नौकरी फोकस


Volume-15

मात्स्यिकी एवं सजावटी मत्स्यपालन में कॅरिअर के अवसर

डॉ. अरुण एस. निनावे

देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में मात्स्यिकी क्षेत्र एक अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इसे आय तथा रोजग़ार  के सशक्त सृजक के रूप में मान्यता दी जाती है, क्योंकि यह अनेक सहायक उद्योगों के विकास को निर्धारित करता है और यह एक सस्ते तथा पोषक खाद्य का स्रोत होने के साथ-साथ विदेशी मुद्रा का अर्जक है. सबसे अधिक महत्वपूर्ण रूप में, यह देश के आर्थिक रूप से कमजोर एक बड़े वर्ग की जीविका का स्रोत है. यह क्षेत्र 14.49 मिलियन से भी अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है, जो इस क्षेत्र में पूरी तरह, आंशिक रूप में या इसके सहायक कार्यकलापों में व्यस्त हंै. इसके अतिरिक्त इतनी ही संख्या में लोग मात्स्यिकी तथा एक्वाकल्चर में सहायक कार्यों में कार्यरत हैं. मात्स्यिकी क्षेत्र में, सजावटी मत्स्य प्रजनन भी युवा वर्ग के लिए अत्यधिक व्यावसायिक एवं आकर्षक अवसर है. भारत में 95 प्रतिशत सजावटी मत्स्य निर्यात जंगली मत्स्य संकलन पर आधारित है. भारत में अधिकांश देशी मत्स्य व्यापार पूर्वोत्तर राज्यों से और शेष व्यापार दक्षिणी राज्यों से होता है, जो भारत में मत्स्य जैव वैविध्य का केंद्र है. मत्स्य अभिग्रहण (कैप्चर) आधारित निर्यात धारणीय नहीं है और यह उद्योग के लिए चिंता का विषय है. इस क्षेत्र में प्र्रगति को बनाए रखने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि ध्यान मत्स्य अभिग्रहण से हटाकर मत्स्य पालन विकास पर दिया जाए. सजावट के महत्व वाली अधिकांश मत्स्य प्रजातियोंं का भारत में सफलतापूर्वक पालन-पोषण किया जा सकता है. तथापि संगठित व्यापार के लिए यह उद्योग मांग की सुनिश्चित एवं पर्याप्त आपूर्ति पर निर्भर है, जो केवल बहु-मत्स्य प्रजनन द्वारा ही संभव है. तथापि पब्लिक एक्वेरिया के लिए विश्व में सजावटी मत्स्य बाजार वर्तमान में 1 प्रतिशत से भी कम है और सजावटी मत्स्य का 99 प्रतिशत से भी अधिक बाजार अभी भी शौकिया व्यक्तियों तक सीमित है.  सजावटी मत्स्य को आज उपभोक्ता आधारित मद माना जाता है तथा पालतू जीव बाजार का स्टार उत्पाद है. यह लाखों डॉलर का उद्योग है जो विकासशील देशों में हजारों ग्रामीण लोगों का सहायक है.
सजावटी मत्स्य व्यापार में भारत का हिस्सा अनुमानत: 158.23 लाख रु. का है जो विश्व-व्यापार का केवल 0.008 प्रतिशत है. इस क्षेत्र की अर्जन संभावना शायद ही समझी गई हो और इसे किसी प्रौद्योगिक समर्थित रूप में नहीं चलाया जा रहा है. बेरोजग़ार युवकों तथा किसानों के लिए प्रोसेस सृजक आय में, कइयों के लिए सजावटी मत्स्य को एक रुचिकर कार्य बनाए रखने में रुचि बढ़ रही है. सजावटी मत्स्य पालन के माध्यम से उद्यम विकास दिन प्रतिदिन लोकप्रिय हो रहा है. इसलिए मत्स्य पालन के माध्यम से सजावटी मत्स्य पालन एवं प्रजनन के आकर्षक व्यवसाय में अधिकाधिक व्यक्ति प्रवेश कर रहे हैं. इसके परिणामस्वरूप, शहरों और यहां तक कि छोटे शहरों में भी पैट शॉप के रूप में अनेक सहायक उद्योग भी पनप रहे हैं. इसमें एक बुनियादी आवश्यकता यह है कि मत्स्य की आदतों तथा जैविकीय जरूरतों की एक स्पष्ट समझ होनी चाहिए. शौकीन व्यक्ति एक्वेरियम रखरखाव के दौरान मत्स्य के व्यवहार तथा जीव विज्ञान का अध्ययन कर सकते हैं और कई किस्मों का मत्स्य प्रजनन करा सकते हैं.
