विशेष लेख


Volume-30, 21-27 October, 2017

भारत में वृद्धों की स्थिति का एक विश्लेषण

डॅा. श्रीनाथ सहाय

21वीं सदी के विश्व में उम्रदराज जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है. दुनिया भर के विभिन्न देशों की जनसंख्या में वृद्धों के अनुपात में वृद्धि हो रही है. यह सच्चाई भारत के विषय में भी है, जहां हमारी कुल जनसंख्या में वृद्धों का प्रतिशत 1951 की जनगणना में 5.58 से बढक़र 2001 में 7.5 और 2011 की जनगणना में 8.6 प्रतिशत (सारणी 1) हो गया है. 2011 की नवीनतम जनगणना के अनुसार, भारत में बुज़ुर्गों की कुल जनसंख्या 10.4 करोड़ थी जिसके 2022 तक बढक़र 17.7 करोड़ और 2050 तक 32.4 करोड़ हो जाने का अनुमान है.
1991-2001 की अवधि के दौरान वृद्धों की जनसंख्या वृद्धि दर देश की कुल जनसंख्या की वृद्धि दर (2.02) के मुकाबले अधिक (2.89) थी. दरअसल बुज़ुर्गों की जनसंख्या में यह वृद्धि बीसवीं सदी के दूसरे अद्र्ध भाग से लेकर एक वैश्विक स्थिति है. प्रभावी जीवनरक्षक दवाइयों का उत्पादन, संक्रमणों, संक्रामक रोगों पर बेहतर नियंत्रण, चिकित्सा उपकरणों के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों की आसानी से उपलब्धता और लोगों की बेहतर स्वास्थ्य और जीवन के प्रति बेहतर जागरूकता, साफ-सफाई-इन सभी ने मिलकर लोगों का जीवनकाल बढ़ाने में योगदान किया है. मृत्यु दर में जबर्दस्त कमी आई है. इसे एज ऑफ एजिंगकी संज्ञा दी गई है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वृद्धजनों की संख्या में विकसित देशों की 1.84 गुणा के मुकाबले विकासशील देशों में अधिक तेज़ी से 3.4 गुणा वृद्धि हुई है.
हमारा देश व्यापक सामाजिक परिवर्तनों से गुजर रहा है. परिवार का बुनियादी ढांचा, जो कि समाज का प्रमुख अंग होता है, संयुक्त प्रणाली से एकांकी में परिवर्तित हो गया है. यह बदलाव संरचनात्मकता के साथ-साथ अवधारणा बन चुका है. विकास के इस आधुनिक युग में परिवार अपने उद्देश्य से भटक गया है. पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में आकर, भारत की संयुक्त परिवार की परंपरा में जो विशेषज्ञता और गुण, भावनात्मक लगाव था वह नहीं रहा है, वह इससे फिसल गया है. आधुनिक परिवार पहले के दिनों की भांति उतना अधिक देखभाल करने वाला नहीं रहा है, जबकि पहले वह अपने सदस्यों के लालन-पालन से लेकर मृत्यु होने तक उनकी देखभाल में जुटा रहता था. कॅरिअर सर्वोपरि हो रहा है, छोटा, एकांकी परिवार मोबाइल बन चुका है. युवा बाहर जाते समय अपने वृद्ध माता-पिता को साथ ले जाने से कतराते हैं जो कि शारीरिक और मानसिक के साथ-साथ आर्थिक तौर पर कमज़ोर होते हैं. उन्हें अकेले जीने के लिये छोड़ दिया जाता है.
बुज़ुर्गों में युवा पीढ़ी की घटती रूचि के मुख्यत: निम्नलिखित कारण हो सकते हैं: (क) उद्योगीकरण (ख) शहरीकरण (ग) बढ़ती शिक्षा (घ) रोजग़ार उन्मुखता (ड़) पारिवारिक संरचना और पसंद.
