नौकरी फोकस


Volume-7, 19-25 May, 2018

 

वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी संबंधी नई खोजें

रईस अल्ताफ

विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे जीवन का स्वाभाविक अंग बनती जा रही है. आज विभिन्न इलेक्ट्रोनिक उपकरण और प्रणालियां हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गयी हैं और उनके बिना हम जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकते. विज्ञान और टेक्नोलाजी जगत संबंधी हाल की कुछ  खोजों से संबंधित खबरें हम अपने सम्मानीय पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. ये ऐसी वैज्ञानिक खोजें और घटनाक्रम हैं जो हमारी संस्कृति को बदलने की क्षमता रखते हैं, जिनसे हमारी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है और हमारे जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है.  

प्लास्टिक भक्षी बैक्टीरिया

प्लास्टिक और इसके उत्पादों का उपयोग और प्रसार हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकीय प्रणाली के लिए आज सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है. हर साल दुनिया भर में करीब 31.10 करोड़ टन प्लास्टिक उत्पादों का उत्पादन और उपयोग होता है. प्लास्टिक का जैव अपघटन करना वैज्ञानिक समुदाय समेत समूची मानवता के लिए अब भी बहुत बड़ी चुनौती है. हाल ही तक ऐसे किसी जीवधारी का पता नहीं था जो इसे सड़ा गला कर इसका अपघटन कर सके. लेकिन ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकों को इस समस्या का समाधान मिल गया है. जापानी वैज्ञानिकों को ऐसे बैक्टीरिया की खोज में सफलता मिली है जो प्लास्टिक का अपघटन कर उसे अपना आहार बना सकता है. बैक्टीरिया की इस नयी प्रजाति का नाम आइडिओनेला साकैएनसिस है और इसे प्लास्टिक की बोतलों की रीसाइक्लिंग करने वाले संयंत्र के बाहर खोजा गया. ये बैक्टरीरिया प्लास्टिक को खाकर हजम कर जाते हैं. यह पॉलीथीन टैरेप्थेलेट (पीईटी) का विखंडन कर उसका उपयोग ऊर्जा और कार्बन के स्रोत के रूप में करता है और इस तरह अपघटित हो सकने वाले सरल तत्व और यौगिक प्राप्त होते हैं . अगर यह खोज वाणिज्यिक दृष्टि से कामयाब रही तो इसकी मदद से प्लास्टिक का जैविक अपघटन पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल तरीके से किया जा सकेगा और इस तरह मनुष्य को अपघटित न हो सकने वाले अपशिष्ट से छुटकारा मिलेगा.    

मादक पदार्थों के दुरुपयोग से होने वाली बीमारियों के इलाज में मदद के लिए पहला मोबाइल मेडिकल एप:

दूसरी बड़ी खबर डिजिटल मेडिसिन के बारे में आने वाली है. आज जब हमारे आस-पास सब कुछ डिजिटल होता जा रहा है तो दवाएं भी अगर डिजिटल गोलियोंके रूप में मिलने लगें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. बहुत जल्द डाक्टर हमारी किसी खास बीमारी के इलाज लिए डिजिटल गोली का नुस्खा लिखने लगेंगे. इलाज के तरीके में भी बदलाव होने वाला है जिसमें इलाज में मोबाइल एप की मदद ली जाएगी. बहुत सी दवा कंपनियों ने तो इस तरह के मोबाइल एप बनाने भी शुरू कर दिये हैं और डाक्टर अलग-अलग बीमारी के लिए अपने नुस्खे में इन एप्स के नाम लिखा करेंगे. इसी तरह के एक एप का नाम है रीसेटजिसमें रोगी को अपने व्यवहार में बदलाव लाने के बारे में सबक दिया जाएगा. शराब, कोकेन और भांग जैसी लतों के इलाज में इस एप का इस्तेमाल रोगी को अस्पताल में भर्ती कराए बिना किया जाएगा. अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन नाम के विभाग ने पिछले साल इस एप को मंजूरी दे दी है जिसके बाद डॉक्टर मादक पदार्थों की लत छुड़ाने के लिए इलाज के तौर पर इसे नुस्खे के रूप में लिख सकेंगे. चिकित्सा क्षेत्र की कुछ कंपनियां तो शिजोफ्रेनिया और मल्टिपल स्क्लेरोसिस जैसी बीमारियों के इलाज के लिए प्रेस्क्रिप्शन सॉफ्टवेयर (यानी नुस्खा सॉफ्टवेयर) के विकास की दिशा में कार्य कर रही हैं.  

