नौकरी फोकस


Volume-7

किसानों को उद्यमियों के रूप में विकसित करने के लिए
जनजातीय आजीविका व्यापार प्रोत्साहन योजना

के. पी. सिंह, अमित कटारिया,
डी. एस. ठाकुर, बीना सिंह और
कपिल देव दीपक

भारत सरकार ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ने खाद्य उत्पादन, विशेषकर अनाज की पैदावार में आत्मनिर्भता हासिल करने पर विशेष बल दिया. परन्तु, छठे दशक में हरित क्रांति के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि लघु जोतों की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बागवानी एक आदर्श पद्धति है, जिसके लिए भारत की भौगोलिक स्थिति और कृषि जलवायु अत्यन्त उपयुक्त है. परन्तु, खेती को अधिक लाभदायक बनाने के लिए भूमि के अधिक सक्षम इस्तेमाल; ग्रामीण जनों और महिलाओं के लिए कौशल आधारित रोजगार सृजन और प्राकृतिक संसाधनों (मृदा, जल और पर्यावरण) के अनुकूलतम उपयोग जैसे उपायों के माध्यम से खेती के रूपांतरण या विविधीकरण की आवश्यकता की ओर भारत सरकार का ध्यान केवल आठवें दशक के मध्य में ही गया.
छत्तीसगढ़ का कुल भौगोलिक क्षेत्र 137.9 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से 47.7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र (32.44 प्रतिशत) में वन हैं. बस्तर के पठार में सर्वाधिक वन भाग (42.7 प्रतिशत) हैं और उसके बाद उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र (36.4 प्रतिशत) और छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग (26.6 प्रतिशत) का स्थान है. परन्तु, राज्य में निवल बुआई क्षेत्र वन क्षेत्र के विपरीत अनुपात में है. बंजर भूमि (3.5 लाख हेक्टेयर) भी बहुत अधिक है, जो  छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में सर्वाधिक (1.4 लाख हेक्टेयर) है. उसके बाद उत्तरी पर्वतीय क्षेत्र (1.24 लाख हेक्टेयर) और बस्तर के पठार (0.85 लाख हेक्टेयर) का स्थान है. राज्य में कुल खेती योग्य क्षेत्र करीब 47.70 लाख हेक्टेयर है. राज्य की आबादी मुख्य रूप से ग्रामीण है.
राज्य की करीब 82.61 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है. अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी राज्य की कुल आबादी में क्रमश: 31.13 प्रतिशत और 22.32 प्रतिशत है. जनजातियां और अनुसूचित जातियां तथा आर्थिक दृष्टि से  पिछड़े वर्ग आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से वनों पर अत्यधिक निर्भर हैं. वे राज्य के वनों से आजीविका सुरक्षा प्राप्त करते हैं. राज्य के जनजातीय बहुल जिलों-बस्तर, कांकेर, दांतेवाड़ा और बीजापुर में 90 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण आबादी है. छत्तीसगढ़ में खनिज संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं. कोयला, लोहा, चूना पत्थर, हीरा आदि की बड़ी-बड़ी खानें राज्य में मौजूद हैं, जो इसे निवेश के लिए आकर्षण का केन्द्र बनाती हैं. राज्य का देश के कुल सीमेंट उत्पादन में करीब 40 प्रतिशत योगदान है. राज्य में उगायी जाने वाली प्रमुख फसलों में अनाज (धान, काडो-कुट्की, मक्का और गेहंू), दलहन (चना, तिवरा) और तिलहन (रामतिल, अलसी और सरसों) शामिल हैं. राज्य में दालों सहित अनाज की खेती की कुल बुआई क्षेत्र के 84.60 प्रतिशत क्षेत्र में की जाती है.
