नौकरी फोकस


Volume-5, 5-11 May, 2018

 

राष्ट्रमंडल सम्मेलन-2018 में भारत

डॉ. विवेक कुमार मिश्र

राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्षों की बैठक (चोगम) ब्रिटेन में 19 से 20 अप्रैल, 2018 के दौरान आयोजित की गई, जिसमें इस बात पर विचार किया गया कि संगठन के सदस्य राष्ट्र ऐसे बेहतर भविष्य में क्या योगदान कर सकते हैं, जो निष्पक्ष, अधिक स्थिर, अधिक सुरक्षित और अधिक समृद्ध हो. चोगम 2018 के दो कार्यकारी सत्रों में मुख्य रूप से लोकतंत्र एवं कानून के शासन को सुदृढ़ बनाना, अंतर्राष्ट्र्रीय व्यापार प्रणाली की स्थिति में सुधार लाना, स्थायी विकास के लक्ष्य (एसडीजीज़) हासिल करना और राष्ट्र्रमंडल देशों द्वारा सामना किए जा रहे जलवायु परिवर्तन तथा सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विचार किया गया. शासनाध्यक्षों ने राष्ट्र्रमंडल के चार्टर में वर्णित बुनियादी राजनीतिक मूल्यों के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराई. चोगम 2018 का विषय था - ‘‘साझा भविष्य की ओर’’, जिस पर फोरम में विचार-विमर्श किया गया. इस विषय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेजा मे ने कहा ‘‘आज हमें विश्व में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. परंतु, राष्ट्र्रमंडल एक बेजोड़ संगठन है और यह शिखर सम्मेलन हमें स्थायी परिवर्तन लाने का अवसर प्रदान कर रहा है, जो हमारे सदस्य राष्ट्र्रों के 2.4 अरब लोगों के लिए लाभकारी है’’. उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘राष्ट्र्रमंडल की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि हमारे सभी सदस्य देशों की स्थिति एक समान है, उनकी आवाज एक समान है और सभी को अपनी बात कहने का समान अधिकार है. अत: इन चुनौतियों का सामना करते समय मैं चाहती हूं कि सभी से एक समान स्वर सुनने को  मिले और सभी को बोलने का समान अवसर मिले’’. 

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

राष्ट्र्रमंडल 53 देशों का एक संगठन है, जिनकी सम्मिलित आबादी 2.4 अरब है, जो सभी 6 महाद्वीपों में फैली है. यह दुनिया में राष्ट्र्रों के प्राचीनतम राजनीतिक संगठनों में से एक है, जिसकी जड़ें उस ब्रिटिश साम्राज्य में निहित हैं, जिसमें कुछ देशों पर प्रत्यक्ष और कुछ पर परोक्ष रूप से ब्रिटेन का शासन था. बाद के वर्षों में अफ्रीका, दोनों अमरीका, एशिया, यूरोप और प्रशांत क्षेत्र के कुछ स्वतंत्र राष्ट्र्र इसमें शामिल हुए. इस संगठन में शामिल होने वाले अंतिम दो सदस्य रवांडा और मोजाम्बिक हैं, जिनका ब्रिटिश साम्राज्य से कोई सीधा ऐतिहासिक नाता नहीं रहा है. यह संगठन लोकतंत्र, मानवाधिकारों, मुक्त व्यापार और कानून के शासन को प्रोत्साहित करता है.