मात्स्यिकी और एक्वाकल्चर में तकनीक के तुलनात्मक रूप में सामान्य होने के तथ्य को देखते हुए, इस क्षेत्र में निर्यात से अर्जन के अतिरिक्त पर्याप्त रोजग़ार अवसर सृजित करने की संभावना है. इसका बहुत अच्छा घरेलू बाजार भी है, जो मुख्य रूप से घरेलू रूप में प्रजनित विदेशी प्रजातियों पर आधारित है.
भारत का प्रचुर जैववैविध्य सजावटी मत्स्य प्रजनन के विस्तार की व्यापक संभावनाएं देता है. एम.पी.ई.डी.ए. के अनुसार समुद्री उत्पाद निर्यात 2014-15 के दौरान 33441.61 करोड़ रु. के लगभग था. निर्यात, सजावटी मत्स्य प्रजनन की व्यापक संभावनाओं वाले इस उत्पादन क्षेत्र में भी योगदान दे रहा है क्योंकि सजावटी मत्स्य की अनेक किस्मों की अभी तक खोज नहीं की गई है. घरेलू सजावटी मत्स्य का बाजार लगभग 50 करोड़ मूल्य का है और इसकी मांग 20 प्रतिशत बढ़ रही है. इस क्षेत्र की अर्जन संभावना शायद ही समझी गई हो और इसे किसी प्रौद्योगिकी समर्थित रूप में नहीं चलाया जा रहा है. इस क्षेत्र में तकनीक तुलनात्मक रूप में सामान्य होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए इस कार्य में, निर्यात अर्जन में सहायता करने के अतिरिक्त पर्याप्त रोजग़ार अवसर सृजित करने की संभावना निहित है.
सजावटी मत्स्य व्यापार में 120 से भी अधिक देश शामिल हैं. लगभग 60-65 प्रतिशत सजावटी मत्स्य विकासशील देशों से आपूर्त की जाती थी. कुल मिलाकर मत्स्य की लगभग 1800 प्रजातियों का व्यापार किया जाता है, जिनमें 1200 से भी अधिक प्रजातियां मीठा जल मूल की हैं. इस सूची में अधिकाधिक प्रजातियां शामिल की जा रही हैं जिसके परिणामस्वरूप प्रजनन, परिवहन तथा एक्वेरियम प्रौद्योगिकी उन्नत हुई है. विश्व सजावटी मत्स्य उद्योग यद्यपि मीठा जल मूल की कैप्टिव-बे्रड मत्स्य पर बड़े पैमाने पर निर्भर है, किंतु जंगली किस्म की मत्स्य एवं इन्वर्टीबे्रट्स भी बड़ी संख्या में शामिल की जा रही है. समुद्री मत्स्य प्रजातियां बाजार मूल्य का 15 प्रतिशत से अधिक भाग रखती हैं. लगभग 98 प्रतिशत समुद्री मत्स्य जंगली किस्मों से एकत्र की जाती है और शेष कैप्टिव-बे्रड किस्म की होती हैं. आमतौर पर कम मूल्य की मत्स्य ऊंचे मूल्य की प्रजातियों की तुलना में अधिक मांग में होती हैं. यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 30 प्रतिशत मीठा जल प्रजातियां जैसे गपीज़, प्लेटीज़, स्वॉर्डटेल्स, भोलीज़, निओनटेट्रा, ऐंजलफिश, गोल्ड फिश, ज़ेबरा, डेनियो, डिस्कस और बाब्र्स बाजार में ऊंचा स्थान रखती हैं. अकेले गपीज़ एवं निओनटेट्रा विश्व बाजार में 25 प्रतिशत से भी अधिक मात्रा में होती है और 14 प्रतिशत से अधिक का मूल्य रखती है. सिंगापुर सजावटी मत्स्य का सबसे बड़ा निर्यातक देश तथा एशियाई हब भी है, जबकि संयुक्त राज्य, यूरोपीय संघ और जापान बड़े आयातक देश हैं और चेक गणराज्य का सजावटी मत्स्य व्यापार में यूरोपीय संघ में मुख्य स्थान है.
