नौकरी फोकस


Volume 25, 2017

शियामेन ब्रिक्स शिखर सम्मेलन : एक आकलन

डॉ. अविनाश गोडबोले

ब्रिक्स देशों (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) के नेताओं के नौवें शिखर सम्मेलन मेजबान चीन के फुजियान प्रांत के समुद्रतटवर्ती शहर शियामेन में आयोजित किया गया. इस सम्मेलन का मुख्य विषय था : संक्रमण के दौर में वैश्वीकरण : ब्रिक्स के समक्ष साझा अवसर, चुनौतियां और उत्तरदायित्व. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत पांचों सदस्य देशों के शासनाध्यक्ष/ राज्याध्यक्ष सम्मेलन में शामिल हुए. ब्रिक्स देश दुनिया के सबसे बड़े विकासशील देशों में शामिल हैं. विश्व की 40 प्रतिशत आबादी इन देशों में रहती है और विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में इनका हिस्सा 30 प्रतिशत के बराबर है. इन देशों की विकास संबंधी सरोकार एक समान हैं और जो बात इन देशों को ब्रिक्स के मंच पर आने के लिए एकजुट करती है वह है इन सरोकारों को हल करने के लिए साझा समझ और एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने
की इच्छा.
यह बात ध्यान देने की है कि ब्रिक्स आधुनिक युग में वैश्वीकरण के चौथे दौर का नतीजा है और यह इसका लाभ भी उठाता है. ब्रिक्स की सामान्य कार्यसूची में विकास के लिए निष्पक्ष और न्यायोचित वैश्विक व्यवस्था की स्थापना का लक्ष्य शामिल है जो समावेशी हो और दुनिया के बड़े विकासशील देशों के सरोकारों और जरूरतों को पूरा करता हो. वैश्वीकरण और प्रति-वैश्वीकरण (यानी एंटी-ग्लोबलाइजेशन) की मौजूदा प्रवृत्तियां ब्रिक्स राष्ट्रोंं के विकास संबंधी हितों के प्रतिकूल हैं. डीग्लोबलाइजेशन के विध्वंसक असर, जैसे व्यापारिक प्रतिबंध, वीजा संबंधी नियमों में बदलाव और नीतियों में अचानक परिवर्तनों का ऊपर से नीचे की ओर व्यापक असर पड़ता है. आज भारतीय आई.टी. उद्योग रोजगार के अवसरों में भारी कटौती और अर्थव्यवस्था पर इसके विस्तृत असर पर टकटकी लगाए हुए हैं क्योंंकि इससे कुल उपभोग पर भी जबरस्त असर पड़ सकता है.
इसलिए ब्रिक्स देशों के बीच आपसी सहयोग बहुत जरूरी है. इससे पहले के ब्रिक्स अकादमिक फोरम ने जिन क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया था उन्हें भविष्य में ब्रिक्स देशों के बीच आपसी सहयोग के लिए दिशानिर्देश माना जा सकता है. इनमें वैश्विक शासन व्यवस्था और ब्रिक्स संस्थाएं शामिल हैं. इसके अलावा बाहरी अंतरिक्ष, इंटरनेट और महासागर, व्यापार और नयी खोज, विकास के लिए धन जुटाना, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा, एजेंडा 2030 : टिकाऊ विकास लक्ष्य (एसडीजी) भी इसमें शामिल हैं.  
इसी साल हैम्बर्ग में जी-20 सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स नेताओं की अलग से हुई अनौपचारिक बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस बात पर जोर दिया थी कि ब्रिक्स को विश्व अर्थव्यवस्था को मुक्त बनाने, बहुपक्षीय व्यापार प्रणालियों की सुरक्षा और आर्थिक वैश्वीकरण में खुलापन, समावेशन, साझा लाभ, संतुलन और सर्वजन हित को स्थान देने के लिए कार्य करना चाहिए ताकि आर्थिक विकास और वैश्वीकरण का फायदा सबको मिल सके. इससे ब्रिक्स देशों के सरोकारों का पता चलता है. इन नेताओं के संयुक्त वक्तव्य में कहा गया था कि विश्व अर्थव्यवस्था के समक्ष अनिश्चितता के चलते प्रमुख देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं में व्यापक स्तर पर नीतिगत तालमेल कायम करना चाहिए और उभरती हुई बाजार अर्थव्यवस्थाओं को नकारात्मक रुझानों से बचाना चाहिए. 
वक्तव्य में विश्व अर्थव्यवस्था को और अधिक समावेशी, संतुलित और मुक्त बनाने पर जोर दिया गया ताकि उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए अनुकूल माहौल बने, मानव संसाधन विकास को बढ़ावा मिले और नागरिकों के बीच आपसी संपर्क  बढ़ें ताकि सभी देश और उनके निवासी वैश्वीकरण का एकसमान फायदा उठा सकें.
