नौकरी फोकस


Volume-10, 9-10 June, 2018

 

 
 
जल विज्ञान नीति में कॅरिअर की संभावनाएं

रईस अल्ताफ

जल विज्ञान नीति
जल हमारे जीवन के साथ-साथ पर्यावरण-प्रणाली, जिसमें हम जीते हैं, का एक अनिवार्य तत्व है. जिसके बगैर इस धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है. इस धरा पर पायी जाने वाली कुल जल राशि में केवल २-३ प्रतिशत शुद्ध जल शामिल है. इसलिए इस संसाधन का उपयोग विवेक सम्मत रूप से करना होगा. संयुक्त राष्ट्र विश्व जल रिपोर्ट २०१८ के अनुसार, जल हेतु वैश्विक मांग १ प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है और यह भविष्य में भी निरंतर बढ़ती रहेगी. जल हेतु मांग में वृद्धि का एक बड़ा भाग विकासशील तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं जैसे भारत और चीन से आयेगा. वैश्विक जलचक्र जलवायु परिवर्तन के कारण भी विछिन्न हो रहा है. अन्य कारकों में, जिसने जल की खपत में वृद्धि की है, गहनीकृत कृषि तथा तीव्र शहरीकरण शामिल हैं. रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि जल प्रदूषण अफ्रीका, एशिया तथा लातिन अमेरिका में प्राय: सभी नदियों में बदतर हो चुका है. जल की नई मांग बढ़ते शहरीकरण तथा तीव्र गति से प्रसारित होती औद्योगिक गतिविधियों से है. जल की कमी विश्व के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती है. इसका प्रशमन पर्यावरण, आर्थिक तथा सामाजिक संधारणीयता दृष्टिकोण से निर्णायक है. जल संकट गहराने के कारण, पुराने समाधान इस वैश्विक चुनौती से निपटने में अप्रभावकारी होते प्रतीत हो रहे हैं. संधारणीय विकास के लिए २०३० कार्यसूची के लक्ष्य ६ का मुख्य संकेंद्र भी जल संसाधनों की उपलब्धता तथा समुचित प्रबंधन सुनिश्चित करने के बारे में है. विश्व जल रिपोर्ट २०१८ बताती है कि विश्व में २ अरब से अधिक लोग सुरक्षित पेय जल की पहुंच से दूर हैं तथा ४ अरब से अधिक लोग सुरक्षित स्वच्छता से महरूम हैं. इस प्रकार सुरक्षित पेय जल की उपलब्धता एक चुनौती है जिसका प्रभावकारी ढंग से तथा तत्काल निराकरण किये जाने की आवश्यकता है.
भारत भी एक आसन्न जल संकट का सामना कर रहा है और इसकी गणना विश्व के सर्वाधिक जल दबाव वाले देशों में होती है. भारत में दस लाख से अधिक लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं होता है और अन्य बहुत सारे लोगों को नियमित जलाभाव का सामना करना पड़ता है. वर्तमान में भारत के अनेक नगर भी प्रचंड जलाभाव का अनुभव कर रहे हैं. आधिकारिक आकलन के अनुसार, भारत जिसके पास विश्व की आबादी का १८ प्रतिशत भाग है, वह कुल शुद्ध जल संसाधनों का मात्र ४ प्रतिशत भाग रखता है. भारत की आधी से अधिक नदियां नितांत प्रदूषित हो चुकी हैं जबकि अन्य नदियां उस स्तर तक प्रदूषित  हैं जिसे वर्तमान वैश्विक तथा राष्ट्रीय मानकों द्वारा असुरक्षित माना जाता है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पिछले पांच वर्षों में प्रदूषित नदियों की संख्या को द्विगुणित करते हुए १२१ से २७५ कर दिया है. भूजल की स्थिति वैज्ञानिक निष्कर्षों के अनुसार समानरूप से चिंंताजनक है जो विशेषकर पंजाब, हरियाणा तथा दिल्ली राज्यों में भूजल की
