विशेष लेख


Volume-23

स्वच्छता की चुनौती
परिणाम हासिल करने और बीमारियों की रोकथाम पर नया जोर

धूर्जटि मुखर्जी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने दुनिया भर में स्वच्छता की समस्या को गंभीर बताया है। तीसरी दुनिया के देशों में तो यह समस्या और भी नाजुक है। एक अनुमान के अनुसार विश्व की 40 प्रतिशत आबादी को स्वच्छता की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वच्छता के महत्व को काफी अरसा पहले महसूस किया था। उन्होंने 40 के दशक में कहा था, ‘‘स्वच्छता का महत्व आजादी से भी ज्यादा है।’’

डब्ल्यूएचओ के अनुसार 80 प्रतिशत बीमारियां प्रदूषित जल के कारण होती हैं। जल प्रदूषण की वजह स्वच्छता और कचरे के निपटारे की अपर्याप्त व्यवस्था है। बड़ी संख्या में लोग अब भी खुले में शौच कर जलाशयों और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को दूषित करते हैं। इसलिये ग्रामीण और शहरी, दोनों तरह के क्षेत्रों में लोगों को स्वच्छता के महत्व के बारे में शिक्षित किये जाने की जरूरत है। स्वच्छता सुविधाओं और जागरूकता की कमी की वजह से राउंडवर्म और हुकवर्म जैसे आंत के कृमियों समेत कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं। कम आमदनी वाले अद्र्धशहरी और ग्रामीण इलाकों में आम तौर पर इस तरह की बीमारियां अधिक ज्यादा पायी जाती हैं। इस तरह मल से संबंधित बीमारियों की रोकथाम के लिये स्वच्छता बुनियादी ढांचागत उपाय है।

इन तथ्यों के मद्देनजर भारत ने स्वच्छता को स्वास्थ्य की बुनियाद के रूप में स्वीकार किया है। अस्वच्छ वातावरण अनेक बीमारियों के प्रसार के लिये आधार मुहैया कराता है। देश ने स्वच्छता सुविधाओं में सुधार और सभी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की चुनौती कबूल की है। केन्द्र सरकार ने 2 अक्टूबर, 2014 को शुरू किये गये स्वच्छ भारत अभियानको बेहद संजीदगी से चलाया है। 2019 में महात्मा गांधी का 150वां जन्मदिवस मनाया जायेगा और उस वर्ष तक देश को स्वच्छ बनाने के लिये इस अभियान का नेतृत्व प्रधानमंत्री खुद कर रहे हैं।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक तौर पर स्वच्छता भारत के मूल में रही है। फिर भी मौजूदा समय में देश की 48 प्रतिशत आबादी खुले में ही शौच करती है। यह सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों की समस्या नहीं है। विश्व में शहरी क्षेत्रों में खुले में शौच करने वालों की आबादी का 46 प्रतिशत हिस्सा भारत में ही है। महिलाओं के खिलाफ 70 प्रतिशत अपराध खुले में शौच के कारण होते हैं।

निर्मल भारत कार्यक्रमने स्वच्छ और स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण की दिशा में एक नया वातायन खोला है। इसमें खुले में शौच की पारंपरिक आदत से पूरी तरह मुक्त एक ऐसे देश की कल्पना की गयी है जिसमें जीवन की गुणवत्ता में सुधार के साथ हर व्यक्ति के महत्व का सम्मान किया जायेगा। लगभग एक दशक पहले 5000 से ज्यादा शहरों में से सिर्फ 237 में आंशिक तौर पर सीवरेज प्रणाली मौजूद थी। लेकिन अब स्थिति में काफी सुधार आया है और लगभग 70 प्रतिशत शहरी आबादी को मानव मल के सुरक्षित निपटारे की सुविधा उपलब्ध है। मौजूदा सरकार के विशेष प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा सिर्फ 20 प्रतिशत से बढ़ कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुंच गया है। मगर अब भी गांवों में सबसे ज्यादा लोग खुले में ही शौच करते हैं।

