विशेष लेख


Volume-3, 21-27April, 2018

 

धरती को बचाने की मुहिम

मदन जैड़ा

हमारी संस्कृति एवं सभ्यता में धरती को माता से भी बढक़र माना गया है. संस्कृत का एक श्लोक इसे परिलक्षित करता है- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी.हमारे देशवासी धरती ही नहीं संपूर्ण प्रकृति के भी पूजक हैं. पृथ्वी के विभिन्न स्वरूपों जिसमें पेड़-पौधे, नदी-तालाब, मिट्टी-पत्थर, पशु-पक्षी आदि शामिल हैं, की पूजा होती है. इसलिए आज पृथ्वी और उस पर मंडरा रहे आसन्न संकट को लेकर आम लोग ही नहीं बल्कि सरकार भी संवेदनशील है. जलवायु परिवर्तन के रूप में पृथ्वी पर मंडरा रहे खतरे पर कई शोध संस्थानों ने अपनी रिपोर्टे दी हैं. ये अध्ययन बताते हैं कि यह संकट सिर्फ मानव जाति के लिए ही नहीं बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले हर जीव और पादप के लिए भी है. इन खतरों के मद्देनजर पृथ्वी को बचाने की एक व्यापक मुहिम शुरू हुई है.

पृथ्वी के प्राकृतिक पर्यावरण को बनाए रखने तथा उससे जुड़े सुरक्षा उपायों को अमल में लाने के लिए विश्व भर में २२ अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जाता है इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने १९७० में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप की थीं. अब प्रति वर्ष इसे १९२ से अधिक देशों में मनाया जाता है. विश्व पृथ्वी दिवस पर हमें यह बात फिर से स्मरण करनी होगी कि यदि मानव जाति का कल्याण चाहिए तो सबसे पहले हमें धरती को बचाना होगा. वर्ना जिस प्रकार पूर्व में कई मानव सभ्यताएं लुप्त हुई थीं, वैसी ही स्थिति आने वाले वर्षों में फिर आ सकती है. इतिहास गवाह है कि चार हजार साल पूर्व भी पृथ्वी के बिगड़ते पर्यावरण और जलवायु के कारण मेडिटेरियन सागर से सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया तक फैली कांस्य युग की कई सभ्यताएं धीरे-धीरे लुप्त हो गईं. माया सभ्यता भी जलवायु परिवर्तन की भेंट चढ़ी. हम इतिहास में ज्यादा दूर न भी जाएं तो ताजा उदाहरण एशिया के खामेर साम्राज्य का है. प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुध दोहन के कारण इसका नामोनिशां मिट चुका है.

इस बार की थीम-प्लास्टिक प्रदूषण से मुक्ति

पृथ्वी दिवस की इस बार की थीम है, प्लास्टिक प्रदूषण का अंत. धरती को प्रदूषण से बचाने के लिए इस बार के कार्यक्रमों का ताना-बाना प्लास्टिक की समस्या के इर्द-गिर्द ही रहेगा. लोगों को प्लास्टिक से होने वाले  प्रदूषण और अन्य स्वास्थ्य संबंधी नुकसानों से अवगत कराया जाएगा. संयुक्त राष्ट्र से लेकर विभिन्न संस्थानों द्वारा यह अभियान व्यक्तिगत स्तर पर लोगों को जागरूक करने, संस्थानों को प्रशिक्षित करने के लिए चलाया जाएगा.

दरअसल, प्लास्टिक के इस्तेमाल को लेकर पिछले काफी समय से चिंता प्रकट की जा रही है. पैकेजिंग के लिए प्लास्टिक को बेहद उपयुक्त माना गया है. इसलिए हाल के वर्षों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. लेकिन इसके इस्तेमाल के प्रति मानव व्यवहार बेहद निराशाजनक रहा है. खासकर भारत में. प्लास्टिक को लोग इस्तेमाल करने के बाद इधर-उधर फेंक देते हैं. पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार देश में रोजाना 15 हजार टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है. इसमें से नौ हजार टन को एकत्र करके प्रोसेस किया जाता है लेकिन छह हजार टन प्लास्टिक खुले में बिखरा रहता है. यह भी देखा गया है कि सफाई करने वाले इसे एकत्र करके खुले में जला देते हैं. या फिर ये नालियों, जल स्रोतों एवं नदियों में जमा हो जाता है और यहां तक की समुद्र में भी प्लास्टिक का कचरा पहुंच रहा है. नतीजा यह है कि प्लास्टिक का कचरा तेजी से बढ़ रहा है. यह मिट्टी, पानी में अपने आप नष्ट नहीं होता है. दूसरे रंग आदि की गफलत में पडक़र इसे जानवर खा लेते हैं, जिससे उन्हें शारीरिक नुकसान होता है.