छत्तीसगढ़ की मुख्य समस्या है धान की खेती की ज़मीन को अन्य उद्यमों के लिए रूपांतरित किया जाना. इस प्रवृत्ति के चलते धान के क्षेत्रों में भारी कमी आयी है, जिससे बड़ी संख्या में खेतिहर मज़दूर, विशेषकर महिलाएं बेराजगार हो गई हैं. इसके अतिरिक्त धान के खेतों में बाढ़ सरणियों को समानांतर किए जाने से राज्य के विभिन्न भागों में बाढ़ की समस्याएं बढऩे लगी हैं, जिससे ग्रीष्म काल के दौरान भूमिगत जल का ह्रास होता है. पर्यावरणीय और खेती संबंधी विकृतियां, बार-बार एक ही फसल उगाना, खेती में कार्बनिक घटकों का इस्तेमाल कम होना, आदि ऐसी समस्याएं हैं, जिनसे राज्य की समग्र खेती पैदावार  में कमी आयी है. ऐसे में विस्तार एजेंसियों के लिए यह उपयुक्त समय है कि वे खेती की वैकल्पिक पद्धतियां अपनाएं.    
बस्तर जिले का कुल रकबा 1010.288 (000 हेक्टेयर) है, जिसमें से खेती योग्य क्षेत्र 52,189 (000 हेक्टेयर) और  वन क्षेत्र 238.8 (000 हेक्टेयर) है. बस्तर में व्यापक विविधता, वनस्पति और भूमि उपलब्धता है, परन्तु किसान की आय राष्ट्रीय स्तर या राज्य स्तर की तुलना में अपर्याप्त है. इसका कारण अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का अभाव, तकनीकी जानकारी की कमी, प्रोत्साहन की कमी और किसानों की क्षमता (जैसे सिंचाई सुविधा, कृषि उपकरण और निवेश) में कमी आना है.
देश में कुल बागवानी उत्पादन में फल और सब्जियों का योगदान करीब 90 प्रतिशत है. भारत आज विश्व में सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा देश है और अनेक बाग़ान फसलों, जैसे आम, केला, पपीता, काजू, सुपारी, आलू और भिंडी के उत्पादन की दृष्टि से विश्व में अग्रणी है. परन्तु, बागावानी फसलों का स्वरूप ऐसा होता है कि उनके उत्पादन का मूल्यांकन आसानी से नहीं किया जा सकता. ये फसलें विशेष रूप  से सब्जियां, छोटे भूखंडों, खेतों या मकानों के पिछवाड़े में उगायी जाती हैं, और अधिकतर मामलों में उनकी फसलें एकल बिंदु पर प्राप्त नहीं होती हंै, जिससे उनके मूल्यांकन में कठिनाई आती है. अनेक बागवानी फसलें ऐसी भी हैं, जिनसे एक ही मौसम में एक से अधिक बार फल चुनने के अवसर मिलते हैं. इसी प्रकार अनेक फल वृक्ष बिखरे हुए हैं, जिन्हें मूल्यांकन में शामिल नहीं किया जा सकता. उपरोक्त कठिनाइयों को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अतीत में अनेक अनुसंधान अध्ययन किए गए.
जिला प्रशासन ने उन वास्तविक स्थितियों की गंभीर समीक्षा की, जो बस्तर के किसानों की तंगहाली के लिए जिम्मेदार हैं. इसके अतिरिक्त अधिकारी इस बात से चिंतित रहे हैं कि स्थिति पर काबू कैसे पाया जाये. इन तथ्यों के साथ टीएलबीआई कार्यक्रम तैयार करने का निर्णय किया गया ताकि इस कार्यक्रम की लाभप्रदता का मूल्यांकन करने के लिए प्रैक्टिकलों पर ध्यान केन्द्रित किया जा सके. 
कृषि क्षेत्र देश में 65 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण आबादी के लिए आजीविका के साधन उपलब्ध कराता है. यह क्षेत्र आज भी विभिन्न फसलों के उत्पादन के लिए सदियों पुरानी प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल कर रहा है. खेती के आधुनिकीकरण के लिए यंत्रीकरण और प्रसंस्करण जैसी नई प्रौद्योगिकी की आवश्यकता महसूस करते हुए जिला प्रशासन ने अपने अनुषंगी विभागों के ज़रिए टीएलबीआई का विकास किया है. 