भारत के पश्चिमी घाटों और पूर्वोत्तर क्षेत्रों को विविध प्रकार के पेड़-पौधों, जलवायु जोनों और विशिष्ट एडेमिज्म वाले जैव वैविध्य संरक्षण के लिए विश्व के 34 मुख्य स्थानों में से दो माना जाता है. इन क्षेत्रों को शानदान रंगीन सजावटी किस्म की मछलियों से भी सज्जित किया गया है. इन जीवंत जीवों की प्रचुरता के कारण व्यापार संभावना की दृष्टि से भारत अन्य देशों की अपेक्षा एक विशिष्ट स्थान रखता है. भारत जैसे उष्ण कटिबंधीय देशों में सजावटी मत्स्य उद्योग की व्यापक संभावना है और इनकी प्रजातियों की बड़ी संख्या ही उद्योग की मांगों को पूरा कर सकती है. विभिन्न देशी, विदेशी सजावटी मत्स्य प्रजातियों और सजावटी श्रिम्प प्रजातियों का भारत से निर्यात किया जा रहा है. व्यापार को बढ़ाने के लिए, नई प्रौद्योगिकियों और नीतियों का विकास करना होगा, जो एक धारणीय सजावटी मत्स्य उद्योग को प्राप्त करने में सहायक होगा. वर्तमान मांग मीठा जल सजावटी मत्स्य की अधिक है, क्योंकि प्रजनन के लिए वे आसानी से सुलभ होती हैं और लवणता की भी आवश्यकता नहीं होती है. मोली, गुप्पी, प्लेटी, स्वॉर्डटेल, गौरामिस, बाब्र्स, गोल्ड फिश, सायमीज फाइटर फिश, केट फिश, ऐंजल, सिचलिड, टेट्रा, काप्र्स जैसी सजावटी मत्स्य प्रजातियों की मांग अधिक है. नई संकर प्रजातियों का भी विकास किया जाता है जो अधिक आकर्षक होती हैं और वास्तु मत्स्य सहित निर्यात बाजार में इनका मूल्य अधिक होता है.
रोजगार के अवसर : यद्यपि, भारत में मात्स्यिकी संस्थापनाओं की बड़ी संख्या है और विस्तार के अवसर भी हैं, किंतु प्रशिक्षण-सुविधा के अभाव और शिक्षित युवा वर्ग में जागरूकता नहीं होने के कारण इसका प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया है. सजावटी मत्स्य प्रजनन पर सुविधाओं सहित प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना करके सजावटी मत्स्य के उत्पादन एवं निर्यात को संपोषित रखा जा सकता है और आंतरिक मांग को भी पूरा किया जा सकता है. तथापि, उद्योग के लिए कुशल जनशक्ति की उपलब्धता में अड़चनें हैं, क्योंकि केज कल्चर, पेन कल्चर, हेचरी परिचालन के माध्यम से प्रजनन तथा कल्टीवेशन में उनकी आवश्यकता, नवप्रवर्तित सोच तथा एकीकृत फार्मिंग एवं वैविध्यकरण भी उत्पादन एवं निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य है. अनुसंधान एवं विकास ने एक्वाकल्चरिस्ट्स, फार्म प्रबंधकों, निर्यातकों, व्यापारियों, ब्रीडर्स और आधुनिक मछुआरों को शामिल करके फिश सीड, उच्च उत्पादक प्रजाति तथा औषधि जैसे महत्वपूर्ण पोषण साधनों की उपलब्धता के लिए तथा उत्पादकता मामलों की समस्या को दूर करने में इस क्षेत्र की सहायता करने के लिए ज्ञान सृजन किया है.
नीति स्तर पर मध्यस्थता ने देश में मात्स्यिकी विकास को आगे ले जाने तथा निष्पादन में सहायता की है. यह क्षेत्र अत्यधिक लाभकारी होने के कारण रोजग़ार सृजन का एक मुख्य स्रोत माना जाता है और मात्स्यिकी तथा एक्वेटिक विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में कॅरिअर के अवसर देता है.
सजावटी मत्स्य प्रजनन अधिक लाभकारी है, सीमेंट सिस्टम/ग्लास टैंक तथा एयरेशन, पम्प, फीड एवं औषधि जैसी सहायक सामग्रियों के रूप में 30000/- रु. निवेश पर एक्वेरियम फिश यूनिट की लागत बेरोजगार युवकों को धनराशि  कमाने में सहायता कर सकती है.
मात्स्यिकी शिक्षा तथा अनुसंधान के लिए पात्रता : मात्स्यिकी विधा में प्रवेश करने के लिए, मात्स्यिकी स्नातक बनने के इच्छुक उम्मीदवारों को राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के मात्स्यिकी कॉलेजों से 4-वर्षीय डिग्री उत्तीर्ण करनी होगी. बी.एफ.एस.सी (मात्स्यिकी विज्ञान स्नातक) पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए उम्मीदवार पी.सी.बी. समूह के साथ 10 (+2) के बाद आवेदन कर सकते हैं. प्रवेश मैरिट, उम्मीदवारों के अंकों तथा सीटों की उपलब्धता के अनुसार दिया जाता है. राज्य के बाहर के उम्मीदवारों का विशेष कोटा उन उम्मीदवारों को दिया जाता है जो आई.सी.ए.आर. प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण हैं तथा अध्येतावृत्ति भी ले रहे हैं. विशेष आरक्षित सीटें जम्मू-कश्मीर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश तथा नगालैंड की होती हैं. कई विश्वविद्यालय  अपने संबद्ध कॉलेजों के माध्यम से 3 वर्षीय बी.एस.सी पाठ्यक्रम में रसायन विज्ञान विषय के अंतर्गत ऐच्छिक औद्योगिक मत्स्य एवं मात्स्यिकी पाठ्यक्रम देते हैं. कई विश्वविद्यालय औद्योगिक मत्स्य एवं मात्स्यिकी में बी.एस.सी. या प्राणि विज्ञान में बी.एस.सी. के बाद एम.एफ.एस. सी.-2 वर्षीय पाठ्यक्रम भी देते हैं.
