नौकरी फोकस


Volume-19, 11-17 August, 2018

 
भारत को हमारे सपने का राष्ट्र बनाने की दिशा में स्वाधीनता से लेकर हमारी यात्रा

श्री प्रकाश शर्मा

अगस्त १५, १९४७ को मिली भारतीय स्वाधीनता हमें उन हजारों महान शहीदों के बलिदानों, कठिन संघर्षों तथा मानसिक-शारीरिक यातनाओं की याद दिलाती है, जिन्होंने लगभग ३५० वर्ष से चली आ रही अंग्रेजी शासन की गुलामी से हमें आजाद करने के लिए मातृभूमि की बलिबेदी पर हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. अन्य देशों के स्वाधीनता संघर्ष से भिन्न, भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष सामूहिक आंदोलन तथा सामूहिक भागीदारी की प्रेरणादायक कहानी है, जो हमारे महान संत, महात्मा गांधी के सत्य व अंहिसा के वैश्विक तौर पर सम्मानित तथा व्यापक मान्यता वाले दर्शनों के साथ ही किसानों, मजदूरों, कारोबारियों तथा आम जनता द्वारा लड़ी गई लड़ाई तथा जुर्मों के प्रति सहनशीलता का प्रतीक है. यह लाखों लोगों द्वारा देखे गए उस सपने के पूरा होने का किस्सा भी है, जो जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन की स्थापना का सपना था. भारत की स्वतंत्रता उन लाखों लोगों की आकांक्षाओं का भी प्रतिनिधित्व करती है, जो स्वराज की प्राप्ति के लिए थीं.
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा था, ‘‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, सुभाष चंद्र बोस ने कहा था. ‘‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’’, राष्ट्रपिता गांधीजी ने कहा था, ‘‘करो या मरो’’ तथा प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानियों और अनेक क्रांतिकारी नेताओं के बहुत-से अन्य  प्रेरक नारे तथा उनकी अवधारणाएं देश की स्वतंत्रता की लड़ाई की याद दिलाते हैं तथा हमारा हदृय भावों से भर जाता है. यही कारण है कि भारतीय स्वाधीनता देश के राजनीतिक इतिहास में महज एक साधारण किस्सा भर नहीं है, बल्कि राष्ट्र के उन देश भक्तों तथा शहीदों और वीर माताओं के बहादुर बेटों और बेटियों को याद करने, आदर करने तथा श्रद्धांजलि अर्पित करने का एक महान अवसर है, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के बर्बर तथा अमानवीय नीतियों द्वारा सभी प्रकार की यातनाएं झेली, जिसके बल पर १५ अगस्त, १९४७ को अपना देश अंग्रेजी शासन के चंगुल से मुक्त हुआ.
आजादी मिले अब सात दशक से अधिक का समय बीत गया है तथा हम अपने देश की आजादी की ७२ वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. वस्तुत: किसी राष्ट्र के जीवन-इतिहास में सात दशकों की अवधि काफी बड़ी नहीं है, किन्तु लोगों की आकांक्षाओं की पूर्ति तथा विकास के मानकों तक हमारी उपलब्धि के मूल्यांकन के परिदृश्य से यह अवधि उतनी छोटी भी नहीं है, जिसे नजरअंदाज किया जाए.
 स्वतंत्रता दिवस हमें अपने शहीदों के प्रति हृदय की गहराइयों से सम्मान दर्शाने का अवसर प्रदान करने के साथ ही हमें इस बात का मूल्यांकन करने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी प्रदान करता है कि देश की आम जनता से किए गए विभिन्न वादे को पूरा करने की दिशा में हम कितना आगे बढ़े हैं. देश के संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित एक अखंड तथा सम्प्रभु राष्ट्र की अनिवार्य विशेषताओं को कायम रखने हेतु हमारे प्रयासों और कर्तव्यों के बारे में सच्चा मूल्यांकन करने का भी यह एक महान अवसर है.