तीव्र क्षीणता दर्शाते हैं. एक अत्यंत नवीनतम नासा अध्ययन जो केवल मई २०१८ में नेचर (प्रकृति) में प्रकाशित हुआ है, में भी भारत को वैश्विक प्रचंड स्थानों में दर्शाया गया है जहां जल संसाधनों के अतिशय उपयोग के कारण शुद्ध जल की उपलब्धता में विशेषकर उत्तर भारत  में गंभीर गिरावट आ गयी है. वैज्ञानिकों एवं पर्यावरणविदों का भी पूर्वानुमान है कि आने वाले वर्षों में अनेक राज्यों में बारंबार तथा गंभीर सूखा पड़ेगा. इन सभी संकटों के बीच, भारत के जल क्षेत्र के अभिशासन में प्रभावकारी परिवर्तन लाने के लिए अपेक्षित योग्य वृत्तिकों की कमी है. निकट भविष्य में बढ़ते शहरीकरण विस्तारित हो रही अवसंरचना  परियोजनाओं तथा जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट और अधिक गहराने जा रहा है तथा भारत को जलाभाव की बढ़ती चुनौती का सामना करने के लिए जलनीति एवं जल प्रबंधन के क्षेत्र में अधिकाधिक प्रशिक्षित पेशेवरों की आवश्यकता होगी. ऐसे परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए, भारत तथा विदेशों में अनेक विश्वविद्यालयों एवं अनुसंधान संस्थाओं द्वारा सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों पहलुओं पर विशेष ध्यान देते हुए जल नीति और जल प्रबंधन पर विशेष पाठ्यक्रम ऑफर किये जाते हैं. ऐसे पाठ्यक्रमों का उद्देश्य जल तथा जल संबंधित मुद्दों के साथ संव्यवहार में और एक प्रभावकारी तथा कार्यकुशल जल विज्ञान नीति को निर्माण एवं कार्यान्वयन में सहायता करने, जो कि गहन विज्ञान एवं यथार्थ आंकड़ों पर आधारित है, के अंतर्गत प्रशिक्षित मानव संसाधन उत्पन्न करना है ताकि संधारणीय जल प्रबंधन का मार्ग सुनिश्चित हो सके.
जल विज्ञान नीति का अध्ययन एवं प्रयोग विज्ञान-नीति की व्यापक संरचना के अंतर्गत किया जाता है. विज्ञान-नीति अंतरामुख एक प्रणाली विज्ञान प्रक्रिया है जो वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, प्रयोगकर्ताओं तथा कभी-कभी जनता के बीच भी सूचना के आदान-प्रदान में कार्यव्यस्त है ताकि वैज्ञानिक निष्कर्षों एवं आंकड़ों की नीति-निर्माण में एकीकृत किया जा सके. प्राकृतिक तथा सामाजिक विज्ञान दोनों से अंतर्दृष्टियां सम्मिलित, साकल्यवादी तथा यथार्थ नीतियों के लिए पूर्वापेक्षा हैं. वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्थानिक परिदृश्यों को समाविष्ट करते हुए जल विज्ञान नीतिजल प्रमात्रा एवं गुणवत्ता दोनों के प्रबंधन में योगदान करती है, इस प्रकार प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित होती है, जबकि उसी समय कृषि तथा औद्योगिक क्षेत्र में जल का एक इष्टतम उपयोग सुनिश्चित होता है.
क्षेत्र : जल विज्ञान नीति वृत्तिकों को विभिन्न अभिकरणों एवं निकायों में केंद्र तथा राज्य दोनों स्तरों पर, (अर्थात् केंद्रीय जल आयोग, केंद्रीय मृदा एवं सामग्री अनुसंधान केंद्र, केंद्रीय भूजल बोर्ड, बाढ़ नियंत्रण आयोगों, नदी बोर्डों, राष्ट्रीय परियोजना निर्माण निगम लिमिटेड, पर्यावरण विभागों, राज्य कृषि विभागों, लोक निर्माण विभागों (पीडब्ल्यूडीज), योजना आयोगों, शहरी विकास तथा आवास एवं ग्रामीण विकास क्षेत्र इत्यादि) नीति तथा प्रयोग दोनों स्तरों पर कार्य करने के अवसर प्राप्त हो सकते हैं. इसके अतिरिक्त वे गैर सरकारी संगठनों (एनजीओज) अंतर्राष्ट्रीय वकालत निकायों, विचारक मंडलों में तथा स्वतंत्र अनुसंधानकर्ताओं के रूप में भी कार्य कर सकते हैं.
