विशेष लेख


Volume-13

मादक पदार्थ दुरूपयोग और अवैध तस्करी विरोधी अंतर्राष्ट्रीय दिवस, 26 जून
इस ख़तरे से निपटने के लिये एकजुट होने का समय

विष्णुप्रिया पांडेय

‘‘मादक पदार्थ किसी व्यक्ति को विनाश के मार्ग पर ले जाते हैं. इसका अंत तबाही के सिवाय कुछ नहीं है. यह एक महान चिंता का विषय है और इस पर पूरा ध्यान देने की ज़रूरत है.’’ -प्रधानमंत्री
मादक पदार्थों का दुरूपयोग स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है, जिसका आज दुनिया सामना कर रही है. यह एक मनो-सामाजिक बुराई भी है, जो कि सामाजिक धब्बे के अलावा चोरी, अपराध और हिंसा जैसे समाज विरोधी व्यवहार को जन्म देती है, और इस तरह, समाज के महत्व को नष्ट करती है और इसका संपूर्ण पतन कर देती है. मादक पदार्थ बड़ी मात्रा में बेहिसाब धनराशि का सृजन करते हैं जिससे देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर पड़ता है, जिसका आमतौर पर आतंकवाद और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिये इस्तेमाल होता है और इस तरह यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं. इस गंभीर समस्या के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिये 26 जून  को हर साल नशीले पदार्थ दुरूपयोग और अवैध तस्करी विरोधी अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र ने दिसंबर, 1987 में यह दिन आम लोगों और विशेषकर युवाओं को नशीले पदार्थों के खतरे के प्रति संवेदनशील करने के वास्ते मनाने का फैसला किया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में आकाशवाणी पर अपनी मन की बातमें कहा था कि नशीले पदार्थ तीन बुराइयों यानी तीन डी‘-डार्कनेस, डिस्ट्रक्शन और डेवासटेशन अर्थात अंधकार, विनाश और तबाही लेकर आते हैं. उन्होंने कहा था कि नशीले पदार्थों का सेवन न केवल इसकी गिरफ्त में आने वाले व्यक्ति, बल्कि पूरे परिवार, समाज और राष्ट्र को बर्बाद कर देता है. उन्होंने नशीले पदार्थों के दुरूपयोग को एक बड़ी चिंता बताते हुए इस पर तत्काल ध्यान दिये जाने का आह्वान किया था.
नशीले पदार्थ के दुरूपयोग की परिभाषा
विश्व स्वास्थ्य संगठन मादक पदार्थों के दुरूपयोग को शराब और अवैध नशीली दवाओं सहित मनोसक्रिय तत्वों के हानिकारक अथवा खतरनाक इस्तेमाल के तौर पर परिभाषित करता है. मनोसक्रिय तत्व का इस्तेमाल निर्भरता सिंड्रोम-व्यावहारिक, पहचान और मनोवैज्ञानिक स्थिति उत्पन्न कर सकता है जो कि बार बार इस तत्व के इस्तेमाल के बाद विकसित होती है जिसमें मुख्यत: नशीले पदार्थ को ग्रहण करने की जबर्दस्त इच्छा होना, इसके इस्तेमाल पर नियंत्रण में कठिनाई, हानिकारक परिणामों के बावजूद इसके इस्तेमाल पर अड़े रहना, अन्य गतिविधियों और दायित्वों की अपेक्षा नशीले पदार्थ के इस्तेमाल को प्राथमिकता देना, सहिष्णुता में वृद्धि, और कई बार शारीरिक गिरावट की स्थिति उत्पन्न होने जैसी स्थितियां पेश आती हैं.  विश्व संस्था नशे की लत को मनोसक्रिय तत्व के बारबार उस मात्रा तक इस्तेमाल करने के तौर पर परिभाषित करती है जिसमें उपयोगकर्ता (एक नशेड़ी के तौर पर संदर्भित) आवधिक या गंभीर नशा करता है, लत वाले नशीले पदार्थ (पदार्थों) को ग्रहण करने की अनिवार्यता को दर्शाता है, नशीले पदार्थ को त्यागने या इसके इस्तेमाल में सुधार करने में कठिनाई महसूस करता है और किसी भी प्रकार से मनोसक्रिय तत्वों को हासिल करने के प्रति दृढ़निश्चयता दर्शाता है. नशे की लत होने के लक्षणों में भूख और वजन कम होना, रोज़मर्रा के कामकाज में मन न लगना, पसीना आना, आंखें लाल होना, बेहोशी अथवा उलटी होना और शरीर में दर्द, उदासी या नींद न आना और निष्क्रियता, अत्यधिक चिंता, अवसाद, मिजाज़ में परिवर्तन होना आदि शामिल है.