देश में प्लास्टिक के इस्तेमाल को लेकर आंशिक प्रतिबंध है. कम से कम 50 माइक्रोन मोटी प्लास्टिक थैलियों की ही इस्तेमाल की अनुमति है. लेकिन इससे समस्या हल नहीं हुई है. सुरक्षित निपटान की कमी है. दूसरे, दूध, तेल समेत कई तरल पदार्थो की पैकेजिंग का कोई विकल्प अभी तक तैयार नहीं हो पाया है.

भारत जैसे विकासशील और विशाल आबादी वाले देश के लिए पृथ्वी और इसके संसाधनों का संरक्षण बेहद जरूरी है. केंद्र सरकार ने व्यापक अध्ययनों के बाद जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने और धरती को बचाने के लिए आठ क्षेत्रों की पहचान कर व्यापक कार्ययोजना आरंभ कर दी है. इनमें से कुछ पर बहुत अच्छा काम हो रहा है.  लेकिन कुछ पर अभी तेजी दिखाए जाने की जरूरत है. जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत भारत सरकार आठ मोर्चों पर एक साथ कार्य कर रही है जिसका मकसद धरती को हर हाल में बचाना है.

राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन

जलवायु परिवर्तन और धरती के गरमाने के कई कारणों में से एक कारण है ऊर्जा निर्माण के तौर-तरीके. हमारे देश में ज्यादातर ऊर्जा कोयले से तैयार होती है. कोयले पर निर्भरता 60 फीसदी तक है. इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है. इसलिए ऊर्जा की स्वच्छ तकनीकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है. हमारा देश एक उष्ण कटिबंधीय देश है जहां पर सूर्य रोज  8-10 घंटे चमकता है. इसकी धूप बेहद तेज होती है. साल में तकरीबन 300 दिन धूप निकलती है. इस ऊर्जा को फोटोवोल्टिक तकनीकों से समेटा जा सकता है. सूरज की ऊर्जा के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल के लिए सौर ऊर्जा मिशन शुरू किया गया है. इस दिशा में अच्छी प्रगति हुई है. अभी देश में करीब 23 हजार मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है. जिसे 2022 तक एक लाख मेगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है. भारत वैश्विक सौर गठबंधन का भी नेतृत्व कर रहा है. सौर ऊर्जा के क्षेत्र में एक अच्छी बात यह हुई है कि इसकी उत्पादन लागत तेजी से घट रही है. यह करीब ढाई रुपये यूनिट तक आ गई है जो कोयले और पानी से बनने वाली बिजली जैसी ही है. इसलिए आने वाले समय में सौर ऊर्जा धरती की सेहत के लिए तो अच्छी होगी ही, किफायती भी होगी. इसी प्रकार पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भी देश में अच्छा कार्य हो रहा है. स्वच्छ तकनीकों से कुल 1.75 लाख मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा गया है. अगले कुछ सालों में जैसे ही यह लक्ष्य हासिल होगा, तो कोयले से बिजली बनाने के प्रदूषित तरीके से मुक्ति मिलेगी.

राष्ट्रीय हरित मिशन

बढ़ते औद्यौगिकीकरण और घरों में ऊर्जा की बढ़ती खपत से ग्रीन हाउस गैसों खासकर कार्बन डाई आक्साइड का उत्र्सजन बढ़ रहा है. इसको कम करने के दो तरीके हैं. एक तो ऊर्जा की खपत कम हो. दूसरे, अधिक से अधिक पेड़-पौधे लगे हैं जो इन प्रदूषणकारी गैसों को चट कर जाएं. दोनों दिशाओं में कार्य शुरू हो गया है. उद्योगों में जहां हरित तकनीकों के इस्तेमाल से उत्र्सजन को कम से कम बढऩे दिया जा रहा है, वहीं वनीकरण बढ़ाने के लिए 13 हजार करोड़ रुपये का हरित मिशन शुरू किया गया है. मिशन के तीन लक्ष्य हैं. वनीकरण को बढ़ाना, वनों की गुणवत्ता का सुधारना तथा वनों के आसपास रहने वाले लोगों की वन आधारित पारिवारिक आय में इजाफे के उपाय सुनिश्चित करना.