टीएलबीआई विस्तार के प्रति एक पाठ्यक्रम आधारित विधि है, जिसका लक्ष्य किसानों की क्षमता का निर्माण करना है. सीखने की प्रक्रिया को प्रतिभागियों के खेती व्यापार के संदर्भ में कार्यरूप दिया जाता है. टीएलबीआई का लक्ष्य यह सीखने में किसानों की मदद करना है कि वे अपने खेती उद्यमों एवं प्रचालनों को किस तरह लाभप्रद बना सकते हैं और बाज़ार की मांग पूरी करने में कैसे सफल हो सकते हैं. यह कार्यक्रम किसानों को सीखने और जानकारी बढ़ाने, दृष्टिकोण बदलने और लाभकारी खेती के लिए आवश्यक कौशल विकसित करने में मदद करता है और यह मदद किसानों के खेतों में काम करते हुए की जाती है.     टीएलबीआई कार्यक्रम खेत-आधारित है, खेती मौसम के दौरान अलग-अलग समय पर प्रैक्टिकल अभ्यास संचालित किए जाते हैं. शिक्षण पाठ्यक्रम खेती के मौसम की गतिविधियों के अनुकूल तैयार किया जाता है, जो धीरे-धीरे किसानों के कौशल एवं सक्षमताओं का निर्माण करता है और उन्हें प्रबलित करता है. टीएलबीआई कार्यक्रम में प्रशिक्षण को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जिसमें कौशल विकसित होने के लिए समय अपेक्षित होता हैै. प्राप्त की गई जानकारी और अर्जित कौशल का मिलान खेती कार्य के विकास के विभिन्न चरणों में वास्तव में आवश्यक ज्ञान और कौशल के साथ किया जाता है.     
छोटे किसानों ने विश्वभर में सीखने की उल्लेखनीय योग्यता का परिचय दिया है. वे अपने खेतों को संगठित करने के लिए बेहतर पद्धतियों की तलाश करते हैं. वे उत्पादकता बढ़ाने, उत्पादन में विविधता लाने, जोखिम कम करने और लाभ में वृद्धि करने के लिए नई फसलों और नए औज़ारों, बेहतर मवेशियों और वैकल्पिक प्रौद्योगिकियों का प्रयोग करते हैं.  
वे अधिक बाजारोन्मुखी बन गए हैं और उन्होंने परिगणित जोखिम उठाना सीख लिया है ताकि अपने उत्पादों के लिए नए बाज़ार खोल सकें या सृजित कर सकें. अनेक लघु किसानों ने उद्यमियों की विशेषताएं अर्जित कर ली हैं.  
छोटा कृषक आमतौर पर निम्नांकित चार में से किसी एक कारण से फसल उगाता है:
*केवल परिवार के इस्तेमाल के लिए, जिसमें अधिशेष की कोई गुंजाइश नहीं;
*मुख्य रूप से घरेलू खपत के लिए, परन्तु अधिशेष को बाज़ार में बेचने की इच्छा के साथ;
*आंशिक रूप से बाज़ार के लिए और आंशिक रूप से पारिवारिक उपभोग के लिए; अथवा
*केवल बाज़ार के लिए.   
खेती के लक्ष्य और प्रयोजन:
*केवल बाज़ार के लिए खेती;
*मुख्य रूप से बाज़ार के लिए और कुछ भाग घरेलू उपभोग के लिए;
*मुख्य रूप  से परिवार के इस्तेमाल हेतु खेती और अधिशेष को बाज़ार में बेचना;
*केवल परिवार की खपत के लिए खेती करना.