नीचे भारतीय विश्वविद्यालयों तथा कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों द्वारा ऑफर किये जा रहे लोकप्रिय कार्यक्रमों की एक सूची दी गयी है. यह सूची सर्वांगीण नहीं है और इसमें विश्व के अनेक अन्य विश्वविद्यालय एवं संस्थाएं शामिल हो सकती हैं :
डिग्री कार्यक्रम तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम :
१. शिव नादर विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर पब्लिक अफेयर्स एंड क्रिटिकल थ्यौरी (सीपीएसीटी) जल विज्ञान नीति में निम्नलिखित बहु-विधायी कार्यक्रम ऑफर करता है.
जल विज्ञान नीति में एम. एससी.
विज्ञान नीति में पी. एचडी.
जल विज्ञान नीति में स्नातकोत्तर डिप्लोमा.
जल विज्ञान नीति में प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम.
पात्रता : एम. एससी. कार्यक्रम, स्नातकोत्तर डिप्लोमा कार्यक्रम तथा प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम के लिए अपेक्षित न्यूनतम योग्यता बी. एससी./बीए/बीटेक अथवा कोई भी समकक्ष पूर्व स्नातक डिग्री है. स्नातकोत्तर डिप्लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम विशेषकर मध्य-कॅरिअर वृत्तिकों, प्रशासकों, प्रबंधकों तथा विकास गतिविधियों के लिए अभिकल्पित किये गये हैं. इन पाठ्यक्रमों में विश्वविद्यालय कुछ छात्रवृत्तियां भी ऑफर करता है. अन्य  विवरणों के लिए देखें : https://cpact.snu.edu.in
२. टीईआरआई विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में जल विज्ञान एवं अभिशासन ऑफर किया जाता है.
ऑफर किये जाने वाले पाठ्यक्रम :
एम. एससी जल विज्ञान एवं अभिशासन (पात्रता : स्नातक (बीएससी/बीए) अथवा समकक्ष अभियांत्रिकी, पर्यावरण विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित, सांख्यिकी, रसायन विज्ञान, भूविज्ञान, वातावरण विज्ञान, अर्थशास्त्र, भूगोल, प्राणि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, मानव विज्ञान, कृषि विज्ञान की किसी भी शाखा से)
एम. टेक जल संसाधन अभियांत्रिकी एवं प्रबंधन (पात्रता : स्नातक अथवा समकक्ष अभियांत्रिकी की किसी भी शाखा से अथवा स्नातकोत्तर अथवा समकक्ष पर्यावरण विज्ञान, भौतिक  विज्ञान, गणित, सांख्यिकी, रसायन विज्ञान, भूविज्ञान, वातवरण विज्ञान, अर्थशास्त्र, भूगोल, कृषि विज्ञान में १०+२ स्तर पर गणित के साथ).
जल विज्ञान एवं अभिशासन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा (पात्रता : स्नातक (बी.एससी./बी.ए.) अथवा समकक्ष अभियांत्रिकी, पर्यावरण विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित, सांख्यिकी, रसायन विज्ञान, भूविज्ञान, वातावरण विज्ञान, अर्थशास्त्र, भूगोल, प्राणिविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान, मानवविज्ञान, कृषि विज्ञान की किसी भी शाखा से)
जल विज्ञान एवं अभिशासन में पीएच.डी. (पात्रता: एम.एससी. अथवा एम.फिल सुसंगत क्षेत्र में अथवा समकक्ष) विवरणों के लिए देखें :  www.teriuniversity.ac.in
3. जल नीति, विनियमन एवं अभिशासन केंद्र स्कूल ऑफ हेबिटाट स्टडीज, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टीआईएसएस)-मुंबई.
