विशेष लेख


Volume-44, 27 January-2 February, 2017

 
स्वच्छ भारत मिशन और युवा

युगल जोशी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन ने राष्ट्र का ध्यान आकर्षित किया है. केंद्र, राज्यों, जिलों और पंचायतों में प्रेरक नेतृत्व की बदौलत तीन वर्ष पहले की तुलना में आज स्वच्छता कवरेज को लगभग दोगुना करना संभव हो गया है. कारगर  संचार, आयोजना और कार्यान्वयन, कड़ी समीक्षाओं, व्यवहार बदलने के लिए प्रमाणित प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल और स्थानीय नवाचारों की बदौलत 5.94 करोड़ शौचालयों का निर्माण और उनका इस्तेमाल संभव हुआ है. स्वच्छ भारत मिशन 2 अक्तूबर, 2019 तक भारत को खुले में शौच जाने से मुक्त बनाने का अपना निर्धारित लक्ष्य हासिल करने की दिशा में तत्पर है.
2014 में जो लक्ष्य लगभग असंभव दिखता था, जब 60 करोड़ भारतीय खुले में मल त्याग करते थे, वह आज हासिल होता नजर आ रहा है. 300 से अधिक जिलों, तीन लाख गांवों, दस राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को खुले में शौच जाने की प्रवृत्ति से मुक्त किया जा चुका है और खुले में मल त्याग करने वाले लोगों की संख्या घट कर करीब 25 करोड़ रह गई है. यह पुनीत कार्य देश भर में सैंकड़ों जिलों में फैली महिला चैम्पियनों और युवा  सरपंचों, स्वच्छता स्वयं सेवकों, जिन्हें स्वच्छाग्राही कहा गया है, स्वच्छ भारत प्रेरकों और हजारों प्रेरित युवाओं के प्रयासों की बदौलत संभव हो पाया है. यह ठीक ही कहा गया है कि
बलवानार्थ नास्त्युत्साहात्परमबलम.
सौत्साहस्य चलोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम..
(अर्थात् उत्साह व्यक्ति को शक्तिशाली बनाता है. उत्साह से बड़ी शक्ति कोई नहीं है, उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी असंभव नहीं है).
हर रोज हमें गांवों से अनेक ऐसी कहानियां सुनने को मिल रही हैं कि किसी युवक या युवती ने अपने परिवार या अपने गांव वालों को शौचालय बनाने और इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया. स्थानीय जरूरतों के मुताबिक शौचालय बनाने की नवीन प्रौद्योगिकी विकसित करने में युवाओं ने अग्रणी भूमिका अदा की है. इनमें अरुणाचल प्रदेश में बांस के चूषणगर्त अथवा तमिलनाडु में सेल्फ क्लीनिंग यानी स्वयं स्वच्छ होने वाले स्कूली शौचालय शामिल हैं. देश के ग्रामीण क्षेत्रों अथवा शीर्ष प्रौद्योगिकी संस्थानों से सैंकड़ों युवाओं ने पहली बार आयोजित स्वच्छतोन कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जिसमें ग्रामीण स्वच्छता में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी विषयक नवाचारों पर बल दिया गया. केंद्र के स्तर पर, युवा सहायक सचिवों ने अपनी प्रथम नियुक्ति पर इस अखिल भारतीय  प्रतियोगिता का संचालन किया. 
जिला कलेक्टरों और राज्य मिशन निदेशकों को स्वच्छता गतिविधियों की योजना बनाने और उन पर निगरानी रखने में मदद करने के लिए तथा कार्यक्रम के प्रति स्थानीय स्तर पर ध्यान केंद्रित करने और उत्साह बनाए रखने के लिए यह महसूस किया गया कि प्रमुख इंजीनियरी या प्रबंधन संस्थानों अथवा विश्वविद्यालयों से ऐसे युवा शिक्षित स्नातकों को इस कार्यक्रम में शामिल किया जाए, जो जिला स्तर पर समय दे सकें और अपनी ऊर्जा इस काम में लगा सकें.  पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने टाटा न्यासों के साथ मिल कर यह कमी दूर की और अब करीब पांच सौ स्वच्छ भारत प्रेरक जिला प्रशासन के साथ मिल कर काम कर रहे हैं ताकि जिलों को खुले में शौच जाने से मुक्त कराया जा सके.