बी.एफ.एस.सी. में अंतर्देशीय एक्वाकल्चर, मीठा जल एक्वाकल्चर, मैरीकल्चर, औद्योगिक मात्स्यिकी, मत्स्य प्रोसेसिंग तथा पोस्ट हार्वेस्ट प्रौद्योगिकी, मत्स्य पोषण, रोग विज्ञान, पर्यावरण, पारिस्थितिकी तथा विस्तार जैसे पाठ्यक्रम शामिल हैं. पाठ्यक्रम में फिशिंग वैसल्स पर सी-कू्रज पर कार्य करने तथा डाटा संकलन एवं प्रोसेसिंग संयंत्रों में फिशिंग के अवसर जैसा व्यावहारिक अनुभव शामिल है. ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव के अंतर्गत ऑन-फार्म अध्ययन छात्रों को आई.सी.ए.आर. के शैक्षिक कार्यक्रम के माध्यम से एक्वा फार्म, हेचरीज़, मत्स्य प्रोसेसिंग इकाइयों, मूल्य संवर्धन, संसाधन प्रबंधन आदि पर व्यावहारिक ज्ञान लेने में सहायता करता है.
बी.एफ.एस.सी. पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उम्मीदवार आई.सी.ए.आर द्वारा ली जाने वाली अखिल भारतीय स्तर की सामान्य प्रवेश परीक्षा के माध्यम से भारत में केंद्रीय संस्थानों में प्रवेश लेने के लिए एम.एफ.एस.सी (मात्स्यिकी  विज्ञान में मास्टर) चुन सकते हैं. भारत में आई.सी.ए.आर संस्थापना के अधीन आठ मात्स्यिकी संस्थान हैं, नामत: सी.आई.एफ.ई., सी.आई.बी.ए., सी.आई. एफ.ए., सी.एम.एफ.आर.आई., सी.आई.एफ.टी., सी.आई.एफ.आर.आई., एन.बी.एफ.जी.आर. तथा डी.सी.एफ.आर. ये संस्थान अपने अनुसंधान कार्यक्रमों के उद्देश्यों के अतिरिक्त कैप्चर, कल्चर मूल्य संवर्धन प्रोसेसिंग, रिपोजिटरी, संरक्षण एवं जैव वैविध्य से संबद्ध शैक्षिक एवं विधिक मामलों में व्यस्त हैं. इसके अतिरिक्त स्वतंत्र पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय  के अधीन लगभग 20 मात्स्यिकी कॉलेज  तथा राज्य कृषि विश्वविद्यालय भी हैं जो बी.एफ.एस.सी. एवं एम.एफ.एस.सी. पाठ्यक्रम चलाते हैं. आधारिक संरचना एवं अत्याधुनिक सुविधा के उपलब्ध होने के आधार पर मात्स्यिकी कॉलेज अपनी संस्थापना के अंतर्गत डॉक्टरल कार्यक्रम भी चला रहे हैं. एक्वाकल्चर तथा मात्स्यिकी में मास्टर एवं डॉक्टर ऑफ फिलोस्फी (पी.एच.डी.) कार्यक्रम कुछ स्कूलों के माध्यम से उपलब्ध है. छात्र विषय क्षेत्रों में अपनी अनुसंधान रुचि के उपयुक्त कार्यक्रम जैसे मत्स्य पोषण, जल गुणवत्ता, एक्वाकल्चर इंजीनियरी, मत्स्य आनुवंशिकी, हेचरी उत्पादन तथा मत्स्य रोगविज्ञान चुन सकते हैं. अधिकांश मास्टर कार्यक्रमों के लिए एक थिसिस आवश्यक होती है, जबकि पी.एच.डी. के छात्रों को एक शोध निबंध पूरा करना विशेष रूप से अपेक्षित होता है. सजावटी मत्स्य सहित मत्स्य कल्चर एवं प्रजनन, एकीकृत मत्स्य लाइवस्टॉक फार्मिंग, मत्स्य स्वास्थ्य प्रबंधन एवं पोषण, पोस्ट हार्वेस्ट विकास तथा गहन मत्स्य फार्मिंग और पर्यावरण प्रबंधन सहित प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान कार्यकलाप करना निहित है.
