विशेष लेख


Volume-43, 20-26 January, 2017

 
वैश्विक शांति के प्रयासों में भारतीय सेना का योगदान

संजीव राठी

स्वयं से पहले सेवायानि सबसे पहले राष्ट्र सेवा यह सेना का ध्येय वाक्य है!
इस ध्येय वाक्य को चरितार्थ करते हुए भारतीय सेना देश की एकता एवं सीमाओं की रक्षा हेतु सदा तत्पर हैं.
हर जवान की जुबां पर हमेशा यही शब्द होते हैं.
कठिनाईयां कितनी ही क्यों न हों, हम हैं तैयार, हम हैं तत्पर, हम हैं देश के प्रति सर्वदा समर्पित.
ये शब्द और पंक्तियां मात्र नहीं हैं अपितु दुनिया के सबसे बड़ लोकतंत्र तथा संप्रभू राष्ट्र की सेना जो दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी सेना है कि राष्ट्र के प्रति वचनबद्धता है और उसके ध्येय वाक्य के समान है.
भारतीय सेना का इतिहास हजारों साल पुराना है और इसके मूल आधार का तानाबाना दो महाग्रंथों रामायण और महाभारत के इर्द-गिर्द बुना हुआ है. महाभारत की लड़ाई का भारतीय जनमानस की मानसिकता पर गहरा प्रभाव है. पांडवों ने शांति और धर्म की स्थापना के लिए लगातार 18 दिन तक यह लड़ाई लड़ी थी. इसके बाद भी अलगअलग काल में धर्म और शांति की स्थापना के लिए कई युद्ध लड़े गये.
पवित्र ग्रन्थ यजुर्वेद में भी शांति के महत्व का उल्लेख करते हुए आकाश पृथ्वी और समूचे बह्मांड में शांति की स्थापना पर जोर दिया गया है. भारतीय सेना आज भी इसी मूल मंत्र को लेकर आगे बढ़ रही है और शांति की स्थापना ही उसकी प्राथमिकता है.
भारतीय सेना का उद्भव ईस्ट इण्डिया कम्पनी के आधिपत्य के समय हुआ. उस समय इसे ब्रिटिश भारतीय सेना के रूप में जाना जाता था. अंग्रेजों ने 1947 में देश को तो आजाद कर दिया पर हमारी सेनाओं की बागडोर अंग्रेज अधिकारियों के ही हाथों में थी लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चला और 15 जनवरी 1949 को उन्हें सेना की बागडोर भारतीय अधिकारियों को सौंपनी पड़ी. ब्रिटिश भारतीय सेना में कमांडर रहे लेफ्टिनेंट जनरल के. एम. करिअप्पा, जिन्हें बाद में फील्ड मार्शल के रैंक से नवाजा गया, आजाद भारत में भारतीय सेना के पहले कमांडर इन चीफ बने. उन्होंने ब्रिटिश राज के समय के भारतीय सेना के अंतिम अंग्रेज शीर्ष कमांडर (कमांडर इन चीफ़, भारत) जनरल फ्रांसिस बूचर से यह पदभार ग्रहण किया था. इसी उपलक्ष्य में भारत में हर वर्ष 15 जनवरी को सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है. साथ ही इस दिन उन तमाम शहीद सैनिकों को याद किया जाता है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा और देश में शांति बनाये रखने के लिए कर्तव्य की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति दी. तीनों सेनाओं के प्रमुख कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से इंडिया गेट स्थित पवित्र स्थल अमर जवान ज्योति पर जाकर भारत मां के इन सपूतों को श्रद्धांजलि देते हैं. 
फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा भारत के दो फील्ड मार्शलों में से एक हैं. भारत के दूसरे  फील्ड मार्शल सैम मानेकशा हैं. फील्ड मार्शल करिअप्पा का जन्म 28 फऱवरी 1899 को कर्नाटक के पूर्ववर्ती
कूर्ग में शनिवर्सांथि नामक स्थान पर हुआ था. वह उन पहले भारतीयों में थे जिन्हें ब्रिटिश सेना ने 1919 में कमीशन की ट्रेनिंग के लिए चुना था. प्रशिक्षण के बाद उन्हें 1922 में स्थायी कमीशन देकर सेकेन्ड लेफ्टिनेंट बनाया गया. इसके बाद अपने तीन दशक लंबे सैन्य कॅरिअर में उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा और नये-नये मुकाम हासिल किये. जनरल करिअप्पा राजपूत रेजीमेंट में थे और 1953 में सेवा निवृत होने के बाद भी वह किसी न किसी रूप में भारतीय सेना को सहयोग देते रहे.   