उद्योगीकरण ने, विशेषकर भारत में, लोगों के व्यवसाय, रोजग़ार और जीवन के अन्य क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव डाला है, जो कि मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान समाज रहा है. इस देश के अधिकतर लोग गांवों में रहते हैं और खेतीबाड़ी करते हैं तथा अपनी ज़मीन से जुड़े हैं. लेकिन नई पीढ़ी, परिवार के परंपरागत व्यवसाय में रूचि नहीं रखती है, एक दिन अपने बूढ़े माता-पिता को घर में अकेले रहने के लिये छोडक़र चले जाते हैं. उच्चतर शिक्षा और नये कौशल अर्जित करके वे बड़े शहरों और विदेश में उच्चतर रोजग़ार प्राप्त करने के उत्सुक होते हैं. उन्हें बाहर जाना पड़ता है और परिवार बिखर जाता है, इसका मूल स्वरूप, संयोजन बदल जाता है. विस्थापन समय की मांग है.
विवाह के नियम और अवधारणा बदल चुकी है. नई पीढ़ी देर से और अंतर्जातीय विवाह करना पसंद करती है जिससे एकांकी परिवार की पद्धति जन्म लेती है. शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और बच्चों की पढ़ाई लिखाई की लागत बेतहाशा बढ़ चुकी है. इससे परिवार के कमाने वाले सदस्य के सीमित संसाधनों पर भारी दबाव है जिससे वे परिवार के वृद्धजनों की देखभाल के लिये होने वाले खर्च का दबाव महसूस करते हैं.
दुव्र्यवहार की समस्या:
वृद्धों के प्रति दुव्र्यवहार काफी व्यापक हो चुका है. इसका प्रमुख कारण आर्थिक व्यवहार्यता है. अध्ययनों से पता चला है कि ‘‘लोग सेवानिवृत्ति के 5 वर्षों के भीतर अपनी बचतों को समाप्त कर डालते हैं और इसके बाद अपने बच्चों तथा संबंधियों पर निर्भर होने को मज़बूर होते हैं.‘‘ वे अपने जीवन की बचत को अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई, उनके रहने के लिये घर के निर्माण, शादी विवाह पर और अंतत: उन्हें बसाने पर ख़र्च कर डालते हैं और इस तरह वे धन से विहीन हो जाते हैं और उनके पास पेन्शन (बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त व्यक्तियों के लिये पेन्शन नहीं होती है) अथवा अन्य संसाधन नही बच जाता है और वे जीवित रहने के लिये संघर्ष ही कर रहे होते हैं. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट (1995-96) में उल्लेख किया गया है कि कऱीब 31 प्रतिशत वृद्ध पुरुष और 71-76 प्रतिशत वृद्ध महिलाएं पूरी तरह दूसरों पर निर्भर पाई गईं. यह उन्हें कमज़ोर बना देता है, उन्हें अपनी ज़मीन जायदाद को हासिल करने, अपनी संपत्तियों, घर और इसी तरह की अन्य वस्तुओं के अंतरण में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
महिलाएं सर्वाधिक पीडि़त
भारत में महिलाओं को शुरू से ही सही मायने में गौरव प्राप्त नहीं हुआ. उनका जीवन पहले एक बालिका के तौर पर, फिर विवाहित लडक़ी, बूढ़ी महिला और अंतत: विधवा के तौर पर संकुचित होकर रह गया. भारतीय परंपरागत समाज में, बूढ़ी महिला को परिवार में दो प्रकार से सम्मान हासिल था: (क) ज्ञान और अनुभव का भण्डार (ख) बाल बच्चों की देखभाल करने वाली. नई पीढ़ी युगों पुरानी परंपरा को पसंद नहीं रकती और बूढ़ी महिला पर कम निर्भर रहती है. टेक्नो-विनिर्दिष्ट रोजग़ारों के अनुरूप इधर उधर विस्थापन के कारण नई पीढ़ी एकांकी परिवार का विकल्प चुनती है और बूढ़े माता-पिता को अकेले उनके पुस्तैनी घरों में छोड़ दिया जाता है.
अध्ययनों से पता चला है कि 13.7 प्रतिशत पुरुर्षों और 36.5 प्रतिशत महिलाओं को उनके परिवार में पुत्रवधुओं ने पीडि़त किया है. और 33.3 वृद्ध पतियों का कहना है कि उन्हें उनकी पत्नियों ने परेशान किया. 81.4 प्रतिशत पीडि़त विवाहित व्यक्ति थे. 47 प्रतिशत पीडि़तों की कोई निजी आय नहीं है और वित्तीय रूप से अपने बच्चों पर निर्भर थे. भारत में पुत्र सर्वाधिक नियमित दुव्र्यवहार करने वाला होता है. वृंदावन में जीवनयापन करने वाली महिलाओं की स्थिति अत्यधिक शोचनीय है.