शियामेन में कई ऐसी बातें देखने को मिलीं जिनसे इससे पहले 2016 में गोवा में हुए शिखर सम्मेेलन की निरंतरता का पता चलता है. अपने उद्घाटन भाषण में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि ब्रिक्स सहयोग से साझा विकास की हमारी जरूरतें पूरी होती हैं और यह इतिहास में जारी रुझान के अनुरूप है.
हालांकि हमारी राष्ट्रीय स्थितियां अलग-अलग हैं, मगर हम सब साझेदारी के जरिए विकास और खुशहाली की ओर बढऩे की अपनी वचनबद्धता पर दृढ़ हैं. इससे हमें अपने आपसी मतभेदों से ऊपर उठने और ऐसे नतीजे हासिल करने के लिए काम करने का मौका मिला है जिनसे सबको फायदा हो. उन्होंने यह भी कहा कि आज जब दुनिया में जबरदस्त और जटिल बदलाव हो रहे हैं तो ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग और भी जरूरी हो गया है. हमारे देशवासी हमसे उम्मीद करते हैं कि विकास को मिलकर बढ़ावा दिया जाए ताकि नागरिकों की खुशहाली में और इजाफा हो. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय हमसे उम्मीद करता है कि हम विश्व शांति और साझा विकास को बढ़ावा देने के लिए मिलकर कार्य करें. हमें ब्रिक्स साझेदारी को और मजबूत करने तथा ब्रिक्स सहयोग के दूसरे स्वणर््िाम दशककी ओर आगे बढऩे के लिए अपने प्रयासों को दुगना कर देना चाहिए.  
श्री शी जिनपिंग ने यह भी कहा कि हमें परिणाम मूलक आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने पर अपना ध्यान केन्द्रित करना होगा व्यापार व निवेश, मुद्रा व वित्त , संपर्क, टिकाऊ विकास, नयी खोज और औ़द्योगिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में एक जैसे हितों को बढ़ाना होगा.
अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ब्रिक्स ने आपसी सहयोग का एक मजबूत ढांचा खड़ा कर लिया है और ब्रिक्स संगठन अनिश्चितता की ओर भटकते विश्व में स्थिरता और विकास लाने में अपना योगदान कर रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि व्यापार और अर्थव्यवस्था ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग का आधार हैं. उन्होंने ब्रिक्स देशों की स्वायत्त संस्थाओं और कंपनियों की वित्त संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ब्रिक्स रेटिंग एजेंसी बनाए जाने के कदम का स्वागत किया. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में सदस्य देशों के बीच मजबूत भागीदारी से विकास दर में तेजी लाने, पारदर्शिता बढ़ाने और टिकाऊ विकास का लक्ष्य प्राप्त करने में मदद मिल सकती है. उन्होंने ब्रिक्स नेताओं को भारत में जनता के लिए गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता, ऊर्जा और सबके लिए शिक्षा जैसे कार्यक्रमों की जानकारी दी और यह भी कहा कि महिला सशक्तीकरण कार्यक्रमों से उत्पादकता में कई गुना बढ़ोतरी होती है जिनसे महिलाएं राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में आ जाती हैं. श्री मोदी ने दलील दी कि ऊर्जा स्रोतों तक वाजिब, भरोसेमंद और टिकाऊ पहुंच हमारे राष्ट्र के विकास के लिए बहुत जरूरी है.
उन्होंने ब्रिक्स देशों से आग्रह किया कि वे इंटरनेशनल सोलर अलायंस यानी अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन के लिए एकजुट होकर कार्य करें. उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिक्स देश स्मार्ट सिटीज, शहरीकरण और आपदा प्रबंधन के जरिए सहयोग का दायरा बढ़ा सकते हैं. 
शियामेन में ब्रिक्स की कुछ उपलब्धियां थीं : सेवाओं के व्यापार के क्षेत्र में ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग का खाका तैयार करना, ब्रिक्स निवेश सुविधाओं की रूपरेखा बनाना, ब्रिक्स ई-कॅामर्स सहयोग पहल, नयी खोजों के बारे में सहयोग के लिए ब्रिक्स कार्य योजना और इन देशों के बीच औद्योगिक सहयोग मजबूत करना. इसके अलावा अफ्रीकी देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए नये विकास बैंक का अफ्रीकी क्षेत्रीय केन्द्र स्थापित किया गया. यह भी निर्णय किया गया कि ब्रिक्स का मॉडल ई-पोर्ट नेटवर्क कायम किया जाए. कराधान, ई-कामर्स, स्थानीय मुद्रा बांड, सार्वजनिक-निजी भागीदारी तथा वित्तीय संस्थाओं और सेवाओं का नेटवर्क कायम करने का भी फैसला किया गया. इस तरह ब्रिक्स देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग और अधिक संस्थाबद्ध और ठोस हो गया है ताकि इसके अधिक अच्छे परिणाम सामने आएं. सदस्य देशों के नागरिकों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने और ब्रिक्स के भीतर पर्यटन, खेल-कूद, फिल्म समारोहों और सांस्कृतिक विनिमय को बढ़ावा देने के बारे में भी समझौता हुआ.
