विशेष लेख


Volume-38, 18-24 November, 2017

1817 के पाइका विद्रोह को मिलेगी इतिहास की किताबों में माकूल जगह


पार्थिव कुमार

देश इस साल पाइका विद्रोह की 200वीं सालगिरह मना रहा है. यह वक्त उन वीरों को याद करने का है, जिन्होंने 1857 की क्रांति से भी दशकों पहले औपनिवेशिक शोषण और दमन के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया तथा अपने पराक्रम से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को हिला कर रख दिया. लेकिन बदकिस्मती से हममें से बहुत कम लोग ही इन जांबाजों की शौर्य गाथाओं से वाकिफ हैं. इतिहास की किताबों में इन्हें गुमनामी के एक अंधेरे कोने में धकेल दिया गया है. मगर अब सरकार देश की आजादी की लड़ाई में इन सेनानियों के योगदान को रेखांकित करते हुए इन्हें पाठ्य पुस्तकों में प्रमुखता से शामिल करने की योजना बना रही है.
केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने हाल ही में कहा है कि 1817 के पाइका विद्रोह को इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के तौर पर शामिल किया जायेगा. उन्होंने बताया कि इस बारे में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के अनुरोध को केन्द्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है. श्री जावड़ेकर ने बताया कि केन्द्र सरकार ने पाइका विद्रोह की 200वीं सालगिरह को समूचे देश में मनाने के लिये 200 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं.
पाइका ओडिशा में खुर्दा साम्राज्य के किसान थे. उनकी लगान माफ कर दी गयी थी, जिसके एवज में वे सम्राट को सैनिक के तौर पर अपनी सेवाएं दिया करते थे. उनके विद्रोह की बुनियाद 1803-04 में ओडिशा में ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठाओं के बीच संघर्ष के दौरान ही पड़ चुकी थी. कंपनी ने पाइका समुदाय का सहयोग मांगते हुए खुर्दा सम्राट मुकुंद देव द्वितीय से आग्रह किया कि उसके सैनिकों को वह अपने साम्राज्य से होकर गुजरने की इजाजत दें. कंपनी ने मुकुंद देव से इस सहयोग के बदले में एक लाख रुपये देने का वायदा किया.
मुकुंद देव को उम्मीद थी कि वह ईस्ट इंडिया कंपनी की मदद से पुरी को फिर से अपने अधिकार में ले सकेंगे. खुर्दा साम्राज्य ने पुरी को 18वीं सदी में मराठाओं के हाथों गंवा दिया था. ओडिशा पर आधिपत्य के लिये पुरी को अपने कब्जे में लेना बेहद महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे सम्राट को धार्मिक वैधता के अलावा काफी माल-असबाब भी मिलता. लिहाजा सम्राट मुकुंद देव ने कंपनी के अनुरोध को स्वीकार कर लिया. लेकिन मराठाओं को ओडिशा से बेदखल करने के बाद कंपनी खुर्दा सम्राट से किये वायदे से मुकर  गयी.
खुर्दा के दीवान जयी राजगुरू शुरूआत से ही इस सौदे के खिलाफ थे. अंग्रेजों की वायदा खिलाफी के बाद उनकी अगुवाई में पाइका योद्धाओं ने 1804 में कंपनी के प्रतिष्ठानों पर धावा बोल दिया मगर अंग्रेजों की ताकत के सामने वे टिक नहीं सके. कंपनी के सैनिकों ने खुर्दा के किले पर कब्जा करने के बाद दीवान को मौत के घाट उतार दिया. मुकुंद देव द्वितीय की शक्तियों और विशेषाधिकारों को छीन उन्हें पेंशन देकर पुरी भेज दिया गया.
 
यह वक्त उन वीरों को याद करने का है, जिन्होंने 1857 की क्रांति से भी दशकों पहले औपनिवेशिक शोषण और दमन के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया
 
इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने ओडिशा में जो प्रशासनिक बदलाव किये उससे खास तौर से किसान बर्बादी के कगार पर पहुंच गये. खुर्दा के सेनापति जगबंधु विद्याधर महापात्र की बख्शी की उपाधि और रोदंगागढ़ की जागीर उनसे छीन ली गयी. पाइका समुदाय की नाराजगी चरम पर पहुंच चुकी थी और उसके योद्धाओं ने कंपनी के ठिकानों पर फिर से हमले शुरू कर दिये. कटक स्थित कंपनी मुख्यालय के मजिस्ट्रेट इस विद्रोह को कुचलने के लिये खुर्दा आये. मगर इस दफा पाइका योद्धाओं का हमला इतना जबर्दस्त था कि अंग्रेज सैनिकों के पांव उखड़ गये और उन्हें कटक वापस भागना पड़ा.
विद्रोहियों का हुजूम पुरी पहुंचा और उसने सम्राट मुकुंद देव द्वितीय से विद्रोह का नेतृत्व करने का आग्रह किया. सम्राट ने काफी मनाये जाने के बावजूद इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया. लेकिन इसी बीच जगन्नाथ मंदिर के पुजारी ने सम्राट मुकुंद देव के शासन की बहाली की घोषणा कर दी, जिसके बाद कंपनी के खिलाफ जन प्रतिरोध ने विकराल रूप ले लिया. इस सैलाब को काबू में करने में नाकाम कंपनी के अधिकारियों ने भाग कर कटक में पनाह ली.
अप्रैल के बीच में जब मुकुंद देव को पुरी से कटक लाया जा रहा था तब लगभग 2500 विद्रोहियों ने रास्ते में कंपनी के सैनिकों के दस्ते पर हमला कर अपने सम्राट को छुड़ाने की कोशिश की. लेकिन वे  हथियारों से लैस ब्रिटिश सैनिकों का अपनी तलवारों और तीर-धनुष से सामना नहीं कर सके. विद्रोह को मई के अंत तक कुचला जा चुका था मगर छिटपुट संघर्ष 1818 तक होते रहे. जगबंधु महापात्र ने 1825 में ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने हथियार डाल दिये और उन्हें 150 रुपये प्रति माह पेंशन देकर कटक में नजरबंद कर दिया गया.
दरअसल अंग्रेजों को भारत में 1857 से पहले अनेक छोटे-बड़े विद्रोहों का सामना करना पड़ा. ईस्ट इंडिया कंपनी आयी तो थी व्यापार करने, मगर जल्दी ही उसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को अपना मकसद बना लिया. उसने इस मकसद को पूरा करने और अपना मुनाफा बढ़ाने के लिये अमानवीय शोषण और दमन का सहारा लिया. देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न समुदायों ने उसके जुल्मों का अपने-अपने ढंग से विरोध किया.
बंगाल के मिदनापुर में चुआर आदिवासियों ने 1764 में ही अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का परचम लहरा दिया था. विद्रोह धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों में फैलता गया और उसने बंगाल और बिहार के एक बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया.
इसी तरह 1805 में त्रावणकोर के निवासियों ने दीवान वेलु थंपी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत छेड़ दी. शुरूआत में त्रावणकोर के राजा ने टीपू सुल्तान के खिलाफ ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ दिया था. मगर थोड़े ही समय में वह समझ गये कि कंपनी की नीतियां रियासत की कृषि, उद्योग और व्यापार को बरबाद कर देंगी. लिहाजा उन्होंने और पड़ोसी रियासत कोच्चि ने भी थंपी का साथ दिया. बाद में कोच्चि रियासत के धोखे की वजह से थंपी को पराजय का मुंह देखना पड़ा और उन्होंने कैद की जलालत से बचने के लिये आत्महत्या कर ली. ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्नल मैकाले ने थंपी के सहयोगियों ेके साथ बेहद अमानवीय और जघन्य बर्ताव किया. वेलु थंपी के पहले से ही मृत होने के बावजूद सार्वजनिक तौर पर फांसी दी गयी.
1857 से पहले अंग्रेजों के खिलाफ हुए विद्रोहों में खानदेश के भीलों का विद्रोह (1817 और 1825), छोटानागपुर और सिंहभूम के हो और मुंडा आदिवासियों का विद्रोह (1820 और 1831 ) तथा पश्चिमी घाट की रामोस जनजाति का विद्रोह (1822 और 1825) भी शामिल है. अहोम साम्राज्य पर अंग्रेजों के कब्जे के विरोध में असम के कुलीनों ने गोमधर कुंवर की अगुवाई में 1828 में बगावत कर दी. इसके नाकाम रहने के बाद 1830 में दूसरा अहोम विद्रोह शुरू हुआ, जिसका अंत भी पहले की तरह ही रहा.
1831 का कोल विद्रोह, 1833 का खासी विद्रोह, 1839 का सतारा विद्रोह और 1855 का संताल विद्रोह भी कुछ ऐसी ही घटनाएं हैं, जिनमें 1857 की क्रांति की आहट को देखा जा सकता है. अंग्रेजों का अपनी सेवा में लगे भारतीय सिपाहियों के प्रति बर्ताव भी अच्छा नहीं था. तनख्वाह तथा अन्य भत्तों और सुविधाओं के मामले में भारतीय सिपाहियों के खिलाफ भेदभाव किया जाता था. इसके खिलाफ 1764 में बंगाल, 1806 में वेल्लोर, 1825 में असम, 1838 में शोलापुर और 1849-50 में पंजाब के गोविंदगढ़ में सिपाहियों ने बगावत छेड़ दी.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने 24 अगस्त, 1608 को पहली बार भारत की जमीन पर कदम रखा था. उसे अपने आगमन के पहले 100 वर्षों में ही भारत में अनेक स्थान पर प्रतिरोधों का सामना करना पड़ा था. कंपनी का विस्तारवादी और शोषक चरित्र जैसे-जैसे उजागर होता गया उसके खिलाफ बगावत की घटनाएं भी बढ़ती गयीं. बेशक ये विद्रोह सीमित क्षेत्रों में ही केन्द्रित और अपने स्वरूप में छोटे थे. लेकिन भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में इनके महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता. वर्ष 1857 की क्रांति को समग्रता के साथ समझने के लिये इन विद्रोहों का अध्ययन जरूरी है. लिहाजा इतिहास की किताबों में सिर्फ  पाइका विद्रोह ही नहीं, बल्कि इन सभी विद्रोहों को शामिल किया जाना प्रासंगिक होगा. पाइका विद्रोह के द्विशताब्दी वर्ष में सरकार ने इस दिशा में पहल की जो घोषणा की है उसका स्वागत किया जाना चाहिये.   
(लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं)  ईमेल : kr.parthiv@gmail.com