विशेष लेख


Volume-23

आज़ादी के बाद से शिक्षा क्षेत्र में प्रगति

लवी चौधरी

देश को व्यापक निरक्षरता से मुक्ति दिलाकर भारत ने अपनी शिक्षा प्रणाली को विश्व मानकों के अनुसार ढाल लिया है. हमने आज़ादी के बाद के 70 वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में शानदार प्रगति की है. आज भारत में शिक्षा की जो स्थिति है, उससे अगर तुलना करें तो 1947 में परिदृश्य एकदम भिन्न था. देश ने साक्षरता दर की समग्र स्थिति के लिहाज से हमने काफी कुछ हासिल कर लिया है और विश्वविद्यालयों तथा शैक्षिक संस्थाओं की संख्या  में भी काफी बढ़ोतरी हुई है.
2001 में साक्षरता दर जहां 64.8 प्रतिशत थी वहीं 2011 में यह 73 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गयी. यही दर 1951 में सिर्फ 18.33 प्रतिशत थी. आज भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली दुनिया में सबसे बड़ी है जिसमें दो दशकों से भी कम समय में 7 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों ने दाखिला लिया.
उच्च शिक्षा का प्रसार
एक जमाना था जब उच्च शिक्षा संभ्रांत वर्ग का विशेषाधिकार मानी जाती थी. मगर आज यह समाज के बहुत बड़े हिस्से को आसानी से उपलब्ध है. सरकार ने देश के समक्ष शैक्षिक चुनौतियों से निपटने, शिक्षा के बारे में विस्तृत नीतियां तैयार करने और शैक्षिक प्रणाली में सुधार के लिए समय-समय पर कई शिक्षा आयोग गठित किये.
आयोग और शैक्षिक सुधार
केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ने अपने गठन के बाद दो आयोगों के गठन का फैसला किया जिनमें से एक विश्वविद्यालय शिक्षा को लेकर और दूसरा माध्यमिक शिक्षा के बारे में था.
1) विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948)
स्वतंत्र भारत में सबसे पहले गठित किये जाने वाले महत्वपूर्ण आयोग में 1948 में बनाया गया विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग प्रमुख था. इसके अध्यक्ष डॉ. सर्वेपल्ली राधाकृष्णनन थे. आयोग को देश में विश्वविद्यालय शिक्षा की स्थिति का जायजा लेने और इसमें ऐसे सुधार विस्तार से सुझाने को कहा गया था जो राष्ट्र  की तत्कालीन तथा भविष्य  की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वांछनीय हों.
आयोग के गठन का एक अन्य उद्देश्य ऐसे विश्वविद्यालयों की स्थापना कराना भी था जो ज्ञान व विवेक का प्रसार करें और जिनसे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का समग्र विकास हो. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय संविधान में की गयी परिकल्पना के अनुरूप देश की शैक्षिक प्रणाली के पुनर्गठन का सुझाव दिया गया. 
2) मुदलियर आयोग (1952-53)
मुदलियर आयोग की रिपोर्ट की स्वतंत्र भारत में माध्यमिक शिक्षा के विकास में अत्यंत महत्वयपूर्ण भूमिका है. इसमें भारतवासियों को लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों के बारे में प्रशिक्षण देने की आवश्यकता पर बल दिया गया था. इस रिपोर्ट और इसमें बतायी गयी सिफारिशों के अनुसार देश की शिक्षा प्रणाली में कुछ सुधार किये गये. इन सुधारों में हायर सेकेंडरी शिक्षा प्रणाली के साथ तीन साल के डिग्री पाठ्यक्रम की शुरूआत तथा अधिक संख्या  में व्यावसायिक एवं तकनीकी स्कूल व कालेज खोलने का सुझाव भी शामिल था. इस तरह शिक्षा केन्द्र और राज्य दोनों ही सरकारों की साझा जिम्मेदारी का विषय बन गया.
कोठारी आयोग (1964-1966)
मुदलियर आयोग के बाद जाने-माने शिक्षाशास्त्री डी.एस. कोठारी की अध्यक्षता में भारतीय शिक्षा आयोग की नियुक्ति की गयी जिसे आमतौर पर कोठारी आयोग के नाम से जाना जाता है. इसे शिक्षा के तमाम पहलुओं और क्षेत्रों पर विचार करने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विकास के बारे में सरकार को सुझाव देने की जिम्मे्दारी सौंपी गयी.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968)
कोठारी आयोग की सिफारिशों के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 तैयार की गयी. भारत में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण प्रयास 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आने के बाद ही किये गये. नीति में समाज में सामंजस्य लाने और समन्वय स्थापित करने के लक्ष्य को प्राप्त  करने के लिए समाज के सभी वर्गों को शिक्षा उपलब्ध कराने की संभावनाओं का जायजा लिया गया था. नीति में अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच अच्छे संबंध विकसित करने के लिए माध्यमिक स्कूलों में क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात भी कही गयी थी. इसके साथ ही स्कूल स्तर पर हिंदी को शिक्षा का माध्य़म बनाने पर जोर दिया गया था.
