नौकरी फोकस


Volume-26, 29 September to 5 October, 2018

 

गांधीजी और भारतीय युवा

सुदर्शन अयंगर

गांधीजी की समाज की अवधारणा में, युवाओं को अपने स्कूली जीवन से ही काम में हाथ बंटाना चाहिए. वे इस बात के पक्षधर थे कि विद्यार्थियों को स्कूल में उत्पादक कार्यों में योगदान करना चाहिए. वास्तव में  उनका दर्शन था- नित नई तालीमऔर उनकी शिक्षण पद्धति थी काम करते हुए सीखना’. गांधीजी का यह पक्का विश्वास था कि जो व्यक्ति काम करने का इच्छुक होगा वह बेरोजग़ार नहीं रहेगा. दुर्भाग्य से हमने एक ऐसी शिक्षा प्रणाली को तिलांजलि नहीं दी, जो प्रशासन के लिए क्लर्क तैयार करने और ब्रिटिश तरीके से सोचने वाले बुद्धिजीवी पैदा करने के दोहरे उद्देश्य को ध्यान में रखकर लागू की गई थी. पहला लक्ष्य अत्यन्त स्वार्थपूर्ण तरीके से सस्ते कार्मिक हासिल करने और दूसरा लक्ष्य आधुनिक सभ्यता की श्रेष्ठता के अहंकार से संबद्ध था. गांधीजी ने इन दोनों का विरोध किया.

आज के अधिकांश युवाओं का सपना अधिक से अधिक धन कमाने का है, हालांकि उनमें से ज्यादातर ईमानदारी पूर्वक और देश के कानूनों का अनुपालन करते हुए धन कमाना पसंद करते हैं. परन्तु, इस तरह धन कमाने से राष्ट्र के लिए ऐसी संपदा का सृजन नहीं होता है, जो खुशहाली, समानता, शांति और सद्भाव पैदा करने वाली हो, बल्कि उससे मुख्य रूप से स्वयं का और परिवार का उत्थान होता है, जो पहले शालीन तरीके से दिखायी देता है और बाद में उच्चतर जीवन स्तर और कभी-कभी असभ्य ऐय्याशी के रूप में सामने आता है. यह धारणा मुख्य रूप से आधुनिकता को अपनाने और इस तरह आधुनिक सभ्यता का हिस्सा बनने का परिणाम है. देखें इस बारे में गांधीजी का क्या कहना था. उन्होंने 1909 में हिन्द स्वराज में सिलसिलेवार अपने विचार व्यक्त किए थे. मैं सभी संवेदनशील युवाओं से अपील करता हूं कि वे गांधीजी के विचारों को धैर्यपूर्वक पढ़ें और उनके संदेश लोगों को समझाएं क्योंकि उन्होंने यूरोपीय सभ्यता के बारे में जो कुछ 1909 में लिखा आज भी हमारे देश के बारे में सही है.