इस योजना के क्रियान्वयन से वनों का विस्तार होगा. यदि वन बढ़ेंगे तो वे ज्यादा कार्बन डाई आक्साइड सोखेंगे. लक्ष्य यह है कि कार्बन डाई आक्साइड सोखने की क्षमता को 2020 तक बढ़ाकर 50-60 करोड़ टन किया जाएगा. अभी देश में करीब 11.25 फीसदी ग्रीनहाउस गैसों को जंगल सोख रहे हैं या यू कहें कि 13.8 करोड़ टन कार्बनडाई आक्साइड जंगल चट कर जाते हैं. यह उत्सर्जन उतना ही है जितना भारत में 1993-94 के दौरान होता था.

हरित मिशन के तहत अगले दस सालों में 40 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि पर वनीकरण किया जाएगा. केंद्र सरकार ने कैंपा फंड जो विकास योजनाओं के दौरान पेड़ काटे जाने पर क्षतिपूर्ति के तौर पर एजेंसियां जमा करती हैं, के इस्तेमाल के लिए पिछले साल कानून भी पारित किया है. इस मद में करीब 42 हजार करोड़ रुपये जमा हैं. हर साल तीन हजार करोड़ रुपये इसमें और जमा हो रहा है. इसे अब वनीकरण पर खर्च करने का रास्ता साफ हो गया है. इससे भी वनों को विस्तार मिलेगा. देश में तीन तरह के वन हैं. अति सघन, मध्यम सघन और छितरे वन. छितरे वनों जिनमें झाडिय़ां आदि होती हैं, उन्हें घने वनों में तब्दील करना भी सरकार की प्राथमिकता में है. ज्यादा क्षेत्रफल छितरे वनों का है. करीब 23 फीसदी भू भाग पर वन हैं जिन्हें 33 फीसदी तक करने का लक्ष्य है.

राष्ट्रीय संवर्धित ऊर्जा बचत मिशन

स्वच्छ तकनीकों से ऊर्जा पैदा करने के साथ-साथ ऊर्जा की बचत और संवर्धन पर भी कार्य शुरू किया गया है. नई तकनीकों के जरिये ऊर्जा की खपत में कमी लाई जा रही है. पिछले तीन सालों के दौरान सरकार ने किफायती दरों पर 26 करोड़ से भी अधिक एलईडी बल्ब वितरित किए हैं. एलईडी वल्ब पांच या दस वाट के होते हैं, जिसमें बिजली का खर्च कई गुना घट जाता है. इसी प्रकार ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 के तहत ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिसिएंसी की स्थापना की गई है. यह अभिकरण ऊर्जा में कमी लाने के कानूनी प्रावधान सुनिश्चित करता है. अगले दो सालों में इसके तहत ऊर्जा की खपत में बीस हजार मेगावाट तक की कमी का लक्ष्य है. इस दिशा में शुरू की गई कुछ अन्य पहल निम्न हैं;

*ऊर्जा बचत के प्रमाणीकरण के माध्यम से अधिक ऊर्जा खपत वाले उद्योगों में ऊर्जा बचत संबंधी सुधारों के लिए एक बाजार तंत्र विकसित करना जिसे कार्बन ट्रेडिंग कहते हैं. इसमें ऊर्जा बचत का व्यापार किया जाता है.

*ऊर्जा की बचत करने वाले उपकरणों को प्रयोग करने में तेजी लाने के उपाय. इसके तहत कम बिजली खपत वाले उपकरणों को बढ़ावा दिया जाता है. ऐसे उपकरणों के लिए स्टार रेटिंग की व्यवस्था की गई है.