यह महसूस किया गया कि शिक्षा सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन का कारगर औजार बन सकती है. इसके अलावा शैक्षिक विषयों का दीर्घकालीन राष्ट्रीय आकांक्षाओं के साथ तालमेल बैठाने का भी प्रयास किया गया. सरकार ने आधुनिक युग में शिक्षा के विकास की समीक्षा के लिए आयोग बनाए खास तौर पर आजादी के बाद और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि भारतीय शिक्षा में आमूल परिवर्तन के लिए काफी कार्य करने की जरूरत है. यह कार्य क्रांति के समान होगा और इससे संवैधानिक लक्ष्यों को प्राप्त  करने के साथ-साथ देश के सम्मुख उपस्थित विभिन्न समस्याओं को सुलझाने के राष्ट्रीय लक्ष्य को भी हासिल किया जा सकता है.  
शिक्षा के बारे में 1979 की राष्ट्रीय नीति के प्रारूप में ऐसी शैक्षिक प्रणाली के विकास का प्रस्ताव किया गया जिससे लोगों को न केवल अपना ज्ञान बढ़ाने का मौका मिले बल्कि उनके शैक्षिक कौशल का भी विकास हो. यह वह दौर था जब सरकार की नीतियों में आमूल परिवर्तन दिखाई देने लगे थे. 
इसमें विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों और सदाचार को बढ़ावा देने पर विशेष रूप से जोर दिया गया था ताकि उनके व्यक्तित्व का स्वस्थ रूप से विकास हो और वे सुयोग्य  नागरिक बनें. यह भी सुझाव दिया गया कि ऐसी अच्छी शैक्षिक प्रणाली अपनायी जानी चाहिए जिससे संवैधानिक मूल्य सुदृढ़ हों.  
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986)
1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गरीबों के लिए फैलोशिप्स, प्रौढ़ शिक्षा और स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देने के लिए समूची शैक्षिक प्रणाली का नये सिरे से विकास करने, समाज के उपेक्षित वर्गों, शारीरिक और मानसिक बाधाओं से ग्रस्त वर्गों के अध्यापकों की भर्ती करने पर जोर दिया गया था. इसके अलावा इसमें नये स्कूल और कॉलेज खोलने तथा विशेष शैक्षिक आवश्यकताओं वाले इलाकों पर खास तौर पर ध्यान देने को भी कहा गया था. स्वतंत्रता के बाद इन सभी नीतिगत पहलों के अच्छे नतीजे सामने आये. स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों  की संख्या में बढ़ोतरी हुई, शिक्षा का खर्च बढ़ाएं साक्षरता की विकास दर में वृद्धि हुई और शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने में मदद मिली.   
दाखिले
यह बात ध्यान देने की है  कि आज देश में 15 लाख स्कूल हैं करीब 26 करोड़ बच्चों  ने दाखिला लिया हुआ है. इसी तरह विश्वविद्यालयों की संख्या़ करीब 751 और कॉलेजों 35,539 है जबकि 1947 में देश में केवल 19 विश्वविद्यालय और 400 कॉलेज थे. 1947 में भारत में केवल 5000 माध्यमिक स्कूल थे.
दाखिलों में बढ़ोतरी
यह बात भी ध्यान देने की है कि प्राथमिक स्कूलों की संख्या  में 1951 और 1980 के बीच 230 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. स्कूल जाने वाली उम्र के स्कूली बच्चों के प्रतिशत माध्यमिक और हाई स्कूलों की संख्या और अध्यापकों की संख्या  में भी 1980 में सबसे अधिक तेजी से बढ़ोतरी हुई. 1981 में देश में 664700 स्कूल थे जबकि 1951 में इनकी संख्या 230700 थी, यानी 30 साल में स्कूलों की कुल संख्या में 65 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इसके 20 साल बाद यह संख्या 1396331 के स्तर पर पहुंच गयी. अपर प्राइमरी स्कूलों की संख्या के लिहाज से 1951 में देश में इस स्तर के स्कूलों की संख्या 13600 थी जो 1981 में बढक़र 118600 हो गयी. यानी 30 साल के अरसे में इनकी संख्या में कुल 105000 (88 प्रतिशत) की बढ़ोतरी हुई. इतना ही नही, 2011 में इस तरह के स्कूलों की संख्या 329000 की बढ़ोतरी के साथ 447600 के स्तर पर पहुंच गयी.
