संपादकीय लेख


Volume-31, 28 October-3 November, 2017

 
आधुनिक भारत के निर्माता : लौह पुरुषसरदार पटेल

चंदन कुमार चौधरी

 
भारत के इतिहास में कई ऐसे महान व्यक्ति हुए हैं जिनके योगदान से राष्ट्र का निर्माण होता रहा है लेकिन आधुनिक भारत के निर्माण के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल ने जो काम किया और नींव रखी, उसके बिना आज दिख रहे भारत वर्ष का निर्माण संभव नहीं हो पाता. सरदार पटेल की रखी नींव पर जिस भारत का निर्माण हुआ वह राष्ट्र कश्मीर से कन्याकुमारी तक एवं पूरब से पश्चिम तक एक विस्तृत भू-भाग में फैला हुआ है.
सरदार पटेल को हम भारत के बिस्मार्क’, ‘लौह पुरुष’, ‘सरदार’, ‘बिना एक बूंद गिराये राष्ट्र को एक करने वालेना जाने कितने उपनामों से जानते हैं. पटेल ने ना केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि इससे मिलने वाली आजादी और उसके बाद देश की सरकार में मंत्री रहते हुए जो निर्णय लिये उसी से एक मजबूत और सशक्त भारतवर्ष का निर्माण हुआ. यही भारतवर्ष आज तरक्की और समृद्धि के पथ पर अग्रसर है. महात्मा गांधी के करीबी सिपहसालार होने के कारण गांधीजी के कई निर्णयों पर भी सरदार पटेल का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है.
सरदार पटेल के निधन के बाद भले ही उनके योगदान को ज्यादा महत्व मिलता नजर नहीं आया, लेकिन करीब साढ़े पांच सौ से अधिक छोटे-मोटे रजवाड़ों को मिलाकर एक करने वाले सरदार पटेल का देश की एकता में योगदान अविस्मरणीय है और उसे भुलाया नहीं जा सकता. वर्तमान समय में हमारी सरकार ने सरदार पटेल के नाम से कई योजनाओं का शुभारंभ किया है और सरदार सरोवर बांध के निकट उनकी एक विशाल प्रतिमा बनाने का भी निर्णय लिया है.
भारतीय इतिहास में ऐसे कई मोड़ आये हैं जिनसे राष्ट्र का वर्तमान और भविष्य तय होता रहा है. हालांकि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई और उसके बाद हासिल होने वाली स्वतंत्रता के बीच राष्ट्र को एकजुट करने का एक ऐसा अहम मोड़ भी आया है जो भारत के इतिहास का एक अहम मील का पत्थर साबित हुआ है. इन घटनाओं ने भारत की वर्तमान भौगोलिक दिशा तय की. उस दौरान होने वाली इन घटनाओं के सूत्रधार थे सरदार वल्लभ भाई पटेल.
सरदार पटेल ने आजादी के दौरान के संक्रमणकाल में जो योजना बनायी और उसे कार्यरूप दिया उससे एक नये भारत का निर्माण हुआ. ऐसे में निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि सरदार पटेल भारतवर्ष को भौगोलिक तौर पर एक करने वाले व्यक्ति थे. उनकी दूरदृष्टि और मजबूत संकल्प का ही नतीजा था कि कई टुकड़ों में बंटा हमारा उस समय का देश एक हो सका. 
लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म आज के गुजरात प्रांत के नाडियाड में हुआ था. तारीख थी ३1 अक्तूबर 1875. पटेल की शिक्षा-दीक्षा मुख्यरूप से स्वाध्याय से ही हुई थी. बाद में उन्होंने लंदन जाकर बैरिस्टरी की पढ़ाई की और फिर वापस आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे.
बाद में महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. हालांकि यह माना जाता है कि वह शुरू में स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से दूर रहे और महात्मा गांधी से खास प्रभावित नहीं थे लेकिन बाद के दिनों में वह उनके काफी करीबी, विश्वासपात्र और मजबूत सिपहसलार बन कर उभरे थे.