ग्रामीण महिलाएं: परंपरागत समाज-संयुक्त परिवार व्यवस्था की हानि की वजह से ग्रामीण महिलाएं अधिक पीडि़त हैं. इन महिलाओं के लिये परिवार के बाहर सुरक्षा और रखरखाव की स्थिति बहुत ही खऱाब है. 1990 के दशक के दौरान वृद्ध महिलाओं के लिये बड़ी संख्या में संस्थान बनाये गये. भारत में वर्ष 1998 में कऱीब 728 ओल्ड एज होम्स थे और इनमें अब तक कई अन्य शामिल किये गये हैं.
ओल्ड एज होम सुविधाएं: हेल्पेज इंडिया ने भारत में ग़ैर सरकारी संगठनों द्वारा संचालित ओल्ड एज होम्स में उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं का अध्ययन किया था. जबकि कुछ निवासियों को अपने ठहरने के लिये भुगतान करना होता है, कुछेक होम्स मुफ्त ठहरने और खानेपीने की सुविधाएं प्रदान करते हैं. इन होम्स में उनके लिये स्त्री पुरुष के लिये अलग अलग आवास, चिकित्सा और मनोरंजन तथा काउंसिलिंग की सुविधाएं भी प्रदान की जाती हैं. बूढ़े हो रहे लोगों के लिये आज के दिन स्वैच्छिक सहायता, समाज कल्याण सेवाओं की बहुत आवश्यकता है. भारत जैसे जनसंख्या बहुल देश में इस तरह के होम्स की अत्यधिक आवश्यकता है.
भावनात्मक लगाव: दिल्ली विश्वविद्यालय में एक अध्ययन में यह पाया गया है कि 85 प्रतिशत बूढ़े व्यक्ति उनके बच्चों के दुव्र्यवहार से पीडि़त होते हैं. हेल्पएज इंडिया के अनुसार तीन में से हरेक एक व्यक्ति को उनके अपने बच्चों, पुत्रवधुओं के दुव्र्यवहार, उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ता है. दिल्ली में बुजुर्ग व्यक्तियों की स्थिति बहुत ही दयनीय है जहां 60 प्रतिशत वृद्धों को उनके अपने पुत्रों और 24 प्रतिशत को उनकी पुत्र वधुओं के दुव्र्यवहार का सामना करना पड़ता है. बुरे व्यवहारों और उत्पीडऩ के बावजूद 98 प्रतिशत वृद्ध अपने बच्चों के साथ रहते हैं और अपने परिवार की प्रतिष्ठा बचाने और कायम रखने के लिये उनके विरुद्ध शिकायत भी नहीं करते हैं.
निष्कर्ष: वृद्धों की संरक्षा और उन्हें दुव्र्यवहार तथा उत्पीडऩ से बचाने के लिये कानून बनाये गये हैं परंतु उनका कोई प्रभावी और ठोस कार्यान्वयन नहीं हुआ है. यह भी नोट करने लायक है कि संयुक्त परिवार के विच्छेदन को रोक पाना मुश्किल है क्योंकि यह समय की आवश्यकता बन चुका है, युवाओं को विस्थापन करने और अपने माता पिता को अकेले छोडऩे के विरुद्ध कोई तर्क नहीं दिया जा सकता है क्योंकि यह उनके कॅरिअर की उन्नति और विकास के लिये है. इस विकास की चुनौतीका सामना करना वर्तमान युग के वृद्धजनों के नसीब में है. अत: इसका हल वृद्धजनों के पास ही है कि वे परिवार से दूर रहना सीखें, ओल्ड एज होम्स में उपलब्ध सुविधाओं और देखभाल के बावजूद उन्हें ऐसे किसी भी लगाव और भावना को पीछे छोडऩा होगा, जो उन्हें परेशान करती हैं. घर के बाहर, एक घर बनाएं, यही मंत्र दिखाई पड़ता है. 
(लेखक एक शिक्षाविद् हैं जो कि सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विषयों पर लिखते हैं) व्यक्त किये गये विचार उनके अपने हैं
चित्र: गूगल के सौजन्य से