खर्च
स्वतंत्रता के बाद शिक्षा के खर्च में कई गुना बढ़ोतरी हुई है. मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार शिक्षा और अन्य विभागों द्वारा शैक्षिक गतिविधियों पर खर्च 1951-52 में 64.46 करोड़ रुपये था जो सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.64 प्रतिशत है.
2013-14 में यह कुल 4,65,000 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया था जो सकल घरेलू उत्पाद का 4.13 प्रतिशत है.  
साक्षरता दर में बढ़ोतरी
भारत की साक्षरता दर में बढ़ोतरी 1991 में 15.52 प्रतिशत के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गयी. ऐसा नयी शिक्षा नीति 1986 पर अमल के कारण संभव हो पाया जिसमें देश में शत-प्रतिशत साक्षरता के लिए अधिकतम उपाय किये गये थे. 1951-52 में 360000 विद्यार्थियों ने कालेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिला लिया था. यह संख्या 1990-91 में 40 लाख तक जा पहुंची थी. इतना ही नहीं दाखिलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. आने वाले वर्षों में भारत में शिक्षा क्षेत्र सर्वोच्च विकास के द्वार पर खड़ा है क्योंकि 2020 तक यहां दुनिया में सबसे अधिक टर्शियरी उम्र वाली आबादी के साथ-साथ स्नातक स्तर की शिक्षा प्राप्त कर चुके लोगों की संख्या दुनिया में दूसरे नंबर पर पहुंच जाएगी.
सर्वसुलभ शिक्षा
अनेक कमेटियों और आयोगों के गठन के बाद भारतीय शैक्षिक प्रणाली और बड़े बदलाव की ओर अग्रसर है जिसके तहत गुणवत्ता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है.
शिक्षा के जरिए विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों के विकास और शिक्षा को जीवन के और करीब लाने के प्रयास किये जाते रहे हैं. लेकिन सभी संबद्ध शासकों, प्रशासकों, अध्यापकों और समाज की ओर से दृढ़ता के साथ जोरदार कदम उठाने बेहद जरूरी हैं जिनसे शिक्षा अधिक उद्देश्यपूर्ण और अर्थपूर्ण हो जाए. मगर इस तरह की ताकत न होने से भारत में शिक्षा मनुष्यों  के सामाजिक विकास की उत्प्रेरक नहीं बन पायी है.
इसमें प्राथमिक शिक्षा को कारगर तरीके से सर्वजनीन बनाने की आवश्यकता को भी रेखांकित करते हुए निरक्षरता के उन्मूलन और 15 से 35 आयुवर्ग के लोगों में कौशल के विकास, शिक्षा के राष्ट्रीयकरण, देश की विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जनशक्ति के विकास तथा सभी स्तरों पर गुणवत्ता  में सुधार वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय अनुसंधान पर जोर दिया गया है. इस नीति पर अमल की हर पांच साल बाद समीक्षा की जानी है.   
सर्वशिक्षा अभियान (२००१)
सरकार ने 2001 में सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत की. इसका उद्देश्य  6 से 14 साल तक के सभी बच्चों को शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराना था. इससे पहले सरकार ने कारगर पहल करते हुए प्रायोजित जिला शिक्षा कार्यक्रम नाम के एक कार्यक्रम की शुरुआत की थी जिससे देश भर में स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई. बच्चों को स्कूलों की ओर आकर्षित करने के लिए, खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों मे, सरकार ने 1995 में दोपहर को भोजन देने के कार्यक्रम की भी शुरुआत की.    
तभी भारत के योजना आयोग ने प्राथमिक शिक्षा को सर्वजनीन बनाने पर जोर दिया ताकि समूचे राष्ट्र को शिक्षा प्रणाली का फायदा मिल सके.  
राज्यों ने प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी ढांचे और इसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता का 2008 में पंचायतों के जरिए आकलन कराकर इस बारे में जानकारी दी थी. केन्द्र सरकार ने आजादी के बाद अपने कर्मचारियों के लिए करीब 1,000 केन्द्रीय विद्यालय खोले और संचालित किये हैं. इसी तरह 2017 में सरकार की कुछ अन्य  महत्वयपूर्ण पहलों में 2017-18 के केन्द्रीेय बजट को भी शामिल किया जा सकता है जिसमें वित्त वर्ष के लिए केन्द्रीय बजट में शिक्षा क्षेत्र के लिए 79,685,95 करोड़ रुपये का खर्च निर्धारित किया गया है जो 2016-17 के मुकाबले 72,394 करोड़ रुपये यानी 9.9 प्रतिशत अधिक है. 