उन्होंने कहा था, कि ‘‘हमें सबसे पहले यह देखना है कि ‘‘सिविलाइजेशन’’ या ‘‘सभ्यता’’ शब्द का निहितार्थ क्या है? इसका सही परीक्षण इस तथ्य में निहित है कि इसके अंतर्गत रहने वाले लोग जीवन का लक्ष्य भौतिक रूप में स्पष्ट रूप से हासिल कर सकें. हम इसके लिए कुछ उदाहरणों पर विचार करेंगे. यूरोप में रहने वाले लोग आज बेहतर रूप में बने मकानों में रह रहे हैं, जो उन्हें आज से करीब सौ वर्ष पहले उपलब्ध नहीं थे. इसे सभ्यता का एक प्रतीक समझा जाता है, और इस तरह यह भौतिक खुशहाली को प्रोत्साहित करने का एक मामला भी है. पहले वे चमड़े का लबादा ओढ़ते थे और हथियारों के रूप में हाथ में भाला रखते थे. अब वे लम्बे पाजामे पहनते हैं और अपने शरीर को अलंकृत करते हैं और विभिन्न प्रकार के वस्त्र पहनते हैं और अब वे भालों की बजाय पांच या अधिक चैम्बरों वाले रिवॉल्वर हाथ में रखते हैं. अतीत में यूरोप में किसान मुख्य रूप से शारीरिक श्रम के ज़रिए जमीन जोतते थे, परन्तु, आज एक व्यक्ति स्टीम इंजन से बड़े भू-भाग की जुताई कर सकता है और इससे अधिकाधिक धन कमा सकता है. इसे एक सभ्यता का संकेत कहा गया है ....अतीत में केवल कुछ गिन-चुने व्यक्ति ही बहु-मूल्य पुस्तकें लिखते थे. आज कोई भी व्यक्ति लिख सकता है और जो चाहे वह प्रकाशित करा सकता है तथा लोगों के दिलो-दिमाग में ज़हर घोल सकता है........... व्यक्तियों को अपने हाथों और पैरों के इस्तेमाल की आवश्यकता नहीं रहेगी. वे एक बटन दबाएंगे और उनके वस्त्र उन्हें तैयार मिलेंगे. वे अन्य बटन दबाएंगे और उन्हें अखबार मिल जाएगा. एक तीसरा बटन दबाने पर मोटर कार उनका इंतज़ार कर रही होगी. सब कुछ मशीन से होगा. पहले लोग जब एक-दूसरे से लड़ते थे तो शारीरिक ताक़त का आकलन करते थे; आज यह संभव है कि एक व्यक्ति पर्वत से बंदूक की गोलियां दाग़ते हुए हज़ारों लोगों की जान ले सकता है. यह सभ्यता है.......पहले शारीरिक दबाव से लोगों को गुलाम बनाया जाता था, आज उन्हें धन और धन से खरीदी जा सकने वाली विलासिताओं का लालच देकर गुलाम बनाया जाता है. पहले लोग घर की बनी रोटी-सब्जी से दो या तीन बार भोजन करते थे; आज उन्हें हर दो घंटे बाद कुछ खाने को चाहिए और इस तरह कोई क्षण फुर्सत का उनके लिए न रहे.     

इस तरह देखें तो गांधीजी ने आधुनिक सभ्यता की जो आलोचना की क्या वह आज सही नजऱ नहीं आती है. आप न चाहें तो भी आपको इससे सहमत होना होगा. धन के लिए यह भाग-दौड़, जिसमें कोई नहीं चाहता कि वह गांव में रहे और जमीन पर खेती करे, पशु पालन करे, वनरोपण और मछली उद्योग जैसे व्यवसाय अपनाएं. थोड़ी सी तथाकथित शिक्षा प्राप्त करने के बाद युवा सिर्फ किसी सेवा में रोजग़ार प्राप्त करना चाहता है. क्या हम यह बात समझ सकते हैं कि हमें अपने शरीर को बनाए रखने के लिए अपेक्षित समस्त उत्पादन यानी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी चीजें मशीन द्वारा उत्पादित होंगी और वह भी बड़े पैमाने पर?  सदा हरित विज्ञान और प्रौद्योगिकी के समर्थक यह दावा करेंगे कि नए आविष्कार और नवाचार भौतिक वस्तुओं की उत्पादन पद्धति को बदल देंगे और मानव प्रत्येक जरूरत के लिए अपने घर पर या बस्ती में ही उत्पादन करने में सक्षम होगा. इसके लिए 3डी प्रिंटिंग का अक्सर हवाला दिया जाता है, परन्तु, क्या हम रुकेंगे और यह पूछेंगे कि कौशल कहां है और यह किसके पास है? समस्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी का स्वागत करते हुए, क्योंकि इससे इस ब्रह्मांड में मानव प्रजातियों के अस्तित्व को स्थायित्व प्रदान करने में मदद मिली है, वह प्रश्न अत्यन्त आवश्यक है जो गांधीजी ने उठाया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी आखिर क्यों और किसके लिए है? गांधीजी ने यह दर्शाया और इस बात पर जोर दिया कि शहरी सभ्यता अस्थिर है क्योंकि यह मुख्य रूप से उच्च संसाधन केन्द्रित है. उन्होंने पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर मानव के दुष्प्रभाव का न सिर्फ  अनुमान लगाया बल्कि हमें संदेश दिया कि हम साधारण ग्रामीण जीवन को अपनाएं और भौतिक अस्तित्व के लिए सीमित जरूरतों पर निर्भर रहें. उन्होंने कहा कि समस्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी अर्थव्यवस्था को विकेन्द्रित करने वाली हो, जिसमें मानव श्रम की गरिमा का परम महत्व बना रहे.       