कहा जा सकता है कि देश में 50 से 60 प्रतिशत परिवारों तक स्वच्छता सुविधाएं पहुंचायी जा चुकी हैं। लेकिन सिर्फ 30 से 35 प्रतिशत अवशिष्ट जल और सीवेज का नदियों और अन्य जल स्रोतों में प्रवाह से पहले परिशोधन किया जाता है। नतीजतन हर साल लगभग 4 लाख बच्चे  स्वच्छता की खराब स्थिति की वजह से हैजा और दस्त जैसी बीमारियों से पीडि़त होकर मौत के मुंह में चले जाते हैं या उनका विकास अवरुद्ध हो जाता है। इस तथ्य की तरफ खास तौर से ध्यान देने की जरूरत है। सरकार ने इस स्थिति में सुधार के लिये राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशनजैसा बड़ा कार्यक्रम चलाया है। इसमें गंगा की सफाई के अलावा यह सुनिश्चित करने के लिये बड़े शहरों में परिशोधन संयंत्र लगाने का प्रावधान है कि नदी प्रदूषित नहीं हो। यमुना नदी की सफाई के लिये भी इसी तरह का कार्यक्रम तैयार किया गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों के पानी का इस्तेमाल नहाने के अलावा खाना पकाने और पीने के लिये भी किया जाना एक बड़ी समस्या है। क्लोरीन के जरिये तालाबों की समय-समय पर सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। महज कुछेक पंचायतें ही इस जरूरत से वाकिफ हैं। जलाशय पूरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं और उनमें मल कॉलीफॉर्म की गिनती 5000 से 50000 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर तक है। गंगा का पानी सफाई की तमाम कोशिशों के बावजूद नहाने तक के योग्य नहीं है। सामुदायिक स्वास्थ्य तथा पारिवारिक और पर्यावरणीय स्वच्छता के बीच संबंध के बारे में आम धारणा वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित नहीं है। ग्रामीण आबादी के बीच हाल में किये गये एक नमूना सर्वेक्षण में पाया गया कि 75 प्रतिशत लोग स्वास्थ्य पर खुले शौच के हानिकारक प्रभाव से अनजान थे।

देश तथा खास तौर से पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में बढ़ते आर्सेनिक प्रदूषण ने समस्या को और भी जटिल बना दिया है। स्वादहीन और गंधहीन अकार्बनिक यौगिक आर्सेनिक ट्रायऑक्साइड काफी जहरीला होता है। आर्सेनिक प्रदूषण का संबंध सिंचाई के लिये भूजल के अत्यधिक इस्तेमाल से है। सालाना एक के बजाय अब तीन फसलें लिये जाने के कारण फॉस्फेट उर्वरकों का इस्तेमाल भी तीन गुना हो गया है। उर्वरक और सड़े हुए कार्बनिक पदार्थों से भूजल में पहुंचने वाला फॉस्फेट जंतुओं और पादपों के अवसाद के विकास को बढ़ाता है। इन मिलीजुली माइक्रो जीव वैज्ञानिक और रासायनिक प्रक्रियाओं से और आर्सेनिक पैदा होता है।

देश में फ्लोरोसिस का प्रसार भी हो रहा है। लगभग 19 राज्यों में फ्लोराइड वाले खनिजों की प्राकृतिक मौजूदगी के कारण उनकी पहचान फ्लोरोसिस प्रभावित राज्य के तौर पर की गयी है। देश के 200 से ज्यादा जिलों में लगभग 6.5 करोड़ आबादी फ्लोरोसिस से ग्रस्त है।

पहली से 11वीं पंचवर्षीय योजना तक पेयजल और स्वच्छता के क्षेत्रों में लगातार प्रगति हुई है। लेकिन उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञ मानते हैं कि अब तक केन्द्र और राज्यों में स्वास्थ्य, पर्यावरण और ग्रामीण विकास विभागों का अलग-अलग काम करना इस समस्या से निपटने में कारगर साबित नहीं हुआ है। डब्ल्यूएचओ के सुपरिचित विशेषज्ञ तथा राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण के पूर्व सदस्य प्रो0 केजे नाथ के अनुसार मौजूदा व्यवस्था की मूलभूत खामियां इस प्रकार हैं-

1.स्वास्थ्य विभाग के तहत पर्यावरणीय स्वास्थ्य के एक ऐसे केन्द्रीय सेक्टर का अभाव जिसमें पर्यावरणीय रोगनियंत्रण विज्ञान, पर्यावरणीय स्वास्थ्य और सामाजिक-परिस्थिति विज्ञान के विशेषज्ञ शामिल हों।

2.पर्यावरण और स्वास्थ्य से संबंधित समुचित कानूनों का अभाव।

3.पर्यावरण और पर्यावरणीय रोगनियंत्रण विज्ञान से जुड़े पहलुओं तथा वायु, जल, मिट्टी, आवास और पारिस्थितिकी से संबंधित पर्यावरणीय स्वास्थ्य प्रभावों पर सूचना का अभाव।