*ऐसा तंत्र तैयार करना जो भावी ऊर्जा बचत अभिग्रहण द्वारा सभी सेक्टरों में वित्त मांग प्रबंधन कार्यक्रमों में सहायता करेगा.

*ऊर्जा बचत को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय साधन विकसित करना.

*सौर ऊर्जा चालित उपकरणों का विकास.

राष्ट्रीय सतत परिवास मिशन

ऊर्जा की बड़ी खपत भवनों में होती है. मिशन का लक्ष्य यह है कि उसे कैसे कम किया जाए. इसके साथ ही भवनों से निकलने वाला अपशिष्ट मिट्टी, नदी, तालाबों को दूषित करता है इसलिए उसका बेहतर प्रबंधन होना चाहिए. इसके तहत तीन किस्म की पहलें शुरू की जा रही हैं.

नए सरकारी भवनों में ऊर्जा संरक्षण के उपायों को अनिवार्य किया जा रहा है. नए भवन कोड बनाए गए हैं. भवनों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि जिनमें ऊर्जा की खपत कम हो. ऐसे भवनों को हरित भवन कहा जाता है. निजी क्षेत्र को भी हरित भवन बनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.

द्य भवनों से उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट के पुनर्चक्रण के उपाय किये जा रहे हैं. हमारे देश में अपशिष्ट के पुनर्चक्रण की दर बेहद कम है. इसलिए मिशन के तहत अपशिष्ट के पुनर्चक्रण से ऊर्जा का भी उत्पादन दिया जाएगा. दोनों फायदे होंगे जहां अपशिष्ट का सुरक्षित प्रबंधन होगा वहीं ऊर्जा भी मिलेगी. इसके लिए नई प्रौद्यौगिकी का विकास और मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है. इसी में अपशिष्ट जल, सीवेज का पुनर्चक्रण भी शामिल है.

द्य सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाना भी इस मिशन का लक्ष्य है. इसके लिए जरूरी है कि शहरों का बेहतर नियोजन किया जाए ताकि सार्वजनिक परिवहन को ज्यादा से ज्यादा लोग इस्तेमाल करें.

राष्ट्रीय जल मिशन

जल संरक्षण, इसकी बर्बादी रोकने और इसकी उपयोगिता (एफिसिएंसी) बढ़ाने के लिए यह मिशन शुरू किया गया है. जल की बचत को 20 फीसदी तक बढ़ाकर उसके उपयोग का दायरा बढ़ा सकते हैं. मिशन के तहत जल के युक्ति संगत इस्तेमाल के लिए एक व्यापक फ्रेमवर्क बनाया जा रहा है. दरअसल, बढ़ती आबादी के लिए देश में स्वच्छ पेयजल बड़ी चुनौती बन रहा है. धरती के तापमान में गर्मी का सबसे ज्यादा असर जल स्रोतों पर भी पड़ रहा है. गर्मियों में स्रोत सूख जाते हैं. नदी, तालाबों में भी पानी घट जाता है. ऐसे में मौजूदा संसाधनों का बेहतर प्रबंधन ही राहत दिला सकता है.

सतत कृषि

इस मिशन का लक्ष्य कृषि को जलवायु परिवर्तन से निपटने में सक्षम बनाना है. जैसा कि जलवायु परिवर्तन के चलते गर्मियों में पहले से ज्यादा गर्मी हो रही है, तो सर्दियों में कभी ज्यादा सर्दी पड़ती है और कभी सर्दी पड़ती ही नहीं. इसी प्रकार कहीं ज्यादा बारिश हो रही है तो कहीं कम. यह पहले पता नहीं होता. ऐसे में चुनौती यह है कि हम ऐसी फसलें विकसित करें जो अधिक या कम गर्मी, बारिश या सर्दी झेलने में सक्षम हों. हमारे देश में कभी सूखे से फसलें तबाह होती हैं तो कभी अतिवृष्टि से. कभी बारिश देर से होती तो कभी बेमौसम. लेकिन भविष्य में वैज्ञानिक ऐसी फसलें तैयार कर इस चुनौती का मुकाबला करेंगे जो सूखा और अतिवृष्टि झेल सकें. साथ ही कम समय में तैयार हो सकें.