गांधीजी का यह मानना था कि देश में प्रत्येक युवा को सभी के लिए आवश्यक बुनियादी उत्पादन, यानी रोटी, कपड़ा और मकान में योगदान करना चाहिए और इसके लिए उसे एक सार्थक सीमा तक भौतिक श्रम करना चाहिए. उन्होंने अपने समय के युवाओं को संबोधित करते हुए हरिजन’ (गांधीजी द्वारा 1932 के बाद संपादित एक पत्रिका) के 1 मार्च, 1935 के अंक में लिखा कि ‘‘अगर शर्म की भावना जो शारीरिक श्रम के साथ गलत ढंग से जुड़ गयी है, से छूटकारा पा लिया जाए तो औसत बुद्धि के स्त्री-पुरुषों के लिए पर्याप्त काम उपलब्ध है.’’ ‘हरिजनके 19 दिसम्बर, 1936 के अंक में उन्होंने लिखा कि ‘‘जो व्यक्ति एक-एक रुपया ईमानदारी से कमाना चाहता है उसके लिए कोई श्रम छोटा नहीं है. बात सिर्फ  यह है कि हम ईश्वर प्रदत्त हाथों और पैरों का उपयोग करने के लिए तैयार रहें.’’

आज का युवा उलझन में है, वह शिक्षित होने का एक तगमा तो लगाए हुए है, परन्तु  मानव अस्तित्व के लिए आवश्यक बुनियादी उत्पादन में योगदान करने के लिए तैयार नहीं है. वे सरकारी नौकरी के लिए आंदोलन करते हैं, निजी क्षेत्र में काम करने की उनकी इच्छा भी सिकुड़ती जा रही है. गांधीजी शक्तिशाली सरकार के पक्ष में कभी नहीं रहे, वे इसे अधिक उचित नहीं समझते थे कि युवाओं को रोजग़ार प्रदान करने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपी जाये. उनके विचार में सरकार की भूमिका न्यूनतम होनी चाहिए और अर्थव्यवस्था का संचालन प्राइवेट लोगों द्वारा किया जाना चाहिए. वे विकेन्द्रित और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पक्ष में थे. आज भी गांवों में व्यापक कार्य उपलब्ध हैं, जिनमें सभी के लिए रोजग़ार उपलब्ध हो सकता है, परन्तु उसके लिए नज़रिए में बदलाव लाना होगा. गांधीजी की दृष्टि में वहां न्यूनतम और स्थिर आजीविका सबके लिए उपलब्ध है और वह केवल साधारण जीवन शैली को सहारा देने वाली है और उस तहर के जीवन के लिए उपयुक्त नहीं है, जिसका वर्णन गांधीजी ने हिन्द स्वराज में अत्यन्त स्पष्ट रूप से किया है.  

गांधीजी के श्रम को गरिमा प्रदान करने और एक ऐसे ग्रामीण-शहरी या ग्रामीणोन्मुखी शहरी समाज के निर्माण में योगदान देकर आज का भारतीय युवा उनकी 150वीं जयंती के अवसर पर गांधीजी को सच्ची श्रंद्धांजलि अर्पित कर सकता है, जहां समस्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी जीवन की नीरसता कम करने में मददगार हो, वह भौतिक, सामाजिक और संचार ढांचा उपलब्ध कराने और बुनियादी न्यूनतम जरूरतें पूरी करने में हाथ के इस्तेमाल में सहायता करे. यही गांधीजी के प्रति सही श्रंद्धांजलि होगी.

(लेखक प्रमुख गांधीवादी चिंतक हैं. ई-मेल: sudarshan54@gmail.com ये लेखक के निजी विचार हैं.)