नौकरी फोकस


Volume-53, 31 March-6 April, 2018

 

 

कृषि मौसम विज्ञान में कॅरिअर के अवसर


मनोज कुमार त्रिपाठी
 

विश्व की जनसंख्या वर्ष २०५० तक बढ़ कर लगभग १० बिलियन हो जाने का अनुमान है, जिससे कृषि की मांग बढ़ेगी. यद्यपि कृषि-निवेश एवं प्रौद्योगिकी नवप्रर्वतन उत्पादकता में वृद्धि कर रहे हैं किंतु उपज की दर आवश्यकता से कहीं कम है. उत्पादकता में वृद्धि की आवश्यक गति प्राकृतिक संसाधनों की दुर्दशा और लुप्त हो रहे जैववैध्य के कारण अवरुद्ध है. वर्तमान खेती पद्धति के साथ कृषि पर बढ़ी हुई मांग को पूरा करना प्राकृतिक संसाधनों, बढ़ रहे ग्रीनहाउस गैस उत्र्सजन तथा व्यापक वन कटाई एवं भूमि के न्यूनीकरण के लिए अत्यधिक संघर्ष-पूर्ण बनने की संभावना है (एफ.ए.ओ.२०१७). जलवायु परिवर्तन से संबद्ध अंतर सरकारी पैनल (आई.पी.सी.सी.) की २०१४ में प्रकाशित ताजा मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीनहाउस गैसों (जी.एच.जी) के उत्सर्जन का स्तर इस समय अपने इतिहास के चरम पर है. कृषि उत्पादन एवं भूमि उपयोग पर उसके प्रभाव इन उत्सर्जनों का मुख्य स्रोत हैं. अत्यधिक अस्थिर वर्षा, गर्म हवा (लू), सूखा एवं बाढ़ जैसी अत्यधिक मौसम की घटनाओं की गंभीरता और बारम्बारता के बढऩे के, कृषि उत्पादन मेंं गिरावट और खाद्य असुरक्षा जैसे व्यापक प्रभाव पड़ेंगे  भारत में कृषि-जो १.३ बिलियन जनसंख्या की खाद्य एवं पोषण की आवश्यकताओं को पूरा करती है और उत्पादन, रोज़गार तथा मांग सृजन में महत्वपूर्ण रूप से योगदान देती है, जलवायु परिवर्तन, विभिन्नता तथा संकट के कारण असुरक्षित है. प्राय: प्रत्येक वर्ष देश के कुछ भागों में मानसून की कमी देखी जाती है. वर्ष २०१३-१४ मेंं देश में खाद्यान का उत्पादन २६५ मिलियन टन था, जो मानसून की की दृष्टि से अच्छा वर्ष था. वर्ष २०१४-१५ में मानसून मेंं और मानसून के बाद कम वर्षा हुई और कम वर्षा के कारण वर्षा के दौरान खरी$फ तथा रबी-दोनों फसलों के उत्पादन पर प्रभाव पड़ा. वर्ष २०१५ में फरवरी और मार्च के दौरान गैर मौसमी वर्षा एवं ओलावृष्टि से स्थिति और खराब हो गई तथा रबी फसल          के उत्पादन पर प्रभाव पड़ा(कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग,भारत सरकार,२०१५-१६). इसी तरह, वर्ष २०१५-१६ में खराब मानसून के कारण खरीफ फसल के उत्पादन में सर्दी के अभाव के कारण रबी फसल में कमी देखी गई (कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग,भारत सरकार, २०१६-१७). इसलिए वर्तमान कृषि विकास कार्य नीति जलवायु अनुकूल कृषि जैसे पूर्णतावादी दृष्टिकोण पर आधारित होनी चाहिए, जो देशी एवं पारम्परिक ज्ञान पर भी बनाई जा सकती है. कृषि मौसम विज्ञान के क्षेत्र में एक व्यापक दृष्टिकोण प्रचलित एवं प्रत्याशित मौसम स्थितियों में कृषि प्रबंधन का तथा कृषि में मौसम से जुड़े खतरों का कम करने एवं अनुसंधान एवं परामर्श-सेवाओं के माध्यम से कृषि-उत्पादन एवं किसानों की आय बढ़ाने के संबंध में एक व्यवहार्य विकल्प होगा.
कृषि मौसमविज्ञान में शिक्षा :
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने ‘‘कृषि मौसमविज्ञान’’ को कृषि विज्ञान के अंतर्गत एक प्राथमिकता विषय के रूप में निर्धारित किया है और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में कृषि मौसमविज्ञान के पृथक विभाग स्थापित करने को बढ़ावा दिया है. कृषि में स्नातक डिग्री (बी.एस.सी-कृषि) के दौरान कृषि मौसमविज्ञान एक साधारण विषय के रूप में तथा एम.एस.सी. एवं पीएच.डी. डिग्री कार्यक्रम में एक मुख्य विषय के रूप में पढ़ाया जाता है. कृषि मौसमविज्ञान एक ऐसा अनुप्रयुक्त मौसमविज्ञान है जो फसल सुरक्षा एवं पशुपालन पर मौसम तथा जलवायु के प्रभाव से जुड़ा है. कृषि मौसमविज्ञान में एम.एस.सी. और पीएच.डी. कार्यक्रम का फोकस कृषि मौसमविज्ञान पर अनुसंधान में मानव संसाधनों एवं सांस्थानिक क्षमता के विकास एवं उसे सुदृढ़ करने तथा प्रचलित और प्रत्याशित मौसम स्थितियों एवं जलवायु के संकट के दौरान कृषि प्रचालन के संसाधनों के धारणीय उपयोग एवं प्रबंधन के माध्यम से खाद्य आत्म-निर्भरता के संबंध में कृषि जोखम प्रबंधन पर होता है. कृषि मौसमविज्ञान डिग्री कार्यक्रम ऐसी मानव संसाधन क्षमता का निर्माण करने में सहायक होंगे, जो जलवायु एवं प्राकृतिक जोखिम आधारित सूचना का विश्लेषण एवं आख्या करने में सक्षम होगी. कृषि मौसम विज्ञानियों को इस तरह प्रशिक्षित किया जाता है कि वे कृषि पर फसलों, मौसम, जल, मृदा  एवं मौसम विज्ञान के सिद्धांतों का लाभपूर्ण उपयोग कर सकते हैं.