उनकी सेवाओं के लिए भारत सरकार ने सन् 1986 में जनरल करिअप्पा को फील्ड मार्शलरैंक और पदवी प्रदान की. पन्द्रह मई 1993 को कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू में उनका निधन हो गया उस समय उनकी आयु 94 साल थी। मौजूदा सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने देश के लिए फील्ड मार्शल करिअप्पा की देश की सेवा तथा भारतीय सेना में  उनके योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किये जाने की मांग की है.
15 जनवरी को 70 वां सेना दिवस मनाया गया और अमर जवान ज्योति पर श्रद्धांजलि के बाद नयी दिल्ली और देश भर में सेना के छह कमान मुख्यालयों में भव्य परेड का आयोजन किया गया. राजधानी में दिल्ली कैंट स्थित करिअप्पा परेड ग्राउंड में सुबह सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने परेड की सलामी ली और शहीदों की पत्नियों जिन्हें वीर नारी से संबोधित किया जाता है, को पदकों और पुरस्कारों से सम्मानित किया. इस मौके पर सेना अपनी तैयारियों की एक झलक में अपने रणकौशल और रणनीति का नमूना पेश करती है. हथियारों की प्रदर्शनी भी लगायी गयी जिसमें दुनिया की खतरनाक सबसे खतरनाक मानी जाने वाली ब्रह्मोस और आकाश मिसाइलों, जैविक और रासायनिक हथियारों से निपटने वाला सीबीआराएन वाहन और टी-90 टैंक आदि खास आकर्षण थे. इस अवसर पर आयोजित परेड और हथियारों के प्रदर्शन का उद्देश्य दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराना और देश के युवाओं को सेना में शामिल होने के लिये प्रेरित करना है.
सेना प्रमुख अपने संबोधन में सैनिकों का हौसला बढ़ाया तथा उनके कल्याण से जुड़ी विभिन्न योजनाओं की घोषणा की. साथ ही उन्होंने देशवासियों को आश्वस्त किया कि सेना देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार तथा तत्पर है.
सेना ने अपने उच्च पेशेवर स्तर, कर्तव्य के प्रति समर्पण और असाधारण अनुशासन से आदर्श स्थापित कर देश में लोकतंत्र को मजबूत बनाने में योगदान दिया है. जब-जब देश में सांप्रदायिक सद्भावना बिगड़ी है सेना ने अपने तटस्थ और धर्म निरेपक्ष चरित्र से एकता और सद्भावना को बनाये रखा है. सेना ने यह मुकाम राजनीति से दूर पूरी तरह तटस्थ और पेशेवर रहकर हासिल किया है. भारतीय सेना 22 जुलाई 1950 को अधिसूचित सेना अधिनियम 1950 से बंधी है और उसने कभी इस अधिनियम के दायरे से बाहर जाकर काम नहीं किया और आदर्श तथा अनुशासन की मिसाल पेश की है.
भारतीय सेना का चरित्र पूरी तरह से धर्म निरपेक्ष और तटस्थ है तथा उसने देश की सुरक्षा के अपने कर्तव्य का निर्वहन कर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दिया है. सेना ने सरकार को राष्ट्र का विकास करने और उसे प्रगति के पथ पर अग्रसर करने का स्वतंत्र माहौल दिया है. भारत और पाकिस्तान की मौजूदा स्थिति से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों देशों की सेना की भूमिका क्या रही है. पाकिस्तान की सेना के सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप के कारण आज पाकिस्तान को विफल राष्ट्रकरार दिया जाता है जबकि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली का दुनिया भर में डंका बज रहा है. यह इस बात का उदाहरण है कि कोई सेना संविधान के अनुसार किसी देश की नींव को मजबूत कर सकती है या उसे खोखला कर सकती है. 
कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि भारतीय सेना की राष्ट्र निर्माण में भूमिका प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से शुरू हुई थी क्योंकि इसमें एक भारतीय सैनिक ने ही विदेशी शासन के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था. यह घटना आजादी के समूचे संग्राम के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत रही. आजादी से पहले लार्ड वॉवेल ने कहा था कि भारतीय सेना की स्थिरता भारत के भविष्य के लिए निर्णायक रहेगी. आजादी के बाद भारतीय सेना की बदौलत ही हठी रियासतों को देश में मिलाया जा सका. सेना ने इसके लिए अभियान चलाये. सेना ने 1961 में अभियान चलाकर गोवा, दमण और दीव को मुक्त कराया तथा राष्ट्र के विदेशियों से छुटकारा दिलाया.  