लेजऱ किरणों की मदद से चुंबक बनाना और हटाना

जर्मनी में हेल्महोल्ट्ज़-ज़ेन्ट्रम ड्रेसडेन-रोसेंडोर्फ तथा अमेरिका की वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का एक दल लेजऱ किरणों की मदद से लोहे और एल्युमीनियम से बनी मिश्रधातु के अत्यंत शक्तिशाली चुंबक तैयार करने में सफल रहा है. इस खोज से आप्टिकल टेक्नोलॉजी और डेटा स्टोरेज के क्षेत्र में नयी और शानदार संभावनाएं सामने आने वाली हैं. वैज्ञानिकों ने प्रयोग के दौरान उच्च तीव्रता वाली लेजऱ किरणों को इस मिश्रधातु पर डाला. इससे मिश्रधातु में लौह परमाणुओं का व्यवस्थित क्रम नष्ट हो गया और वे एक दूसरे के ज्यादा करीब आ गये. लौह परमाणुओं के इस नये व्यवस्थापन से मिश्रधातु में चुंबकीय गुण उत्पन्न हो गये और वह शक्तिशाली चुंबक में बदल गयी. अगर इन्हीं लेजऱ किरणों को कम तीव्रता के साथ मिश्रधातु पर डाला जाए तो चुंबकीय गुण समाप्त हो जाते हैं और परमाणु फिर से सुव्यवस्थित संरचना में संयोजित हो जाते हैं. इस तरह इस तकनीक से शक्तिशाली चुंबक तैयार किये जा सकते हैं और जरूरत पडऩे पर चुंबकीय गुणों को समाप्त भी किया जा सकता है.     

जीन चिकित्सा 2.0

चिकित्सा के क्षेत्र में जीन चिकित्सा का मतलब है बीमारी के इलाज के लिए आनुवंशिक सामग्री या डीएनए को रोगी की कोशिकाओं तक पहुंचाना. इस तकनीक में आनुवंशिक सामग्री को कृत्रिम रूप से तैयार किये गये वायरस की मदद से कोशिका में प्रवेश कराया जाता है ताकि दोषपूर्ण या असामान्य जीन में कमी की क्षतिपूर्ति के लिए स्वस्थ प्रोटीन का निर्माण किया जा सके. कृत्रिम रूप से तैयार वायरस, वैक्टर यानी संवाहक का काम करता है और कोशिका को संक्रमित कर नये जीन को वहां तक पहुंचाता है. नसों में लगाए जाने वाले इंट्रावीनस इंजेक्शन के जरिए इसे शरीर के प्रभावित  अंग या किसी खास ऊतक तक पहुंचाया जाता है जहां यह किसी कोशिका विशेष में पहुंच जाता है.    

संवाहक द्वारा पहुंचाया गया नया जीन सामान्य और क्रियाशील प्रोटीनों का निर्माण शुरू कर देता है. इस विधि से हृदय रोग और कैंसर जैसी असाधारण आनुवंशिक बीमारियों और विकृतियों के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव आने की संभावना है. अब तक दुनिया भर में चिकित्सा विनियामक एजेंसियां जीन चिकित्सा की इजाजत नहीं देती थीं. मगर अब पहली जीन चिकित्सा को अमेरिका की विनियामक एजेंसी की बहुत जल्द स्वीकृति मिलने की संभावना है. सीआरआईएसपीआर-कैस 9 नाम की जीन संशोधन तकनीक के आविष्कार से वैज्ञानिकों के लिए गड़बड़ी वाले जीन का पता लगाना और इसे हटाना या इसमें सूक्ष्म से सूक्ष्म सुधार करना संभव हो गया है.    

