नौकरी फोकस


Volume-31, 3-9 November 2018

 

 

जैवप्रौद्योगिकी क्षेत्र में स्टार्टअप्स के लिए उभरते अवसर

अंकिता रानी

स्टार्टअप्स नवप्रवर्तन के केन्द्र हैं और अर्थव्यवस्था में रोजग़ार-सृजन में वृद्धि करने का एक बड़ा साधन हैं, भारत को एक वर्ष में लगभग 6 से 7 मिलियन रोजग़ार की आवश्यकता होती है और विश्व-आंकड़े दर्शाते हैं कि यही स्टार्टअप्स हैं, न किवे बड़े उद्यम जो किसी देश में कुल नए रोजग़ार सृजित करते हैं. भारत के मााननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी ने 16 जनवरी, 2016 को विज्ञान भवन, नई दिल्ली से स्टार्ट-अप इंडियापहल औपचारिक रूप से प्रारंभ की. इस पहल का उद्देश्य उद्यमिता को बढ़ावा देना और स्टार्टअप्स के विकास के लिए अनूकूल पारिस्थितिकी प्रणाली का सृजन करके नवप्रवर्तन को प्रोत्साहन देना है. इसका लक्ष्य यह है कि भारत रोजग़ार तलाशकर्ता राष्ट्र बनने के स्थान पर रोजग़ार सृजक राष्ट्र बने. भारत के प्रधानमंत्री द्वारा प्रारंभ स्टार्टअप इंडिया से भारत में नवोद्यमियों में व्यापक सकारात्मकता का विकास हुआ है. उद्योग इस तथ्य से उत्साहित हैं कि वैश्विक दृष्टि से भारत में स्टार्टअप्स की तीसरी सबसे बड़ी संख्या है. देश में नवप्रवर्तन की एक लाभदायक संस्कृति को प्रोत्साहन देना एक लम्बी और महत्वपूर्ण यात्रा है. भारत को नवप्रवर्तन, डिज़ाइन और स्टार्टअप्स का एक बड़ा केन्द्र बनाने की भारत सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराने में यह पहल एक महत्वपूर्ण साधन का कार्य करेगी.

भारतीय जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र विश्व के आकर्षण का केन्द्र बन रहा है और यहां निवेश के उभरते हुए अवसरों का पता लगाया जा रहा है. यह क्षेत्र पांच बड़े खंडों-बायो-फार्मा, जैव-सेवा, जैव-कृषि, जैव-औद्योगिकी और जैव-सूचना विज्ञान में विभाजित है. जैव भेषज (बायोफार्मास्युटिकल) क्षेत्र, कुल राजस्व के 64त्न अंश के साथ जैव प्रौद्योगिकी उद्योग का सबसे बड़ा अंश है, इसके बाद १८ त्न बाजार अंश के साथ जैव-सेवा का स्थान है. भारत नैदानिक परीक्षणों, संविदा अनुसंधान और विनिर्माण कार्यों हेतु एक अग्रणी स्थल बन रहा है, जो जैव-सेवा क्षेत्र के विकास को प्रोत्साहन दे रहा है. 2015-16 में जैव-प्रौद्योगिकी में जैव-कृषि खंड 14त्न है, जबकि शेष बाजार की पूर्ति जैव-प्रौद्योगिकी (3त्न) और जैव-सूचनाविज्ञान (1त्न) द्वारा की जाती है. भारत जैसे देश के लिए जैव-प्रौद्योगिकी सशक्त समर्थनशील प्रौद्योगिकी है, जो कृषि, स्वास्थ्य परिचर्या, औद्योगिक प्रसंस्करण तथा पर्यावरणीय  स्थिरता में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकता है.

भारतीय जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने पिछले दो दशकों से अनेक बिखरे और छिटपुट शैक्षिक तथा औद्योगिक पहलों के माध्यम से आकृति ली है. 2025 तक जैव-प्रौद्योगिकी उद्योग के, 30.46 प्रतिशत सी.ए.जी.आर. तक बडक़र 100 बिलियन अमरीकी डालर तक पहुंचने की आशा है. भारत में जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र 2005 के 1.1 बिलियन अमरीकी डालर से बढक़र 2015 में 7 बिलियन अमरीकी डालर का हो गया है और 2018 के अंत तक इसके 11.6 बिलियन अमरीकी डालर तक पहुंचने की आशा है.