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की एक प्रमुख उपलब्धि वह संयुक्त घोषणा थी जिसमें तालिबान और इस्लामिक स्टेट समेत पाकिस्तान के बहुत से आतंकवादी संगठनों जैसे हक्कानी नेटवर्क, लश्कार-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और हिज्बुल तहरीर का नाम लिया गया था. लेकिन यह क्षेत्रीय स्थिति के संदर्भ में कहा गया था न कि किसी सदस्य देश विशेष के सरोकारों के सदर्भ में. तो भी ब्रिक्स के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि आतंकवाद एक वैश्विक सरोकार है इस बारे में ब्रिक्स की नीति एक स्वागत योग्य कदम है. ब्रिक्स घोषणा में आतंकवाद से संघर्ष में एकजुटता और दृढ़ संकल्पकी पुष्टि की गयी और इस बात पर सहमति बनी कि इससे निपटने के लिए आपसी सहयोग को सुदृढ़ किया जाए. इसमें अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के बारे में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा विस्तृत संकल्प पारित करने का भी आह्वान किया गया.
चीन में बहुत से विद्वानों के साथ-साथ राजनयिकों और विशेषज्ञों का भी यही विचार है कि ब्रिक्स संगठन का दायरा बढ़ाने के लिए ब्रिक्स-प्लस की अवधारणा बड़ी अहम और सामयिक है. इससे ब्रिक्स विकासशील देशों के बीच सहयोग (दक्षिण-दक्षिण सहयोग) का एक महत्वपूर्ण मंच बन सकता है. उनका यह भी कहना था कि ब्रिक्स के सदस्यों को इस बारे में अधिक गंभीरता से विचार करना चाहिए. शियामेन में ब्रिक्स के सम्पर्क शिखर में उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच संवाद का आह्वान किया गया जिसमें चीन ने मिस्र, ताजिकिस्तान, मैक्सिको, गिनी और थाइलैंड को आमंत्रित किया था. इससे पहले की शिखर बैठक में संपर्क पहल के तहत यूरेशियन आर्थिक संघ (ईईयू), शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ), बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल (बिमस्टेक), अफ्रीकी यूनियन (एयू) और अफ्रीकी के विकास के लिए नयी साझेदारी जैसे संगठन वार्ता में साझेदार बने थे. संपर्क पहल के तहत किन देशों को बुलाया जाए यह मेजबान देश का विशेषाधिकार होता है.
इस समय भारत और चीन सबसे तेजी से बढ़ती ब्रिक्स अर्थव्यवस्थाएं हैं. अन्य तीन अर्थव्यवस्थाएं विभिन्न घरेलू मुद्दों जैसे आर्थिक सुधारों की कमी, राजनीतिक अस्थिरता, बुनियादी ढांचे और शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त निवेश न होने जैसी वजहों से कुछ पीछे हैं. भारत और चीन एकजुट होकर अन्य ब्रिक्स देशों को विकास में पिछडऩे के दुश्चक्र से बाहर निकलने में मदद कर सकते हैं और इस तरह ब्रिक्स की वास्तविक क्षमता हासिल की जा सकती है. अगला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2018 में दक्षिण अफ्रीकी में आयोजित किया जाएगा जिसमें यह मुद्दा बहस का केन्द्रीय
विषय होगा.   
ब्रिक्स देश आज युगांतरकारी दौर से गुजर रहे हैं. विकास की दिशा में उनकी यात्रा गुणात्मक बदलाव की ओर अग्रसर है जिससे तभी बाहर निकला जा सकता है जब सदस्य देशों के बीच आदान-प्रदान और सहयोग हो, एक-दूसरे से काम करने के बेहतरीन तौर-तरीके सीखे जाएं और एक जैसी सोच वाले देशों के बीच वार्ता की शुरूआत हो.
एक क्षेत्रीय संगठन के रूप में ब्रिक्स का जोर इसी बात पर है और अगला दशक ब्रिक्स के लिए और इसके सदस्य देशों के लिए भी एक समूह के रूप में अधिक उज्ज्वल साझा भविष्य का वादा करता है.
(लेखक इंडियन काउंसिल ऑफ वल्र्ड अफेयर्स में रिसर्च फैलो हैं).
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और इनसे इंडियन काउंसिल ऑफ वल्र्ड अफेयर्स का कोई लेना-देना नहीं है.)
चित्र : गूगल के सौजन्य से.