समाज के वंचित और उपेक्षित लोगों के कल्याण के लिए अनेक सरकारों की नीतियों और कार्यक्रमों का जायजा लेने में भी यह दिन महत्वपूर्ण है. और, अंतत: यह दिन राष्ट्र की सुरक्षा, स्वतंत्रता, अखंडता और सम्प्रभुता कायम रखने की समृद्ध विरासत के साथ साथ हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों पीड़ाओं, देशभक्ति, निष्ठा तथा प्रयासों की महान कथाओं को याद करने तथा अपने नैतिक दायित्वों के पुनर्मूल्यांकन के लिए भी महत्वपूर्ण है, ताकि वर्तमान तथा देश की आगामी पीढिय़ों को फायदा मिल सके.
यदि हम वर्ष १९४७ में मिली स्वतंत्रता के दिनों की तुलना २१ वीं सदी के भारत  से करते हैं तो हम पाते हैं कि हमने बड़ी-बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धियां पाने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के प्राय: सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है. इससे हमें अपनी उपलब्धियों के सात दशकों से भी अधिक समय की यात्रा का एक परिदृश्य उपलब्ध होता है, जिसे हमारे महान नेताओं ने तैयार किया था.
 इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हम अब तक अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचे, किन्तु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष १९४७ में हम जहां से चले थे, उससे काफी दूरी तक आगे पहुंच पाए हैं. एक राष्ट्र के रूप में अर्थव्यवस्था के प्राय: सभी क्षेत्रों के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में हमने सफलतापूर्वक अपनी उपस्थिति दर्ज की है.
हम चांद पर अपनी कालोनियां बसाने पर विचार कर रहे हैं तथा मंगल ग्रह पर मानवीय जीवन की संभावना का पता लगाने में जुटे हैं. इस स्वतंत्रता दिवस पर यदि हम विचार करें तो यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है, जबकि हम कभी एक ऑलपिन के निर्माण में भी समर्थ नहीं थे. अब हमने आश्चर्यजनक तौर पर इस प्रकार की तकनीक विकसित की है तथा वैज्ञानिक सूझ-बूझ प्राप्त की है, जिसके बल पर हमने अपने देश में तथा अपने इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और तकनीशियनों की मदद से अपने कारखाने में हेलीकॉप्टर, हवाईजहाज, उपग्रह तथा अपने देश में तैयार होने वाले अत्याधुनिक हथियारों तथा मशीनों के निर्माण में समर्थ हैं.
वर्ष १७७० और १९४३ में बंगाल में जिस प्रकार अकाल हुआ था और प्लेग तथा हैजा जैसी महामारी से हजारों लोग मौत के मुंह में समा जाते थे, अब वैसा नहीं होता. अब हम चेचक, पोलियो, डायरिया, यक्ष्मा तथा कई प्रकार की अन्य बीमारियों से प्राय: मुक्त हो चुके हैं, जो स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले सभी उम्र-वर्ग के लोगों  की मौतों की कारण होती थीं.
अब हमारे पास विश्वविख्यात २३ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैं, ४६० से अधिक मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें प्रत्येक वर्ष ५०,००० से अधिक छात्रों को प्रवेश मिलता है. अब देश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थानों की संख्या बढक़र सात हो गई है. देश में इसी प्रकार की अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से सुसज्जित सुपरटेक अस्पतालों का एक ठोस नेटवर्क विकसित हुआ है.
अग्रणी भारतीय प्रबंधन संस्थानों की संख्या अब बढक़र २० हो गई है, जो हमारे जैसे देश में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है, जहां हाल तक उद्यमिता और प्रबंधन कौशल का अभाव था. फिलहाल हमारे लगभग २६ करोड़ बच्चे देश के ६३३ जिले में पब्लिक तथा प्राइवेट दोनों प्रकार के १५ लाख स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं. इनमें से केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा १० लाख से भी अधिक स्कूल संचालित हैं.