फॉर्म आधारित/कौशल आधारित प्रशिक्षण: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अधीन कृषि विज्ञान केन्द्र अपने संस्थानों के सहयोग में प्रशिक्षक प्रशिक्षण चलाते हैं और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद् के सक्रिय सहयोग में १० (+२) स्तर पर एक व्यावसायिक विषय के रूप में मात्स्यिकी कार्यक्रम चलाते हैं. तटीय राज्यों में मछुआरा बहुल्य गांवों में मात्स्यिकी विद्यालय मछुआरा कौशल विकास के नियमित पाठ्यक्रम चलाते हैं. गहरे समुद्र में मछली पकडऩे और नौ चालन पर केन्द्रीय मात्स्यिकी नौ चालन एवं इंजिनियरी प्रशिक्षण संस्थान (सीआईएफएनईटी) द्वारा प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं. भारत में विभिन्न निजी एजेंसियां स्कूबा डाइविंग में अल्पकालीन प्रशिक्षण चलाते हैं जो गहरे समुद्र में मछली पकडऩे और संसाधन उपयोग, मैपिंग एवं निर्धारण एवं रोज़गार सर्जन में सहायक होते हैं. विभिन्न प्रशिक्षण और विस्तार कार्य संचालित करने के लिए मात्स्यिकी स्नातकोत्तरों के लिए विषय विशेषज्ञ के रूप में कृषि विज्ञान केन्द्रों में रोज़गार भी उपलब्ध हैं.
सरकारी एवं शैक्षिक क्षेत्र में रोज़गार- अवसर :
एक्वाकल्चर एवं समुद्री क्षेत्र में समुद्र जीव विज्ञानी/समुद्र वैज्ञानिक, हेचरी/फॉर्म ऑपरेटर/मात्स्यिकी विस्तार अधिकारी/ तकनीकी अधिकारी, फीडमिल प्रबंधक, प्रोसेसिंग एवं उत्पादन प्रबंधक, मत्स्य निर्यात निरीक्षक, निर्यात प्रबंधक, अनुसंधान एवं विकास व्यवसायी, एक्वाकल्चर उद्यमी, फिश फार्म प्रबंधन सलाहकार आदि रूप में कार्य करने के लिए सरकारी तथा निजी क्षेत्रों, व्यवसाय संस्थापना आदि में अनेक अवसर उपलब्ध हैं. मात्स्यिकी एवं एक्वाकल्चर स्नातकों के लिए विभिन्न नियोक्ताओं, राज्य एवं केन्द्रीय सरकारी एजेंसियों, शैक्षिक संस्था एवं फिश फार्म में कॅरिअर के अच्छे विकल्प उपलब्ध हैं. सरकारी एजेंसियां एवं उद्योग एक्वाकल्चर किसान, शलफिश कल्चरिस्ट, हेचरी तकनीशियन, जैविकीय विज्ञान तकनीशियन एवं मत्स्य अनुसंधान सहायक आदि जैसे पदों पर भर्ती
करते हैं.
राज्य सरकारी रोज़गार : इस समय राज्यों में डिजाइनिंग, निर्माण, मत्स्य फार्मों और हेचरी के क्षेत्र में कुशल जनशक्ति का अत्यधिक अभाव है. प्रत्येक राज्य सरकार के मात्स्यिकी विभाग हैं जिनमें मात्स्यिकी स्नातक, सहायक मात्स्यिकी विकास अधिकारी/मात्स्यिकी विस्तार अधिकारी और जिला मात्स्यिकी विकास अधिकारी के पद के लिए आवेदन कर सकते हैं. मात्स्यिकी में स्नातक, मत्स्य जीव विज्ञानी, हेचरी प्रबंधक, अनुसंधान तकनीशियन, पर्यवेक्षक, मत्स्य परियोजना प्रबंधक, मत्स्य कल्चरिस्ट, वन्य जीव तकनीशियन, एक्वेरियम में क्यूरेटर तथा फील्ड सहायक आदि के रूप में कार्य कर सकते हैं. इन पदों के लिए योग्यताएं १०वीं कक्षा से लेकर मत्स्य विज्ञान में मास्टर डिग्री तक हैं. फार्म एवं हेचरी प्रणाली में उम्मीदवारों को रखने के लिए दसवीं कक्षा के बाद व्यावसायिक स्कूलों के माध्यम से कौशल आधारित मत्स्य शिक्षा भी दी जा रही है.