भारत की भौगोलिक स्थिति, दुर्गम क्षेत्र, विविधतापूर्ण संस्कति, धर्म और भाषा समूचे देश को एक सूत्र में बांध कर रखने की चुनौती को और कठिन बनाती है. भारतीय सेना ने जरूरत पडऩे पर दंगा प्रभावित क्षेत्रों में सद्भावना सुनिश्चित कर शांति बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. सेना ने पिछले सात दशकों में देश की सीमाओं की रक्षा के लिए दो पड़ोसियों के साथ तीन बड़ी लड़ाइयां लड़ी और दो सीमित युद्ध लड़े.
आंतरिक मोर्चे पर भी जम्मू-कश्मीर तथा पूर्वोत्तर में सेना की महत्वपूर्ण् भूमिका रही है. विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में उसने परोक्ष युद्ध का बखूबी सामना किया है और नागरिक प्रशासन को उसके संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने में सहयोग दिया है. सेना ने सीमा पार से आतंकवाद के दंश का भी दृढ़ता से मुकाबला किया है और जम्मू-कश्मीर के लोगों को स्वतंत्र तथा भयमुक्त माहौल दिया है. इसी का परिणाम है कि अब राज्य के युवा खेलों के साथ-साथ नौकरशाही तथा अन्य क्षेत्रों में परचम लहरा रहे हैं. सेना राज्य के स्कूली बच्चों के लिए विशेष सद्भावना कार्यक्रम चलाती है और इन बच्चों को देश की एकता के सूत्र में पिरौने के लिए इन्हें देश के अलग अलग हिस्सों में सद्भावना टूर पर ले जाती है.
भारतीय सेना देश में ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ रही है. वह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के एक जिम्मेदार देश के नाते वैश्विक शांति के भारत के प्रयासों में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है. उसने जरूरत पडऩे पर देश ही नहीं विदेशाों में भी लोकतंत्र की जड़े मजबूत करने के लिए सहयोग और हस्तक्षेप किया है. मालदीव में 1988 में भारतीय सेना ने लोकतांत्रिक सरकार के समर्थन में हस्तक्षेप किया. भारत ने मित्र देश मालदीव के अनुरोध पर वहां सैन्य हस्तक्षेप किया जिससे क्षेत्र में उसकी स्थिरता बनाये रखने में मदद्गार की पहचान बनी.
भारतीय सेना ने इसी तरह आंतरिक संघर्ष से जूझ रहे श्रीलंका में भी शांति स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
भारत के वैश्विक शांति के प्रयासों को मूर्त रूप देने में भी सेना का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और वह संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के विभिन्न मिशनों में सबसे अधिक हिस्सेदारी करने वाली सेनाओं में शामिल है. भारतीय सेना ने पिछले 7 सालों में संयुक्त राष्ट्र के 43 मिशनों में 90000 से अधिक सैनिकों को भेजा है अभी भारत के लगभग 7000 सैनिक संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न मिशनों में तैनात हैं. भारतीय सैनिकों ने अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और शांति की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र के बेहद खतरनाक मिशनों में धैर्य, संयम और बहादुरी के साथ काम कर आदर्श प्रस्तुत किया है. साथ ही सरकार के राजनयिक प्रयासों में बराबर का भागीदार बनते हुए सेना ने अनेक देशों की सेनाओं के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाया है और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने में मदद की है. इससे भारत को दुनिया भर में पहचान तथा सम्मान मिला है.
देश की सीमाओं की सुरक्षा तथा आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी के साथ-साथ सेना किसी भी तरह की आपदा की स्थिति में भी बचाव तथा राहत अभियानों में सबसे आगे रहती है. गुजरात, उत्तरकाशी तथा पड़ोसी देश नेपाल में भूकंप, सूनामी, चक्रवाती तूफानों और केदारनाथ आपदा के साथ-साथ समय पर बाढ़ से जूझने वाले राज्यों में सेना के बचाव अभियानों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. आकस्मिक स्थिति में कहीं पुल बनाना हो या कोई और व्यवस्था करनी हो तो भी सेना को ही याद किया जाता है. 
इसीलिए भारत में सैनिकों को बड़ा सम्मानपूर्ण और गौरवपूर्ण दर्जा दिया गया है और महान कवि माखनलाल चतुर्वेदी की निम्न पंक्तियां इसका उदाहरण है जिसमें पुष्प भी अपनी अभिलाषा बताते हुए कहता है कि यदि उसे शहादत के लिए जाने वाले सैनिकों के पथ पर फेंका जाये तो उसका जीवन सफल हो जायेगा. पुष्प की अभिलाषा :-
चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढूं भाग्य पर इठलाऊँ.
मुझे तोड़ लेना वनमाली.
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जावें वीर अनेक
लेखक यूनीवार्ता के विशेष संवाददाता हैं