भारत आधुनिक राष्ट्र्रमंडल के संस्थापक सदस्यों में से एक है. हालांकि इस संगठन का सदस्य होना भारत की सुदृढ़ साम्राज्य विरोधी धारणाओं के प्रतिकूल है, हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद ब्रिटिश राष्ट्र्रमंडल में भारत के शामिल होने के किसी भी प्रस्ताव या विचार का विरोध किया था. 1940 में भारतीय राष्ट्र्रीय कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में नेहरू ने कहा था, ‘‘भारत राष्ट्र्रमंडल का समान सदस्य तब तक नहीं बन सकता, जब तक कि साम्राज्यवाद और इससे जुड़ी सभी बातों को तिरस्कृत नहीं किया जाता’’. परंतु, अंतत: भारत ने राष्ट्र्रमंडल में शामिल होने का निर्णय उस समय किया, जब 1949 में लंदन घोषणा में भारत के उस विचार को शामिल किया गया, जिसमें उसने इस संगठन में दो स्तरीय सदस्यता को नामंजूर कर दिया था और ब्रिटिश राजतंत्र को ‘‘राष्ट्र्रमंडल देशों के मुक्त संगठन’’ का प्रतीक मानने से इंकार कर दिया था. राष्ट्र्रमंडल में शामिल होने के पीछे जो प्रमुख धारणाएं थीं, उनमें से एक यह थी कि इससे भारत को एक ऐसा मंच मिल सकता था, जहां से वह अन्य पूर्ववर्ती औपनिवेशिक राष्ट्र्रों के साथ जोड़ सकता था और साम्राज्यवाद तथा नस्लवाद के खिलाफ अपने सरोकार निरंतर साझा कर सकता था. नतीजतन ‘‘ब्रिटिश राष्ट्र्रमंडल’’ नामकरण हटा दिया गया और इस संगठन ने अपने को राष्ट्र्रमंडल राष्ट्र्रों के संगठन का नाम दिया. इस तरह लंदन घोषणा भारत के लिए एक राजनयिक विजय के रूप में देखी गई और इससे इस अर्थ में एक मिसाल कायम हुई कि एक गणराज्य होते हुए भारत ने स्वतंत्र और समान राष्ट्र्र के रूप में राष्ट्र्रमंडल की सदस्यता जारी रखी.

प्रधानमंत्री मोदी की भूमिका

चोगम 2018 में हिस्सा लेने के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के निर्णय से इस संगठन को नई पहचान मिली. वे 2010 के बाद इसमें हिस्सा लेने वाले प्रथम भारतीय प्रधानमंत्री हैं. प्रधानमंत्री मोदी को प्रिंस चाल्र्स ने भारत यात्रा के दौरान व्यक्तिगत तौर पर आमंत्रित किया था. ब्रिटेन की महारानी ने भी प्रधानमंत्री              नरेंद्र मोदी को आमंत्रित करने के लिए निजी पत्र लिखा था. इस संगठन में भारत की रुचि के ऐतिहासिक अभाव के बावजूद राष्ट्र्रमंडल सम्मेलन में हिस्सा लेने के श्री नरेंद्र मोदी के निर्णय से पुन: आश्वस्त करने वाले संकेत मिलते हैं. इसे इस रूप में देखा जा रहा है कि भारत ऐसे समय इस संगठन के साथ रचनात्मक भूमिका अदा करना चाहता है, जिस समय यह अपनी प्रासंगिकता के बुनियादी प्रश्न के साथ संघर्ष कर रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वपूर्ण घोषणाएं

द्यप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र्रमंडल तकनीकी सहयोग निधि में भारत का योगदान दोगुना करने की घोषणा की है और छोटे द्वीप राष्ट्र्रों को विकासात्मक सहायता प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता जताई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे छोटे देशों और लघु द्वीपों की क्षमता बढ़ाने पर भी बल दिया है, जो राष्ट्र्रमंडल का हिस्सा हैं. उन्होंने कहा कि ‘‘भारत इन छोटे द्वीप देशों और तटवर्ती देशों को गोआ स्थित राष्ट्र्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान में प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए क्षमता निर्माण में मदद करेगा’’.

द्यभारत की विनयशील कूटनीति: प्रधानमंत्री मोदी ने एक कार्यक्रम के अंतर्गत विश्व स्तरीय केंद्रों में राष्ट्र्रमंडल देशों के युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान करने की पेशकश की है. लंदन में राष्ट्र्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों की बैठक के दौरान उनके इस विचार ने ध्यानाकर्षित किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अन्य 52 राष्ट्र्राध्यक्षों को बताया कि भारत हर वर्ष 16 वर्ष से कम आयु के 30 लडक़ों और इतनी ही संख्या में लड़कियों को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की मदद से प्रशिक्षण प्रदान करेगा. उनका विश्वास है कि युवा सभी देशों का भविष्य हैं और खेल लोगों को एकजुट करने में मददगार हैं.