ऑफर किए जाने वाले कार्यक्रम :
जल नीति एवं अभिशासन में एम.ए./एम.एएसी. (पात्रता : स्नातक डिग्री न्यूनतम 3 वर्षीय अवधि की अथवा इसके समकक्ष (10+2+3 अथवा 10+2+4 अथवा 10+2+2+1 वर्ष ब्रिज कोर्स अध्ययन प्रतिमान अथवा कोई अन्य प्रतिमान 15 वर्षीय औपचारिक शिक्षा की अनिवार्य अपेक्षाएं पूरा करते हुए) किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से, किसी भी विधा में)
4. जल अनुसंधान अन्तर्विधायी केंद्र (आईसीडब्ल्यूएआर), भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी)-बंगलोर.
यह केंद्र जल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में नवोन्नत अनुसंधान कार्यान्वित करने हेतु उद्धिष्ट है.
ऑफर किए जाने वाले कार्यक्रम :
एम.एससी. (अभि.), पीएच.डी. तथा पोस्ट डाक्टोरल अनुसंधान (पात्रता मानदंड : सुसंगत क्षेत्र में बी.टेक, एम.टेक, तथा पीएच.डी)
अन्य विवरणों के लिए देखें :http://www.icwr.iisc.ac.in/
5. जल संसाधन विद्यालय, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खडग़पुर
ऑफर किए जाने वाले कार्यक्रम :
जल अभियांत्रिकी एवं प्रबंधन में एम.टेक. तथा पीएच.डी.
विवरणों के लिए देखें : http://www.iitkgp.ac.in/department/wm
6. जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रूडक़ी
प्रस्तावित किए जाने वाले कार्यक्रम :
जल संसाधन विकास में एम.टेक. तथा स्नातकोत्तर डिप्लोमा (पात्रता: अभियांत्रिकी डिग्री सिविल, वैद्युत अथवा यांत्रिक में)
एम.टेक.सिंचाई जल प्रबंधन (पात्रता: सिविल/कृषि में बी.टेक अथवा कृषि विज्ञान में निष्णात डिग्री)
पीएच.डी. निष्णात/एम.टेक डिग्री एक सुसंगत क्षेत्र में.
7. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भुवनेश्वर
ऑफर किए जाने वाले कार्यक्रम :
जल संसाधन एवं अभियांत्रिकी में एम.टेक (पात्रता: सिविल/कृषि अभियांत्रिकी में बी.ई./बी.टेक अथवा समकक्ष डिग्री न्यूनतम 60 प्रतिशत अंकों के साथ वैध गेट स्कोर)
विवरणों के लिए देखें : www.iitbbs.ac.in
जल विज्ञान नीति एवं प्रबंधन में लोकप्रिय पाठ्यक्रम तथा विशेषज्ञताएं उपलब्ध करा रहे कुछ विदेशी विश्वविद्यालय निम्नानुसार हैं :
1. जल विज्ञान, नीति एवं प्रबंधन में एम. एससी./एम.फिल, भूगोल एवं पर्यावरण विद्यालय, आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, ब्रिटेन में.
विवरणों के लिए देखें: https://www. ox.ac.uk/admissions/graduate-courses/social-sciences/ geography-and-the-enviorn ment?wssl=1
2. जल विज्ञान एवं अभिशासन में एम.एससी. किंग्ज कॉलेज लंदन में.
विवरणों के लिए देखें: https://www.kcl.ac.uk/study/postgraduate/taught-courses/ water-science-and-gover nance-msc.aspx
3. जल विज्ञान एवं प्रबंधन में एम.एससी. यूटे्रच विश्वविद्यालय नीदरलैंड्स में.
विवरणों के लिए देखें: https://www. uu.nl/masters/en/water-scie nce-and-management.
4. जल विज्ञान एवं नीति में एम.एससी. कार्यक्रम युनिवर्सिटी ऑफ डेलावेयर-संयुक्त राष्ट्र में.
विवरणों के लिए देखें: http://www1. udel.edu/watersciencepolicy/courses.html.
5. संधारणीय जल प्रबंधन में एम.एससी. टफ्ट्स युनिवर्सिटी मेसाचुएट्स, संयुक्त राष्ट्र में.
विवरणों के लिए देखें: http://swm. tufts.edu/
लेखक नई दिल्ली स्थित विज्ञान संचारक तथा विज्ञान नीति अनुसंधानकर्ता हैं. ईमेल: raiesaltaf@gmail.com