चूंकि कृषि की असफलता या सफलता किसानों के कौशल, प्रौद्योगिकी, मौसम, मिट्टी और बीजों पर निर्भर करती है, इसलिए इस शृंखला में कोई भी कमजोर कड़ी कृषि उत्पादन पर अंत में प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है.
कृषि मौसम विज्ञान डिग्री कार्यक्रम में प्रवेश की पद्धति :
भारत में, कृषि मौसम विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री में प्रवेश/चयन की पद्धति यह है कि कोई भी व्यक्ति कृषि, बागवानी, वानिकी आदि में स्नातक योग्यता पूरी करने के बाद इसके लिए आवेदन कर सकता है. कृषि मौसम विज्ञान में मास्टर डिग्री में प्रवेश के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा संचालित करती है. परीक्षा में निष्पादन के आधार पर, उम्मीदवारों को मानित राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में प्रवेश दिया जाता है. इसके अतिरिक्त, कोई भी उम्मीदवार राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा संचालित प्रवेश-परीक्षा के माध्यम से कृषि मौसम विज्ञान में स्नातकोत्तर कार्यक्रम में प्रवेश ले सकते हैं. इसी तरह कोई भी उम्मीदवार कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा कृषि मौसम विज्ञान में चलाए जाने वाले पीएच.डी. डिग्री कार्यक्रम में प्रवेश ले सकते हैं. कृषि मौसम विज्ञान के स्नातकोत्तर राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) में भी बैठ सकते हैं, जो कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल/एएसआरबी, भाकृअप नई दिल्ली द्वारा संचालित की जाती है और लैक्चरशिप के लिए एक महत्वपूर्ण प्रमाणपत्र है.
कृषि मौसम विज्ञान व्यवसायियों के लिए रोज़गार एवं कॅरिअर के अवसर
कृषि मौसम विज्ञान क्षेत्र में किसी संतोषजनक कॅरिअर के व्यापक अवसर होते हैं. वर्तमान में इस क्षेत्र में रोज़गार के अवसर, इन अवसरों का  लाभ ले सकने वाले उपलब्ध स्नातकोत्तर उम्मीदवारों की संख्या से अधिक हैं और इस कमी के निकट भविष्य में बने रहने की संभावना है. इस क्षेत्र में कॅरिअर की प्रगति के शानदार अवसर है. कृषि मौसम विज्ञान व्यवसायी कृषि के क्षेत्र में कार्यरत सरकारी तथा निजी संगठनों अनुसंधान एवं विकास गतिविधियों में कार्य कर सकते हैं. कृषि मौसम विज्ञानी ग्रामीण विकास, कमांड क्षेत्रों और जलागम (वाटरशेड) प्रबंधन कार्यक्रमों में व्यस्त कई संगठनों, गैर सरकारी संगठनों में सलाहकार के रूप में कार्य के अवसर प्राप्त कर सकते हैं. सरकारी क्षेत्र में ये व्यवसायी कृषि विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर, वैज्ञानिक एवं अनुसंधान अधिकारी के रूप में अध्यापन, अनुसंधान तथा विस्तार कार्य जैसे रोज़गार अवसर प्राप्त कर सकते हैं. ये व्यवसायी, भाकृअप, नई दिल्ली के कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल द्वारा संचालित कृषि अनुसंधान सेवा/एआरएस परीक्षा उत्तीर्ण करके भाकृअप संस्थानों में कृषि मौसम विज्ञान के क्षेत्र में वैज्ञानिक के रूप में भी अपना कॅरिअर प्रारंभ कर सकते हैं. वैज्ञानिक के रूप में उनके कार्य मौसम आधारित उपयोगी फार्म प्रचालन, कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए फसल सूक्ष्म जलवायु आशोधन, फसल मौसम केलेंडर का विकास, सूखा  निगरानी एवं आकस्मिक फसल योजना का विकास, विभिन्न जलवायु परिदृश्यों के अंतर्गत क्षेत्र की प्रचुर फसल किस्मों की पैदावार का मूल्यांकन करने के लिए फसल विकास सिमुलेशन मॉडल का विकास, मौसम आधारित पेस्ट रोग, पूर्वानुमान मॉडल, पशुधन