वर्तमान में, बढ़ रहा निवेश, आउटसोर्सिंग कार्य, निर्यात और क्षेत्र पर सरकार का ध्यान जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र के विकास के मुख्य चालक हैं. हरित क्षेत्र फार्मा के स्वचालित मार्ग के अंतर्गत 100त्न विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) की अनुमति होती है. ब्राउनफील्ड फार्मा के लिए सरकारी मार्ग के माध्यम से 100त्न विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ.डी.आई.) की अनुमति होती है, 74त्न तक एफ.डी.आई. स्वचालित मार्ग के अंतर्गत और 74त्न से अधिक के लिए सरकारी  अनुमोदन मार्ग के अंतर्गत होती है. चिकित्सा उपस्करों के विनिर्माण के लिए 100त्न तक एफ.डी.आई. स्वचालित मार्ग के अंतर्गत अनुमत है.

स्टार्टअप्स अनिवार्यत: दो तरह का होता है, पहला वह जो कुछ ग्राउण्ड ऊपर प्रारंभ करता है, कुछ ऐसा जिसके बारे में किसी ने कुछ नहीं सोचा हो और यह प्राय: ग्राउण्ड ब्रेकिंग होता है, इस प्रकार के स्टार्टअप का सृजन करना कठिन होता है, किंतु एक बार सृजन हो जाने पर इसका प्राय: अभूतपूर्व विकास होता है. दूसरे प्रकार का स्टार्टअप वे होते हैं जिसे वे सुविधा होते हुए भी पुन: विकसित नहीं करते. यह कुछ नया तथा नवप्रवर्तित सृजित करने के लिए नई बोतल में पुरानी शराब जैसा होता है.

उद्यमिता एवं स्टार्टअप्स देश में मात्र एक ताजा अवधारणा है. कुछ स्टार्टअप करना कठिन है और प्रत्येक देश सफलता की तुलना में अधिक असफलता देखता है. बहुधा कोई भी उद्यमी असफलता और अभूतपूर्व कठिनाई का सामना करने के लिए तैयार नहीं रहता. उद्यमिता धैर्य पर आश्रित होती है, ऐसा समाज जो व्यवसाय असफलता को स्वीकार करने में असफल रहता है वह किसी नवप्रवर्तन एवं सृजनशीलता का, प्रारंभ होने से पहले ही उसे समाप्त कर देता है. किसी स्टार्टअप की असफलता को असफलता के रूप में स्वीकार करना चाहिए क्योंकि यह उद्यमी को सिखाती है कि क्या करना है और क्या नहीं.

भारत में स्टार्टअप के लिए वित्तीय चुनौतियां

पूरे देश में पहली पीढ़ी के अधिकांश उद्यमी स्टार्टअप बैनर के अंतर्गत अपने व्यावसायिक उद्यमों को मान्यता देने के सरकार के प्रयासों की सराहना कर रहे हैं, किंतु अधिकांश उद्यमियों के लिए वित्त पोषण, पेटेंट और बौद्धिक सम्पदा सृजन की चुनौतियां बनी रहती हैं. स्टार्टअप्स के लिए वर्तमान में 90त्न के लगभग वित्त-पोषण विदेशी उद्यम पूंजी से आता है और घरेलू वित्तपोषक नवप्रवर्तन की प्रकृति में बदलाव भी ला सकते हैं. ग्रांड थार्नटन द्वारा किए गए एक ताजा अध्ययन से पता चला कि 2015 में 600 से अधिक ऐसी कंपनियों को पी.ई. एवं वी.सी. निधियों द्वारा 2 बिलियन डालर से अधिक का वित्त पोषण मिला.

हाल ही के एक अध्ययन के अनुसार 94त्न से अधिक व्यवसाय प्रचालन के अपने पहले वर्ष में ही असफल हो गए. वित्त पोषण का अभाव इसका एक मुख्य कारण है. धनराशि किसी भी व्यवसाय का आधार होती है. किसी व्यवसाय की कल्पना से लेकर राजस्व सृजन करने तक की लम्बी परिश्रमयुक्त किंतु आकर्षक यात्रा के लिए पूंजी नामक ईंधन की आवश्यकता होती है. इसलिए, व्यवसाय के लगभग प्रत्येक चरण पर, उद्यमी स्वयं से यह प्रश्न करते हैं कि अपने स्टार्टअप में कैसे वित्तपोषित करूं? स्टार्टअप के लिए बाजार में विभिन्न वित्त पोषण तंत्र उपलब्ध हैं.