एक्वाकल्चर में स्नातक डिग्री धारी उम्मीदवार केन्द्रीय सरकारी एजेंसियों सहित विभिन्न संगठनों में एक्वा कल्चर समन्वयकर्ता एक्वेटिक पशु स्वास्थ्य समन्वयकर्ता तथा उप प्रबंधक आदि जैसे प्रबंधन पद प्राप्त कर सकते हैं.
डीएफएससी डिग्री धारी उम्मीदवार अनुसंधान सहायक, जैव रसायनज्ञ, जैव विज्ञानी, तकनीशियन आदि पदों के लिए आवेदन कर सकते हैं. एमएफएससी डिग्री धारी स्नातकोत्तर उम्मीदवार मास्यिकी संकाय में सहायक प्रोफेसर के पद के लिए आवेदन कर सकते हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अन्तर्गत विभिन्न कृषि एवं मात्स्यिकी संस्थाओं में वैज्ञानिक के रूप में भर्ती के लिए कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड अखिल भारतीय प्रतियोगी परीक्षा एवं कृषि अनुसंधान सेवा तत्पश्चात् मौखिक साक्षात्कार का संचालन करता है और प्रबंधन कार्यक्रमों के लिए प्रवेश उनके प्रदर्शन पर आधारित होता है. समुद्रीय उत्पाद निर्यात एवं विकास प्राधिकरण, भारतीय मत्स्य सर्वेक्षण आदि जैसी केन्द्रीय एजेंसियां भी मात्स्यिकी स्नातकों के लिए कॅरिअर के अच्छा अवसर देती हंै. मात्स्यिकी स्नातक फील्ड अधिकारी, प्रबंधक के कृषि अनुभाग के रूप में राष्ट्रीयकृत एवं निजी बैंकों में एक विशेषज्ञ अधिकारी के रूप में रोज़गार प्राप्त कर सकते हैं.
अधिस्नातक छात्र मत्स्य पालन, प्रजनन, मत्स्य प्रसंस्करण और मात्स्यिकी विस्तार में, पौंड तैयार करने से लेकर स्टॉकिंग तक, पोषण प्रबंधन हारवेस्टिंग, उत्पाद के सेल आदि जैसे क्षेत्रों में अवसर प्राप्त कर सकते हैं. अधिकांश मत्स्य स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्र भारत तथा विदेश में फॉर्म एवं हेचरी प्रबंधन मत्स्य प्रसंस्करण एवं फीड क्षेत्र में रोज़गार प्राप्त करते हैं. कई छात्र आईसीएआर संस्थाओं, केवीके, राज्य मात्स्यिकी विभाग, गैर सरकारी संगठन एवं विश्वविद्यालयों में सेवारत हैं.
इसके अतिरिक्त मात्स्यिकी स्नातक डेयरी उत्पाद प्रसंस्करण एककों, खनिज जल संयंत्रों, प्रसंस्करण उद्योग, आंतरिक मत्स्य फॉर्मो, हवाई अड्डों पर हवाई अड्डा प्राधिकरणों की संगरोध एककों जैसे सरकारी एवं निजी फार्मों, राज्य सरकारी स्वास्थ्य विभागों, जन स्वास्थ्य इंजीनियरी विभागों में और सरकारी विभागों में विश्लेषक, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधकीय समतुल्य लाइन में पौंड स्वास्थ्य प्रबंधक के रूप में भी लगाए जाते हैं. विपणन क्षेत्र में वे एक्वा-औषधि, प्रोबायोटिक्स, डेट्रो-डायजेस्ट, फीड पौंड सेनिटाइजर, केज़ इम्प्लांटस, सप्लाई एजेंट, मत्स्य बोटों के उपस्करों एयररेटर्स पंपों आदि के क्षेत्र में बढ़ावा देने के लिए निजी कंपनियों में भी लगाए जातें हैं.
स्वरोज़गार के लिए अवसर :  एक नवोद्यमी के रूप में, बीएफएससी की व्यावसायिक बिक्री प्राप्त करने के बाद कोई भी व्यक्ति अपना निजी उद्यम प्रारंभ कर सकता है. इस संबंध में आर्थिक सहायता नाबार्ड, एमपेरा, एनएफडीबी या अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है. ऐसे मुख्य क्षेत्र जिनमें मात्स्यिकी उद्यम किया जा सकता है वे क्षेत्र हैं, फीड विनिर्माण, विपणन एवं विक्रय, सजावटी, मत्स्य, कल्चर एवं प्रजनन, एक्वाकल्चर एवं हेचरी तथा बीज उत्पादन, व्यावसायिक मोती, उत्पादन, मत्स्य प्रसंस्करण एवं विपणन, नेट मेकिंग, मत्स्य रोग निदान केन्द्र, परामर्शी सेवा एवं कृषि-क्लीनिक की स्थापना. सरकारी एवं विश्व बैंक भी आर्थिक सहायता एवं वित्त के संबंध में सहायता देकर मत्स्य उद्योग का विकास करने में सहायता कर रहे हैं, जहां मत्स्य व्यावसायियों के लिए बड़े पैमाने पर अवसर विद्यमान हैं.