द्यप्रधानमंत्री मोदी ने दूसरे पूर्ण कार्यकारी सत्र को संबोधित करते हुए भारत का यह नजरिया दोहराया कि वह राष्ट्र्रमंडल के छोटे विकासशील द्वीप राष्ट्र्रों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है और उन्हें ‘‘दान संचालित की बजाए मांग संचालित’’ सहायता प्रदान करने में विश्वास रखता है.

द्यद्विपक्षीय वार्ताएं: इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक द्विपक्षीय बैठकों और वार्ताओं में हिस्सा लिया. इनमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना और सिसिल के राष्ट्र्रपति डैनी फोरे के साथ बैठक शामिल थी. प्रधानमंत्री मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने आपसी हित के विभिन्न मुद्दों पर लाभप्रद विचार विमर्श किया. दोनों नेताओं ने भारत और बांग्लादेश के बीच विकासात्मक सहयोग की संभावनाओं पर विचार किया. उन्होंने दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच पिछली बैठकों में किए गए निर्णयों को लागू करने के तौर तरीकों पर भी विचार किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिसिल के राष्ट्र्रपति फोरे के साथ व्यापार और निवेश तथा अन्य द्विपक्षीय मुद्दों में सहयोग पर विचार विमर्श किया. मॉरिशस के साथ संबंध सुदृढ़ करने के उद्देश्य से श्री मोदी ने मॉरिशस के प्रधानमंत्री प्रविंद कुमार जुगनॉथ से भेंट की और व्यापार एवं निवेश, समुद्री सहयोग के बारे में बातचीत की. प्रधानमंत्री के साथ बैठक करने वाले अन्य विश्व नेताओं में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल, युगांडा के राष्ट्र्रपति योवेरी मुसेवेनी, गैम्बिया के राष्ट्र्रपति अडमा बैरो, फिजी के प्रधानमंत्री फ्रेंक बैनिमारामा, सेंट लूसिया के प्रधानमंत्री ऐलेन चेस्टानेट और सोलोमन द्वीप के प्रधानमंत्री रिक हाउनिपवेला शामिल थे. इन बैठकों से साफ  पता चलता है कि यह शिखर सम्मेलन आपसी हित के मुद्दों पर विचार विमर्श करने और राष्ट्र्रमंडल मुद्दों के बारे में सहयोग करने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान  करता है.

भारत और ब्रिटेन के हित और संभावनाएं:

चोगम 2018 का आयोजन ऐसे समय में हो रहा है जब ब्रिटेन को ब्रेग्जि़ट के बाद अनिश्चय की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है, और राष्ट्र्रमंडल में एक नई रुचि  पैदा हो गई है. थेरेजा मे सरकार एक ऐसे समय में अपने ऐतिहासिक भागीदारों के साथ फिर से संबंध बढ़ाने की इच्छुक है, जब यूरोप में उसके परम्परागत साझीदार ब्रिटेन के साथ अपने संबंध नए सिरे से निर्धारित कर रहे हैं. ब्रेग्जि़ट के बाद आज जब ब्रिटेन को अपनी नई वैश्विक पहचान तलाश करनी पड़ रही है, तो बहुत लोगों का यह मानना है कि राष्ट्र्रमंडल, जहां विश्व की एक-तिहाई आबादी अंग्रेजी-भाषी लोकतांत्रिक देशों में निवास करती है, जहां विविध जातियों और धार्मिक समुदाय के लोग निवास करते हैं, वह एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्र्रीय मंच के रूप में उभर सकता है.

भारत ब्रिटेन में एक अरब पाउंड निवेश करने जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेजा मे के बीच बैठक के समय भारत और ब्रिटेन ने अनेक समझौतों और समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए. दोनों देशों ने संबंध और घनिष्ठ बनाने, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में संबंध बढ़ाने पर सहमति जतायी.