रणनीतिक ज्ञान मिशन के तहत नई तकनीकें

इस मिशन का मकसद है कि ऐसे वैज्ञानिक अनुसंधान किए जाएं जो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रौद्यौगिकी तैयार कर सकें. दरअसल, जलवायु परिवर्तन से निपटने वाली तकनीकें ज्यादातर विकसित देशों के पास हैं जो वे गरीब और विकासशील देशों को निशुल्क देने को तैयार नहीं. ऐसे में भारत समेत तमाम देशों के समक्ष चुनौती यह है कि वे खुद अपनी जरूरत के हिसाब से ऐसी तकनीकें विकसित करें. दूसरे, उन्हें जलवायु परिवर्तन के दूरगामी प्रभावों के भी अध्ययन करने होंगे ताकि उससे बचाव के अन्य उपाय भी किए जा सकें. जहां बचाव संभव नहीं हो तो खतरों को न्यूनतम कर सकें. हाल में सीएसआईआर के वैज्ञानिकों ने एक सोलर ट्री बनाया है जिसमें सोलर पैनल लगे होते हैं. सोलर पैनल लगाने के लिए जगह की समस्या आती है. यह उसका समाधान है. इसी प्रकार हाल में सौर ऊर्जा से चालित पंप, वाटर प्यूरीफायर आदि भी विकसित किए गए हैं.

चार योजनाएं जो बचाएंगी धरती को

सरकार के विभिन्न मंत्रालयों द्वारा शुरू की गई चार योजनाएं ऐसी हैं जो लोगों का जीवन तो बेहतर बना रही हैं लेकिन धरती की बिगड़ी सेहत को भी बचाएंगी. जैसे उज्ज्वला योजना के तहत गरीबों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन दिए जा रहे हैं. तीन करोड़ से ज्यादा लोगों को दी जा चुकी है. जहां लोगों को चूल्हा जलाने से राहत मिलेगी वहीं लकड़ी जलाने से पर्यावरण को होने वाला नुकसान भी रुकेगा. पेड़ भी कम कटेंगे और धुआं भी नहीं निकलेगा. इसी प्रकार सौभाग्य योजना है जिसमें गरीब परिवारों को मुफ्त बिजली कनेक्शन दिया जाता है. तीन करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों को इसमें शामिल किया जा चुका है. फायदा यह है कि लोगों को उजाले के लिए केरोसिन नहीं जलाना पड़ेगा जो उनके खुद के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है. इसी प्रकार एलईडी बल्ब योजना है जिसका जिक्र पहले कर चुके हैं. इससे ऊर्जा की खपत घट रही है. चौथी योजना फसलों के अवशेष जलाने से जुड़ी है जिसके लिए सरकार मशीनें लगा रही है ताकि खुले में अवशेष जलाकर धरती को प्रदूषित नहीं किया जाए.

इलेक्ट्रिक कार और भारत-6

हाल में सरकार ने इलेक्ट्रिक कारों को बढ़ावा देने की योजना शुरू की है. सरकारी महकमों में इलेक्ट्रिक कारों को खरीदा जा रहा है. तेजी से इलेक्ट्रिक कार की कीमतें घट रही हैं. इससे पेट्रोल से निर्भरता कम होगी तो प्रदूषण कम होगा. दूसरे, सरकार ने भारत-6 मानकों को भी लागू किया है. अभी भारत चार मानक लागू थे जिसके बाद सीधे भारत-6 मानक लागू हुए हैं. धरती को बचाने के लिए यह भी एक अहम पहल है.

आम लोगों की भूमिका

धरती को बचाने के लिए आम लोगों की भूमिका अहम है. सरकार के प्रयास तब तक सफल नहीं हो पाएंगे जब तक उनमें आम लोगों की भागीदारी नहीं होगी. वह एलईडी हो, वनों की सुरक्षा की बात हो या स्वच्छ ईंधन की. लोगों को इन्हें अपनाना चाहिए. दूसरे, वह अपनी ऊर्जा की जरूरतों को घटाएं. इसके कम ऊर्जा खर्च करने वाले उपकरण खरीदें, सार्वजनिक परिवहन का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें. पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले कदमों से तौबा करें.

लेखक: हिन्दुस्तानके ब्यूरो चीफ हैं, ई-मेल: m_jaira@hotmail.com

छायाचित्र: गूगल से साभार