फिशिंग और समुद्र विज्ञान के क्षेत्र में, समुद्री खाद्य वस्तुओं, समुद्र आधारित औषधियों की तथा पारिस्थितिकी के अनुकूल उद्योगों की ग्रूमिंग की बढ़ती हुई मांग से समुद्र विज्ञानियों की भारी मांग होने की संभावना है. मत्स्य क्षेत्र में फिशिंग एक मुख्य क्षेत्र है. गहरे समुद्र में अन्वेषण में सहभागिता के शानदार अवसर हैं. अनुसंधान की इच्छा रखने वाले अनुसंधान वैज्ञानिक नये तथा मूल्यवान संसाधनों का पता लगाने के लिए अंटार्कटिक अभियान में भाग ले सकते हैं. मात्स्यिकी स्नातकों को प्रदर्शनियों के लिए नए नमूने प्राप्त करने के लिए और सुरक्षित परिवहन तथा प्रदानगी प्रक्रिया के लिए एक्वेरियम क्यूरेटर के रूप में भी रखा जाता है.
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में अवसर : हाई स्कूल शिक्षा के पश्चात कोई भी व्यक्ति प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन का कोई भी ऐसा क्षेत्र चुन सकता है जिसमें उसकी रुचि हो, इन क्षेत्रों की पसंद में मात्स्यिकी प्रबंधन, वन्य जीव प्रबंधन, रेंज प्रबंधन, वानिकी, मृदा, जल विज्ञान, वन्य जीव विधि प्रवर्तन, पर्यावरण शिक्षा, उद्यान प्रबंधन, बाह्य मनोरंजन, एक्वाकल्चर, समुद्र विज्ञान एवं अन्य विषय शामिल हैं. मात्स्यिकी जीव विज्ञान, वन्य जीव प्रबंधन, एक्वेटिक पारिस्थितिकी या संबंधित क्षेत्रों में विज्ञान स्नातक की डिग्री रखने वाले छात्र एंट्री स्तर के तकनीशियनों के रूप में नियुक्ति किए जाते हैं और वे प्राकृतिक संसाधनों में अध्ययन के विशेष क्षेत्रों के बारे में अध्ययन करने के लिए किसी कॅरिअर सलाहकार के साथ कार्य करते हैं. कार्यों में सार्वजनिक फिशिंग वाटर में स्टॉकिंग के लिए मत्स्य छोडऩा, रिकवरी कार्यक्रमों के लिए प्रजातियों का सर्वधन, संवर्धन तकनीकों का विकास करना, आनुवंशिक अनुसंधान संचालित करने के कार्य शामिल हैं. प्रबंधन जीव विज्ञानी मत्स्य संख्या में सुधार के लिए फार्मिंग प्रक्रियाओं की डिजाइनिंग के रूप में रखे जाते हैं और ऐंजलर्स के लिए फिशिंग अवसरों में फिश स्टॉकिंग, जल स्तर निर्धारण, वानस्पतिक नियंत्रण, उर्वरण एवं जल सीमित करने, मत्स्य विनियमों का विकास करने अंतरधारा एवं बहिर्धारा पर्यावास सुधार योजना और पर्यावरण प्रभाव निर्धारण शामिल हैं. प्राकृतिक संसाधन शिक्षाशास्त्री संसाधन प्रबंधन एजेंसियों, उद्यान एवं मनोरंजन विभागों, प्राकृतिक केन्द्रों, कैंपों, निजी संगठनों, युवा शिक्षा संगठनों और उच्च निजी निगमों के साथ कार्य करने के लिए उत्तरदायी होते हैं. वे ऐसे शिक्षा कार्यक्रमों की रूप रेखा, कार्यान्वयन एवं प्रबंधन कार्य करते हैं जो संगठन के संसाधन उद्देश्यों और दर्शन को पूरा करते हैं.