दुनिया भर में करीब 230 मिलियन लोग अवैध मादक पदार्थों जैसे कि कोकीन, कैनाबिस, हेलुसिनोजन्स, ओपियटस और सेटेटिव हिप्नोटिक्स का वर्ष में कम से कम एक बार इस्तेमाल करते हैं. यह आंकड़ा 15 से 64 वर्ष की आयु के बीच के 20 व्यक्तियों में से करीब 1 को दर्शाता है. इसी आयु वर्ग में 40 लोगों में से अनुमानत: 1 नशीले पदार्थ का सेवन महीने में कम से कम एक बार करता है और करीब 27 मिलियन लोग नशीले पदार्थों का सेवन इस तरह से करते हैं जो उनके लिये गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न कर देते हैं. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि अवैध नशीले पदार्थों के कारण दुनिया भर में करीब 2 लाख लोग मौत का शिकार होते हैं जिनमें अधिकतर 30 वर्ष की आयु के आसपास के होते हैं. अत: अवैध मादक पदार्थ का इस्तेमाल मुख्यत: आज की दुनिया में युवा दृष्टांत बन गया है जो कि किशोरावस्था के दौरान बढ़ता है और 18-25 वर्ष की आयु के व्यक्तियों के बीच शिखर पर होता है.
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार और नशीले पदार्थों तथा अपराध पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय द्वारा किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 70 मिलियन से अधिक नशेड़ी हैं और देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग प्रकार के नशीले पदार्थ प्रचलन में हैं. अध्ययन के अनुसार राजस्थान में सबसे अधिक अनुपात में अफीम का इस्तेमाल होता है, इसके बाद हरियाणा का नंबर है. जबकि हेरोइन का इस्तेमाल करने वाले 43 प्रतिशत लोग उत्तर प्रदेश में हैं. राज्यसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश में मादक पदार्थ अथवा शराब के कारण रोज़ाना करीब 10 आत्महत्याएं दजऱ् की जाती हैं. राष्ट्रीय अपराध अभिकलन ब्यूरो के अनुसार, 2014 में देश में ऐसी आत्महत्याओं के मामलों की संख्या 3647 थी. ऐसे मामले महाराष्ट्र में सर्वाधिक दर्ज किये गये, इसके बाद तमिलनाडु और केरल का स्थान है.
दुनिया में होने वाली मादक पदार्थों की जब्ती में भारत का हिस्सा 1.62 प्रतिशत है. हेरोइन और हशीश के सबसे बड़े उत्पादकों-स्वर्ण त्रिभुज (दक्षिणपूर्व एशिया) और स्वर्ण क्रीसेंट (अफगानिस्तान-पाकिस्तान तथा ईरान) से समीप्य भारत में मादक पदार्थों की तस्करी होने का प्रमुख कारण है, जिससे इसकी सीमाएं संवदेनशील हो गई हैं. इसके अलावा नेपाल गांजे का परंपरागत स्रोत है. इन क्षेत्रों में मादक पदार्थ तस्करों के लिये गंतव्य और ट्रांजिट रूट दोनों हैं. सीमा के आरपार नशीले पदार्थों की तस्करी के परिणामस्वरूप, पूर्वोत्तर, उत्तर और पश्चिमी हिस्सों से सटे पड़ोसी देशों से हमारे सीमावर्ती राज्य मादक आतंकवाद-आतंकी गुटों द्वारा धन जुटाने के लिये मादक पदार्थों की तस्करी के लिये प्रयुक्त शब्द, से प्रभावित हैं. इस धन का इस्तेमाल हत्याओं, उत्पीडऩ, अपहरण, बमविस्फोट, किडनैपिंग और सरकार का अवैध पदार्थों के प्रति अभियान से ध्यान बांटने के लिये सामान्य व्यवधान उत्पन्न करने के वास्ते किया जाता है.
मादक पदार्थ विरोधी भारत सरकार की पहलें
भारत के संविधान की राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 47 में राज्य को अवैध नशीले पदार्थ के इस्तेमाल के विरूद्ध आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है. इसमें कहा गया है, ‘‘ पोषण का स्तर और जीवन का स्तर बढ़ाने और जन स्वास्थ्य में सुधार का राज्य का कत्र्तव्य-राज्य अपने प्रमुख कत्र्तव्यों के बीच, अपने लोगों के पोषण के स्तर और रहन-सहन के स्तर को बढ़ाने और जन स्वास्थ्य में सुधार के प्रयास करेगा और विशेष तौर पर राज्य मादक पेय पदार्थों और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक पदार्थों का, औषधीय उपयोग को छोडक़र, उपभोग रोकने के लिये प्रयास करेगा.‘‘
भारत तीन संयुक्त राष्ट्र मादक समझौतों-1961 एकल नारकोटिक्स ड्रग्स समझौता (1961 समझौता), 1971 का मनोवैज्ञानिक पदार्थ समझौता (1971 समझौता) और 1988 का मादक पदार्थ
तथा मनोवैज्ञानिक पदार्थों की अवैध तस्करी का समझौता (1988 समझौता), का हिस्सा है. अवैध नशीले पदार्थों की समस्या से निपटने के लिये संसद ने नशीले पदार्थों पर एक व्यापक विधेयक के तौर पर मादक पदार्थ और मनोवैज्ञानिक तत्व अधिनियम 1985 को पारित किया जिसमें दोषियों के खिलाफ  कड़ी कार्रवाई और लंबी जेल की सजा तथा भारी जुर्माने की व्यवस्था है. यह अधिनियम अफीम अधिनियम और खतरनाक औषधि अधिनियम के स्थान पर लाया गया था. इसी तरह संसद ने नशीले पदार्थों और मनोवैज्ञानिक तत्वों की अवैध तस्करी रोकथाम अधिनियम, 1988 भी पारित किया.
भारत सरकार नशीले पदार्थों के इस्तेमाल की समस्या से बहु आयामी रणनीति के तहत निपटती है. मादक पदार्थों की अवैध आपूर्ति की रोकथाम के लिये प्रवर्तन एजेंसियां जैसे कि नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), नारकोटिक्स कंट्रोल डिवीजन, केंद्रीय उत्पाद कर एवं सीमा शुल्क विभाग, राजस्व निदेशालय, अद्र्ध सैनिक और सैन्य बलों आदि को लगाया गया है जबकि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के पास नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने, शिक्षित करने, इसकी पहचान और पुनर्वास करने की जिम्मेदारी है. यह नशीले पदार्थ की मांग को घटाने के लिये नोडल मंत्रालय के तौर पर काम करता है और मादक पदार्थों की रोकथाम के सभी पहलुओं की निगरानी करता है जिसमें समस्या की गंभीरता का मूल्यांकन, निवारक कार्रवाई, नशेडिय़ों का इलाज और पुनर्वास, सूचना का विस्तार और सार्वजनिक शिक्षण शामिल है. मंत्रालय स्वैच्छिक संगठनों के जरिये नशेडिय़ों की पहचान, इलाज और पुनर्वास के लिये समुदाय आधारित सेवाएं उपलब्ध करवाता है. यह नशे की रोकथाम और नशेडिय़ों के पुनर्वास के क्षेत्रों में कार्यरत गैऱ सरकारी संगठनों की गतिविधियों को समर्थन देता है. यह पंचायती राज संस्थानों, शहरी स्थानीय निकायों आदि को वित्त भी उपलब्ध करवाता है. मांग में कमी लाने के लिये मंत्रालय की रणनीति तीन स्तरीय है:-
क) नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में लोगों में जागरूकता फैलाना और शिक्षित करना.
ख) नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों के लिये प्रेरणादायक काउंसलिंग, उनकी पहचान, इलाज और पुनर्वास, तथा
ग) स्वयंसेवकों/सेवा प्रदाताओं और अन्य पणधारियों को प्रतिबद्ध और कुशल संवर्ग के निर्माण के दृष्टिगत प्रशिक्षण प्रदान करना.
मंत्रालय 1985-86 से शराब और नशीले पदार्थ के सेवन की रोकथाम की योजना, नशे की रोकथाम और नशे की लत वाले व्यक्तियों के इलाज और पुनर्वास के लिये संस्कृति-विनिर्दिष्ट मॉडल्स विकसित करने पर ज़ोर देने की योजना का कार्यान्वयन कर रहा है. मंत्रालय द्वारा हर साल सूचना के प्रसार, शिक्षा और संचार सामग्रियों के लिये जागरूकता सृजन कार्यक्रम संचालित किये जाते हैं. स्कूलों और समुदायों में प्रदर्शनियों के आयोजन और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन जैसे कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. वर्तमान में देश में मंत्रालय के सहयोग से नशे की लत वाले लोगों के लिये करीब 350 से 400 एकीकृत पुनर्वास केंद्र संचालित किये जा रहे हैं. ग़ैर पहुंच वाले क्षेत्रों में नियमित तौर पर नशा मुक्ति शिविर आयोजित किये जाते हैं. मंत्रालय ने नशा मुक्ति केंद्र संचालित करने वाले गैर सरकारी संगठनों के लिये क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण के लिये राष्ट्रीय समाज रक्षा संस्थान में मादक पदार्थ रोकथाम के लिये राष्ट्रीय केंद्र की स्थापना की है. इसके अलावा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भी जिला अस्पतालों में 122 नशामुक्ति केंद्रों की सहायता करता है.
2004 में, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और मादक पदार्थ तथा अपराध हेतु संयुक्त राष्ट्र कार्यालय ने संयुक्त रूप से भारत में मादक पदार्थ के दुरूपयोग की पद्धति और प्रवृत्तियों पर राष्ट्रीय सर्वेक्षण जारी किया. सर्वेक्षण की प्रमुख विशेषताएं हैं:-
*भारत में शराब, भांग और मादक पदार्थ नशे की लत के प्रमुख कारक हैं.
*पुरूर्षों और आम लोगों में नशीले पदार्थों के दुरूपयोग की अधिक प्रभावकारिता है.
*महिलाओं में नशीले पदार्थ सेवन की लत मौजूद है.
*नशीले पदार्थ के सेवन से महिलाओं पर महत्वपूर्ण खतरा और बोझ है.
*आश्रित उपयोगकर्ताओं की संख्या इलाज में नहीं होनामहत्वपूर्ण है.
*उच्च इस्तेमाल वाले इलाके मौजूद हैं.
*नशीले पदार्थ शहरों की समस्या है, एक मिथ्या है.
*ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आईडीयूज और अन्य उच्च जोखिम व्यवहार देखे जाते हैं.
*मादक पदार्थों के इस्तेमाल से महत्वपूर्ण स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बोझ उत्पन्न होते हैं.
*सेवा सुपुर्दगी में महत्वपूर्ण अंतर.
इसने सरकार के समक्ष भी समस्या से निपटने की चुनौतियां उत्पन्न कर दीं. इनमें कुछेक थीं:-
*संभावित इलाज चाहने वालों की सही संख्या (कार्य की मात्रा) चुनौतीपूर्ण है.
*इलाज में नामांकन में कमी और मौजूदा सेवाओं का कम उपयोग.
*उच्च इस्तेमाल वाले स्थानों और इलाज केंद्रों की उपलब्धता के बीच असंतुलन
*इलाज से पूर्व लंबी अवधि तक मादक पदार्थ का प्रयोग
*बहुत उच्च जोखिम व्यवहार
*नशे के इंजेक्शन लेना
अध्ययन की प्रमुख सिफारिशें थीं:
*नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों को इलाज के लिये आकर्षित करना
*प्रमुख व्यवहारों, समुदाय आधारित सेवाओं को जोडऩा
*वंचित वर्गों जैसे कि युवा, गली के बच्चों, महिलाओं, कैदियों आदि के लिये कार्यक्रम तैयार करना
*देखभाल करने वालों की कौशल वृद्धि. सेवा सुपुर्दगी में सुधार करना
*प्रगति की निगरानी के लिये समय-समय पर डाटा का संग्रह करना (बहु पद्धतियां, पैरामीटर और स्थल)
*गैर सरकारी संगठनों के प्रशिक्षण के जरिए जि़ला नशामुक्ति केंद्रों को जारी रखना.
*परामर्श वृद्धि (नशीले पदार्थ: इलाज कार्य)
*सबूत-आधारित कार्यों के लिये वित्तपोषण
देश में मादक पदार्थों के दुरूपयोग से प्रभावित लोगों की संख्या का पता लगाने के लिये मंत्रालय एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण संचालित कर रहा है. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के राष्ट्रीय ड्रग निर्भरता इलाज केंद्र द्वारा संचालित सर्वेक्षण के संपूर्ण परिणाम 2018 में आने की संभावना है. इसने हाल में नशीले पदार्थों की लत वाले लोगों के सफल पुनर्वास में सहायता के लिये एक राष्ट्रीय टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर-1800-11-0031 शुरू किया है. नवसृजित हेल्पलाइन नंबर सप्ताह में छह दिन प्रात: 9.30 बजे से सायं 6.00 बजे के बीच सहायता प्रदान करता है. सरकार ने मुख्यत: भारत में अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के साथ लगते राज्यों में जारी नशीले पदार्थों की तस्करी की समस्या पर अंकुश के लिये चार केंद्रीय मंत्रियों की एक संयुक्त समिति का गठन किया है जिसमें गृह, स्वास्थ्य, वित्त और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री शामिल हैं.
मंत्रालय ने मादक पदार्थ मांग कटौती हेतु एक राष्ट्रीय नीति का मसौदा तैयार किया है जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ राज्य सरकारों/संघ शासित प्रदेशों, मंत्रालयों और अन्य पणधारियों को शामिल किया गया है.
सरकार ने मादक पदार्थ मांग कटौती के लिये राष्ट्रीय नीति का मसौदा आरंभिक चरण में काउंसलिंग (नशे की लत वालों के लिये) सहित विभिन्न मुद्दों की देखरेख के लिये भी किया है. इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं:-
*सभी स्तरों पर शिक्षा और जागरूकता निर्माण
*इलाज और पुनर्वास (संपूर्ण व्यक्तित्व बहाली)
*सेवा प्रदाताओं की नेटवर्किंग
*कुशल मानवशक्ति के निर्माण के दृष्टिगत ड्रग क्षेत्र में सेवा प्रदाताओं का क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण
*डाटा संग्रह और प्रबंधन
*अंतर-क्षेत्रीय सहयोग और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
नीति में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा अन्य पणधारियों के साथ समन्वय में प्रदान किये जाने वाले इलाज/सुविधाओं के मानकीकरण के वास्ते नशामुक्ति केंद्रों के प्रमाणन की व्यवस्था करने का भी प्रस्ताव किया गया है.
जैसा कि दुनिया 26 जून को मादक पदार्थ दुरूपयोग और अवैध तस्करी के विरूद्ध अंतर्राष्ट्रीय दिवस इसके ख़तरे, जो कि मानवता के लिये एक प्रमुख उत्साह भंग करने वाला और विशेषकर युवाओं के स्वास्थ्य के लिये एक कारक बन गया है, के उन्मूलन के लिये पूरे जोश के साथ मनाने की तैयारी कर रहा है, युवा पीढ़ी को इस मनो-सामाजिक चिकित्सा समस्या से स्वयं को दूर रखने की शपथ लेनी चाहिये. उन्हें स्वामी विवेकानंद के इन शब्दों का पालन करना चाहिये-‘‘विचार करें, इसे अपना जीवन बनायें. इसका मंथन करें और इसके बारे में सपना लें. इसे अपने सपनों का अभिन्न भाग बनाएं. इससे अपने मन, मस्तिष्क, नसों और शरीर के प्रत्येक अंक का हिस्सा बनाएं और सब कुछ भूल जाएं’’. सरकार, समाज और युवाओं का संयुक्त प्रयास मादक पदार्थों के दुरूपयोग विरोधी आवाज़ को बुलंद कर सकता है.
विष्णुप्रिया पांडेय समाज कार्य विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रिसर्च स्कॉलर हैं. व्यक्त किये गये विचार उनके निजी हैं. ई-मेल पता है:vishnupriyapandey@gmail.com