भारत में स्टार्टअप के लिए कुछ नई/ अभिनव वित्तपोषण पद्धतियां निम्नलिखित हैं:-

1. प्रधानमंत्री माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी लिमिटेड (मुद्रा):- लगभग 10 लाख लघु-मामले उद्यमों (एस.एम.ई.) को लाभ देने के लिए 20,000 करोड़ रु. के प्रारंभिक कोर्पस के साथ प्रारंभ की गई. आप अपनी व्यवसाय योजना प्रस्तुत कर सकते हैं और इसे एक बार अनुमोदन मिल जाने पर, ऋण स्वीकृत किया जाता है. आपको एक मुद्रा कार्ड मिलता है जो क्रेडिट कार्ड जैसा होता है. इसका उपयोग आप कच्चा माल खरीदने, अन्य व्यय आदि के लिए कर सकते हैं. इस शानदार योजना के अंतर्गत शिशु, किशोर और तरुण नामक तीन श्रेणियों का ऋण उपलब्ध है.

2. स्व-वित्त पोषण: स्व-वित्त पोषण, जिसे बूट स्ट्रैपिंग भी कहा जाता है, स्टार्टअप वित्त पोषण एक प्रभावी उपाय है, विशेष रूप से तब जब आप अपना व्यवसाय प्रारंभ ही कर रहे होते हैं. प्रारंभ में उद्यमियों को संभावित सफलता का कुछ आकर्षण एवं कोई योजना दिखाए बिना वित्तीय सहायता प्राप्त करने में परेशानी होती है.

3. क्राउड फंडिंग: क्राउड फंडिंग, एक ही समय एक से अधिक व्यक्तियों से आदेश-पूर्व ऋण, योगदान या निवेश प्राप्त करने जैसी होती है. इसमें, कोई स्टार्टअप किसी क्राउड फंडिंग मंच पर अपने व्यवसाय का विस्तृत विवरण, प्रस्तुत करेगा. वह अपने व्यवसाय के उद्देश्यों, लाभ प्राप्त करने की योजना, अपेक्षित वित्त पोषण और उनके कारणों का उल्लेख करेगा और उसके बाद उपभोक्ता व्यवसाय के बारे में पढ़ सकते हैं और यदि उन्हें विचार अच्छा लगा तो धन-राशि दे सकते हैं. धन-राशि देने वाले व्यक्ति उत्पाद की पूर्व-खरीद या आश्वासन या अंश दान देकर ऑनलाइन शपथ देंगे. कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे व्यवसाय में सहायता करने के संबंध में धन का योगदान कर सकता है जिसमें उन्हें वास्तव में विश्वास हो. इंडीगोगो, विशबैरी, केट्टो, फंडलाइंड आदि कुछ साइट्स भारत में प्रसिद्ध क्राउड फंडिंग साइट्स हैं.

4. एंजिल निवेश: एंजिल निवेशक अधिशेष नकद राशि वाले तथा भावी स्टार्टअप्स में निवेश करने के इच्छुक व्यक्ति होते हैं. वे निवेश करने से पहले प्रस्तावों की सामूहिक जांच करने के लिए नेटवर्क-समूह के रूप में भी कार्य करते हैं. वे पूंजी के साथ-साथ मेंटोरिंग या परामर्श कार्य भी कर सकते हैं. ऐंजिल इन्वेस्र्ट्स ने गूगल, याहू और अलीबाबा जैसी कई प्रसिद्ध कंपनियों को स्टार्टअप में सहायता की है. निवेश करने का यह वैकिल्पक रूप 30% तक की इक्विटी की आशा रखने वाले निवेशकों के साथ, सामान्यत: कंपनी के विकास के प्रारंभिक चरणों पर होता है. उच्च मुनाफे (रिटर्न) के लिए निवेश में अधिक जोखिम लेना पसंद करते हैं.

5. वेंचर पूंजी: वेंचर पूंजी व्यावसायिक रूप से प्रबंधित निधि होती है जो व्यापक संभावनाओं वाली कंपनियों में निवेश की जाती है. वे सामान्यत: इक्विटी पर किसी व्यवसाय में निवेश करते हैं और आई.पी.ओ. या किसी अधिग्रहण पर निकास करते हैं. वेंचर पूंजी (वी.सी.) विशेषज्ञता, मेंटोरशिप प्रदान करती है और एक वास्तविक परीक्षण के रूप में कार्य करती है कि संगठन कहां जा रहा है. वे धारणीयता एवं स्थायित्व की दृष्टि से भी व्यवसाय का मूल्यांकन करते हैं.

6. बिजनस इन्क्यूबेटर्स एवं एक्सीलरेटर्स: प्रारंभिक चरण के व्यवसाय वित्त पोषण विकल्प के रूप में इन्क्यूबेटर्स एवं एक्सीलरेटर कार्यक्रम पर विचार कर सकते हैं. प्राय: सभी बड़े शहरों में पाए जाने वाले ये कार्यक्रम प्रत्येक वर्ष सैंकड़ों स्टार्टअप व्यवसायों की सहायता करते है. इन्क्यूबेटर किसी बच्चे के अभिभावक जैसे होते हैं जो व्यवसाय को आश्रय साधन तथा प्रशिक्षण नेटवर्क प्रदान करके उसे पोषित करते हंै. एक्सीलरेटर भी कम या समान रूप में ऐसे ही होते हैं, किंतु इनक्यूबेटर किसी व्यवसाय को चलाने में सहायता करते हैं, जबकि एक्लीलरेटर तीव्र गति से चलने/ एक लंबी छलांग लगाने में सहायता करते हैं.