राष्ट्रीय/राज्य मात्स्यिकी संस्थान
१.केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान, वरसोवा, मुंबई www.cife.edu.in
२. केन्द्रीय मीठाजल एक्वाकल्चर संस्थान, भुवनेश्वर, उड़ीसा www.cife.edu.in
३. केन्द्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, कोच्चि, www.cmfri.org.in
४. सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रेकिश वाटर एक्वाकल्चर, चेन्नै www.ciba.res.in
५. केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी संस्थान, कोच्चि www.cift.res.in
६. केन्द्रीय अंतरदेशीय अभिग्रहण मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान, बैरकपुर, पश्चिम बंगाल
www.cifri.ernet.in
७. राष्ट्रीय मत्स्य आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, लखनऊ www.nbfgr.res.in
८. शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान निदेशालय, नैनीताल, उत्तराखंड www.dcfr.res.in
९. केन्द्रीय मात्स्यिकी नौचालन एवं इंजीनियरी प्रशिक्षण संस्थान, कोच्चि www.cifnet.nic.in
१०. राष्ट्रीय महासागर विज्ञान संस्थान, दोना पौला, गोवा www.nio.org
११. केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी एवं अनुसंधान संस्थान, मैसूर, www.cftri.com
१२. केरल मात्स्यिकी एवं महासागर अध्ययन विश्वविद्यालय कोच्चि, www.kufos.ac.in
१३. तमिलनाडु मात्स्यिकी विश्वविद्यालय, नागापट्टिनम, तमिलनाडु, www.tnfu.org.in
१४. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खडग़पुर, पश्चिम बंगाल, www.iitkgp.ac.in
१५. आंध्र विश्वविद्यालय, तेलीबाग, वाल्टेयर, आंध्र प्रदेश www.andhrauniversity.edu.in
१६. गोवा विश्वविद्यालय, गोवा, www.unigoa.ac.in
१७. बरहमपुर विश्वविद्यालय, बरहमपुर, ओडि़शा, www.buodisha.edu.in
१८. मंगलौर विश्वविद्यालय, मंगलौर, कर्नाटक, www.mangaloreuniversity.ac.in
१९. कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कोच्चि, www.cusat.ac.in
२०. समुद्री जीव विज्ञान सीएएस, अन्नामल्लै विश्वविद्यालय, अन्नामल्लै नगर, तमिलनाडु, http://annamalaiuniversity.ac.in/ 
२१. बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल, मध्यप्रदेश, http://www.bubhopal.nic.in/aqua.htm
राज्य कृषि/पशु चिकित्सा विश्व-विद्यालयों के अधीन मात्स्यिकी कॉलेज
१. मात्स्यिकी कॉलेज, शिरगांव, रत्नागिरी, महाराष्ट्र www.dbskkv.org
२. मात्स्यिकी विज्ञान कॉलेज, तेलंगखेड़ी, नागपुर, महाराष्ट्र, http://cofsngp.org
३. मात्स्यिकी कॉलेज, मंगलौर, कर्नाटक, www.kvafsu.kar.nic.in
४. मात्स्यिकी कॉलेज, तूतीकोरिन, तमिलनाडु, http://tnfu.ac.in/
५. मात्स्यिकी कॉलेज, पनानगढ़, कोच्चि
६. मात्स्यिकी विज्ञान कॉलेज, पंतनगर, उत्तराखंड
७. पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना, पंजाब, www.pau.edu
८. मात्स्यिकी कॉलेज, धोली, आरएयू, बिहार, www.htcampus.com
९. मात्स्यिकी कॉलेज, सीएयू, अगरतला, त्रिपुरा, www.cofcau.nic.in
१०. मात्स्यिकी प्रौद्योगिकी संस्थान, तिरुवेल्लुर, चेन्नै, तमिलनाडु
११. स्नातकोत्तर मात्स्यिकी कॉलेज, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, आंध्र प्रदेश
१२. मात्स्यिकी कॉलेज, उदयपुर, राजस्थान
१३. मात्स्यिकी विज्ञान कॉलेज, नेल्लौर, आंध्र प्रदेश
१४. मात्स्यिकी विज्ञान कॉलेज, कुलिया, पश्चिम बंगाल, www.wbuafscl.ac.in
१५. मात्स्यिकी कॉलेज, रंगेलुना, बरहमपुर, उड़ीसा
१६. मात्स्यिकी कॉलेज, वेरावल, गुजरात, http://www.gsauca.in/
१७. मात्स्यिकी कॉलेज, राहा, एएयू, असम
१८. मात्स्यिकी विज्ञान कॉलेज, उदगीर, महाराष्ट्र, www.mafsu.in
१९. मात्स्यिकी विज्ञान कॉलेज, जबलपुर, मध्य प्रदेश
२०. मात्स्यिकी कॉलेज, रायपुर, छत्तीसगढ़
(सूची उदाहरण मात्र है)
लेखक वर्तमान में जैव प्रौद्योगिकी विभाग में वैज्ञानिक जी एवं सलाहकारके रूप में कार्यरत हैं, जो कार्यक्रम क्षेत्र पशु एवं एक्वाकल्चर जैव प्रौद्योगिकी से संबंधित हैं. व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं.
चित्र: गूगल के सौजन्य से