उद्योग की दीर्घावधि मांग पूरी होगी। वस़्त्र क्षेत्र के लिए टीयूएफएस सब्सिडी में 10 प्रतिशत की अतिरिक्त बढ़ोतरी से यह क्षेत्र अत्याधुनिक ढांचा, आधुनिक और संवर्धित उत्पादन तकनीक अपनाने में सक्षम होगा, और इसमें युवाओं के लिए रोज़गार के अतिरिक्त अवसर पैदा होंगे।

आयकर अधिनियम की धारा 80 जेजेएए के अंतर्गत न्यूनतम दिनों की संख्या को 240 दिन से कम करके 150 दिन करने से निर्यातकों और श्रमिकों दोनों के लिए लाभप्रद स्थिति होगी क्योंकि विनिर्माताओं/निर्यातकों को कभी कभी मौसमी मांग पूरी करने के लिए अधिक संख्या में श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। इसके अतिरिक्त 15,000 रुपये तक वेतन पाने वाले श्रमिकों को भविष्यनिधि में कर्मचारी अंशदान से छूट देना और नियोक्ता के अंशदान का भुगतान सरकार की ओर से करना श्रमिकों को असंगठित से संगठित क्षेत्र में स्थानांतरित होने में मदद करेगा। इससे वे श्रमिक कल्याण को लक्ष्य बना कर सरकार द्वारा दिए जा रहे विभिन्न लाभ पाने के हकदार होंगे।

भारत में औपचारिक और उत्पादक रोज़गार सृजन करना आज समय की आवश्यकता है। अर्थव्यवस्था के संभावनाशील और विकासमान क्षेत्रों में व्यापक निवेश करने से उत्पादन की सीमाओं का विस्तार होगा और रोज़गार के अवसर पैदा होंगे। वस्त्र और परिधान क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के ऐसे ही संभावनाशील और विकासमान क्षेत्रों में से एक है, जिसे सुदृढ़ बृहत्त आर्थिक प्रभाव के साथ रोज़गार सृजन कार्यनीति का उत्कृष्ट साधन समझा जा रहा है। अत: टैक्सटाइल क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए बड़ी संख्या में उपायों का अनुमोदन एक महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय है। इसका इस्तेमाल चीन की तुलना में दिहाड़ी का स्तर बढ़ाने के लिए वस्त्र और परिधान निर्यात को प्रोत्साहित करने के एक अवसर के रूप में किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीन की कम होती जा रही प्रतिस्पर्धा क्षमता का लाभ उठाने में भारत के लिए यह सर्वाधिक उपयुक्त समय है, क्योंकि अधिकतर भारतीय राज्यों में मजदूरी की लागत अपेक्षाकृत कम है। परंतु, बांग्लादेश, थाईलैंड और वियतनाम जैसी कुछ अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थायें भी प्रतिस्पर्धा कर रही हैं और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सफल हो रही हैं। अत: हमें अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपनी खोई हुई प्रतिस्पर्धा फिर से हासिल करने के लिए तेजी से आगे बढऩा होगा। घरेलू मोर्चे पर हमें प्रतिस्पर्धात्मक बनने के लिए अपनी उत्पादकता बढ़ानी होगी, अत: इस क्षेत्र के लिए लचीले श्रम सुधार महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि यह उद्योग उच्च श्रम बहुल है। इसके अतिरिक्त उन लक्षित विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बाजारों तक पहुंच कायम करने में भारत को भारी शुल्क अदा करने पड़ते हैं, जिनके साथ कोई मुक्त व्यापार समझौता नहीं है। इस प्रकार उन बाजारों में प्रवेश करने के लिए हमें मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने की दिशा में आगे बढऩे पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

 

(लेखिका वस्त्र क्षेत्र विकास से संबंधित एक विशेषज्ञ है ईमेल- youngindiastartups@gmail.com आलेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी विचार हैं)