ऐसा माना जाता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी के सबसे नजदीक थे लेकिन वास्तव में पटेल गांधी के भी उतने ही करीब थे जितने नेहरू. गौरतलब है कि सरदार पटेल और महात्मा गांधी करीब तीन साल तक एक साथ जेल में रहे थे. जेल में इतने समय तक साथ में रहने के कारण इन दोनों को एक-दूसरे को समझने जानने का मौका मिला और वे करीब आए. सरदार पटेल गांधीजी के विचारों से प्रेरित होते गये.
गांधीजी के विचारों से प्रेरित और प्रभावित हो कर पटेल ने सूटबूट  छोड़ कर धोती कुर्ता पहनना शुरू कर दिया था. जेल में रहने के दौरान सरदार पटेल ने महात्मा गांधी की भरपूर सेवा की थी. पटेल की सेवा से प्रसन्न होकर गांधीजी ने कहा था कि जेल में पटेल ने मेरी जो सेवा की उसे देख कर मुझे मेरी मां की याद आ गयी.
महात्मा गांधी के बारे में कहा जाता है कि वह कागज  बरबाद करने में यकीन नहीं करते थे और पटेल को पुराने कागजों से लिफाफे बनाने में महारत हासिल थी. इन दोनों के बीच ऐसे रिश्तों ने आपसी तालमेल और मधुर संबंध को मजबूत किया था. 
महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद उनके डांडी मार्च में पटेल ने पूरा साथ दिया. इसके कारण रास गांव के नजदीक सरदार पटेल को बंदी बना लिया गया. यह पटेल की पहली राजनीतिक गिरफ्तारी थी. महात्मा गांधी को भी बंदी बना लिया गया था जिसके कारण नमक सत्याग्रह को पूरे देश में हवा मिली. बाद में 1931 में पटेल कांग्रेस के अध्यक्ष बने और राजनीतिक फलक पर उनकी एक बहुत बड़ी पहचान बन गयी. वे राष्ट्र के प्रथम पंक्ति के नेताओं की जमात में शामिल हो गये.
सरदार पटेल ने स्वतंत्रता संग्राम में सबसे पहला संघर्ष गुजरात के खेड़ा में किया. उन दिनों गुजरात का यह इलाका भयंकर सूखे की चपेट में था. अंग्रेज सरकार भारी कर ले रही थी और किसान उनसे छूट देने की मांग कर रहे थे. ब्रिटानी हुकूमत इसके लिए सहमत नहीं थी और विरोध स्वरूप महात्मा गांधी, सरदार पटेल और अन्य लोगों ने किसान आंदोलन का नेतृत्व किया और उन्हें कर नहीं देने के लिए प्रेरित किया. आखिरकार ब्रिटानी हुकूमत को झुकना पड़ा और किसानों को उस साल करों में राहत दी गयी. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में सरदार पटेल की यह पहली बड़ी सफलता थी.
यह कोई छोटी-मोटी सफलता नहीं थी क्योंकि इस घटना ने अंग्रेजों के खिलाफ होने वाले संघर्ष में एक नयी जान फूंक दी. देशभर के किसान एकजुट और जागरूक होने लगे. गांधीजी ने भी किसान संघर्ष एवं राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के अंर्तसबंधों की व्याख्या बारदोली किसान संघर्ष के संदर्भ में की है.
इस आंदोलन की सफलता के संदर्भ में गांधीजी ने कहा था कि इस तरह का हर संघर्ष, हर कोशिश हमें स्वराज के करीब पहुंचा रही है और हम सबको स्वराज की मंजिल तक पहुंचाने में ये संघर्ष सीधे स्वराज के लिए संघर्ष से कहीं ज्यादा सहायक सिद्ध हो सकते हैं.
इस आंदोलन की सफलता से पहले पटेल को बारडोली का सरदार और बाद में सिर्फ सरदार कहा जाने लगा. पटेल को यह उपाधि आंदोलन में शामिल वहां की महिलाओं ने दी थी. सरदार उपनाम वल्लभभाई पटेल से ऐसा जुड़ा कि बाद में पटेल अपने इसी उपनाम सरदारसे जाने जाने लगे और देश भर में लोकप्रिय हुये. यहां तक कि महात्मा गांधी भी उन्हें सरदार कह कर ही संबोधित करते थे.