फ्लू की बीमारी फैलाने वाले वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग मूल वायरस में कर ली गयी है. इसमें नैनोपोर टेक्नोलॉजीकी मदद ली गयी. इस सफलता का श्रेय अमेरिका में अटलांटा स्थित सेंटर फार डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन, बैटेले मैमोरियल इंस्टीट्यूट अटलांटा और ओकरिज इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस को जाता है. ऐसा पहली बार हुआ है जब फ्लू के मूल वायरस की जीनोम सीक्वेसिंग करने में कामयाबी मिली है. ज्यादातर वायरसों में मूल जीनोम आरएनए के रूप में होता है. आरएनए का पूरी तरह विश्लेषण करना और इसके बारे में पता लगाना वैज्ञानिकों के लिए कोई आसान काम नहीं था.     

इससे पहले जिन विधियों का उपयोग किया जाता था उनमें न सिर्फ  ज्यादा समय लगता था बल्कि वे ज्यादा जटिल भी थीं साथ ही वे ज्यादा कारगर नहीं थीं. इनसे सिर्फ छोटे-मोटे सीक्वेंस का ही पता चल पाता था और पूरे जीनोम की सीक्वेंसिंग नहीं हो पाती थी. इस अध्ययन में जिस नयी तकनीक का उपयोग किया गया है उसे ऑक्सफोर्ड नैनोपोर टेक्नोलॉजी कहा जाता है. इसमें अति सूक्ष्म आणविक चैनल से गुजरते हुए आरएनए के सूत्र उजागर हो जाते हैं. इस नयी खोज का महत्व इस तथ्य में निहित है कि इससे बीमारी फैलाने वाले वायरसों की प्रकृति और उनके काम करने के तौर-तरीकों को समझने की संभावनाएं बढ़ गयी हैं. इससे कई वायरल बीमारियों जैसे आम जुकाम, पोलियो, मीजल्स, हैपटाइटिस सी आदि के शीघ्रता से, विश्वसनीय और बेहतर इलाज का रास्ता खुल गया है. आरएनए डीएनए की ही तरह होता है. असल में यह डीएनए के रूप में कूटबद्ध जीन और प्रोटीनों के बीच मध्यस्थ का कार्य करता है तथा कोशिका में अन्य कार्य भी करता है.    

स्मार्ट औषधियां

स्मार्ट फोन और स्मार्ट टेलिविजन के बाद अब स्मार्ट दवाओंकी बारी है. नैनोटेक्नोलॉजी की मदद से इस तरह की दवाओं को बनाने का तरीका खोज निकाला गया है. इस तरह की दवाओं और औषधियों को नैनोमेडिसिन नाम दिया गया है. लिंकन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने नैनोमेडिसिन बनाने की नयी विधि खोज निकाली है जिसकी मदद से शरीर के किसी खास अंग या हिस्से की बीमारी, जैसे कैंसर की रसौली, का इलाज अधिक कारगर और सही-सही तरीके से किया जा सकेगा. लिंकन विश्वविद्यालय के नैनोबायोटेक्नोलॉजिस्टों ने इस अभिनव विधि का आविष्कार किया जिसका औषधियों के माध्यम से किये जाने वाले इलाज में व्यापक स्तर पर उपयोग किया जा सकेगा. इस तकनीक में सोने के नैनोपार्टिकल्स यानी अत्यंत सूक्ष्म कणों पर किसी जैव प्रोटीन का लेप कर दिया जाएगा और इसमें दवा को मिलाकर शरीर के प्रभावित अंग या हिस्से में इस तरह से पहुंचाया जाएगा कि दवा खून में घुलकर व्यर्थ न चली जाए या रास्ते में ही खत्म न हो जाए. इस तरह से बनायी गयी दवाओं के दो संभावित फायदे हो सकते हैं. पहला, नैनो पार्टिकल्स अपनी सतह पर ऐसी दवाओं का वहन कर सकते हैं जिनके रक्त में खराब हो जाने का खतरा है. दूसरे, अपने अत्यंत सूक्ष्म आकार के कारण ये कण छोटी आंत और शरीर के अन्य अंगों में झिल्लियों के आर-पार होकर गुजर सकते हैं (जबकि ये झिल्लियां आम तौर पर दवाओं की गतिविधियों में बाधा उत्पन्न करती हैं जिससे दवाएं शरीर में लक्षित स्थान तक नहीं पहुंच पातीं.) इस तरह नैनोपार्टिकल्स के जरिए दवाओं को शरीर के प्रभावित अंग तक कारगर तरीके से और कम समय में पहुंचाया जा सकता है. इस नयी तकनीक से औषधि निर्माताओं को दवाओं को प्रोटीन की परतों के बीच व्यवस्थित तरीके से सोने के नैनोपार्टिकल्स में इच्छानुसार परतें रखने में मदद मिलेगी. इस तरह प्रोटीन्स की शुद्धता और मौलिकता बनी रहेगी जिससे दवा को और अधिक असरदार और कारगर बनाया जा सकेगा जिससे सही इलाज अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर होने लगेगा.     