प्रथम श्रेणी में वे किसान आते हैं, जो केवल परिवार की खपत के लिए खेती करते हैं और यदि कुछ अधिशेष होता है, तो वे उसे बाज़ार में बेच देते हैं, परन्तु अधिशेष बचने की संभावानाएं के बराबर रहती हैं. ये किसान अकसर स्वयं के और अपने परिवार के अस्तित्व के लिए संघर्ष करते दिखायी देते हैं. वे आमतौर पर स्वास्थ्य, पानी, भोजन और मकान की दृष्टि से असुरक्षा का सामना करते हैं. ऐसे किसान आमतौर पर दिमागी और भौतिक तौर पर उद्यमिता के कार्यों में लगना पसंद नहीं करते हैं. उनकी इच्छा यदि उद्यमी बनने की होती भी है, तो उन्हें आमतौर पर उद्यमी कृषक के रूप में विकसित होने का अवसर नहीं मिलता.
दूसरी श्रेणी के अंतर्गत वे किसान आते हैं, जिन्हें अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के अतिरिक्त अधिक मात्रा में पैदावार के अवसर मिलते हैं. हालांकि ये अवसर सीमित होते हैं. परन्तु, वे अपने मिश्रित संसाधनों में बदलाव लाकर और पहुंच तथा जोखिम संबंधी मुद्दों पर काबू पाते हुए अपने अवसरों का विस्तार कर सकते हैं. ऐसे किसानों को कभी-कभी पूर्व-उद्यमीके रूप में देखा जाता है, जिन्हें एक से अधिक स्वतंत्र स्थिति में पहुंचने के लिए सहायता की आवश्यकता होती है. इस स्तर पर किसान सही मायनों में उद्यमीनहीं होते हैं और न ही वे सही मायने में बाज़ारोन्मुखी होते हैं. उन्हें बाज़ार की अधिक समझ होती है और वे अपनी अस्तित्व विषयक खेती का विस्तार करते हुए उसमें कुछ आर्थिक गतिविधियों को जोड़ लेते हैं. उन्होंने अभी मुनाफा-संचालित खेती व्यापार के विकास की दिशा में कुछ कदम चलना मात्र शुरू किया होता है. दीर्घावधि निवेश अभी उनकी प्राथमिकता नहीं होती है. वे उच्चतर मूल्य उत्पादों में विस्तार और विविधीकरण में संकोच करते हैं. वे अपने अधिशेष खाद्य उत्पादन को विक्रय करने में सहज होते हैं. उनके लिए नक़दी फसलों में स्थानांतरित होना दूर की बात है और उसमें जो जोखिम होता है, उसे वे उठाना नहीं चाहते हैं.
उद्यमियों के रूप में किसान
उद्यमी-कृषक अपने खेतों को व्यापार के रूप में देखते हैं. वे अपने खेतों को लाभ कमाने के साधन के रूप में देखते हैं. वे अपने खेती-व्यापार के प्रति अत्यन्त आशावान होते हैं और परिगणित जोखिम उठाने के इच्छुक होते हैं ताकि अपनी खेती को लाभप्रद बना सकें और अपने व्यापार का विकास कर सकें. 
उद्यमशीलता का वातावरण
उद्यमी-कृषक एक जटिल और गतिशील वातावरण में प्रचालन करते हैं. वे किसानों, आपूर्तिकर्ताओं, व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों, प्रोसेसर्स और कई अन्य भूमिकाओं वाले लोगों के बृहतर समूह का हिस्सा होते हैं. इनमें से प्रत्येक को उत्पाद तैयार करने और मूल्य शृंखला के ज़रिए उन्हें बाज़ार पहुंचाने में कोई एक भूमिका अदा करनी होती है. इनमें से प्रत्येक को एक उद्यमी बनना होता है. उन्हें आपस में एक-दूसरे का सम्मान करने की आवश्यकता होती है और समूची व्यवस्था को बेहतर ढंग से संचालित करने और अधिक लाभदायक बनाने के लिए वे मिल कर काम करते हैं.