वैसे तो राष्ट्र के निर्माण में सरदार पटेल का बहुत योगदान है. उनका योगदान स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने से लेकर राष्ट्र निर्माण के लिए कई बुनियाद रखने तक फैला हुआ है. हालांकि आज सरदार पटेल को सही मायनों में याद किया जाता है तो वह है आजादी से पहले और बाद में विभिन्न रियासतों में बिखरे भारत के भू-राजनीतिक एकीकरण में उनका केंद्रीय भूमिका निभाना. 
गौरतलब है कि स्वतंत्रता के समय भारत के अन्तर्गत तीन तरह के क्षेत्र थे- ब्रिटिश भारत के क्षेत्र, देसी राज्य और फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र जिसमें चन्दननगर, पुदुच्चेरी और गोवा आदि क्षेत्र आता था. दरअसल यह सभी क्षेत्र सीधे तौर पर भारत के अधीन नहीं आते थे. जिस समय हमारा यह देश आजाद हुआ उस समय यहां पर छोटे-बड़े रजवाड़ों को मिलाकर करीब साढ़े पांच सौ रजवाड़े थे.
वास्तव मेंलार्ड लुई माउण्टबैटन ने भारत की आजादी को लेकर एक प्रस्ताव रखा था जिसमें यह प्रावधान था कि भारत के इन रजवाड़ों के पास भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में विलय होने का अधिकार है या वे चाहें तो दोनों के साथ न जाकर अपने को स्वतंत्र भी रख सकते हैं. इन रजवाड़ों, जिनमें से अधिकांश प्रिंसली स्टेट (ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य का हिस्सा) थे. दरअसल सभी समस्याओं की जड़ यही एक प्रस्ताव था. अगर गौर से देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि अंग्रेज एकजुट भारत नहीं चाहते थे. वे भारत को इतने टुकड़ों में बांट देना चाहते थे कि भारत का कोई अस्तित्व ही ना बचे. ऐसे में इन रजवाड़ों की महत्वाकांक्षा जाग उठी और वे स्वतंत्र रहने की दिशा में आगे बढऩे के बारे में सोचने लगे. अगर ऐसा होता तो आज इतने बड़े भू-भाग में फैला भारतवर्ष कई खंडों और टुकड़ों में बंटा होता.
अटल और चट्टानी इरादों वालों के सरदार पटेल को यह कहां मंजूर होने वाला था. उन्होंने एक अखंड भारत का सपना देखा और इन रजवाड़ों के भारत में विलय के लिए काम करना शुरू कर दिया. नतीजा यह रहा कि भारत के हिस्से में आए इन रजवाड़ों ने सरदार वल्लभभाई पटेल और वीपी मेनन के कुशल नेतृत्व के कारण एक-एक करके विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. वीपी मेनन सरदार पटेल के बहुत करीबी और विश्वासपात्र व्यक्ति थे.
दरअसल सरदार पटेल ने आजादी के पूर्व ही (संक्रमण काल में) वीपी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था. पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हें स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा. इसके परिणामस्वरूप तीन को छोडक़र शेष सभी रजवाडों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. इसके लिए सरदार पटेल को काफी लंबी रणनीति बनानी पड़ी और ऐसे में उन्हें इन रजवाड़ों को मनाने से लेकर सख्ती तक से पेश आना पड़ा. सरदार ने अपने इस प्रयास में सामने आने वाले सारी रुकावटों को ना केवल दूर किया बल्कि अपने किसी खास पैरोकारों तक की भी बात नहीं सुनी.
  सरदार पटेल की महानतम देन थी 562 छोटी-बड़ी रियासतों का भारतीय संघ में विलीनीकरण करके भारतीय एकता का निर्माण करना. विश्व के इतिहास में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो. आखिरकार तीन रियासतों कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद को छोडक़र उस लौह पुरुष ने सभी रियासतों को भारत में मिला दिया.