यदि आप ऐसे गांवों में जाएं, जहां अभी भी खुले में शौच जाने की प्रवृत्ति बनी हुई है, तो सूर्यास्त से काफी पहले आपको निगरानी समितियों के ऐसे युवा सदस्य दिखाई देंगे, जो ग्रामवासियों को शौचालयों के इस्तेमाल के फायदों और खुले में शौच जाने के नुकसान बता रहे होंगे. इन स्वयं सेवकों को स्वच्छाग्राही कहा गया है. ये युवक और युवतियां अपने-अपने गांवों और पंचायतों को खुले में शौच जाने की बुराई से मुक्त कराने के प्रति वचनबद्ध हैं. इन्हें स्वच्छ भारत की रीढ कहना उचित होगा. वर्तमान में इन युवाओं की संख्या करीब 3.5 लाख है. ये युवा ग्रामवासियों को इस बात के लिए तैयार करते हैं कि वे अपने घर में शौचालय बनवाएं. वे उन्हें स्वास्थ्य और सफाई के बीच घनिष्ठ संबंध के बारे में शिक्षित करते हैं, खुले में शौच जाने संबंधी जोखिमों के संदर्भ में महिला सुरक्षा और तकलीफों के मुद्दों पर चर्चा करते हैं तथा शौचालयों का निर्माण कराने में उनकी सहायता करते हैं. स्वच्छाग्राही स्थानीय प्रशासन और ग्रामवासियों के बीच एक सेतु का काम कर रहे हैं. उनमें से अधिकतर स्थानीय गांवों से सम्बद्ध होते हैं, अत: वे स्वच्छता के मुद्दों पर ग्रामवासियों के भरोसेमंद मित्रों के रूप में काम करते हैं. मंत्रालय की योजना है कि भारत के प्रत्येक गांव में कम से कम एक स्वच्छाग्राही उपलब्ध कराया जाए. इस तरह 6.5 लाख स्वच्छता स्वयंसेवकों की एक प्रतिबद्ध टीम तैयार की जाएगी. गांवों को खुले में शौच जाने से मुक्त कराने के साथ-साथ यह भी जरूरी होगा कि ठोस और तरल संसाधनों का समुचित प्रबंधन किया जाए.
यहां यह चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि लाखों युवा स्वच्छ शक्ति (स्वच्छता प्रयासों में महिलाओं के भूमिका अदा करने के लिए प्रेरित करना), सत्याग्रह से स्वच्छाग्रह, खुले में शौच से मुक्ति सप्ताह (स्वतंत्रता दिवस से एक सप्ताह तक, जिसमें खुले में शौच जाने से मुक्ति पर ध्यान केंद्रित किया गया), स्वच्छ संकल्प से स्वच्छ सिद्धि (स्वच्छता के प्रति समर्पित पखवाड़ा), स्वच्छता ही सेवा जैसे मंत्रालय के कार्यक्रमों और अन्य कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं. स्वच्छ भारत मिशन एक बेजोड़ कार्यक्रम है और मानव मात्र के इतिहास में व्यवहार में परिवर्तन लाने का सबसे बड़ा कार्यक्रम है. इस कार्यक्रम में लाखों युवाओं की भागीदारी ने इसे एक विशाल यज्ञ बना दिया है. उदाहरण के लिए दस करोड़ से अधिक लोगों ने स्वच्छता ही सेवा कार्यक्रम में हिस्सा लिया और उनमें अधिसंख्य युवा थे. 7,40,000 से अधिक एनसीसी कैडेटों और 1,57,000 अद्र्ध-सैनिक जवानों ने कार्यक्रम में प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा लिया. मंत्रालय ने जागरूकता बढ़ाने के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की थी, जिसमें 2.89 करोड़ पेंटिंग्स, 2.8 करोड़ निबंध और करीब 3 लाख लघु फिल्में प्राप्त हुईं.