7. माइक्रोफाइनेंस प्रदाता या एनबीएफसी: माइक्रोफाइनेंस मूल रूप से उन लोगों को वित्तीय सेवाएं प्रदान करता है जिनकी पारंपरिक बैंकिंग सेवाओं तक पहुंच नहीं होती है. यह उन लोगों के लिए तेजी से लोकप्रिय हो रहा है जिनकी आवश्यकताएं सीमित हैं और क्रेडिट बैंक द्वारा समर्थित नहीं हंै. इसी तरह, एनबीएफसी गैर बैंकिंग वित्तीय निगम, वे निगम हैं जो बैंक की कानूनी आवश्यकता/परिभाषा को पूरा किए बिना बैंकिंग सेवाएं प्रदान करते हैं.

इस प्रकार यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत सरकार और पिछले तीन वर्षों में बनाए गए पारिस्थितिकी तंत्र के सभी समर्थन के साथ, जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में स्टार्टअप के लिए बहुत सारे अवसर हैं. जब 20 साल पहले बायोटेक्नोलॉजी स्टार्टअप की पहली पीढ़ी का गठन शुरू हुआ, तो भारत के प्रारंभिक समूह की स्थापना उन वैज्ञानिकों द्वारा की गई थी जिनके पास कोई व्यावसायिक अनुभव नहीं था या कम व्यावसायिक पृष्ठभूमि वाले उद्यमीयों थे. लेकिन अब, एक विविध समूह स्टार्टअप उद्यमी भी हैं जो निम्न कंपनियों की स्थापना कर रहे हैं:-

* पुनरुत्पादक दवा * दवा वितरण के नए तरीके * नई जैव-अनुकूल सामग्री * आण्विक निदान * पोषण * ऊर्जा और कृषि

कई इंजीनियरिंग स्टार्टअप स्वास्थ्य देखभाल और कृषि समस्याओं को हल करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे बायोटेक्नोलॉजी की परिभाषा फैल रही है. अन्य बायोटेक शोध के लिए महत्वपूर्ण उत्पाद विकसित कर रहे हैं. पिछले दशक में, इंजीनियरिंग और जीव विज्ञान के विलय और चिकित्सा प्रौद्योगिकी कंपनियों के उदय के साथ, जैव-प्रौद्योगिकी की परिभाषा व्यापक हो गई है. परंपरागत जैव प्रौद्योगिकी भी विस्तारित हुई है, खासतौर से कृषि-बायोटेक स्टार्टअप के उभरने के साथ. कृषि अब बड़ी कंपनियों और उद्यम पूंजीपतियों द्वारा निवेश का क्षेत्र है. यह विस्तृत विज्ञान के नेतृत्व में कंपनियों का एक समूह बन रहा है.

यद्यपि इस क्षेत्र में चुनौतियां हैं लेकिन फिर भी जैव प्रौद्योगिकी में कई स्टार्टअप उद्यमी हैं, जो असाधारण रूप से अच्छी तरह से कार्य कर रहे हैं. भारत सरकार डीबीटी, डीएसटी, सीएसआईआर और बीआईआरएसी जैसी पहलों के माध्यम से बहुत अधिक समर्थन प्रदान कर रही है जो बायोटेक्नोलॉजी स्टार्टअप पारिस्थितिक तंत्र के भीतर बड़ी राशि को पोषित कर रहे हैं.

अंत में, यह कहा जा सकता है कि जैव प्रौद्योगिकी में उभरती स्टार्टअप कंपनियां बाजार में सबसे गतिशील आर्थिक संगठन हैं, क्योंकि वे किसी भी आर्थिक प्रणाली के लिए अतिरिक्त गतिशीलता और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रदान करते हैं. वे परिवर्तन के लिए उत्प्रेरक एजेंट के रूप में कार्य करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप शृंखला-प्रतिक्रिया होती है और औद्योगीकरण की प्रक्रिया गति में निर्धारित होती है.

(लेखिका स्वामी रामा हिमालयी विश्वविद्यालय, देहरादून में जैवप्रौद्योगिकी अनुसंधानकर्ता हैं) ई-मेल आई.डी. ankit ashrivastav062@gmail.comव्यक्त विचार लेखक के अपने हैं