आधुनिक पद्धतियां
सारणी: 01 टीएलबीआई कार्यक्रम के अंतर्गत बागवानी महाविद्यालय और अनुसंधान केन्द्र में उगायी गई विभिन्न फसलों की लागत एवं लाभ
फसल- मिर्च
खेती की लागत-   18623                        
पैदावार (क्विं/एकड़)- 90
सकल आय (रु) (न्यूनतम लागत पर)- 45000(रु.5 कि.ग्रा. की दर से)
बाजार भाव रेंज (रु.)- 5-15/ कि.ग्रा.
 
फसल- भिंडी
खेती की लागत-   16437               
पैदावार (क्विं/एकड़)- 40
सकल आय (रु) (न्यूनतम लागत पर)- 24000(रु.6 कि.ग्रा. की दर से)
बाजार भाव रेंज (रु.)- 6-15/ कि.ग्रा.
 
फसल- पत्ता गोभी
खेती की लागत-   20850        
पैदावार (क्विं/एकड़)- 300
सकल आय (रु) (न्यूनतम लागत पर)- 90000 (रु.3 कि.ग्रा. की दर से)
बाजार भाव रेंज (रु.)- 3-10/ कि.ग्रा.
                                                               
फसल- फूल गोभी
खेती की लागत-   20850 
पैदावार (क्विं/एकड़)- 12955 फूल
सकल आय (रु) (न्यूनतम लागत पर)- 64775 (रु.5/फूल की दर से)
बाजार भाव रेंज (रु.)- 5-15/ फूल
                                                    
फसल- मूली
खेती की लागत-   6000
पैदावार (क्विं/एकड़)- 70
सकल आय (रु) (न्यूनतम लागत पर)- 21000
बाजार भाव रेंज (रु.)- 3 / कि.ग्रा.
सकल आय जलवायु स्थितियों, क्षेत्रगत विशेषताओं और किस्मों पर निर्भर है.
उद्यमिता की गतिशीलता
परन्तु इन सबसे परे, सफल कृषक-उद्यमी तकनीकी दृष्टि से सक्षम होते हैं, नवीनता और योजनाबद्ध रूप से काम करते हैं ताकि वे अपने कृषि व्यापार को उद्यमशीलता विकास के चरणों-यानी स्थापना और अस्तित्व से आगे ले जाते हुए तीव्र वृद्धि और परिपक्वता पर पहुंचा सकें. परन्तु, इन किसानों के समक्ष अनेक चुनौतियां होती हैं, जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है, जैसे सामाजिक बाधाएं, आर्थिक बाधाएं, विनियमों संबंधी बाधाएं, वित्तीय साधनों और जानकारी तक पहुंच कायम करने संबंधी पहलू. इसके लिए उनकी स्वयं की प्रबंधकीय क्षमता भी जरूरी होती है ताकि वे बदलावों और जोखिमों से बच सकें और अवसरों का लाभ उठा सकें. 
टीएलबीआई का लक्ष्य बागवानी, कृषि, मछली उद्योग और पशु पालन के क्षेत्र में जनजातीय लोगों के लिए आजीविका के अवसर बढ़ाने हेतु वैज्ञानिक प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करना है.
टीएलबीआई में इंक्यूबैट को एक फसल-मौसम के लिए संसाधन उपलब्ध कराए गए, जैसे आधा एकड़ जमीन, बीज, मवेशी और जल. उन्हें बाज़ार और संरक्षण पद्धतियों का व्यावहारिक ज्ञान दिया गया. उनके रहने की व्यवस्था एफटीसी  में की गई थी ताकि वे बागवानी और अनुषंगी गतिविधियों के क्षेत्र में उत्कृष्ट अनुसंधान एवं विकास की जानकारी प्राप्त कर सकें. इन्क्यूबेशन अवधि पूरी कर लेने पर उन्हें तकनीकी मदद दी गई और बाज़ार की स्थितियों का सामना करने में उनकी सहायता की गई. इस तरह उन्हें भावी चैम्पियन उद्यमियों में परिवर्तित किया गया.