हाल की पहल
स्किल इंडिया मिशन के तहत सरकार ने करीब 17,000 करोड़ रुपये कौशल विकास, रोजगार सृजन और करोड़ों युवाओं को आजीविका उपलब्धल कराने के लिए आबंटित किये हैं. इस तरह शिक्षा क्षेत्र के बजट आबंटन में पिछले साल के मुकाबले 8 प्रतिशत से कुछ ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन अगर 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल से बढ़े हुए वेतन की देनदारी को हिसाब में ले लिया जाए तो शिक्षा का बजट पिछले साल के बराबर ही बैठता है. इस साल वित्त मंत्री ने शिक्षा के लिए 3.711 प्रतिशत आबंटन किया है जबकि इससे पहले साल के बजट में आबंटन 3.653 प्रतिशत था. 
बजट में वर्ष 2017-18 के सत्र में मेडिकल कालेजों और अस्पतालों में 4000 से अधिक स्नाकोत्तर सीटें बढ़ाने की मंजूरी दी गयी है जो अब तक का रिकार्ड है. इसके अलावा देश में सिविल/रक्षा क्षेत्र में 50 नये केन्द्रीय विद्यालय खोलने का प्रस्ताव है जिसमें 1,116 करोड़ रुपये का खर्च आएगा. इसके अलावा भारत सरकार ने विश्व बैंक के साथ एक समझौते पर दस्तखत किये हैं जिसके अंतर्गत तीसरे शैक्षिक गुणवत्ता  सुधार कार्यक्रम (टीईक्यूआईपी) के तहत इंटरनेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन से 20.15 करोड़ डालर का ऋण प्राप्त  होगा. इसका उद्देश्य देश के चुने हुए कई राज्यों  में इंजीनियरी शिक्षा की गुणवत्ता के साथ-साथ इस तरह की शिक्षा प्रदान करने की गुणवत्ता  लाने और शिक्षा में समता को बढ़ावा देना है.    
निश्चित तौर पर देश में सर्व शिक्षा अभियान, जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, मध्याह्न भोजन योजना, अध्यापिका शिक्षा योजना और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय योजना जैसे शैक्षिक कार्यक्रमों ने अच्छा कार्य किया है और कई राज्यों में इनमें अब भी अच्छे कार्य हो रहा है. प्राथमिक स्कूलों में पढऩे को आने वाले बच्चों की संख्या दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ी है. हालांकि, स्कूली शिक्षा पूरी न कर पाने वाले बच्चों की संख्या अब भी बहुत ज्यादा बनी हुई है. फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि इन शैक्षिक कार्यक्रमों ने प्राथमिक शिक्षा से वंचित करोड़ों बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा किया है. अब गांवों में प्राथमिक शिक्षा 1 से 2 किलोमीटर के दायरे में उपलब्ध है. 
अगर योजना आयोग के दस्तावेज का हवाला दें तो एक किलोमीटर की दूरी के दायरे में प्राथमिक विद्यालय वाली बस्तियों की संख्याा 10.71 लाख (87 प्रतिशत) थी. इसी तरह जिन बस्तियों से 3 किलोमीटर के दायरे में अपर प्राइमरी स्कूल थे उनकी संख्या  9.61 लाख (78 प्रतिशत) थी. इसी दस्तावेज के अनुसार सिर्फ  एक लाख बस्तियां ऐसी बची थीं जिनमें प्राइमरी स्कूल (पहली से पांचवीं कक्षा तक, उम्र 6 से 11 वर्ष) और अपर प्राइमरी स्कूल (छठी से आठवीं कक्षा, उम्र 7 से 14 वर्ष) बनाए जाने बाकी थे. 
शिक्षा का अधिकार
नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के बच्चों के अधिकार का कानून (शिक्षा का अधिकार कानून) भारतीय संसद द्वारा 4 अगस्त 2009 को पारित एक अधिनियम है जिसमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21क के तहत 4 से 14 साल तक के बच्चों  के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के महत्व और इसके तौर-तरीकों को बताया गया है. 1 अप्रैल 2010 को इस अधिनियम के लागू होने के बाद भारत दुनिया के उन 135 देशों में शामिल हो गया है जहां शिक्षा हर बच्चे  का बुनियादी अधिकार है.   