समूचे भारत में लाखों युवा सरपंचों, स्वयं सेवकों, सामाजिक संगठनों, खेल जगत से जुड़ी विभूतियों, कलाकारों और फिल्म अदाकारों ने अपने को स्वच्छ भारत मिशन के साथ जोड़ा. कुछ वर्ष पहले किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि खुले में शौच पर आधारित एक अभियान चलाया जा सकता है और शौचालय की जरूरत 200 करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार प्रदान कर सकती है. लेकिन यह हुआ है. युवाओं ने टीवी चैनलों द्वारा चलाए गए दिन भर के स्वच्छता कार्यक्रमों में उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया. स्वच्छता चैम्पियनों, विख्यात व्यक्तियों या सामान्य जनों ने अपनी-अपनी तरह से जहां कहीं वे स्वच्छ भारत बनाने में योगदान कर सकते थे, तदनुरूप उन्होंने विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लिया.
ऐसी अनेक कहानियां सामने आईं, जहां भाइयों ने अपनी बहनों के लिए शौचालय बनवाए या फिर नव-विवाहिताओं ने पति के घर में प्रवेश से पहले शौचालय बनवाने की शर्तें रखीं, या फिर विकलांग महिलाओं ने अपने गांवों को खुले में शौच जाने से मुक्त बनाने के लिए प्रेरित किया. ये सब कहानियां सामान्य रूप में दिखाई दीं. उदाहरण के लिए एक नव-विवाहिता अनजानी मल्लाह की कहानी सामने आई. संत कबीर नगर जिले के गांव मेदरापार में जब वह ब्याह कर आई, तो उसने देखा कि ससुराल में शौचालय नहीं है. उसे खुले में शौच जाने की पीड़ा झेलनी पड़ी. उसने स्थानीय महिलाओं को एकजुट किया और उनके साथ प्रशासन की मदद से 150 शौचालयों के निर्माण में गांव वालों की मदद की. सामान्य जनों के ऐसे प्रयासों ने स्वच्छ भारत मिशन को जन आंदोलन का रूप दे दिया.
युवाओं के दलों द्वारा सार्वजनिक स्थलों से कचरा साफ  करने अथवा युवा नगर आयुक्तों द्वारा महत्वपूर्ण स्थलों को स्वच्छ बनाने या फिर गांवों में युवाओं द्वारा मिल कर शौचालयों का निर्माण करने और उसके बदले प्रोत्साहन राशि लेने से इन्कार करने की अनेक कहानियां समूचे ग्रामीण भारतीय परिदृश्य में दोहराई गईं. वे सभी इस तथ्य के प्रति समान रूप से सजग नजर आए कि ठोस और तरल कचरे का प्रबंधन एक अन्य बड़ी चुनौती है, जिसका शीघ्र और सक्षम समाधान करना जरूरी है. अभी तक यह देखा गया है कि भारतीय युवाओं ने देश को स्वच्छ बनाने के प्रधानमंत्री के आह्वान के प्रति गहन रुचि  प्रदर्शित की है. 2014 में स्वच्छता कवरेज मात्र 39 प्रतिशत थी जो अब बढ़ कर 76 प्रतिशत हो गई है. युवाओं के सामने चुनौती सिर्फ  शौचालय कवरेज प्रतिशत बढ़ाने और उनका इस्तेमाल करने की ही नहीं है, बल्कि आने वाले समय में उन्हें स्वच्छ और चालू हालत में बनाए रखने की भी है.
(लेखक पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय में निदेशक  हैं ईमेल आईडी: yugal.joshi@gov.in)