राष्ट्र्रमंडल भारत को समान राजनीतिक विचारधारा वाले विश्व के अनेक देशों के साथ जुडऩे का एक बेहतर मंच उपलब्ध कराता है. भारत क्रय शक्ति समानता के संदर्भ में पहले ही विश्व की तीसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है, जबकि ब्रिटेन 21वीं सदी में भारत में निवेश करने वाला सबसे बड़ा जी-20 राष्ट्र्र है. भारत 2030 तक 10 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है अत: उसे स्वयं के क्षेत्रों और मंचों की आवश्यकता होगी. विशेष रूप से राष्ट्र्रमंडल जैसे मंचों की जहां चीन सदस्य नहीं है. राष्ट्र्रमंडल को तरजीह देने की भारत की नई नीति इस बात का एक शुभ संकेत हो सकती है कि भारत अपनी ताकत प्रदर्शित करने के लिए एक संभावित मंच के रूप में इस संगठन को देख रहा है. इस मंच की संभावनाओं को मूत्र्त रूप देने के लिए भारत को कूटनीतिक पूंजी निवेश करनी होगी ताकि वह स्वयं की कार्यनीतिक जरूरतों के अनुरूप इस मंच को ढाल सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंदन यात्रा इस दिशा में एक कदम कही जा सकती है.

राष्ट्र्रमंडल की कुल 2.4 अरब की आबादी का 55 प्रतिशत हिस्सा भारत में है और आंतरिक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत है. इसलिए संगठन को नया रूप देने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी. इस संगठन के प्रति भारतीयों में एक उदासीनता देखी जाती रही है, जिसके बारे में बहुत लोगों का यह मानना है कि उससे भारतीय हित प्रेरित करने में वांछित परिणाम हासिल नहीं किए जा सकते. व्यापार प्राथमिकता क्षेत्रों में से एक है, जहां भारत को अवश्य ध्यान केंद्रित करना चाहिए. भारत को यह भलीभांति मालूम है कि राष्ट्र्रमंडल की अंतर-महाद्वीपीय सदस्यता उसे अपना व्यापार और आर्थिक संबंधों का विस्तार करने में मददगार सिद्ध होगी. भारत विश्व व्यापार संगठन में व्यापार सुविधा प्राप्त करने के लिए पहले से संघर्षरत है ताकि अपने सेवा क्षेत्र की मदद कर सके. भारत व्यापार संबंधी महत्वपूर्ण मुद्दों का सूक्ष्म ब्यौरा तैयार करने और उनके बारे में सहमति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और उसके बदले उस सहमति का लाभ डब्ल्यूटीओ में मोलभाव करने के लिए उठा सकता है.

निष्कर्ष

चोगम 2018 में प्रधानमंत्री मोदी की भागीदारी का लक्ष्य राष्ट्र्रमंडल देशों के साथ भारत की भागीदारी बढ़ाना है. इस संगठन ने समान विचारधारा वाले देशों को एक अवसर प्रदान किया है, जिससे वे अपनी व्यापार और सुरक्षा संबंधी वैश्विक चुनौतियों पर विचार कर सकते हैं. प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने भारत की इस इच्छा को भी व्यक्त किया है कि राष्ट्र्रमंडल को विकासशील देशों की प्राथमिकताओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए. सम्मेलन में भाग लेने का प्रधानमंत्री का निर्णय राष्ट्र्रमंडल जैसे अपेक्षाकृत बड़े मंच के प्रति भारत के नजरिए में बदलाव का भी संकेत है. भारत के लिए एक बड़ी भूमिका निभाने और वार्ताओं में अधिक प्रभावशाली भूमिका अदा करने का भी अवसर है. भारत विश्व की उभरती हुई सर्वाधिक महत्वपूर्ण ताकतों में से एक है. उसे राष्ट्र्रमंडल के भविष्य को नया रूप देने में प्रमुख भूमिका अदा करनी चाहिए.

(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा, उत्तर प्रदेश में राजनीति विज्ञान और अंतर्राष्ट्र्रीय संबंध विभाग में सहायक प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं. ईमेल - mishrajnu@gmail.com)