4.स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण और विन्यास का अभाव।

5.जनता में जागरूकता, समझ और जोखिम के ज्ञान की कमी तथा संचार रणनीतियों का अभाव।

सरकार ने इनमें से कुछ सुझावों पर गौर किया है। वह पानी और स्वच्छता के बारे में ग्रामीण आबादी में बड़े पैमाने पर जागरूकता फैलाने के लिये गंभीरता से काम कर रही है। इस संबंध में 11 अक्टूबर, 2014 को शुरू की गयी सांसद आदर्श ग्राम योजना का जिक्र किया जा सकता है। इसके तहत हर सांसद आदर्श भारतीय गांव के महात्मा गांधी के दृष्टिकोण को मूर्त रूप देने के लिये गांवों को गोद लेगा। स्वच्छता इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इस ओर काफी प्रगति भी हुई है। उम्मीद है कि 2019 तक इस दिशा में अनुकरणीय उपलब्धियां हासिल कर ली जायेंगी।

इस सिलसिले में जमीनी स्तर तक पहुंचने की जिम्मेदारी विषय की विशेषज्ञता और दक्षता रखने वाले सिविल सोसायटी संगठनों को सौंपी जानी चाहिये। पंचायत प्रतिनिधियों के प्रशिक्षण और आम लोगों को आसान भाषा में समझाने का दायित्व भी इन संगठनों को ही दिया जाना  चाहिये ताकि लोग स्वच्छता, पानी और मानव स्वास्थ्य के मूलभूत संबंधों को ध्यान में रखते हुए अपनी पुरानी आदतों में बदलाव लाने के लिये तैयार हों।

शौचालय बनाने में सक्षम अनेक परिवार भी खुले में शौच को तरजीह देते हैं। स्वयंसेवी संगठनों और पंचायतों को स्वच्छता और मानव स्वास्थ्य के बीच आधारभूत संबंध के बारे में लोगों को नियमित तौर पर बताना चाहिये ताकि वे शौचालय बनाने के लिये प्रेरित हों और इस तरह अपने घर के आसपास स्वस्थ वातावरण बना कर परिवार को निरोग रख रख सकें। बैंक भी शौचालय बनाने के लिये कम ब्याज दर पर छोटे कर्ज दे सकते हैं जिन्हें लगभग साल भर में चुकाया जा सके।

देश में स्वास्थ्य पर पर्यावरण के प्रभाव के बारे में रोग नियंत्रण विज्ञान संबंधी अनुसंधान कार्यक्रम की जरूरत है जो पानी और स्वच्छता के अलावा हवा और मिट्टी से भी संबंधित हो और जिससे समस्याओं की सही समझ पैदा हो सके। इस अनुसंधान के निष्कर्षों की जानकारी निचले स्तर तक दी जानी चाहिये ताकि मानव और खास तौर से बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिये समुचित कदम उठाये जा सकें।

जल की बेहतर उपलब्धता और स्वच्छता की सुविधाओं के जरिये देश को साफसुथरा बनाने की चुनौती वित्तीय और सामाजिक, दोनों दृष्टिकोणों से वास्तव में बहुत बड़ी है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने जरूरी वित्तीय संसाधन उपलब्ध करा इस दिशा में निस्संदेह बड़ा कदम उठाते हुए अपनी राजनीतिक इच्छा शक्ति और प्रतिबद्धता प्रदर्शित की है। निजी क्षेत्र को भी गांवों में स्कूलों और अन्य शैक्षिक संस्थानों में शौचालयों के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिये। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना चाहिये कि ऐसे शौचालयों में पानी उपलब्ध हो। पाया गया है कि लड़कियों के कुछ शौचालय पानी के अभाव में इस्तेमाल करने योग्य नहीं हैं।

प्रधानमंत्री ने जिस पूरी तरह साफसुथरे पर्यावरण की ओर इशारा किया है उसके निर्माण के लिये सरकार के अलावा सक्रिय सामुदायिक भागीदारी के जरिये निजी क्षेत्र की समर्पित कार्रवाई वक्त की जरूरत है। संसाधन तो हैं मगर इस मुहिम को वर्गों, जातियों और समुदायों के बंधनों से परे जन अभियान बनाना जरूरी है। हम अपने घर की तरह ही अपने आस-पड़ोस के बारे में भी सोचें और उसे साफ सुथरा रखने की कोशिश करें तो देश की तस्वीर निश्चित तौर पर बदल सकती है।

 

(लेखक एक पत्रकार हैं। वह पिछले तीन दशकों से विकास और पर्यावरण से संबंधित मसलों पर गांधीवादी नजरिये से लिखते और बोलते रहे हैं।)