केवल जम्मू एवं कश्मीर, जूनागढ़ तथा हैदराबाद के राजाओं ने ऐसा करना नहीं स्वीकारा. सरदार पटेल ने जूनागढ़ के नवाब पर काफी दबाव बनाया और जब नवाब के विरुद्ध वहां के लोगों ने बहुत विरोध किया तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ भी भारत में मिल गया. अब ऐसे में सिर्फ दो क्षेत्र हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर बचे. जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहां सख्ती से काम लिया और वहां सेना भेज दी. 
सेना भेजे जाने पर निजाम ने बिना प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया. शांति के पुजारी गांधीजी के अनुयायी सरदार पटेल ने हैदराबाद को अपने में मिलाने के लिए सिर्फ एक बार सेना का सहारा लिया. इसके अलावा उन्होंने हर जगह शांति या दबाव की रणनीति के तहत इन रजवाड़ों को अपने में मिलाया.
इस तरह से पटेल ने अपनी सूझ-बूझ का परिचय देते हुये पूरे भारत को एक कर लिया. हालांकि, कश्मीर का मसला थोड़ा उलझा रह गया. कश्मीर ने पहले स्वतंत्र रहने का निर्णय लिया था लेकिन बाद में पाकिस्तानी हमले के कारण वहां की स्थितियां कुछ अलग रही. बाद में कश्मीर ने भी भारत का हिस्सा बनना स्वीकार कर लिया.
इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुये अगर कहा जाए कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ, अनुभव, दूरदृष्टि, साहस और मजबूत इरादों के कारण इन छोटे-छोटे भूखंडों में बंटे सभी रजवाड़ों को एक कर भारत को एक राष्ट्र के सूत्र में पिरोया तो यह कहना अतिशक्योक्ति नहीं होगा.
हालांकि, आजादी के बाद अधिकांश प्रान्तीय कांग्रेस समितियां प्रधानमंत्री पद के लिए पटेल के पक्ष में थीं लेकिन गांधीजी की इच्छा का आदर करते हुए पटेल ने इस पद की दौड़ से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया. भारत की आजादी के बाद सरदार पटेल देश के पहले गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री बने. सरदार पटेल के पास उप प्रधानमंत्री पद के साथ गृह, सूचना और रियासत विभाग का भी जिम्मा था. सरकार में रहने और साथ मिल कर काम करते रहने के बाद भी नेहरू और पटेल के संबंध तनावपूर्ण ही रहे. इस वजह से कई अवसरों पर दोनों ने ही अपने पद का त्याग करने की धमकी तक दे दी थी.
स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू और पहले उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल के बीच वैचारिक और पृष्ठभूमि में काफी अंतर था. हालांकि, दोनों कांग्रेस के सदस्य होने के साथ-साथ महात्मा गांधी के भी काफी करीब थे लेकिन इन दोनों के बीच का मतभेद कई मौके पर उभर कर सामने आये.
एक ओर जहां पंडित नेहरू पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति से काफी प्रभावित थे वहीं पटेल भारतीय मिट्टी में रचे बसे प्राणी थे. पटेल ने ऊंची शिक्षा हासिल की थी लेकिन वह अहंकारी नहीं थे. सरदार पटेल स्वयं कहा करते थे, ‘‘मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं. मेरा विकास कच्ची झोपडिय़ों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है.’’
दरअसल दोनों के बीच टकराव का एक कारण यह भी था कि जहां नेहरू अन्तरराष्ट्रीय ख्याति पाने के इच्छुक और समाजवादी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे वहीं सरदार पटेल की सोच ख्याति से इतर राष्ट्र निर्माण पर जोर देने की थी.
सरदार पटेल एक दूरदर्शी नेता थे. उनकी दूरदर्शिता का लाभ यदि उस समय लिया जाता तो शायद आज दिख रही अनेक वर्तमान समस्याओं का जन्म न होता. आजादी के बाद पहले सरकार के गठन में विदेश मंत्रालय का कामकाज नेहरू के पास था. हालांकि उप प्रधानमंत्री होने के नाते सरदार पटेल को भी कैबिनेट की विदेश विभाग समिति में जाना होता था.