टीएलबीआई के प्रथम बैच में बागवानी, कृषि, मछली उद्योग, पशु-पालन और एकीकृत खेती प्रणाली से संबद्ध 30 प्रशिक्षार्थी शामिल थे. टीएलबीआई कुल मिलाकर बागवानी कॉलेज से कृषि-अनुषंगी विभागों, कृषि महाविद्यालय और कृषि विज्ञान केन्द्र जगदलपुर का एक संयुक्त प्रयास था. 
परम्परागत पद्धतियां :
परम्परागत पद्धतियों के अंतर्गत किसान आमतौर पर चेक बेसिन या कुंड सिंचाई पद्धति के साथ स्थानीय रूप में उपलब्ध प्रजातियां उगाते हैं. उनके अंतर्गत पोषक तत्वों और पादप संरक्षण उपायों का प्रयोग नहीं हो पाता है. खेती से अधिकतर धन तभी प्राप्त होता है जब किसान अपनी पैदावार को बेच देता है. टीएलबीआई किसान मूल्य शृंखला के भीतर संवद्र्धित मूल्य हासिल करने के उपायों को सक्रियता से अपनाते हैं. टीएलबीआई प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने मूली को प्रसंस्कृत किया और उससे बाडी बनायी. बाडी को बाज़ार में उतारा गया और उसे लोकप्रियता मिली और मूल्य संवद्र्धन के कारण उससे ताजा मूली की तुलना में अधिक आमदनी हुई. मूल्य संवद्र्धित उत्पाद की शेल्फ -लाइफ  एक वर्ष होती है. 
टीएलबीआई किसान खेत विद्यालय का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसे कॉलेज के खेतों में अंजाम दिया जाता है, जहां किसान जानकारी, महत्वपूर्ण कौशल और आत्म विश्वास अर्जित करते हैं ताकि स्वयं के अध्ययन और अनुभव के आधार पर कृषि प्रबंधन के बारे में निर्णय कर सकें. समूह आमतौर पर मिलते हैं और उन्हें अपने अनुभवों एवं विचार-विमर्श के निष्कर्ष लिखने को प्रोत्साहित किया जाता है ताकि उन्हें अन्य समूहों के साथ साझा किया जा सके. इस नीति का इस्तेमाल मुख्य रूप से प्रौद्योगिकी के विकास और प्रसार के लिए किया जाता है.
टीएलबीआई किसान उत्पादन पर ध्यान केन्द्रित करने से अधिक अन्य जरूरतों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं. वे खेती व्यापार प्रबंधन कौशल विकसित करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता को समझते हैं. 
विपणन             जोखिम प्रबंधन
वित्तीय प्रबंधन श्रमिक प्रबंधन
मुनाफा और प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए सबसे महत्पूर्ण यह है कि इन सभी क्षेत्रों में प्रबंधन के प्रति एक युक्तिसंगत, एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया जाये. 
डॉ. कृष्ण पाल सिंह सहायक प्रोफेसर/वैज्ञानिक हैं, पता है-कॉलेज ऑफ होर्टिकल्चर एंड रिसर्च  सेंटर, आईजीकेवी, जगदलपुर, बस्तर-494001
ई-मेल : drkpsingh2010@gmail.com
अमित कटारिया  छत्तीसगढ़ सरकार में कलेक्टर हैं, जो जगदलपुर, बस्तर-494001 में स्थित है. 
डॉ.डी एस ठाकुर डीन हैं, पता है-कॉलेज ऑफ होर्टिकल्चर एंड रिसर्च  सेंटर, आईजीकेवी, जगदलपुर, बस्तर-494001
डॉ. (श्रीमती) बीना सिंह सहायक प्रोफेसर/वैज्ञानिक हैं, पता है-कॉलेज ऑफ होर्टिकल्चर एंड रिसर्च  सेंटर, आईजीकेवी, जगदलपुर, बस्तर-494001
कपिल देव दीपक उपनिदेशक (कृषि) हैं, पता है-कृषि विभाग, जगदलपुर,
बस्तर-494001
चित्र: साभार गूगल