 भारत सरकार की नई शिक्षा नीति, १९८६ के अनुसार वर्ष १९८६ में स्थापित जवाहर नवोदय विद्यालय विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के  प्रतिभावान छात्रों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा देने में आदर्श विद्यालयों के रूप में माना जाता है. यह आधुनिक सुविधा से वंचित भारत के गांवों में शिक्षा के तेजी से प्रसार के संदर्भ में एक प्रेरणास्रोत साबित हो रहे हैं.
६०० से अधिक जवाहर नवोदय विद्यालयों में, केवल तमिलनाडु को छोडक़र, सभी राज्यों में शत-प्रतिशत रियायती शिक्षा प्रदान करते हुए, देशभर में २ लाख से भी अधिक छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जा रही है. शिक्षा के क्षेत्र में यह भारत सरकार का सबसे महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ है.
जनसंख्या संबंधी अन्य आंकड़े के संदर्भ में भी हमारे देश ने ऐतिहासिक प्रगति की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के नवीनतम आंकड़े के अनुसार, देश की मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) में चालू वर्ष में अत्यधिक गिरावट दर्ज हुई है.  यह प्रति १,००,००० जन्म के लिए घटकर १७४ हो गई है, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. हमने शिशु मृत्यु दर में ७५ प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज की है (प्रति १००० शिशुओं में से अपने पहले जन्मदिन से पूर्व मरने वाले बच्चे की संख्या). विश्व बैंक के नवीनतम आंकड़े के अनुसार, शिशु मृत्यु दर १९६० के दशक की १६५ मौतों से घटकर ३८ तक पहुंच गई है.
स्वतंत्रता दिवस के पहले से लेकर जीवन संभाव्यता (लाइफ एक्सपेक्टेंसी में भी दोगुणी वृद्धि दर्ज की गई है. स्वतंत्रता से पहले एक भारतीय की औसत आयु महज ३२ वर्ष थी, जो अब उल्लेखनीय वृद्धि के साथ ६८ वर्ष तक हो गई्र है. यह देश में स्वास्थ्य के निरंतर बढ़ते स्तर का सूचक है.
वर्ष २०११ की नवीनतम जनगणना के अनुसार भारत की साक्षरता दर ७४.०४ थी, जबकि १९४७ के दौरान यह २० प्रतिशत थी. स्वतंत्रता के समय १० भारतीय लोगों में से केवल दो व्यक्ति साक्षर थे, जबकि नवीनतम आंकड़े के अनुसार अब १० लोगों में से ८ से अधिक व्यक्ति साक्षर हैं, उसमें भी कम्प्यूटर शिक्षा एक सराहनीय उपलब्धि है.
किसी देश की राष्ट्रीय आय को राष्ट्र के विकास की माप का एक प्रमुख मानक माना जाता है. भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार १९४५-४६ के दौरान देश की राष्ट्रीय आय मात्र ६,२३४ करोड़ रुपये थी, जो अब तीव्रगति से बढक़र २०१७-१८ के दौरान १३४.०८ लाख करोड़ रुपये के आंकड़े तक पहुंच गई है.
२० वीं सदी के पूर्वाद्र्ध के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था २ प्रतिशत से भी कम वृद्धि दर  से बढ़ी थी, जो अब प्रतिवर्ष ७.७ प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी है. यह चीन की ७ प्रतिशत वृद्धिदर से भी अधिक है, जो विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है.
वस्तुत: स्वतंत्र भारत के विकास की कहानी योजना आयोग की स्थापना के साथ शुरू हुई है (अब इसे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पुनर्गठित नीति आयोग के नाम से जानते हैं).
 पंचवर्षीय योजनाओं ने भारत की सफलता की कहानी लिखी तथा हम अपनी तीव्र वृद्धि दर और करोड़ों लोगों की स्थिति में सुधार की दिशा में चलते हुए विश्व के विकसित देशों के साथ प्रतियोगी बने रहे.
महात्मा गांधी ने एक बार कहा था, ‘‘मैं तुम्हें एक यंत्र दूंगा. जब तुम संदेह में होते हो अथवा तुम्हारे पास अत्यधिक अहं का भाव आ जाए, तो निम्नलिखित जांच करो :
 सबसे निर्धनतम और कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करो, जिसे आपने कभी देखा हो तथा अपने-आप से पूछो कि आप जो कदम उठाने का विचार कर रहे हो, क्या उसके लिए किसी रूप में उपयोगी होने जा रहा है. इसके द्वारा क्या उसे कोई लाभ होने वाला है? क्या यह उसके जीवन और भाग्य पर कोई नियंत्रण कायम करेगा? दूसरे शब्दों में, क्या यह करोड़ों भूखे तथा आध्यात्मिक रूप से भुखमरी से पीडि़त लोगों को स्वराज की ओर ले जानेवाला है? तब तुम पाओगे कि तुम्हारे संदेह और तुम्हारे अहंकार दूर हो गए हैं.’’ इस उद्धरण का एक गहरा अर्थ है तथा यह देश के आम लोगों की आर्थिक स्थिति के परीक्षण से संबंधित है. किसी राष्ट्र की राजनीतिक स्वतंत्रता उसके निवासियों के सम्मानित जीवन के लिए अनिवार्य है, किन्तु आर्थिक स्वतंत्रता के बारे में क्या कहना है? जनता की वित्तीय सुरक्षा किस प्रकार की है, विशेषकर देश के कमजोर वर्गों के लिए?
 वास्तव में, आर्थिक स्वतंत्रता के लक्ष्य तक पहुंचे बिना, राजनीतिक स्वतंत्रता  का सच्चा उत्साह पूर्णत: खो जाता है. हालांकि, देश की आजादी से लेकर कई सरकारों ने देश के एक-चौथाई से अधिक गरीबी रेखा से नीचे वाले (बीपीएल) परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा कायम करने के लिए अनेक कार्यक्रम शुरू किए तथा कई नीतियां लागू कीं, किन्तु वर्ष २०१४ में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए तथा उन्होंने देश के इन वर्गों में समृद्धि और खुशहाली लाने की दिशा में अत्यधिक सरोकार दर्शाया.
सरकार ने हाशिये वाले परिवारों को वित्तीय तौर पर सशक्त बनाकर उन्हें अंतत: राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से निम्नलिखित अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्यक्रम शुरू किए हैं. इन सभी कार्यक्रमों का लक्ष्य काफी समय वंचित और उपेक्षित लोगों को आर्थिक तौर पर मजबूती प्रदान करके अंतत: उन सपनों को साकार करने में उनकी मदद करनी है, जिसे हमारे स्वतंत्रता सेनानियों और नीति-निर्माताओं ने देखा था.
प्रधानमंत्री जनधन योजना
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस २०१४ को पूर्व-संध्या पर शुरू किए गए इस कार्यक्रम को उन लोगों के वित्तीय सम्मिलन के लिए अब तक के सबसे महत्वपूर्ण औजार के रूप देख जा रहा है, जिनके पास बैंक में खाता खोलने, बचत जमा करने और आवश्यकतानुसार धन वापस लेने जैसे विभिन्न अनिवार्य वित्तीय सेवाओं तक किसी प्रकार की पहुंच नहीं थी. इस कार्यक्रम के तहत बैंकों में अब तक लगभग ३० करोड़ खाते खोले गए और इन खाते में ६६.००० करोड़ रुपये जमा कराये गए. लोगों को वित्तीय तौर पर साक्षर और सुरक्षित बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है.
सुकन्या समृद्धि योजना
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने २२ जनवरी, २०१५ को  ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ अभियान  के तहत सुकन्या समृद्धि योजना की शुरूआत की. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसी परिवार में एक बालिका की शिक्षा और उसकी शादी के खर्चे को पूरा करना है. इस योजना के तहत, एक बालिका के जन्म लेने से लेकर १० वर्ष की उम्र होने तक एक खाता खोला जा सकता है.
 प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना
 केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरूण जेटली ने बजट २०१५ पेश करते समय इस कार्यक्रम की घोषणा की थी. यह एक नवीकरणीय बीमा योजना है, जो मृत्यु होने पर २ लाख रुपये की बीमा सुरक्षा प्रदान करती है. इस योजना का लक्ष्य देश के आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों के लिए किसी अनहोनी से उत्पन्न आकस्मिकता के मामले में वित्तीय आश्वासन प्रदान करना है.
 अटल पेंशन योजना
पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर शुरू की गई इस योजना में भारत के नागरिकों के लिए वित्तीय सुरक्षा प्रदान की जाती है. असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की आर्थिक सुरक्षा पर जोर देते हुए इसकी शुरूआत की गई है. इस योजना के तहत, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) में शामिल किया जा रहा है.
इस योजना के तहत लाभार्थी इस योजना में अपने अंशदान के आधार पर ६० वर्ष की उम्र होने के बाद १००० रु. से ५००० रुपये की सुनिश्चित मासिक पेंशन प्राप्त करने के लिए अधिकृत हो जाता है. इस योजना को ऐसे लोगों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जाता है, जिनके पास पिछली बचत और सुरक्षा नहीं होने के कारण शारीरिक और मानसिक तौर पर कम सक्षम होने पर किसी प्रकार का रोज़गार पाने में कम समर्थ होने पर कोई विकल्प नहीं रह गया हो.
 डिजिटल इंडिया
 २१ वीं सदी के तेजी से विकसित होती सूचना प्रौद्योगिकी के युग में डिजिटाइजेशन अत्याधुनिक रहन-सहन के लिए एक नया घटक साबित हुआ है, जिसकी ओर देश भर में लोगों का झुकाव हुआ है. इंटरनेट सेवाओं तक आम लोगों की आसान पहुंच तथा सस्ती उपलब्धता से एक इलेक्ट्रॉनिक तौर पर सशक्त अर्थव्यवस्था के रूप में देश का बदलाव हुआ है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट की मदद से सभी सरकारी विभागों को आपस में जोडऩा है.  इलेक्ट्रॉनिक विधि से लोगों  को सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराना आय सृजन, रोज़गार तथा भविष्य के लिए ज्ञान के इस्तेमाल की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है. इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकार की इस पहल से २१ वीं सदी में भारत ज्ञान आधारित महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है.
प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना
 सामाजिक सुरक्षा प्रदान  करने के लिए यह एक बीमा योजना है, जिसमें मामूली प्रीमियम पर दुर्घटना में मौत होने तथा विकलांगता शामिल है. यह योजना १८ से ७० वर्ष के उम्र-समूह के बीच सभी लोगों के लिए उपलब्ध है. भारत के नागरिकों के वित्तीय समावेशन के लिए एक कदम के रूप में यह योजना नरेन्द्र मोदी के
मिशन ‘‘सबका साथ, सबका विकास’’ को पूरा करने की दिशा
में उठाया गया एक अगला कदम है.
सांसद आदर्श ग्राम योजना
यह योजना प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गांवों के समग्र विकास के लिए शुरू की गई अत्यंत महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों में से एक है. हमारे गांव भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास का एक अभिन्न हिस्सा हैं. 
लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर ११ अक्टूबर, २०१४ को इस कार्यक्रम की शुरूआत की गई थी.  इस योजना के तहत, एक सांसद अपनी लोक सभा अथवा राज्य सभा निर्वाचन क्षेत्र से एक ग्राम पंचायत को चुनकर उसे गोद लेते हैं, ताकि उसे एक आदर्श ग्राम के रूप में विकसित किया जा सके, जिसमें सभी आधारभूत सुविधाएं, शिक्षा, स्वच्छता, संचार, स्वास्थ्य सुविधा और अन्य नागरिक सुविधाएं मौजूद होंगी. ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित, सांसद आदर्श ग्राम योजना का लक्ष्य गांवों और ग्राम पंचायत की विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों को सशक्त बनाना है.
मेक इन इंडिया
मेक इन इंडिया श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू की गई सबसे चर्चित कार्यक्रमों में से एक है. इसका लक्ष्य विश्व भर के राष्ट्रों के बीच वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखते हुए भारत के विकास का मार्गनिर्देश तैयार करना है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने १५ अगस्त, २०१४ को लाल किले की प्राचीर से इस कार्यक्रम की घोषणा की थी. निर्माताओं, विशेषकर विदेशी निर्माताओं से यह अनुरोध किया गया है कि वे भारत में सामग्रियों का उत्पादन करें. इससे देश का औद्योगिक विकास को बल मिलेगा. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय तथा औद्योगिक नीति एवं संवद्र्धन विभाग द्वारा संचालित इस योजना का लक्ष्य देश में नई खोज तथा निवेश सुविधा को बढ़ावा देना है. भारत को एक महत्वपूर्ण निर्माण केन्द्र बनाना भी इसका लक्ष्य है, ताकि हमारे जैसे रोज़गार की आवश्यकता वाले राष्ट्र के लिए रोज़गार के अवसर तैयार हो पाएं.
प्रधानमंत्री द्वारा इसे ‘‘शेर का कदम’’  के रूप में बताया गया. आनेवाले वर्षों में ‘‘मेक इन इंडिया’’  भारत में तेजी से उभरते उद्योगों तथा अर्थव्यवस्था को नई पहचान प्रदान करने जा रहा है. किसी देश का विकास एक गतिमान अवधारणा है. यह हमेशा चलता रहता है और इसी कारण से यह कहा जाता है कि यदि किसी राष्ट्र का विकास कभी पूरा हो जाता है और उसकी जनता की आकांक्षाएं कभी पूरी हो जाती हैं, तो एक राष्ट्र के रूप में वह समाप्त हो जाता है. भारत की कहानी भी किसी रूप में भिन्न नहीं है. एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने तथा हमारा संविधान लागू होने से लेकर प्राय: सभी क्षेत्रों में हमने उल्लेखनीय प्रगति की है. चुनौतियां और समस्याएं अभी भी मौजूद हैं, किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि हम संसाधनों की कमी को ध्यान में रखते हुए एक-एक करके उन पर विजय प्राप्त करने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं. प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार और लेखक इडवार्ड गिब्बन ने एक बार कहा था, ‘‘अंत में, उन्होंने स्वतंत्रता की चाहत से अधिक सुरक्षा के प्रति चाहत दर्शायी’’. यहां सुरक्षा का संदर्भ आर्थिक सुरक्षा से है तथा एक राष्ट्र के रूप में हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता का अंतिम लक्ष्य, आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करना है, क्योंकि एक भूखा व्यक्ति एक स्वतंत्र व्यक्ति नहीं है. इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने वादे को पूरा करने की दिशा में हमने अपनी यात्रा के कई पड़ाव तय किए हैं और शेष पड़ावों तक पहुंचने के लिए हमारी यात्रा जारी है. हमारे जैसे एक राष्ट्र के लिए, जो सदियों से किसी विदेशी सत्ता द्वारा वंचित और शोषित हो, यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है. हम धीरे-धीरे तथा निरंतर प्रगति की दिशा में चलने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हैं और देश  के नागरिक भारत को विकसित होते हुए देखना चाहते हैं, जो हमारे सपने का भारत है.
(लेखक जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, जिला-मामित (मिजोरम) के प्रधानाचार्य हैं) इे-मेल : spsharma.rishu@gmail.com