कार्यों के लिए पशु जैव प्रौद्योगिकी का विकास, कृषि एडवाइजरी आदि तैयार करने से जुड़े हो सकते हैं. कृषि मौसम विज्ञान व्यवसायियों के लिए निकट भविष्य में, मौसम पूर्वानुमानों का प्रयोग करके फसल उत्पादन को धारणीय बनाने हेतु सूक्ष्म स्तर पर मौसम आधारित कृषि एडवाइजरी  को सुदृढ़ करने के लिए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, नई दिल्ली की ग्रामीण कृषि मौसम सेवा (जीकेएमएस) परियोजना में कार्य करने के भावी अवसर हैं. वे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी  विभाग, राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग एजेंसी, अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद जैसे सरकारी संगठनों, केंद्रीय एवं राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा खाद्य एवं कृषि संगठन आदि में कृषि मौसम विज्ञानी के पदों के रोज़गार अवसर भी तलाश सकते हैं.
भारत एवं विदेश में कृषि मौसम विज्ञान शिक्षा के विश्वविद्यालय
भारत में कुछ विश्वविद्यालय कृषि मौसम विज्ञान को, या तो एम.एससी डिग्री या पीएच.डी डिग्री वाले एक मुख्य पाठ्यक्रम के रूप में संचालित करते हैं. भारत में कृषि मौसम विज्ञान डिग्री कार्यक्रम चलाने वाले कृषि विश्वविद्यालय निम्नानुसार हैं :-
*आणंद कृषि विश्वविद्यालय, आणंद, गुजरात.
*असम कृषि विश्वविद्यालय, जोरहाट, असम.
*बिधान चन्द कृषि विश्वविद्यालय, नादिया, पश्चिम बंगाल.
*बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची, झारखंड.
*चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा.
*जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर, उत्तराखंड.
*इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़.
*जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय, जूनागढ़, गुजरात.
*केरल कृषि विश्वविद्यालय, त्रिश्शूर, केरल.
*महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी महाराष्ट्र.
*नरेन्द्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश.
*उड़ीसा कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, ओडिशा.
*पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना, पंजाब.
*तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयम्बटूर, तमिलनाडु और
*बसंतराव नाइक मराठवाडा कृषि विद्यापीठ, परभणि, महाराष्ट्र.
विदेश में, कृषि मौसम विज्ञान में एम.एससी और पीएच.डी डिग्री चलाने वाले विश्वविद्यालय निम्नानुसार हैं :-
*हरमाया यूनिवर्सिटी, हरार, इथियोपिया.
*लोवा स्टेट यूनिवर्सिटी, एमेस, यूएसए.
*नेंजिंग यूनिवर्सिटी ऑफ इन्र्फोमेशन साइंस एंड टेक्नॉलोजी, नेंजिंग, चीन.
*यूनिवर्सिटी ऑफ ब्यूनस आयरस, ब्यूनस आयरस, अर्जेंटिना.
*यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, डेविस, यूएसए, यूनिवर्सिटी ऑफ फिरेंज़ी, फ्रिएंजी, इटली.
*यूनिवर्सिटी ऑफ ग्यूल्फ, ग्यूल्फ कनाडा.
*यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम, रेहोवोट, इज़राइल.
*यूनिवर्सिटी ऑफ कज़ाखस्तान, अल्मेती, कज़ाखस्तान.
*यूनिवर्सिटी ऑफ मोंटपीलियर, मोंटपीलियर, फ्रांस.
*यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी, कोलंबिया, यूएसए.
*यूनिवर्सिटी ऑफ नैरोबी, नैरोबी, कीनिया.
*यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, लिन्कॉन, यूएसए, पीटर  मैरिट्जबर्ग, साउथ अफ्रीका.
*यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम, नॉटिंघम, यूनाइटेड किंगडम.
*यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग, रीडिंग, इंग्लैंड.
*यूनिवर्सिटी ऑफ फिलिपिन्स, लॉस बेलस, लागुना, फिलिपिन्स.
*यूनिवर्सिटी ऑफ जिम्बाब्बे, हरारे, जिम्बाब्बे.
*उताह स्टेट यूनिवर्सिटी, लोगन, यूएसए और
*वेजीनिंगेन यूनिवर्सिटी एंड रिसर्च सेंटर, वेजीनिंगेन, नीदरलैंड्स.
(उक्त सूची उदाहरण मात्र हैं)
(लेखक कृषि कॉलेज, आरबीएसकेवीवाई, ग्वालियर, मध्य प्रदेश में सहायक प्रोफेसर, भौतिकी एवं मौसम-विज्ञान है)
(ई-मेल : manojtripathi08@gmail.com)