पटेल ने 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में चीन की तिब्बत के प्रति नीति से उन्हें सावधान किया था और चीन का रवैया कपटपूर्ण और विश्वासघाती बतलाया था. अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा कहा था. उन्होंने यह भी लिखा था कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा. 1950 में नेपाल के संदर्भ में लिखे गये पत्रों से भी पंडित जवाहरलाल नेहरू असहमत थे. 1950 में ही गोवा की स्वतंत्रता के संबंध में चली दो घंटे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्ता सुनने के पश्चात सरदार पटेल ने केवल इतना कहा ‘‘क्या हम गोवा जाएंगे, केवल दो घंटे की बात है.’’
दरअसल गोवा पुर्तगाली शासन के अन्तर्गत आता था. सरदार पटेल वहां सैन्य शक्ति का सहारा लेकर उसे अपने भू-भाग में मिला लेना चाहते थे लेकिन नेहरू इस बात से असहमत थे. वह सैन्य इस्तेमाल के खिलाफ थे और एक अंतरराष्ट्रीय संदेश देना चाहते थे. हालांकि पटेल की बात उस समय अगर मान ली गयी होती तो हमें 1961 तक गोवा की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा न करनी पड़ती.
सरदार पटेल जहां पाकिस्तान की छद्म और चालाकी पूर्ण चालों से सतर्क थे वहीं देश के विघटनकारी तत्वों से भी समय-समय पर सावधान करते रहते थे. विशेषकर वे भारत में मुस्लिम लीग और कम्युनिस्टों की विभेदकारी सोच और रूस के प्रति उनके लगाव को लेकर सजग रहते थे.     
गृहमंत्री के रूप में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (आई.सी.एस.) का भारतीयकरण कर इन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आई.ए.एस.) बनाया. अंग्रेजों की सेवा करने वालों में विश्वास भरकर उन्हें राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोडऩे का काम किया. आज की तारीख में यह देश के शासन-प्रशासन को दिशा देने की दिशा में एक बहुत ही मजबूत स्तंभ नजर आता है. सरदार पटेल के पास अगर कुछ वर्ष का समय और  होता तो संभवत: नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता.
गुजरात प्रांत के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्तूबर 2013 को गुजरात के नर्मदा जिले में सरदार वल्लभभाई पटेल के स्मारक का शिलान्यास किया. इसका नाम एकता की मूर्ति’ (स्टैच्यू ऑफ यूनिटी) रखा गया. यह मूर्ति स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी’ (93 मीटर) से दुगनी ऊंची बनेगी. इस प्रस्तावित प्रतिमा को एक छोटे चट्टानी द्वीप पर स्थापित किया जाना है जो केवाडिय़ा में सरदार सरोवर बांध के सामने नर्मदा नदी के मध्य में है. सरदार वल्लभभाई पटेल की यह प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होगी और यह लगभग 2500 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होनी है. गुजरात सरकार ने सात अक्तूबर 2010 को इस परियोजना की घोषणा की थी और  प्रतिमा को अक्तूबर 2018 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा
गया है.
आज कल्पना की जाए कि अगर हमें सरदार पटेल जैसा सपूत नहीं मिला होता तो लगता है कि शायद हमें इतना बड़ा, विशाल और विस्तृत एवं सामरिक दृष्टि से मजबूत भौगोलिक क्षेत्र वाला भारतवर्ष नहीं मिलता. भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हें भारत का लौह पुरुष के रूप में जाना जाता है. 1950 में उनका देहान्त हो गया.
ऐसा लगता है कि आजादी के बाद अगर वह कुछ और सालों तक जीवित रहते तो बहुत सारी समस्याएं सामने नहीं आतीं और हमें और अधिक मजबूत एवं सुदृढ़ भारतवर्ष मिलता. 
(लेखक पत्रकार हैं ये उनके निजी विचार हैं)