जीवित ऊतक के भीतर सक्रिय कोशिका का उच्च रिजॉल्यूशन 3डी वीडियो

अमेरिका के वर्जीनिया राज्य में हॉरवर्ड हय़ूजेज मेडिकल संस्थान के जेलेनिया अनुसंधान परिसर के वैज्ञानिक ऊतक के अंदर सक्रिय कोशिकाओं के थ्री डी वीडियो बनाने में कामयाब रहे हैं. इस सफलता की जानकारी हाल ही में विज्ञान पत्रिका नेचरऔर साइंससमेत अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिकाओं में हाल में दी  गयी है.  

यह कदम अपने आप में अभूतपूर्व है क्योंकि वैज्ञानिक अनुसंधान के अब तक के इतिहास में किसी जीवित कोशिका को ज़ेब्रा फिश के कान के भीतर के जीवित ऊतक में सामान्य रूप से काम करते हुए उच्च रिजोल्यूशन वाले 3-डी वीडियो में रिकॉर्ड नहीं किया गया था. वैज्ञानिकों और जीव वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा प्रश्न हमेशा से रहा है कि ऊतक या शरीर में कोशिका के व्यवहार का प्रेक्षण किस तरह किया जाए. लेकिन अत्याधुनिक और परिष्कृत माइक्रोस्कोपी तकनीक से यह संभव हो गया है. ऊतक के भीतर काम करने वाली किसी जीवित और सक्रिय कोशिका का चित्र लेना बहुत बड़ी चुनौती का काम था क्योंकि कोशिका के आस-पास की चीजें, जिनमें दूसरी कोशिकाएं और शारीरिक द्रव पदार्थों में परिदृश्य को विकृत करने की प्रवृत्ति होती है. इससे जो चित्र प्राप्त होते हैं वे धुंधले, असंगत और कभी-कभी तो गलत भी हो जाते हैं. इस समस्या के समाधान के लिए भौतिकीविद एरिक बेटजिग़ के नेतृत्व में वैज्ञानिकों ने लाइट शीट माइक्रोस्कोपी और अनुकूलन करने वाली प्रकाशिकी तकनीकों का उपयोग किया. इसका नतीजा बड़ा शानदार रहा और स्पष्ट तथा सुंदर त्रिविमीय वीडियो रिकार्ड किये जा सके. जीवित कोशिकाओं को उच्च गुणवत्ता वाले वीडियो फार्मेट में रिकॉर्ड करने की इस तकनीक से वैज्ञानिकों, खास तौर पर चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य करने वाले अनुसंधानकर्ताओं को कोशिकाओं की प्रकृति के अध्ययन में मदद मिलेगी जो कि मनुष्यों समेत तमाम जीवधारियों की मूल प्रकार्यात्मक इकाइयां हैं. असामान्य परिस्थितियों में कोशिकाओं का व्यवहार जैसे जीवित ऊतकों में कैंसर कोशिकाओं के व्यवहार के अध्ययन से भविष्य में मनुष्यों और जानवरों की अनेक बीमारियों के समाधान की संभावना के द्वार खुल जाएंगे. इस विधि से अनुसंधानकर्ता उच्च रिजोल्यूशन वाले वीडियो के जरिए कोशिकाओं की एक दूसरे पर पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रिया को भी समझ सकेंगे.      

(लेखक नई दिल्ली स्थित विज्ञान संचारकर्ता और विज्ञान नीति अनुसंधानकर्ता हैं.) ई-मेल: raiesaltaf@gmail.com

 (चित्र गूगल से साभार)