अधिनियम के जरिए शिक्षा को 4 से 14 साल तक के हर बच्चे का बुनियादी अधिकार बना दिया गया है और स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा के मानक निर्धारित कर दिये गये हैं. इसके साथ ही सभी निजी स्कूलों से अपेक्षा की गयी है कि वे 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित श्रेणियों के बच्चों के लिए सुरक्षित कर दें. (इसका खर्च सार्वजनिक-निजी भागीदारी योजना के तहत सरकार द्वारा उठाया जाएगा.)
आगे का खाका
नयी शैक्षिक तकनीकों जैसे ई-लर्निंग और एम. लर्निंग पर ध्यान केन्द्रित करने के साथ-साथ दूरस्थ शिक्षा मार्केट का दायरा बढ़ाने के लिए सरकार कई अन्य पहल करने पर विचार कर रही है.
शिक्षा के क्षेत्र में हाल के वर्षों में कई सुधार हुए हैं और इसका वित्तीय खर्च भी बढ़ा है. इससे देश के ज्ञान के स्वर्गके रूप में उभर कर सामने आने की पूरी संभावना है.
देश के समग्र विकास में मानव संसाधनों के बढ़ते महत्व को देखते हुए चालू दशक में शिक्षा के बुनियाद ढांचे के निर्माण का कार्य, तमाम शैक्षिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु बना रहने की संभावना है. इसको ध्यान में रखते हुए शिक्षा के क्षेत्र में बुनियादी ढांचे में निवेश में चालू दशक में भारी बढ़ोतरी की संभावना है. 
भारत में करीब 650 जिले हैं और हर जिले में औसतन करीब 20 लाख लोग रहते हैं जो कि पश्चिम के कुछ देशों की कुल आबादी के बराबर हैं. असल में भारत के कुछ राज्यों की जनसंख्या  स्वीडन, स्विटजरलैंड, नॉर्वे, बेल्जियम और हॉलैंड की कुल आबादी से अधिक है. इसलिए हमारी शैक्षिक प्राथमिकताएं और योजनाएं पश्चिमी देशों से पूरी तरह भिन्न  होनी चाहिए. लेकिन यह बात बड़ी महत्वपूर्ण है कि भारत लगातार बढ़ रही बच्चों की आबादी को प्राथमिक और पूर्व प्राथमिक स्तर की शिक्षा का बुनियादी ढांचा उपलब्ध  कराने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है. 
इन तमाम मुसीबतों के बावजूद तमाम क्षेत्रों को अपने आप में समेटे भारत का शैक्षिक परिदृश्य  महान और विस्तृत विस्तार लिए हुए है और इसका आगे भी फैलाव हो रहा है. विभिन्न एजेंसियों जैसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और भारतीय चिकित्सा परिषद जैसी विभिन्न  एजेंसियों तथा राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, राज्य  शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं निजी पेशेवर संगठनों तथा मैनेजमेंट एसोसिएशनों द्वारा उठाए गये कदमों के अच्छे नतीजे अवश्य ही सामने आएंगे जिनसे भारत को ज्ञानवान समाज बनाने में मदद मिलेगी. इससे भारत आज की वैश्वीकृत दुनिया के लिए शिक्षा के एक आकर्षक केन्द्र के रूप में उभर कर सामने आएगा. आइये इस लेख को यूनेस्को की तीस साल पहले की इस टिप्पणी के साथ समाप्त करें कि : शिक्षा ऐसी अभिवृत्तियों को अपनाने और ऐसे कौशल प्रदान करने की योजनाबद्ध प्रक्रिया है जो स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय विकास के लिए आवश्यक हैं. आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन के साथ सामाजिक परिवर्तन सभी देशों के लिए बेहद जरूरी हैं खास तौर पर ऐसे विकासशील देशों के लिए जिनमें समाज के सभी वर्गों की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बुनियादी बदलाव अभी आने बाकी हैं. आइये हम उम्मीद करें कि पिछले 65 वर्षों में भारत ने शिक्षा के तमाम क्षेत्रों में समग्र रूप से जो सराहनीय विकास किया है उसे आने वाले सालों में और बढ़ावा मिलेगा.       
हमें यह भी आशा करनी चाहिए कि आने वाले वर्षों में विकास को और बढ़ावा देने के लिए हम आगे बढ़ते ही रहेंगे. आजादी के बाद के 70 वर्षों में शिक्षा क्षेत्र का सुदृढ़ होना एक ऐसी अनवरत और जीवंत धारा की तरह है जो अतीत के गर्भ से निकलकर वर्तमान से होते हुए भविष्य की ओर अग्रसर है. 
(लेखिका दिल्ली की श्रमजीवी पत्रकार हैं.) इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं.