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भारत छोड़ो आंदोलन 

1939 में जब ब्रिटेन ने जर्मनी के खि़लाफ युद्ध की घोषणा कर दी तो भारत एक ब्रिटिश डिपेंडेंसी के रूप में, स्वत: ही दूसरे विश्व युद्ध का एक युद्धरत देश बन गया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने युद्ध में ब्रिटेन के साथ तब तक सहयोग करने से इन्कार कर दिया जब तक कि उनके उद्देश्यों को स्पष्ट तौर पर परिभाषित नहीं किया तथा यह आश्वासन नहीं दिया गया कि भारत को युद्ध की समाप्ति पर एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया जायेगा. ब्रिटिशों द्वारा राष्ट्रीय मांग को स्वीकार किये जाने से लगातार इंकार के कारण धधकती हुई असंतोष की ज्वाला युद्ध में जापान के शामिल होने के साथ ही ताकत की धुरी पर अपने चरम पर पहुंच गई. जापान की सिंगापुर, सियाम, मलाया और बर्मा के ऊपर सफलता के साथ तेज़ी से आगे बढऩे और ख़ौफनाक युद्ध के भारत की सीमाओं के निकट पहुंच जाने के कारण एक संकटमय स्थिति उत्पन्न हो गई. अब ब्रिटेन सरकार ने भारत में राष्ट्रवादी तत्वों का दिल जीतने की आवश्यकता को महसूस किया और सर स्टाफोर्ड क्रिप्स, ब्रिटिश युद्ध कैबिनेट का एक सदस्य, को देश के भविष्य के संविधान पर विचारविमर्श शुरू करने के वास्ते भेजा. क्रिप्स 23 मार्च, 1942 को दिल्ली पहुंचे. उन्होंने विभिन्न दलों और समूहों के साथ लंबी बातचीत की, परंतु ‘‘युद्ध के बाद औपनिवेशिक दजऱ्ा‘‘ प्रदान करने और एक ‘‘संविधान सभा‘‘ के वायदे के लिये कांग्रेस से कोई अपील असफल रही. क्रिप्स मिशन की असफलता से विदेशी शासन के खिलाफ खुली चुनौती की आवश्यकता ने ज़ोर पकड़ा जो कि जापानियों के लिये भारत की भूमि पर युद्ध और विनाश को लेकर एकमात्र उकसावा हो सकता था.

मुंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में 8 अगस्त, 1942 को एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें गांधी जी के नेतृत्व में व्यापक पैमाने पर अहिंसक संघर्ष शुरू करने की मंजूरी प्रदान की गई. समिति ने भारत से ब्रिटिश शासन को पूर्ण वापसी की मांग की ताकि युद्ध वास्तव में लोगों का संग्राम बन सके जिसमें लाखों की संख्या में भारतीय उत्साह और जोश के साथ शामिल हो सकें. यद्यपि कांग्रेस ने अभी जन आंदोलन के लिये कोई तैयारी नहीं की थी, ‘‘भारत छोड़ो‘‘ प्रस्ताव एक प्रकार से विदेशी शासन के खि़लाफ खुले विद्रोह का आहवान था. गांधी जी ने सभी से कहा कि वे कुछ इस तरह काम करें जैसे कि वे स्वतंत्र हैं और कहा कि ‘‘मुझे पूर्ण आज़ादी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है‘‘ हम करेंगे या मरेंगे. हम या तो भारत को आज़ाद करवायेंगे अथवा इसकी कोशिश में मर मिटेंगे.‘‘

भारत में ब्रिटिश सरकार अथॉरिटी इस खुली चुनौती का सामना नहीं कर सकी. 9 अगस्त की सुबह महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, अबुल कलाम आजाद और कांग्रेस कार्य समिति के अन्य सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया. एक सप्ताह के भीतर भारत के सभी हिस्सों में कांग्रेस के लगभग सभी महत्वपूर्ण कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया. नेताओं की अचानक गिरफ्तारी ने भारतीय जनता को अनिर्देशित और सहज प्रतिक्रिया व्यक्त करने को लेकर स्वतंत्र कर दिया. कांग्रेसी नेताओं का इरादा अहिंसक आंदोलन शुरू करने का था परंतु कई मामलों में लोगों ने हिंसक तरीके अपनाये, विशेषकर जब उन्हें क्रूर उत्पीडऩ की स्थिति का सामना करना पड़ा. शस्त्रविहीन भीड़ ने शांतिपूर्ण हड़तालें, धरने प्रदर्शन और बैठकें आयोजित कीं परंतु शीघ्र ही पुलिस और सैन्य अधिकारियों के साथ झड़पें शुरू हो गईं, नाराज़ लोगों का ध्यान रेलवे, डाक और टेलीग्राफ तथा सडक़ों जैसे सभी प्रकार के संचार मार्गों की ओर हो गया ताकि इन्हें नुकसान पहुंचाया जा सके. असम, बंगाल, बिहार, उ.प्र., बम्बई और मध्यवर्ती प्रांतों में हिंसा फैलने लगी. पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार में सरकार ने अस्थाई रूप से अपना नियंत्रण खो दिया. मिदनापुर (बंगाल) और सतारा (महाराष्ट्र) में समानांतर सरकारों का गठन हो गया जिसने इन क्षेत्रों से कुछ समय के लिये ब्रिटिश शासन की सभी व्यवस्थाओं को भंग कर दिया. आगजऩी, तोडफ़ोड़ और ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारियों पर हमले होने लगे. सरकार ने क्रूर दमन की नीति शुरू कर दी. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 9 अगस्त से लेकर पांच महीनों के दौरान पुलिस और सेना की टुकडिय़ों ने 538 बार गोलीबारी की जिसके परिणामस्वरूप 940 व्यक्ति मारे गये और 1630 अन्य घायल हो गये.  कुल 60,000 से अधिक व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया. ये सरकार के आधिकारिक आंकड़े थे जिनमें पूर्ण सच्चाई नहीं थी. मारे गये, घायल व्यक्तियों अथवा जेल में डाले गये लोगों के वास्तविक आंकड़े काफी अधिक थे. ग़ैर सरकारी अनुमानों के अनुसार मृतकों की संख्या अवश्य कऱीब 10,000 पहुंच चुकी थी.

भारत छोड़ो आंदोलन इसकी हिंसा और सघनता के बावजूद सफल नहीं हुआ. लोगों ने आंदोलन में भाग लिया परंतु बिना किसी निर्देशन अथवा स्पष्ट योजना के. उन्होंने कई बार घटनाओं के हिंसक होने पर चिंता महसूस की, जिसके बारे में वे जानते थे कि वे अपने नेताओं से इसकी कभी स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकेंगे, जिन्होंने अहिंसा के मार्ग को अपनाया था. भागीदारों के बीच समन्वय का अभाव था जो कि एक दूसरे से व्यापक रूप से अलग-थलग थे. यहां तक कि उन क्षेत्रों में भी जहां पर उन्होंने सत्ता पर कब्जा कर लिया था, उन्हें नहीं मालूम था कि वे देश की आज़ादी के लिये लंबे अभियान के लिये किसी प्रकार की शुरूआत की जाये. यद्यपि यह आंदोलन यह प्रदर्शित करने में सफल रहा कि देश भर में लोग आज़ादी हासिल करने के वास्ते सभी कुछ कुर्बान करने के लिये तैयार हो गये थे. ब्रिटिश शासकों को लोगों की वफादारी अथवा यहां तक कि स्वीकार्यता पर विचार करना पड़ा. विदेशी शासन तहस नहस हो चला था और यह समाप्ति की ओर था तथा स्वतंत्रता की सुबह अब कुछ ही समय की बात रह गई थी.

(प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित भारत के शहीद, खंड-3 से साभार)